23 Sep मुस्लिम महिलाओं को विरासत में समान अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा जवाब
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के विरासत अधिकारों में कथित लैंगिक असमानता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है, जिससे व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा और लैंगिक न्याय पर बहस फिर से…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, महिलाओं की भूमिका | GS Paper II — भारतीय संविधान, मौलिक अधिकार, न्यायपालिका, केंद्र सरकार की नीतियां | GS Paper IV — नैतिकता और मानवाधिकार
- Prelims: मुस्लिम पर्सनल लॉ, विरासत अधिकार, उत्तराधिकार कानून, समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), भेदभाव पर रोक (अनुच्छेद 15), जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21), शायरा बानो वाद, जनहित याचिका (PIL)
- Essay: भारत में लैंगिक न्याय और व्यक्तिगत कानूनों की भूमिका, समान नागरिक संहिता की दिशा में न्यायिक हस्तक्षेप और संवैधानिक मूल्य
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं के विरासत अधिकारों में कथित लैंगिक असमानता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है, जिससे व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा और लैंगिक न्याय पर बहस फिर से शुरू हो गई है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत और उत्तराधिकार के नियमों में कथित लैंगिक असमानता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। याचिका में तर्क दिया गया है कि वर्तमान व्यवस्था में महिला उत्तराधिकारियों को पुरुष उत्तराधिकारियों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है, जिससे उन्हें पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में समान अधिकारों से वंचित किया जाता है। न्यायालय ने इन नियमों की संवैधानिक वैधता पर विचार करने की सहमति व्यक्त की है, जो लैंगिक भेदभाव को संस्थागत रूप देने के आरोपों से घिरे हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए व्यक्तिगत कानून (Personal Laws) हैं जो विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार जैसे मामलों को नियंत्रित करते हैं। मुस्लिम समुदाय के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत शरिया कानून के प्रावधान लागू होते हैं।
- मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत के नियम गैर-संहिताबद्ध हैं और इस्लामी न्यायशास्त्र के विभिन्न स्कूलों की व्याख्याओं पर आधारित हैं। पारंपरिक रूप से, कुछ मामलों में महिला उत्तराधिकारियों को पुरुष उत्तराधिकारियों की तुलना में आधा हिस्सा मिलता है।
- संविधान का अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार की गारंटी देता है, अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है, और अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण करता है।
- पूर्व में, सर्वोच्च न्यायालय ने शायरा बानो वाद (Shayara Bano case) में ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक घोषित करते हुए व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा की शक्ति पर जोर दिया था।
- यह याचिका मुस्लिम महिलाओं के संपत्ति अधिकारों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने की मांग करती है, जो भारत में लैंगिक न्याय के व्यापक विमर्श का हिस्सा है।
- केंद्र सरकार को युवा मामले और खेल मंत्रालय के साथ-साथ कानून एवं न्याय मंत्रालय के माध्यम से इस मामले पर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए नोटिस जारी किया गया है।
भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ और विरासत अधिकार
- मुस्लिम पर्सनल लॉ, जिसे शरिया कानून के रूप में भी जाना जाता है, भारत में मुसलमानों के व्यक्तिगत मामलों, जैसे विवाह, तलाक, भरण-पोषण, वसीयत और विरासत को नियंत्रित करता है।
- यह कानून मुख्य रूप से कुरान, सुन्नत (पैगंबर मुहम्मद की परंपराएं), इज्मा (विद्वानों की सहमति) और क़ियास (तुलनात्मक तर्क) पर आधारित है।
- विरासत के संबंध में, मुस्लिम पर्सनल लॉ में उत्तराधिकारियों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है: हिस्सेदार (Sharers) और अवशिष्ट (Residuaries)। हिस्सेदारों को संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा मिलता है, जबकि अवशिष्टों को हिस्सेदारों को भुगतान के बाद बची हुई संपत्ति मिलती है।
- पारंपरिक व्याख्याओं के अनुसार, कुछ स्थितियों में, एक बेटी को बेटे के हिस्से का आधा हिस्सा मिलता है, इस तर्क के साथ कि पुरुषों पर परिवार के वित्तीय भरण-पोषण की अधिक जिम्मेदारी होती है।
- याचिका में इस प्रावधान को लैंगिक भेदभावपूर्ण बताया गया है और संवैधानिक सिद्धांतों, विशेषकर अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करने वाला करार दिया गया है।
- यह मामला व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा के दायरे और न्यायपालिका की भूमिका पर महत्वपूर्ण बहस को फिर से सामने लाता है।
- भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की अवधारणा भी इस संदर्भ में प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि यह सभी नागरिकों के लिए समान व्यक्तिगत कानूनों की वकालत करती है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।
- सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मुस्लिम महिलाओं के संपत्ति अधिकारों और भारत में लैंगिक न्याय के भविष्य पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मुस्लिम पर्सनल लॉ | यह मुसलमानों के व्यक्तिगत मामलों, जैसे विवाह, तलाक और विरासत को नियंत्रित करता है। यह गैर-संहिताबद्ध नियमों पर आधारित है। |
| विरासत में लैंगिक असमानता | याचिका में दावा किया गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिला उत्तराधिकारियों को पुरुष उत्तराधिकारियों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है, जिससे लैंगिक भेदभाव होता है। |
| समान अधिकार की मांग | याचिका में मुस्लिम महिलाओं के लिए पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में समान विरासत और उत्तराधिकार अधिकारों की मांग की गई है। |
| संवैधानिक वैधता को चुनौती | मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत के नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, विशेष रूप से अनुच्छेद 14, 15 और 21 के उल्लंघन के आधार पर। |
| केंद्र सरकार से जवाब | सर्वोच्च न्यायालय ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, जो नीतिगत और कानूनी निहितार्थों को दर्शाता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह मुद्दा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और समाज में उनकी स्थिति से संबंधित है, जो लैंगिक न्याय और समानता की व्यापक बहस का हिस्सा है।
- यह व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है ताकि वे आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हों।
कानूनी महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय का यह कदम व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा के दायरे को फिर से स्थापित कर सकता है, जैसा कि शायरा बानो मामले में देखा गया था।
- यह निर्णय भारत में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है, यदि न्यायालय व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का निर्देश देता है।
शासन और नीतिगत महत्व
- केंद्र सरकार से जवाब मांगने से सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और संभावित नीतिगत बदलावों पर विचार करना होगा।
- यह धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत कानूनों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर करता है, जो भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक प्रमुख विशेषता है।
चुनौतियाँ
1. धार्मिक स्वतंत्रता बनाम लैंगिक समानता
- व्यक्तिगत कानून धार्मिक प्रथाओं से जुड़े होते हैं, और उनमें बदलाव को धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।
- लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, धर्मनिरपेक्षता, मौलिक अधिकार
2. समान नागरिक संहिता का मुद्दा
- मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार की मांग अक्सर समान नागरिक संहिता (UCC) की बहस को जन्म देती है, जो एक विवादास्पद मुद्दा है।
- समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून प्रदान करना है।
यूपीएससी लिंक: राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत, समान नागरिक संहिता
3. न्यायिक सक्रियता और विधायी भूमिका
- न्यायालय द्वारा व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप को न्यायिक सक्रियता के रूप में देखा जा सकता है, जबकि कानून बनाने का कार्य विधायिका का है।
- न्यायालय को संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने और व्यक्तिगत कानूनों की समीक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, विधायिका और न्यायपालिका के कार्य
4. सामाजिक स्वीकृति और कार्यान्वयन
- व्यक्तिगत कानूनों में कोई भी बदलाव समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए, विशेष रूप से धार्मिक समुदायों द्वारा।
- कानूनी सुधारों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक जागरूकता और शिक्षा महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुस्लिम पर्सनल लॉ में लैंगिक असमानता | महिला उत्तराधिकारियों को पुरुष उत्तराधिकारियों की तुलना में कम हिस्सा मिलता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है। |
| संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन | मौजूदा व्यवस्था को अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव पर रोक) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। |
| व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा | यह प्रश्न उठता है कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को संवैधानिक समीक्षा से छूट दी जा सकती है, खासकर जब वे मनमाने परिणाम देते हैं। |
| समान नागरिक संहिता की ओर संकेत | व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की मांग अक्सर समान नागरिक संहिता के कार्यान्वयन की बहस को पुनर्जीवित करती है। |
| केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया | केंद्र सरकार को इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और संभावित कानूनी या नीतिगत बदलावों पर विचार करना होगा। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय को सभी हितधारकों, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं की दलीलों पर विचार करना चाहिए।
- केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर एक व्यापक और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए, जो संवैधानिक सिद्धांतों और सामाजिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखे।
- विधायिका को व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के लिए एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, यदि आवश्यक हो तो परामर्श और आम सहमति के माध्यम से कानून बनाना चाहिए।
- मुस्लिम महिलाओं के बीच उनके अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि वे न्याय के लिए अपनी लड़ाई लड़ सकें।
- धार्मिक नेताओं और विद्वानों को लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप व्यक्तिगत कानूनों की व्याख्या और सुधार में रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
- दीर्घकालिक समाधान के रूप में, समान नागरिक संहिता पर व्यापक राष्ट्रीय बहस और आम सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुस्लिम पर्सनल लॉ · विरासत के अधिकार · लैंगिक समानता · समान नागरिक संहिता · अनुच्छेद 14 · अनुच्छेद 15 · अनुच्छेद 21 · शायरा बानो मामला · संवैधानिक नैतिकता · न्यायिक समीक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘भेदभाव पर रोक’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 44’, ‘note’: ‘समान नागरिक संहिता’}
अवधारणा प्रवाह
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ को चुनौती → विरासत में लैंगिक असमानता का आरोप → मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, 15, 21) का उल्लंघन → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र से जवाब मांगना → व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक समीक्षा की संभावना → लैंगिक समानता और न्याय की स्थापना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ को शरिया कानून के नाम से भी जाना जाता है।
2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) से संबंधित है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने ‘शायरा बानो बनाम भारत संघ’ मामले में तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है। मुस्लिम पर्सनल लॉ को शरिया कानून के नाम से जाना जाता है, लेकिन भारत में यह शरिया कानून का पूर्ण और सीधा अनुप्रयोग नहीं है, बल्कि भारतीय विधायी ढांचे के तहत मान्यता प्राप्त एक व्यक्तिगत कानून है। कथन 2 सही है। अनुच्छेद 44 राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के तहत समान नागरिक संहिता को लागू करने का प्रावधान करता है। कथन 3 सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2017 में ‘शायरा बानो बनाम भारत संघ’ मामले में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित किया था।
Q2. अभिकथन (A): भारत में व्यक्तिगत कानूनों को संवैधानिक समीक्षा से छूट नहीं दी जा सकती।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 13(1) के अनुसार, संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले भारत में प्रवृत्त सभी विधियाँ, जहाँ तक वे इस भाग के उपबंधों से असंगत हैं, उस असंगति की मात्रा तक शून्य होंगी।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सत्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत कानून भी मौलिक अधिकारों के अधीन हैं और उनकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा की जा सकती है। कारण (R) भी सत्य है। अनुच्छेद 13(1) ‘विधि’ की परिभाषा में व्यक्तिगत कानूनों को शामिल करता है, जिसका अर्थ है कि वे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इस प्रकार, R, A का सही स्पष्टीकरण है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत और उत्तराधिकार के नियमों में लैंगिक असमानता को चुनौती देने वाली हालिया याचिका के आलोक में, भारत में व्यक्तिगत कानूनों की संवैधानिक वैधता की न्यायिक समीक्षा के दायरे का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: हालिया सुप्रीम कोर्ट की याचिका का संदर्भ दें, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत में लैंगिक असमानता को चुनौती दी गई है।
2. व्यक्तिगत कानूनों की स्थिति: भारत में व्यक्तिगत कानूनों (जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ) की उत्पत्ति और उनके लागू होने की संक्षिप्त व्याख्या।
3. संवैधानिक प्रावधान: उन मौलिक अधिकारों का उल्लेख करें जिनका उल्लंघन होने का आरोप है (अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार, अनुच्छेद 15 – भेदभाव पर रोक, अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)।
4. न्यायिक समीक्षा का दायरा: स्पष्ट करें कि क्या व्यक्तिगत कानून ‘राज्य’ की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं और क्या वे ‘विधि’ की परिभाषा में शामिल हैं (अनुच्छेद 13)।
5. प्रमुख न्यायिक निर्णय: ‘शायरा बानो बनाम भारत संघ’ मामले का हवाला दें, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करते हुए व्यक्तिगत कानूनों पर न्यायिक समीक्षा के दायरे को बढ़ाया। ‘सरला मुद्गल बनाम भारत संघ’ जैसे अन्य प्रासंगिक मामलों का भी उल्लेख किया जा सकता है।
6. तर्क और चुनौतियाँ: याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए तर्कों को प्रस्तुत करें (लैंगिक भेदभाव, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन)। साथ ही, व्यक्तिगत कानूनों में सुधार के मार्ग में आने वाली चुनौतियों (धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता) पर भी प्रकाश डालें।
7. समान नागरिक संहिता (UCC) से संबंध: अनुच्छेद 44 और समान नागरिक संहिता की अवधारणा को संक्षिप्त रूप से जोड़ें, क्योंकि यह व्यक्तिगत कानूनों में सुधार का एक संभावित समाधान है।
8. निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें, जिसमें संवैधानिक नैतिकता और लैंगिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए व्यक्तिगत कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया जाए।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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