चमोली सुरंग हादसा: 2 श्रमिक लापता, बचाव अभियान तीव्र; जानिए नवीनतम अपडेट्स

Chamoli Tunnel Landslide: दो श्रमिक टनल में अभी भी लापता, खोज एंव बचाव अभियान जारी — diagram

चमोली सुरंग हादसा: 2 श्रमिक लापता, बचाव अभियान तीव्र; जानिए नवीनतम अपडेट्स

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Chamoli Tunnel Landslide

✎ पर्वतीय क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आपदा प्रबंधन तंत्र को सुदृढ़ करना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, आपदाएँ और आपदा प्रबंधन)  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन (आपदाओं के प्रकार, न्यूनीकरण और तैयारी)  |  GS Paper III — पर्यावरण (पर्यावरण प्रभाव आकलन, सतत विकास)
  • Prelims: आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), पर्वतीय पारिस्थितिकी, जलविद्युत परियोजनाएँ, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)
  • Essay: पर्वतीय विकास और पर्यावरणीय संतुलन: चुनौतियाँ और समाधान, भारत में आपदा प्रबंधन: तैयारी से प्रतिक्रिया तक की यात्रा

त्वरित पुनरावृत्ति: पर्वतीय क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और आपदा प्रबंधन तंत्र को सुदृढ़ करना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

उत्तराखंड के चमोली जिले में पीपलकोटी-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की एक निर्माणाधीन सुरंग में हुए भूस्खलन के कारण कई श्रमिक फंस गए थे। इस घटना में कुछ श्रमिकों की मृत्यु हो गई है, जबकि दो श्रमिक अभी भी लापता हैं, जिनकी तलाश के लिए खोज एवं बचाव अभियान जारी है। यह घटना पर्वतीय क्षेत्रों में चल रही विकास परियोजनाओं की सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के महत्व को रेखांकित करती है।

पृष्ठभूमि

  • यह घटना चमोली जिले में THDC इंडिया लिमिटेड द्वारा निर्मित की जा रही पीपलकोटी-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना से संबंधित है।
  • सुरंग में भूस्खलन के कारण कुल 22 श्रमिक फंसे थे, जिनमें से 12 को सुरक्षित निकाल लिया गया, आठ की जान चली गई और दो अभी भी लापता हैं।
  • खोज एवं बचाव अभियान में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), पुलिस और जिला प्रशासन की टीमें शामिल हैं।
  • बचाव कार्यों में सुरंग के अंदर पानी और मलबे की उपस्थिति के कारण बाधाएँ आ रही हैं।
  • उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य भूगर्भीय रूप से संवेदनशील हैं और भूस्खलन, बाढ़ तथा भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक प्रवण हैं।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में बड़ी विकास परियोजनाओं, विशेषकर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में भूवैज्ञानिक स्थिरता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है।

भारत में आपदा प्रबंधन

  • भारत में आपदा प्रबंधन का प्राथमिक कानूनी ढाँचा आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) है, जो आपदाओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक संस्थागत तंत्र प्रदान करता है।
  • इस अधिनियम के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। यह आपदा प्रबंधन के लिए नीतियाँ, योजनाएँ और दिशानिर्देश तैयार करता है।
  • राज्य स्तर पर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्यरत हैं।
  • राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) एक विशेष बल है जिसे आपदा प्रतिक्रिया, खोज और बचाव कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
  • राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) भी राज्यों में आपदा प्रतिक्रिया के लिए गठित किए गए हैं।
  • आपदा प्रबंधन में जोखिम न्यूनीकरण (Risk Mitigation), तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्प्राप्ति (Recovery) के चार चरण शामिल होते हैं।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अनिवार्य है, ताकि संभावित पर्यावरणीय और भूवैज्ञानिक जोखिमों का मूल्यांकन किया जा सके।
  • आपदा प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जागरूकता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
सुरंग निर्माण यह पर्वतीय क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं और कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण है।
भूस्खलन पर्वतीय क्षेत्रों में एक सामान्य प्राकृतिक आपदा, जो जान-माल का भारी नुकसान करती है।
खोज एवं बचाव अभियान आपदा के बाद फंसे हुए लोगों को बचाने और हताहतों को निकालने के लिए आवश्यक।
श्रमिक सुरक्षा निर्माण स्थलों पर श्रमिकों के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
आपदा प्रबंधन आपदाओं की रोकथाम, तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • जलविद्युत परियोजनाएँ ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • सुरंग निर्माण जैसे बुनियादी ढाँचा परियोजनाएँ रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देती हैं।

सामाजिक महत्व

  • श्रमिकों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करना सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
  • आपदाओं के दौरान त्वरित और प्रभावी बचाव अभियान नागरिकों के जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।

पर्यावरणीय महत्व

  • पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण परियोजनाओं को पर्यावरण पर उनके प्रभाव को कम करने के लिए सावधानीपूर्वक योजनाबद्ध और निष्पादित किया जाना चाहिए।
  • भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएँ पारिस्थितिक संतुलन को बाधित कर सकती हैं और दीर्घकालिक पर्यावरणीय क्षति का कारण बन सकती हैं।

शासनिक महत्व

  • आपदा प्रबंधन तंत्र को मजबूत करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना सुशासन का एक महत्वपूर्ण घटक है।
  • निर्माण परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों का अनुपालन सुनिश्चित करना सरकारी नियामकों की जिम्मेदारी है।

चुनौतियाँ

1. भूस्खलन का खतरा

  • उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में भूस्खलन एक गंभीर और लगातार खतरा है, विशेषकर मानसून के मौसम में।
  • भूगर्भीय अस्थिरता, भारी वर्षा और मानवीय गतिविधियाँ (जैसे निर्माण) भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं।

2. सुरंग निर्माण में सुरक्षा मानक

  • सुरंग निर्माण एक जटिल और जोखिम भरा कार्य है, जिसमें उच्च सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य है।
  • सुरक्षा प्रोटोकॉल का उल्लंघन या अपर्याप्त भूगर्भीय सर्वेक्षण दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है।

3. खोज एवं बचाव अभियान की चुनौतियाँ

  • सुरंग के अंदर पानी, मलबा और मशीनरी की उपस्थिति बचाव कार्यों को धीमा और खतरनाक बनाती है।
  • लापता श्रमिकों का पता लगाने और उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए विशेष उपकरणों और प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है।

4. मुआवजा और जवाबदेही

  • मृतकों के परिजनों और घायल श्रमिकों को उचित मुआवजा सुनिश्चित करना एक नैतिक और कानूनी दायित्व है।
  • दुर्घटना के लिए जिम्मेदार पक्षों की पहचान करना और उनकी जवाबदेही तय करना भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पर्वतीय क्षेत्रों में निर्माण भूगर्भीय अस्थिरता और पर्यावरणीय संवेदनशीलता के कारण जोखिम।
श्रमिकों की सुरक्षा सुरक्षा प्रोटोकॉल का अपर्याप्त पालन और जोखिम भरे कार्य वातावरण।
आपदा प्रतिक्रिया जटिल परिस्थितियों में बचाव अभियान की धीमी गति और चुनौतियाँ।
मुआवजा और पुनर्वास पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए समय पर और पर्याप्त सहायता सुनिश्चित करना।
जवाबदेही दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार पक्षों की पहचान और भविष्य में रोकथाम के उपाय।

आगे की राह

  • पर्वतीय क्षेत्रों में सभी निर्माण परियोजनाओं के लिए कठोर भूगर्भीय सर्वेक्षण और जोखिम मूल्यांकन अनिवार्य किया जाए।
  • सुरंग निर्माण सहित सभी जोखिम भरे निर्माण स्थलों पर अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए।
  • श्रमिकों के लिए नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण और आपातकालीन निकासी अभ्यास आयोजित किए जाएँ।
  • आधुनिक उपकरणों और प्रशिक्षित कर्मियों के साथ आपदा प्रतिक्रिया टीमों को मजबूत किया जाए, विशेषकर दुर्गम क्षेत्रों में।
  • दुर्घटनाओं की स्वतंत्र और समयबद्ध जाँच सुनिश्चित की जाए ताकि जवाबदेही तय हो सके और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।
  • पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए त्वरित और पर्याप्त वित्तीय सहायता तथा पुनर्वास पैकेज सुनिश्चित किए जाएँ।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

आपदा प्रबंधन · भूस्खलन · सुरंग निर्माण · श्रम सुरक्षा · राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) · राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) · आधारभूत संरचना परियोजनाएं · पर्यावरणीय प्रभाव आकलन · जोखिम न्यूनीकरण · सतत विकास

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 39 (e)’, ‘note’: ‘श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की सुरक्षा’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 42’, ‘note’: ‘काम की मानवीय दशाएँ और मातृत्व राहत’}

अवधारणा प्रवाह

पर्वतीय क्षेत्र में जलविद्युत परियोजना का निर्माण  →  सुरंग निर्माण के दौरान भूस्खलन  →  श्रमिकों का सुरंग में फंसना  →  खोज एवं बचाव अभियान का संचालन  →  लापता श्रमिकों की तलाश और हताहतों की पहचान  →  सुरक्षा मानकों पर सवाल और मुआवजे की मांग

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
2. भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की स्थापना की गई थी।
3. भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है जो केवल हिमालयी क्षेत्रों तक ही सीमित है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। NDRF गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और NDMA की स्थापना आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत हुई थी। कथन 3 गलत है क्योंकि भूस्खलन केवल हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, यह पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट जैसे अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भी होता है।

Q2. आपदा प्रबंधन में ‘मिटिगेशन’ (Mitigation) शब्द का सबसे उपयुक्त अर्थ क्या है?

  1. आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्य
  2. आपदा के प्रभावों को कम करने या रोकने के लिए किए गए उपाय
  3. आपदा से पहले चेतावनी प्रणाली स्थापित करना
  4. आपदा के दौरान त्वरित प्रतिक्रिया देना

उत्तर: आपदा के प्रभावों को कम करने या रोकने के लिए किए गए उपाय — मिटिगेशन का अर्थ आपदा के प्रभावों को कम करने या रोकने के लिए किए गए दीर्घकालिक उपाय हैं, जैसे कि सुरक्षित निर्माण तकनीकें या जोखिम वाले क्षेत्रों में विकास पर प्रतिबंध।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में आधारभूत संरचना परियोजनाओं, विशेषकर सुरंग निर्माण में, भूस्खलन जैसी आपदाओं के बढ़ते जोखिमों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इन जोखिमों को कम करने और श्रमिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: परिचय में चमोली जैसी घटनाओं का उल्लेख करते हुए भूस्खलन के बढ़ते जोखिमों को रेखांकित करें। मुख्य भाग में, भूस्खलन के कारणों (भूवैज्ञानिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास) और आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर इसके प्रभावों (जान-माल का नुकसान, परियोजना में देरी, आर्थिक हानि) का विश्लेषण करें। श्रमिक सुरक्षा के मुद्दों पर विशेष ध्यान दें। समाधान के तौर पर, कठोर पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA), आधुनिक भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, उन्नत इंजीनियरिंग तकनीकें (जैसे टनल बोरिंग मशीन), प्रभावी आपदा प्रबंधन योजनाएँ, राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) की भूमिका, श्रमिक सुरक्षा प्रोटोकॉल (जैसे PPE, आपातकालीन निकास, नियमित प्रशिक्षण), और मुआवजे के प्रावधानों पर चर्चा करें। निष्कर्ष में, सतत विकास और जोखिम-आधारित नियोजन के महत्व पर जोर दें।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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