08 Aug केरल में वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए 60 किमी सोलर बाड़ लगाने की तैयारी

✎ मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए केरल सरकार वायनाड में सौर बाड़ लगाएगी और भारतीय वन्यजीव संस्थान वनों की वहन क्षमता का अध्ययन करेगा।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता | GS Paper III — आपदा प्रबंधन | GS Paper II — सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप
- Prelims: मानव-वन्यजीव संघर्ष, सौर बाड़, वायनाड वन्यजीव अभयारण्य, वन्यजीव संस्थान, वहन क्षमता अध्ययन, रैपिड रिस्पांस टीम
- Essay: मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व: चुनौतियाँ और समाधान, सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए केरल सरकार वायनाड में सौर बाड़ लगाएगी और भारतीय वन्यजीव संस्थान वनों की वहन क्षमता का अध्ययन करेगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल सरकार ने वायनाड जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को कम करने के लिए 60 किलोमीटर लंबी सौर बाड़ (Solar Fencing) लगाने की घोषणा की है। यह परियोजना राज्य सरकार के 100-दिवसीय कार्य कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसमें मौजूदा 25 किलोमीटर सौर बाड़ की मरम्मत भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India – WII) को वायनाड के वनों की वहन क्षमता (Carrying Capacity) का अध्ययन करने का कार्य सौंपा गया है।
पृष्ठभूमि
- मानव-वन्यजीव संघर्ष तब होता है जब मानव बस्तियों और वन्यजीवों के आवासों के बीच अतिक्रमण और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, जिससे दोनों पक्षों को नुकसान होता है।
- वायनाड केरल का एक ऐसा जिला है जो मानव-वन्यजीव संघर्ष से सबसे अधिक प्रभावित है, क्योंकि यहाँ बड़ी संख्या में मानव बस्तियाँ वन क्षेत्रों के करीब स्थित हैं।
- इस संघर्ष के प्रमुख कारणों में वनों का विखंडन, वन्यजीव गलियारों का अवरोध, मानव बस्तियों का विस्तार, कृषि का अतिक्रमण और खाद्य स्रोतों की कमी शामिल है।
- संघर्ष के परिणामस्वरूप फसलों को नुकसान, पशुधन की हानि, मानव जीवन का नुकसान और वन्यजीवों को चोट या मृत्यु जैसे गंभीर परिणाम होते हैं।
- सौर बाड़ एक प्रभावी और पर्यावरण-अनुकूल तरीका है जो वन्यजीवों को मानव बस्तियों में प्रवेश करने से रोकने में मदद करता है, जिससे संघर्ष कम होता है।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) एक स्वायत्त संस्थान है जो वन्यजीव अनुसंधान और प्रबंधन में विशेषज्ञता रखता है, और इसकी वहन क्षमता का अध्ययन संघर्ष के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
मानव-वन्यजीव संघर्ष क्या है?
- मानव-वन्यजीव संघर्ष से तात्पर्य मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते नकारात्मक संपर्क से है, जो दोनों के लिए हानिकारक होता है।
- यह संघर्ष तब उत्पन्न होता है जब वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर मानव बस्तियों, कृषि क्षेत्रों या अन्य मानव-संशोधित परिदृश्यों में प्रवेश करते हैं।
- इसके मुख्य कारणों में आवासों का नुकसान और विखंडन, वन्यजीव गलियारों का अवरोध, मानव अतिक्रमण, कृषि का विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ती निर्भरता शामिल है।
- संघर्ष के परिणामों में फसलों का विनाश, पशुधन की हानि, मानव जीवन का नुकसान, वन्यजीवों को चोट या मृत्यु, और स्थानीय समुदायों में भय और शत्रुता शामिल हैं।
- इस समस्या के समाधान के लिए विभिन्न रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं, जैसे सौर बाड़, खाई खोदना, वन्यजीव गलियारों का निर्माण, जागरूकता कार्यक्रम और रैपिड रिस्पांस टीमें।
- वहन क्षमता अध्ययन (Carrying Capacity Study) यह निर्धारित करने में मदद करता है कि कोई विशेष पारिस्थितिकी तंत्र कितनी आबादी (मानव या वन्यजीव) को बिना अपनी गुणवत्ता खोए बनाए रख सकता है।
- भारत में, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change) और राज्य वन विभाग मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| वायनाड में 60 किलोमीटर सौर बाड़ लगाना | मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को कम करने में सहायक, विशेषकर केरल के सबसे अधिक प्रभावित जिले में। |
| मौजूदा 25 किलोमीटर सौर बाड़ की मरम्मत | बुनियादी ढांचे का रखरखाव और उसकी प्रभावशीलता सुनिश्चित करना। |
| भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India – WII) द्वारा वहन क्षमता अध्ययन | वन क्षेत्रों के निकट मानव बस्तियों की संख्या को देखते हुए बाघों और हाथियों की आबादी का आकलन, वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण। |
| वन विभाग की सड़कों पर 100 किलोमीटर तक वनस्पति हटाना | वन्यजीव प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए पहुंच में सुधार। |
| वायनाड में चार त्वरित प्रतिक्रिया टीमों (Rapid Response Teams) की तैनाती | वन्यजीव संबंधी आपात स्थितियों के लिए त्वरित और प्रभावी प्रतिक्रिया सुनिश्चित करना। |
| वन विभाग द्वारा ‘अदालत’ का आयोजन | लंबित शिकायतों का निवारण और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देना। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- सौर बाड़ लगाने से वन्यजीवों को कृषि क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोका जा सकेगा, जिससे फसलों को नुकसान और मानव जीवन को खतरा कम होगा।
- वहन क्षमता अध्ययन से वनों पर मानव गतिविधियों के दबाव को समझने में मदद मिलेगी, जिससे दीर्घकालिक संरक्षण रणनीतियाँ बनाई जा सकेंगी।
सामाजिक और सामुदायिक
- मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी से स्थानीय समुदायों, विशेषकर किसानों की सुरक्षा और आजीविका में सुधार होगा।
- वन विभाग की ‘अदालत’ और सार्वजनिक सतर्कता समितियों की भागीदारी से स्थानीय लोगों की शिकायतों का समाधान होगा और वन प्रबंधन में उनकी सहभागिता बढ़ेगी।
शासन और प्रबंधन
- त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की तैनाती और वन रक्षकों को अतिरिक्त उपकरण प्रदान करने से वन्यजीव प्रबंधन और आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता मजबूत होगी।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय (जैसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के साथ चर्चा) से बड़े पैमाने पर वन्यजीव संरक्षण के मुद्दों का समाधान संभव होगा।
चुनौतियाँ
1. मानव-वन्यजीव संघर्ष का बढ़ना
- वन्यजीवों के आवासों का सिकुड़ना और मानव बस्तियों का वनों के करीब विस्तार, संघर्ष का मुख्य कारण है।
- फसलों को नुकसान, पशुधन की हानि और मानव जीवन को खतरा स्थानीय समुदायों के लिए बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; आपदा प्रबंधन
2. वहन क्षमता का दबाव
- वन क्षेत्रों की वहन क्षमता से अधिक वन्यजीवों की संख्या या मानव बस्तियों का घनत्व पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ सकता है।
- बाघों और हाथियों जैसी बड़ी प्रजातियों के लिए पर्याप्त स्थान और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पारिस्थितिकी तंत्र; जैव विविधता
3. संरक्षण और विकास में संतुलन
- स्थानीय समुदायों की आजीविका और विकास की जरूरतों को पूरा करते हुए वन्यजीवों और उनके आवासों का संरक्षण करना एक जटिल कार्य है।
- किसानों की भूमि के स्वामित्व को बनाए रखते हुए वन भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: सतत विकास; पर्यावरण नैतिकता
4. संसाधन और बुनियादी ढांचा
- सौर बाड़ के रखरखाव, त्वरित प्रतिक्रिया टीमों के लिए प्रशिक्षण और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- वन विभाग के कर्मचारियों की संख्या और उनकी क्षमता बढ़ाना।
यूपीएससी लिंक: शासन; सार्वजनिक प्रशासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वन्यजीवों का मानव बस्तियों में प्रवेश | फसलों को नुकसान, पशुधन की हानि, मानव जीवन को खतरा। |
| वन्यजीवों के आवास का विखंडन | वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पैटर्न में व्यवधान, भोजन और पानी की कमी। |
| स्थानीय समुदायों का विरोध | मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण संरक्षण प्रयासों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण। |
| वैज्ञानिक डेटा की कमी | प्रभावी प्रबंधन रणनीतियों के लिए वन्यजीव आबादी और वहन क्षमता पर सटीक जानकारी का अभाव। |
| अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव | वन विभाग, स्थानीय स्वशासन और अन्य हितधारकों के बीच प्रभावी सहयोग की कमी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राज्य सरकार का 100-दिवसीय कार्य कार्यक्रम
आगे की राह
- मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सौर बाड़ और अन्य भौतिक बाधाओं का प्रभावी ढंग से उपयोग करना।
- भारतीय वन्यजीव संस्थान जैसे विशेषज्ञ निकायों द्वारा वहन क्षमता अध्ययन के निष्कर्षों को नीति निर्माण में शामिल करना।
- वन्यजीवों के लिए वैकल्पिक जल स्रोतों और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित कर उन्हें मानव बस्तियों से दूर रखना।
- स्थानीय समुदायों, किसानों और जनप्रतिनिधियों को वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल करना।
- वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया टीमों को उन्नत प्रशिक्षण और उपकरण प्रदान कर उनकी क्षमता को बढ़ाना।
- वन्यजीवों के स्थानांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय और सहयोग बढ़ाना।
- वन्यजीवों के व्यवहार और संघर्ष के पैटर्न को समझने के लिए निरंतर निगरानी और अनुसंधान को बढ़ावा देना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मानव-वन्यजीव संघर्ष · पर्यावरण संरक्षण · सतत विकास · वन्यजीव संरक्षण अधिनियम · पारिस्थितिकी संतुलन · सौर बाड़ लगाना · वन्यजीव गलियारे · वहन क्षमता अध्ययन · सामुदायिक भागीदारी · जलवायु परिवर्तन अनुकूलन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन
- अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन
अवधारणा प्रवाह
मानव बस्तियों का वन क्षेत्रों के निकट विस्तार → वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में कमी → वन्यजीवों का भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों में प्रवेश → मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि (फसल क्षति, जीवन हानि) → सौर बाड़ और अन्य उपायों द्वारा संघर्ष को कम करने का प्रयास → वैज्ञानिक अध्ययन और सामुदायिक भागीदारी से दीर्घकालिक समाधान
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
2. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है।
3. भारत में बाघों की जनगणना प्रत्येक चार वर्ष में एक बार की जाती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 भारत में वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। कथन 2 सही है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना है। कथन 3 गलत है। भारत में बाघों की जनगणना (बाघ गणना) प्रत्येक चार वर्ष में एक बार की जाती है, न कि प्रत्येक दो वर्ष में।
Q2. अभिकथन (A): मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान के लिए केवल तकनीकी उपाय जैसे सौर बाड़ लगाना पर्याप्त नहीं है।
कारण (R): संघर्ष के मूल कारणों में आवास का नुकसान, वन्यजीव गलियारों का विखंडन और मानव बस्तियों का वनों के करीब विस्तार शामिल है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बहुआयामी समस्या है जिसके लिए तकनीकी और सामाजिक-आर्थिक दोनों प्रकार के समाधानों की आवश्यकता होती है। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि संघर्ष के मूल कारण पर्यावरणीय और मानवीय कारकों से जुड़े हैं जिन्हें केवल तकनीकी समाधानों से हल नहीं किया जा सकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मानव-वन्यजीव संघर्ष भारत में एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती बन गया है। इस कथन के आलोक में, संघर्ष के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए और इसके शमन के लिए केरल सरकार द्वारा उठाए गए कदमों तथा अन्य संभावित रणनीतियों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिभाषा और भारत में इसकी बढ़ती गंभीरता का संक्षिप्त परिचय।
2. संघर्ष के प्रमुख कारण: आवास का नुकसान और विखंडन, वन्यजीव गलियारों का अतिक्रमण, मानव बस्तियों का विस्तार, कृषि पद्धतियाँ, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, शिकार और अवैध व्यापार।
3. केरल सरकार के कदम (वायनाड के संदर्भ में): 60 किमी सौर बाड़ लगाने की योजना, मौजूदा बाड़ की मरम्मत, वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India – WII) द्वारा वहन क्षमता (carrying capacity) अध्ययन, रैपिड रिस्पांस टीमें, वन विभाग सड़कों की सफाई, शिकायत निवारण के लिए अदालतें।
4. अन्य संभावित रणनीतियाँ: सामुदायिक भागीदारी और जागरूकता कार्यक्रम, फसल क्षतिपूर्ति योजनाएँ, वैज्ञानिक वन्यजीव प्रबंधन (जैसे स्थानांतरण), भूमि उपयोग योजना, प्रौद्योगिकी का उपयोग (जैसे प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली), सह-अस्तित्व के मॉडल।
5. निष्कर्ष: संघर्ष के समाधान के लिए एक समग्र, बहु-हितधारक दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें संरक्षण और मानव कल्याण दोनों को प्राथमिकता दी जाए।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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