22 Sep किशाऊ परियोजना विवाद: पंजाब सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा, जानें पूरा मामला
✎ किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है और हाल ही में हुए समझौते से पंजाब को बाहर रखने के कारण यह अंतरराज्यीय जल विवाद का विषय बन गई है, जिस पर पंजाब सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी में है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध, विवाद निवारण तंत्र | GS Paper III — बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा, जल संसाधन
- Prelims: किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना, टोंस नदी, यमुना नदी, अंतरराज्यीय जल विवाद, अनुच्छेद 262, अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, राष्ट्रीय परियोजना
- Essay: भारत में सहकारी संघवाद की चुनौतियाँ, जल सुरक्षा और अंतरराज्यीय सहयोग का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है और हाल ही में हुए समझौते से पंजाब को बाहर रखने के कारण यह अंतरराज्यीय जल विवाद का विषय बन गई है, जिस पर पंजाब सरकार सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी में है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना (Kishau Multipurpose Project) को लेकर छह राज्यों (उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली) के बीच एक समझौता हुआ, जिसमें पंजाब को शामिल नहीं किया गया। पंजाब सरकार ने इस समझौते पर आपत्ति जताते हुए इसे अस्वीकार्य बताया है और अपने अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में ले जाने की घोषणा की है।
पृष्ठभूमि
- किशाऊ परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देश्यीय परियोजना है, जो यमुना नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।
- यह परियोजना जल भंडारण, बिजली उत्पादन और सिंचाई सुविधाओं के विकास के लिए डिज़ाइन की गई है।
- परियोजना की कुल जल भंडारण क्षमता 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) है, जिसमें से हरियाणा को 633 MCM, उत्तर प्रदेश को 411 MCM, राजस्थान को 124 MCM और दिल्ली को 80 MCM पानी आवंटित किया गया है।
- इस परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता 422 मेगावाट है, जिससे सालाना लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ बिजली पैदा होने का अनुमान है।
- केंद्र सरकार ने इस परियोजना को ‘राष्ट्रीय परियोजना’ घोषित किया है, जिसका अर्थ है कि इसके वित्तीय बोझ का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी।
- पंजाब सरकार का दावा है कि 1954 के समझौते के तहत यमुना के पानी में उसके अधिकार स्वीकार किए गए थे, और पंजाब पुनर्गठन के बाद भी ये अधिकार समाप्त नहीं माने जा सकते।
अंतरराज्यीय जल विवाद और संवैधानिक प्रावधान
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतरराज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है।
- अनुच्छेद 262(1) संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतरराज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 262(2) संसद को यह शक्ति देता है कि वह कानून द्वारा यह प्रावधान कर सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी भी विवाद या शिकायत के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा।
- संसद ने इस शक्ति का प्रयोग करते हुए ‘अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956’ (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है।
- यह अधिनियम केंद्र सरकार को अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- सर्वोच्च न्यायालय आमतौर पर न्यायाधिकरण के निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करता है, हालांकि कुछ मामलों में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार बरकरार रखा गया है।
- अंतरराज्यीय जल विवाद भारत में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि जल राज्यों का विषय है और इसके बंटवारे पर अक्सर राज्यों के बीच मतभेद उत्पन्न होते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना | हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित; यमुना की सहायक नदी पर जल भंडारण और बिजली उत्पादन। |
| जल भंडारण क्षमता | 1,562 दस लाख घन मीटर; छह राज्यों (हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड) को पानी का आवंटन। |
| बिजली उत्पादन | 422 मेगावाट की क्षमता; सालाना 1,476 दस लाख यूनिट स्वच्छ बिजली का उत्पादन अनुमानित। |
| सिंचाई सुविधा | लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा विकसित करने का लक्ष्य। |
| राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा | केंद्र सरकार द्वारा घोषित; वित्तीय बोझ का 90 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी। |
महत्व
अंतर-राज्यीय जल विवाद समाधान
- यह परियोजना लंबे समय से अंतर-राज्यीय जल बंटवारे के मतभेदों के कारण अटकी हुई थी, जिसका समाधान एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
- विवादों के समाधान से संबंधित राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को बढ़ावा मिलेगा, जो क्षेत्रीय विकास के लिए आवश्यक है।
जल सुरक्षा और प्रबंधन
- परियोजना से विभिन्न राज्यों, विशेषकर दिल्ली और हरियाणा जैसे जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों में पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
- टोंस नदी पर बांध के निर्माण से बाढ़ नियंत्रण और सूखे की स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी, जिससे जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन होगा।
ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा
- 422 मेगावाट की जलविद्युत उत्पादन क्षमता से राष्ट्रीय ग्रिड में स्वच्छ ऊर्जा का योगदान होगा, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी।
- स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन भारत के जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में सहायक होगा।
कृषि और ग्रामीण विकास
- लगभग 97 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा से कृषि उत्पादकता बढ़ेगी, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
- सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से कृषि में स्थिरता आएगी और मानसून पर निर्भरता कम होगी।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- पंजाब सरकार का यह दावा कि उसे समझौते से बाहर रखा गया है और उसके यमुना जल अधिकारों की अनदेखी की गई है, एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद पैदा कर सकता है।
- 1954 के समझौते और पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत पंजाब के जल अधिकारों की व्याख्या पर मतभेद, सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता को दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. कानूनी और संवैधानिक चुनौतियाँ
- पंजाब द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने से परियोजना के कार्यान्वयन में देरी हो सकती है और कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
- संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान की प्रक्रिया और न्यायाधिकरणों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक प्रावधान
3. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
- बड़े बांधों के निर्माण से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और विस्थापन पर प्रभाव पड़ सकता है, जिसके लिए उचित मूल्यांकन और शमन उपायों की आवश्यकता है।
- परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों के पुनर्वास और मुआवजे से संबंधित मुद्दे सामाजिक स्वीकार्यता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन, सतत विकास
4. वित्तीय और कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियाँ
- राष्ट्रीय परियोजना के रूप में केंद्र सरकार द्वारा 90 प्रतिशत वित्तीय सहायता के बावजूद, शेष 10 प्रतिशत और परियोजना के समय पर पूरा होने में राज्यों के बीच समन्वय आवश्यक है।
- परियोजना की लागत में वृद्धि और समय-सीमा का पालन न करना अक्सर बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में आम चुनौतियाँ होती हैं।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढांचा विकास, सार्वजनिक वित्त
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पंजाब को समझौते से बाहर रखना | पंजाब सरकार का दावा है कि उसके यमुना जल अधिकारों की अनदेखी की गई है, जो 1954 के समझौते और पंजाब पुनर्गठन अधिनियम के तहत स्थापित हैं। |
| कानूनी विवाद | पंजाब सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में जाने की तैयारी से परियोजना के कार्यान्वयन में देरी और एक लंबी कानूनी लड़ाई की संभावना। |
| अंतर-राज्यीय समन्वय का अभाव | छह राज्यों के बीच समझौता होने के बावजूद, एक महत्वपूर्ण हितधारक (पंजाब) को शामिल न करने से संघवाद के सिद्धांतों पर सवाल उठते हैं। |
| जल आवंटन में असंतुलन | पंजाब का आरोप है कि उसकी गैरमौजूदगी में उसके हितों को प्रभावित करने वाला फैसला लिया गया है, जिससे जल आवंटन में असंतुलन हो सकता है। |
| ऐतिहासिक अधिकारों की अनदेखी | पंजाब का तर्क है कि 1954 में स्वीकार किए गए उसके यमुना संबंधी अधिकारों को पंजाब पुनर्गठन के बाद भी समाप्त नहीं माना जा सकता। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी हितधारक राज्यों, विशेषकर पंजाब, को विश्वास में लेकर व्यापक बातचीत और परामर्श प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत एक न्यायाधिकरण का गठन या मौजूदा न्यायाधिकरणों का उपयोग करके विवाद का शीघ्र और न्यायसंगत समाधान खोजना चाहिए।
- सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन या निर्णय का सम्मान करते हुए, सभी राज्यों को संवैधानिक प्रावधानों और ऐतिहासिक समझौतों के अनुरूप समाधान स्वीकार करना चाहिए।
- जल आवंटन के लिए एक वैज्ञानिक और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें सभी राज्यों की वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।
- परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन किया जाए और प्रभावित समुदायों के लिए उचित पुनर्वास और मुआवजा सुनिश्चित किया जाए।
- दीर्घकालिक जल प्रबंधन योजनाओं को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और जल-कुशल कृषि पद्धतियों को शामिल किया जाए ताकि जल संसाधनों पर दबाव कम हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अंतर-राज्यीय जल विवाद · किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना · यमुना जल बंटवारा · सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार · संघवाद और जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 · राष्ट्रीय परियोजना · अनुच्छेद 262 · अंतर-राज्यीय परिषद · जल संसाधन प्रबंधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों के जल संबंधी विवाद’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: ‘राज्यों को जल का नियंत्रण’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची I, प्रविष्टि 56)’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों का विनियमन’}
अवधारणा प्रवाह
किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना पर समझौता → पंजाब को समझौते से बाहर रखा गया → पंजाब ने अपने यमुना जल अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाया → पंजाब सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में जाने का निर्णय → अंतर-राज्यीय जल विवाद और कानूनी चुनौती → परियोजना के कार्यान्वयन में संभावित देरी और अनिश्चितता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की एक सहायक नदी है।
2. केंद्र सरकार ने किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है और इसके वित्तीय बोझ का 90% वहन करेगी।
3. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल से संबंधित विवादों के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि किशाऊ परियोजना हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित है, जो यमुना की एक प्रमुख सहायक नदी है। कथन 2 भी सही है क्योंकि केंद्र सरकार ने इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया है और इसके वित्तीय बोझ का लगभग 90% हिस्सा केंद्र सरकार उठाएगी। कथन 3 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
Q2. अभिकथन (A): पंजाब सरकार किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना समझौते से बाहर रखे जाने के कारण सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रही है।
कारण (R): 1954 में पंजाब के यमुना संबंधी अधिकारों को स्वीकार किया गया था, और पंजाब का तर्क है कि उन अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि समाचार के अनुसार, पंजाब सरकार किशाऊ परियोजना समझौते से बाहर रखे जाने के कारण सर्वोच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रही है। कारण (R) भी सही है क्योंकि पंजाब का तर्क है कि 1954 में उसके यमुना संबंधी अधिकार स्वीकार किए गए थे, और समझौते से बाहर रखने से इन अधिकारों की अनदेखी होती है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है क्योंकि पंजाब के अधिकारों की अनदेखी ही सर्वोच्च न्यायालय जाने का मुख्य आधार है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों का परीक्षण कीजिए। किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना के संदर्भ में, ऐसे विवादों को हल करने में आने वाली चुनौतियों और उनके संभावित समाधानों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. **परिचय:** भारत में जल विवादों की पृष्ठभूमि और संघवाद पर उनके प्रभाव का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **संवैधानिक प्रावधान:**
* अनुच्छेद 262: संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार।
* अंतर-राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263): राष्ट्रपति द्वारा स्थापित की जा सकने वाली परिषद, जो राज्यों के बीच विवादों की जांच और सलाह देती है।
3. **वैधानिक प्रावधान:**
* अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956: विवादों के समाधान के लिए न्यायाधिकरणों (Tribunals) की स्थापना का प्रावधान।
* नदी बोर्ड अधिनियम, 1956: केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास के लिए नदी बोर्ड स्थापित करने का अधिकार।
4. **किशाऊ परियोजना के संदर्भ में चुनौतियाँ:**
* राज्यों के बीच विश्वास की कमी और राजनीतिकरण।
* ऐतिहासिक अधिकारों और वर्तमान आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने में कठिनाई (जैसे पंजाब का 1954 के अधिकारों का दावा)।
* न्यायाधिकरणों द्वारा निर्णय लेने में लगने वाला लंबा समय और उनके कार्यान्वयन में चुनौतियाँ।
* केंद्र सरकार की भूमिका और उसकी तटस्थता पर प्रश्न।
* पानी की बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव।
5. **संभावित समाधान:**
* सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना और राज्यों के बीच संवाद।
* स्थायी और प्रभावी विवाद समाधान तंत्र, जिसमें समयबद्ध निर्णय हों।
* वैज्ञानिक डेटा और नवीनतम तकनीक का उपयोग करके जल बंटवारे का मूल्यांकन।
* केंद्र सरकार द्वारा एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाना।
* जल को एक राष्ट्रीय संसाधन के रूप में देखना और एकीकृत जल प्रबंधन दृष्टिकोण अपनाना।
6. **निष्कर्ष:** अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान के लिए संवैधानिक ढांचे के भीतर सहयोगात्मक और दूरदर्शी नीतियों की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: amarujala.com
Punjab PCS (PPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: किशाऊ परियोजना के संबंध में पंजाब सरकार द्वारा उठाए गए विवाद के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- A. पंजाब सरकार ने किशाऊ परियोजना को समझौते से बाहर रखने की मांग की है क्योंकि यह राज्य के जल अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करता है।
- B. किशाऊ परियोजना का निर्माण केवल हिमाचल प्रदेश द्वारा किया जा रहा है, जिसमें पंजाब सरकार की कोई भूमिका नहीं है।
- C. पंजाब सरकार ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का निर्णय लिया है क्योंकि समझौते में पंजाब के जल अधिकार सुनिश्चित नहीं किए गए हैं।
- D. किशाऊ परियोजना का उद्देश्य केवल हिमाचल प्रदेश के लिए सिंचाई सुविधा प्रदान करना है, जिससे पंजाब पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उत्तर: C. पंजाब सरकार ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने का निर्णय लिया है क्योंकि समझौते में पंजाब के जल अधिकार सुनिश्चित नहीं किए गए हैं। — पंजाब सरकार ने किशाऊ परियोजना को समझौते से बाहर रखने की मांग की है, क्योंकि इसे राज्य के जल अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण माना जा रहा है।
Mains: किशाऊ परियोजना विवाद में शामिल प्रमुख मुद्दों का विश्लेषण करते हुए, पंजाब सरकार द्वारा उठाए गए कानूनी और राजनीतिक कदमों की व्याख्या कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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