झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण पर लिया सख्त रुख, सरकार से रिपोर्ट मांगी

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जलाशय अतिक्रमण निवारण प्रक्रिया

✎ झारखंड उच्च न्यायालय का रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण के खिलाफ सख्त रुख न्यायिक सक्रियता और जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ स्वच्छ जल और पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, शासन प्रणाली और सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
  • Prelims: झारखंड उच्च न्यायालय, न्यायिक सक्रियता, जल संरक्षण, अतिक्रमण, भूजल स्तर, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, स्थानीय स्वशासन, सार्वजनिक न्यास सिद्धांत
  • Essay: न्यायिक सक्रियता और सुशासन में उसकी भूमिका, भारत में जल संकट और उसके समाधान के उपाय

त्वरित पुनरावृत्ति: झारखंड उच्च न्यायालय का रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण के खिलाफ सख्त रुख न्यायिक सक्रियता और जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ स्वच्छ जल और पर्यावरण का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

झारखंड उच्च न्यायालय ने रांची के प्रमुख जलाशयों जैसे बड़ा तालाब और अन्य डैमों के जलग्रहण क्षेत्रों पर हुए अतिक्रमण के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत प्रगति रिपोर्ट मांगी है कि पूर्व में जारी न्यायिक आदेशों के आलोक में अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, अदालत ने एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) को भी जलाशयों की वर्तमान स्थिति का स्वतंत्र अध्ययन कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, जिसका मुख्य उद्देश्य रांची शहर के जल स्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त कराना और भूजल स्तर में सुधार लाना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक जल स्रोतों, विशेषकर तालाबों, झीलों और नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों पर अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन गया है।
  • यह अतिक्रमण न केवल जल निकायों के आकार को कम करता है, बल्कि उनकी जल धारण क्षमता को भी प्रभावित करता है, जिससे बाढ़ और जल संकट जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • अतिक्रमण के कारण जल स्रोतों में प्रदूषण भी बढ़ता है, जिससे जल की गुणवत्ता खराब होती है और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) को नुकसान पहुँचता है।
  • भूजल स्तर में गिरावट देश के कई हिस्सों में एक बड़ी चिंता का विषय है, और जलाशयों पर अतिक्रमण इस समस्या को और गंभीर बनाता है क्योंकि ये जलाशय भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में जल निकायों के संरक्षण और अतिक्रमण हटाने के लिए कई बार निर्देश जारी किए हैं, जो ‘सार्वजनिक न्यास सिद्धांत’ (Public Trust Doctrine) पर आधारित हैं कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षक है।
  • राज्यों की सरकारों पर इन न्यायिक आदेशों का पालन करने और जल स्रोतों के संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठाने की संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी है।

न्यायिक सक्रियता और जल संरक्षण

  • न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) से तात्पर्य न्यायपालिका द्वारा समाज में न्याय सुनिश्चित करने और संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर सक्रिय भूमिका निभाने से है।
  • पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में, जहाँ कार्यपालिका और विधायिका अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में विफल रहती हैं, न्यायिक सक्रियता महत्वपूर्ण हो जाती है।
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत स्वच्छ पर्यावरण और स्वच्छ जल के अधिकार को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है।
  • अदालतें जनहित याचिकाओं (Public Interest Litigations – PILs) के माध्यम से ऐसे मामलों की सुनवाई करती हैं, जहाँ सार्वजनिक हित प्रभावित होते हैं, जैसे कि जल निकायों पर अतिक्रमण।
  • एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) की नियुक्ति अदालत को जटिल मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष जानकारी प्रदान करने में मदद करती है, खासकर जब जमीनी हकीकत का आकलन करना होता है।
  • जल संरक्षण के लिए सरकार की विभिन्न योजनाएँ और अधिनियम जैसे जल शक्ति अभियान, राष्ट्रीय जल नीति, और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 मौजूद हैं, लेकिन उनके प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता है।
  • अतिक्रमण हटाने के लिए स्थानीय प्रशासन और शहरी विकास निकायों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है, जिसमें अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाना और जल निकायों के चारों ओर बफर जोन (Buffer Zone) निर्धारित करना शामिल है।
  • जल निकायों का संरक्षण न केवल पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह शहरी क्षेत्रों में जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए भी आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण यह राजधानी के जल स्रोतों और पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा है, जिससे भूजल स्तर में गिरावट आती है।
झारखंड उच्च न्यायालय का सख्त रुख यह न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का एक उदाहरण है, जो राज्य सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए जवाबदेह ठहराता है।
विस्तृत प्रगति रिपोर्ट की मांग यह सरकार द्वारा पूर्व में दिए गए न्यायिक आदेशों के अनुपालन और उठाए गए ठोस कदमों की पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) द्वारा स्वतंत्र जांच यह मामले की निष्पक्ष और तथ्यात्मक जानकारी अदालत तक पहुंचाने में मदद करेगा, जिससे प्रभावी निर्णय लिए जा सकेंगे।
भूजल स्तर में सुधार की प्राथमिकता यह शहर की दीर्घकालिक जल सुरक्षा और निवासियों के जीवन की गुणवत्ता के लिए महत्वपूर्ण है।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • जलाशयों का अतिक्रमण और प्रदूषण शहरी पारिस्थितिकी (Urban Ecology) को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, जिससे जैव विविधता (Biodiversity) और जल चक्र (Water Cycle) बाधित होते हैं।
  • स्वच्छ जल स्रोतों का संरक्षण भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के लिए आवश्यक है, जो शहरी क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत है।

सामाजिक महत्व

  • स्वच्छ जल की उपलब्धता सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए मूलभूत आवश्यकता है। जलाशयों का अतिक्रमण और प्रदूषण जल-जनित रोगों के जोखिम को बढ़ाता है।
  • अतिक्रमण हटाने और जलाशयों को साफ करने से स्थानीय समुदायों के लिए मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों के अवसर बहाल होते हैं।

शासनिक महत्व

  • उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकार अपने संवैधानिक और वैधानिक दायित्वों का पालन करे, विशेष रूप से पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक संसाधनों के प्रबंधन के संबंध में।
  • यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति को दर्शाता है, जिसके तहत न्यायपालिका कार्यपालिका के कार्यों की वैधता और प्रभावशीलता की जांच करती है।

चुनौतियाँ

1. अतिक्रमण हटाना और पुनर्वास

  • अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया अक्सर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जुड़ी होती है, क्योंकि इसमें प्रभावित लोगों के पुनर्वास का मुद्दा शामिल होता है।
  • अतिक्रमण हटाने के बाद भी, दोबारा अतिक्रमण को रोकने के लिए निरंतर निगरानी और प्रवर्तन (Enforcement) की आवश्यकता होती है।

2. अंतर-विभागीय समन्वय

  • जलाशयों के प्रबंधन और संरक्षण में विभिन्न सरकारी विभाग (जैसे शहरी विकास, सिंचाई, पर्यावरण) शामिल होते हैं, जिनके बीच प्रभावी समन्वय की कमी एक चुनौती हो सकती है।
  • योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी और संसाधनों के आवंटन में अक्षमता समन्वय की कमी के कारण हो सकती है।

3. पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी संसाधन

  • जलाशयों की सफाई, जीर्णोद्धार (Restoration) और दीर्घकालिक रखरखाव के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और विशेषज्ञ तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है।
  • आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके जल गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण के लिए निवेश की आवश्यकता होती है।

4. जन जागरूकता और भागीदारी

  • स्थानीय समुदायों में जल संरक्षण और जलाशयों के महत्व के बारे में जागरूकता की कमी अतिक्रमण और प्रदूषण को बढ़ावा दे सकती है।
  • स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी के बिना किसी भी संरक्षण प्रयास की सफलता सीमित हो सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जलाशयों पर अवैध अतिक्रमण यह जल स्रोतों की क्षमता को कम करता है, जिससे जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट आती है।
प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी यह न्यायिक आदेशों के अनुपालन में बाधा डालती है और सार्वजनिक संसाधनों के अनुचित प्रबंधन को बढ़ावा देती है।
गिरता भूजल स्तर यह शहरी क्षेत्रों में पेयजल सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए चुनौतियां पैदा करता है।
पुरानी पानी टंकी हादसे जैसी दुर्घटनाएं यह सुरक्षा प्रोटोकॉल (Safety Protocol) के उल्लंघन और प्रशासनिक निगरानी की कमी को उजागर करती हैं, जिससे जान-माल का नुकसान होता है।

आगे की राह

  • अतिक्रमण हटाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार करना, जिसमें प्रभावित व्यक्तियों के लिए उचित पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्थाएं शामिल हों।
  • जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्रों का सीमांकन (Demarcation) और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित सर्वेक्षण और निगरानी तंत्र स्थापित करना।
  • जल निकायों की सफाई, गाद निकालने (Desilting) और जल गुणवत्ता में सुधार के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना।
  • भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और अन्य जल संरक्षण उपायों को अनिवार्य करना।
  • विभिन्न सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resource Management) सुनिश्चित हो सके।
  • पर्यावरण संरक्षण और जल निकायों के महत्व के बारे में जन जागरूकता अभियान चलाना और सामुदायिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
  • न्यायिक आदेशों के प्रभावी अनुपालन के लिए एक मजबूत निगरानी और जवाबदेही तंत्र विकसित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

न्यायिक सक्रियता · पर्यावरण संरक्षण · जल निकाय अतिक्रमण · भूजल स्तर · शहरी नियोजन · स्थानीय स्वशासन · अधिकारों का प्रवर्तन · सार्वजनिक न्यास सिद्धांत · न्यायिक समीक्षा · विकास बनाम पर्यावरण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण और प्रदूषण  →  भूजल स्तर में गिरावट और पर्यावरणीय क्षति  →  झारखंड उच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक हस्तक्षेप  →  राज्य सरकार को विस्तृत रिपोर्ट और कार्रवाई के निर्देश  →  अतिक्रमण हटाने और जल स्रोतों के संरक्षण का प्रयास  →  भूजल स्तर में सुधार और शहरी जल सुरक्षा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार है।
2. एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) न्यायालय का मित्र होता है और मामले में निष्पक्ष राय प्रस्तुत करता है।
3. सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) के अनुसार, राज्य प्राकृतिक संसाधनों का न्यासी होता है और उन्हें जनता के लाभ के लिए संरक्षित करने के लिए बाध्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और किसी अन्य उद्देश्य के लिए रिट जारी करने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। एमिकस क्यूरी एक तटस्थ पक्ष होता है जिसे अदालत को किसी मामले में सहायता करने के लिए नियुक्त किया जाता है। कथन 3 सही है। सार्वजनिक न्यास सिद्धांत पर्यावरण कानून का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो राज्य पर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का दायित्व डालता है।

Q2. कथन (A): उच्च न्यायालयों द्वारा पर्यावरण संबंधी मामलों में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का प्रदर्शन भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण रहा है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 21, जीवन के अधिकार में स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को भी शामिल करता है, जिसके प्रवर्तन के लिए न्यायपालिका सक्रिय भूमिका निभाती है।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — कथन (A) सही है क्योंकि उच्च न्यायालयों ने विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर सक्रियता दिखाई है। कारण (R) भी सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को मान्यता दी है, जो न्यायपालिका को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने का आधार प्रदान करता है। कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में प्राकृतिक जल निकायों पर अतिक्रमण एक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती है। इस संदर्भ में, उच्च न्यायालयों द्वारा न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, ऐसे अतिक्रमणों को रोकने और जल निकायों के संरक्षण के लिए प्रभावी उपायों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** प्राकृतिक जल निकायों के महत्व और उन पर अतिक्रमण की समस्या का संक्षिप्त परिचय। (20-30 शब्द)
2. **न्यायिक सक्रियता की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पहलू:**
* अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का विस्तार।
* सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) का अनुप्रयोग (जैसे एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ)।
* कार्यपालिका की निष्क्रियता को दूर करना और जवाबदेही तय करना।
* पर्यावरण कानूनों के प्रवर्तन को सुनिश्चित करना।
* एमिकस क्यूरी की नियुक्ति जैसे रचनात्मक उपाय।
* **नकारात्मक पहलू (समालोचना):**
* शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन का आरोप।
* न्यायपालिका पर कार्यपालिका के कार्यों का बोझ।
* विशेषज्ञता की कमी (तकनीकी मामलों में)।
* अदालती आदेशों के क्रियान्वयन में चुनौतियाँ।
3. **अतिक्रमण रोकने और संरक्षण के प्रभावी उपाय:**
* **कानूनी और नियामक उपाय:**
* कठोर भूमि उपयोग योजनाएँ और ज़ोनिंग नियम।
* पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) का प्रभावी क्रियान्वयन।
* अतिक्रमण विरोधी कानूनों का सख्त प्रवर्तन।
* राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal – NGT) की भूमिका को मजबूत करना।
* **प्रशासनिक और संस्थागत उपाय:**
* स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगरपालिकाओं) को सशक्त बनाना।
* जल निकायों की नियमित निगरानी और सीमांकन।
* अतिक्रमण हटाने के लिए त्वरित कार्रवाई बल।
* अंतर-विभागीय समन्वय।
* **सामुदायिक भागीदारी और जन जागरूकता:**
* जन जागरूकता अभियान।
* नागरिक समाज संगठनों की भागीदारी।
* जलागम प्रबंधन (Watershed Management) में स्थानीय समुदायों की भूमिका।
* **तकनीकी उपाय:**
* GIS मैपिंग और रिमोट सेंसिंग का उपयोग।
* भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) परियोजनाओं को बढ़ावा।
4. **निष्कर्ष:** न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना जिसमें सरकार, न्यायपालिका और नागरिक समाज सभी की सक्रिय भागीदारी हो। (20-30 शब्द)

स्रोत: amarujala.com

Jharkhand PCS (JPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के जलाशयों पर अतिक्रमण को लेकर राज्य सरकार से क्या मांगा है?

  1. A. जलाशयों का पुनर्निर्माण
  2. B. अतिक्रमण हटाने के लिए विस्तृत रिपोर्ट
  3. C. जलाशयों का निजीकरण
  4. D. जलाशयों को पर्यटन स्थल बनाने का प्रस्ताव

उत्तर: B. अतिक्रमण हटाने के लिए विस्तृत रिपोर्ट — झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से अतिक्रमण हटाने के लिए विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

Mains: झारखंड में जलाशयों पर अतिक्रमण की समस्या के कारणों एवं इसके दूरगामी प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए, राज्य सरकार द्वारा इस मुद्दे के समाधान हेतु उठाए जाने वाले कदमों का वर्णन कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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