तमिलनाडु में पूमपुहार तट पर तीसरे चरण की जलमग्न पुरातत्व खोज शुरू

T.N. launches third phase of underwater archaeological exploration off Poompuhar coast — diagram

तमिलनाडु में पूमपुहार तट पर तीसरे चरण की जलमग्न पुरातत्व खोज शुरू

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Underwater archaeology setup

✎ पुम्पुहार में चल रहा जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण प्राचीन तमिलों के समुद्री व्यापारिक संबंधों और भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को समझने में महत्वपूर्ण है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति  |  GS Paper I — इतिहास  |  GS Paper III — विज्ञान और प्रौद्योगिकी
  • Prelims: पुम्पुहार, कावेरीपूम्पट्टिनम, संगम साहित्य, जलमग्न पुरातत्व, साइड-स्कैन सोनार, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV)
  • Essay: भारत की समृद्ध समुद्री विरासत और आर्थिक विकास में इसका योगदान, आधुनिक तकनीक का उपयोग कर प्राचीन सभ्यताओं का पुनर्निर्माण

त्वरित पुनरावृत्ति: पुम्पुहार में चल रहा जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण प्राचीन तमिलों के समुद्री व्यापारिक संबंधों और भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को समझने में महत्वपूर्ण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने मायिलादुथुराई जिले में पुम्पुहार के तट पर जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण के तीसरे चरण का शुभारंभ किया है। यह पहल प्राचीन तमिलों के समुद्री व्यापारिक संबंधों का पता लगाने और कावेरीपूम्पट्टिनम के नाम से जाने जाने वाले इस प्राचीन बंदरगाह शहर के इतिहास को उजागर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पृष्ठभूमि

  • पुम्पुहार, जिसे प्राचीन काल में कावेरीपूम्पट्टिनम के नाम से जाना जाता था, संगम काल का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर था।
  • संगम साहित्य, जैसे कि पट्टिनप्पालाई, सिलाप्पदिकारम और मणिमेकलै, में पुम्पुहार और इसके समृद्ध समुद्री व्यापारिक संबंधों का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
  • इन साहित्यिक कृतियों से पता चलता है कि पुम्पुहार का श्रीलंका, दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक संबंध था।
  • पिछले अन्वेषणों में उन्नत समुद्री अन्वेषण उपकरणों जैसे रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV), साइड-स्कैन सोनार, सब-बॉटम प्रोफाइलर और मल्टीबीम स्कैनर का उपयोग किया गया था।
  • यह अन्वेषण समुद्री धाराओं के पैटर्न और पूर्वोत्तर मानसून को ध्यान में रखते हुए लगभग 20 दिनों के लिए नियोजित किया गया है।

जलमग्न पुरातत्व (Underwater Archaeology) क्या है?

  • जलमग्न पुरातत्व पुरातत्व की एक शाखा है जो पानी के नीचे स्थित पुरातात्विक स्थलों, जैसे कि डूबे हुए शहरों, जहाजों के मलबे और अन्य मानव निर्मित संरचनाओं का अध्ययन करती है।
  • यह समुद्री पर्यावरण में संरक्षित प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
  • इस क्षेत्र में गोताखोरी, सोनार तकनीक, रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) और सबमर्सिबल जैसे विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
  • जलमग्न पुरातत्वविद् समुद्री व्यापार मार्गों, नौवहन तकनीकों, बंदरगाहों के विकास और प्राचीन समाजों के समुद्री जीवन शैली का अध्ययन करते हैं।
  • यह सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि पानी के नीचे के स्थल अक्सर भूमि पर पाए जाने वाले स्थलों की तुलना में बेहतर ढंग से संरक्षित होते हैं।
  • भारत में, भारतीय नौसेना और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography – NIO) जैसी संस्थाएँ जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषणों में शामिल रही हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
पुरातत्व विभाग, तमिलनाडु पुरातत्व अन्वेषण का नेतृत्व कर रहा है, जो राज्य के सांस्कृतिक विरासत संरक्षण में उसकी भूमिका को दर्शाता है।
पुहार तट प्राचीन बंदरगाह शहर कावेरीपूंपट्टिनम का स्थल, जो संगम साहित्य में वर्णित एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था।
तीसरा चरण यह दर्शाता है कि यह एक सतत और व्यवस्थित अन्वेषण परियोजना है, जो दीर्घकालिक शोध के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
समुद्री व्यापारिक संबंध प्राचीन तमिलों के श्रीलंका, दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी देशों के साथ समृद्ध समुद्री व्यापारिक संबंधों को उजागर करने का प्रयास।
संगम साहित्य पट्टिनप्पालाई, सिलाप्पदिकारम और मणिमेकलई जैसे ग्रंथ पुहार के अस्तित्व और उसके व्यापारिक महत्व के साहित्यिक प्रमाण प्रदान करते हैं।
उन्नत समुद्री उपकरण रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल, साइड-स्कैन सोनार, सब-बॉटम प्रोफाइलर और मल्टीबीम स्कैनर का उपयोग आधुनिक तकनीक के अनुप्रयोग को दर्शाता है।

महत्व

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • यह अन्वेषण प्राचीन तमिल सभ्यता के समुद्री इतिहास और व्यापारिक कौशल पर प्रकाश डालेगा, जिससे भारत के सांस्कृतिक विरासत की समझ गहरी होगी।
  • पुहार जैसे प्राचीन बंदरगाहों के अवशेषों की खोज से संगम युग के साहित्य में वर्णित शहरों की प्रामाणिकता स्थापित करने में मदद मिलेगी, जो ऐतिहासिक साक्ष्यों को मजबूत करेगा।
  • यह परियोजना भारत के समुद्री इतिहास को फिर से लिखने में सहायक हो सकती है, विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी दुनिया के साथ प्राचीन व्यापारिक मार्गों के संदर्भ में।

पुरातत्व और वैज्ञानिक महत्व

  • समुद्र के नीचे की संरचनाओं और कलाकृतियों की खोज से प्राचीन शहरी नियोजन, वास्तुकला और समुद्री प्रौद्योगिकी के बारे में नई जानकारी मिलेगी।
  • यह परियोजना समुद्री पुरातत्व (Marine Archaeology) के क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता और क्षमताओं को बढ़ाएगी, जिससे भविष्य में इसी तरह के अन्वेषणों के लिए मार्ग प्रशस्त होगा।
  • उन्नत समुद्री अन्वेषण उपकरणों का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देगा और समुद्र विज्ञान तथा भू-भौतिकी के क्षेत्र में नई तकनीकों के विकास को प्रोत्साहित करेगा।

पर्यटन और आर्थिक महत्व

  • पुहार जैसे ऐतिहासिक स्थलों की खोज से सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
  • यह परियोजना तमिलनाडु की समृद्ध विरासत को उजागर करेगी, जिससे राज्य की सांस्कृतिक पहचान मजबूत होगी और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

  • समुद्र के भीतर सीमित दृश्यता और मजबूत समुद्री धाराएँ अन्वेषण कार्य को कठिन बना सकती हैं, जिससे सटीकता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • पूर्वोत्तर मानसून जैसे मौसमी कारक और समुद्र की स्थिति अन्वेषण के लिए उपलब्ध समय को सीमित कर सकती है, जिससे परियोजना की प्रगति धीमी हो सकती है।

2. संरक्षण और प्रलेखन

  • पानी के भीतर मिली कलाकृतियों और संरचनाओं का संरक्षण एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि उन्हें पानी से बाहर निकालने पर क्षरण का खतरा होता है।
  • अन्वेषण के दौरान प्राप्त डेटा का सटीक प्रलेखन और विश्लेषण महत्वपूर्ण है ताकि निष्कर्षों की वैज्ञानिक वैधता सुनिश्चित की जा सके।

3. संसाधन और समन्वय

  • समुद्री पुरातत्व अन्वेषणों के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों, कुशल जनशक्ति और उन्नत उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिनकी उपलब्धता एक चुनौती हो सकती है।
  • विभिन्न सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थानों और विशेषज्ञों के बीच प्रभावी समन्वय परियोजना की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
समुद्री पर्यावरण सीमित दृश्यता, मजबूत धाराएँ और मौसमी बदलाव अन्वेषण को बाधित करते हैं।
कलाकृतियों का संरक्षण पानी के भीतर मिली वस्तुओं का क्षरण और उन्हें बाहर निकालने के बाद उनका उचित संरक्षण।
तकनीकी विशेषज्ञता समुद्री पुरातत्व के लिए विशेष उपकरणों और प्रशिक्षित गोताखोरों/पुरातत्वविदों की आवश्यकता।
वित्तीय संसाधन दीर्घकालिक और गहन अन्वेषण परियोजनाओं के लिए पर्याप्त धन की उपलब्धता।
साहित्यिक साक्ष्य का सत्यापन संगम साहित्य में वर्णित विवरणों को भौतिक साक्ष्यों से जोड़ना एक जटिल कार्य है।

आगे की राह

  • समुद्री पुरातत्व अन्वेषणों के लिए एक राष्ट्रीय नीति विकसित करना, जिसमें दीर्घकालिक वित्तपोषण और संसाधन आवंटन शामिल हो।
  • भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय (Indian Maritime University) जैसे संस्थानों के साथ सहयोग को मजबूत करना ताकि तकनीकी विशेषज्ञता और अनुसंधान क्षमता बढ़ाई जा सके।
  • समुद्री पुरातत्वविदों और गोताखोरों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना ताकि कुशल जनशक्ति की कमी को पूरा किया जा सके।
  • अन्वेषण के दौरान मिली कलाकृतियों के संरक्षण के लिए उन्नत तकनीकों और सुविधाओं का विकास करना।
  • जन जागरूकता बढ़ाने के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों और प्रदर्शनियों का आयोजन करना, ताकि लोग भारत की समुद्री विरासत के महत्व को समझ सकें।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं और प्रौद्योगिकियों का आदान-प्रदान किया जा सके।
  • प्राचीन बंदरगाहों और व्यापारिक मार्गों के डिजिटल मानचित्रण और 3D मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पुहार · कावेरीपूमपट्टिनम · संगम साहित्य · समुद्री व्यापार · पुरातत्व अन्वेषण · जलमग्न शहर · तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग · भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय · रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल · साइड-स्कैन सोनार · उप-तल प्रोफाइलर · मल्टीबीम स्कैनर

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 49’, ‘note’: ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण’}

अवधारणा प्रवाह

पुहार तट पर प्राचीन बंदरगाह के साहित्यिक संदर्भ  →  तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा समुद्री अन्वेषण  →  उन्नत उपकरणों का उपयोग कर पानी के नीचे संरचनाओं की खोज  →  प्राचीन तमिलों के समुद्री व्यापारिक संबंधों का सत्यापन  →  भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और समुद्री विरासत का अनावरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पुहार, जिसे कावेरीपूमपट्टिनम के नाम से भी जाना जाता है, एक प्राचीन बंदरगाह शहर था जिसका उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है।
2. तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) ने भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय के सहयोग से पुहार तट पर जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण का तीसरा चरण शुरू किया है।
3. इस अन्वेषण में रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल और साइड-स्कैन सोनार जैसे उन्नत समुद्री अन्वेषण उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि पुहार (कावेरीपूमपट्टिनम) एक प्राचीन बंदरगाह शहर था जिसका उल्लेख संगम साहित्य में है। कथन 2 गलत है क्योंकि तीसरे चरण का अन्वेषण TNSDA द्वारा स्वतंत्र रूप से शुरू किया गया है, जबकि पिछले चरण में भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय के साथ सहयोग था। कथन 3 सही है क्योंकि अन्वेषण में उन्नत समुद्री उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा संगम साहित्य का कार्य पुहार के प्राचीन बंदरगाह शहर और उसके समुद्री व्यापार का संदर्भ देता है?
1. पत्तिनप्पालाई
2. सिलप्पदिकारम
3. मणिमेकलाई
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: 1, 2 और 3 — पत्तिनप्पालाई, सिलप्पदिकारम और मणिमेकलाई तीनों ही संगम काल के साहित्यिक कार्य हैं जो पुहार के प्राचीन बंदरगाह शहर, उसकी बस्तियों और श्रीलंका, दक्षिण पूर्व एशिया तथा पश्चिम के साथ उसके समुद्री व्यापार का संदर्भ देते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ पुहार जैसे प्राचीन बंदरगाह शहरों के जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण का महत्व क्या है? भारत के समुद्री इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने में इस तरह के अन्वेषण कैसे योगदान करते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल: परिचय में पुहार और उसके ऐतिहासिक महत्व का संक्षिप्त उल्लेख। जलमग्न पुरातात्विक अन्वेषण के महत्व पर चर्चा करें, जिसमें प्राचीन समुद्री व्यापार मार्गों, सभ्यतागत संपर्कों और तकनीकी प्रगति को उजागर करना शामिल है। भारत के समुद्री इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समझने में इसके योगदान को विस्तार से बताएं, जिसमें संगम साहित्य से प्राप्त जानकारी की पुष्टि, तटीय समुदायों के विकास, और भारत के वैश्विक व्यापारिक संबंधों पर प्रकाश डालना शामिल है। निष्कर्ष में इन अन्वेषणों के भविष्य के निहितार्थ और संरक्षण के महत्व पर जोर दें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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