20 Aug दक्षिण राज्यों को न्याय: शिवकुमार ने केंद्र से मांगी समानता और संसाधन
✎ राजकोषीय संघवाद और परिसीमन भारत में केंद्र-राज्य संबंधों के महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, संसाधन जुटाना, राजकोषीय संघवाद
- Prelims: राजकोषीय संघवाद, वित्त आयोग, परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद, विभाज्य पूल, जनसंख्या मानदंड
- Essay: भारत में संघवाद की बदलती प्रकृति और चुनौतियाँ, राज्यों की आर्थिक संवृद्धि और राष्ट्रीय विकास में उनकी भूमिका: एक विश्लेषण
त्वरित पुनरावृत्ति: राजकोषीय संघवाद और परिसीमन भारत में केंद्र-राज्य संबंधों के महत्वपूर्ण पहलू हैं, जो राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने 31वीं दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (Southern Zonal Council) की बैठक में दक्षिणी राज्यों के लिए करों के हस्तांतरण (devolution) और परिसीमन (delimitation) में निष्पक्षता की मांग की है। उन्होंने तर्क दिया कि दक्षिणी राज्य भारतीय अर्थव्यवस्था के ‘इंजन’ हैं और राष्ट्रीय GDP में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन उन्हें केंद्रीय निधियों के वितरण और लोकसभा सीटों के प्रतिनिधित्व में उचित हिस्सा नहीं मिल रहा है। यह मुद्दा केंद्र-राज्य संबंधों और राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) पर बहस को फिर से सामने लाता है।
पृष्ठभूमि
- दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि वे देश की लगभग 20% आबादी के साथ देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 33% हिस्सा हैं, जो उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति को दर्शाता है।
- परिसीमन के संबंध में, दक्षिणी राज्यों ने 1971 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाए रखने और अगले 25 वर्षों के लिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बनाए रखने का आग्रह किया है।
- यह मांग इस चिंता से उपजी है कि जनसंख्या वृद्धि को आधार बनाने से उन राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
- दक्षिणी राज्यों ने केंद्र सरकार से राज्यों को केंद्रीय निधियों के हस्तांतरण को 50% तक बढ़ाने और किसी राज्य के आर्थिक प्रदर्शन को अधिक महत्व देने की भी मांग की है।
भारत में राजकोषीय संघवाद और परिसीमन
- राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों और जिम्मेदारियों के वितरण से संबंधित है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना और संतुलित विकास सुनिश्चित करना है।
- वित्त आयोग (Finance Commission) एक संवैधानिक निकाय है, जिसका गठन संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत किया जाता है। इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों के संबंधित शेयरों के आवंटन पर राष्ट्रपति को सिफारिशें देना है।
- वित्त आयोग राज्यों को राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grants) और विशिष्ट उद्देश्यों के लिए अनुदान (Grants for Specific Purposes) भी प्रदान करता है, जो राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करते हैं।
- विभाज्य पूल (Divisible Pool) केंद्र सरकार द्वारा लगाए और एकत्र किए गए सभी करों का वह हिस्सा है जिसे केंद्र और राज्यों के बीच वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार साझा किया जाता है।
- परिसीमन (Delimitation) का अर्थ किसी देश या विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं या सीटों की संख्या का निर्धारण करना है। भारत में, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन से संबंधित है।
- वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया है, और इसे 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया गया है ताकि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित न किया जा सके।
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद (Southern Zonal Council) क्षेत्रीय परिषदों में से एक है, जिसका गठन राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत किया गया है। ये परिषदें केंद्र और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपस में सहयोग और समन्वय को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्यों को निधियों का हस्तांतरण (Devolution of Funds) | केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को कर राजस्व का वितरण, जो राज्यों के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण है। |
| परिसीमन (Delimitation) | लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण, जो राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है। |
| दक्षिणी राज्यों का आर्थिक योगदान | देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में दक्षिणी राज्यों का महत्वपूर्ण योगदान (लगभग 33%), जो उनकी उच्च आर्थिक उत्पादकता को दर्शाता है। |
| जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व | परिसीमन में जनसंख्या को आधार बनाने से उन राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है। |
| वित्त आयोग की सिफारिशें | केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व बंटवारे के लिए वित्त आयोग (Finance Commission) की सिफारिशें, जो राज्यों के वित्तीय संसाधनों को प्रभावित करती हैं। |
महत्व
संघवाद और राजकोषीय संबंध
- यह मुद्दा भारतीय संघवाद (Indian Federalism) के मूल सिद्धांतों और केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों (Fiscal Relations) को दर्शाता है। यह दर्शाता है कि कैसे वित्तीय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे राज्यों के बीच असंतोष पैदा कर सकते हैं।
- दक्षिणी राज्यों की यह मांग केंद्र-राज्य संबंधों में विश्वास और निष्पक्षता की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है, विशेषकर जब आर्थिक रूप से मजबूत राज्य अपने योगदान के अनुपात में प्रतिफल की अपेक्षा करते हैं।
जनसंख्या नियंत्रण और प्रोत्साहन
- परिसीमन में 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखने की मांग जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को दंडित न करने के सिद्धांत पर आधारित है। यदि नवीनतम जनगणना को आधार बनाया जाता है, तो इन राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
- यह मुद्दा भविष्य में राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने या हतोत्साहित करने के संबंध में नीतिगत बहस को जन्म देता है।
क्षेत्रीय असमानताएँ और विकास
- दक्षिणी राज्यों का उच्च आर्थिक प्रदर्शन और FDI प्रवाह देश के भीतर क्षेत्रीय असमानताओं को उजागर करता है। इन राज्यों का तर्क है कि उनके योगदान को उचित मान्यता मिलनी चाहिए।
- यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या आर्थिक रूप से अधिक विकसित राज्यों को उनके प्रदर्शन के लिए पुरस्कृत किया जाना चाहिए, या क्या संसाधनों का वितरण पिछड़े क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।
चुनौतियाँ
1. केंद्र-राज्य राजकोषीय असंतुलन
- दक्षिणी राज्यों का मानना है कि उनके उच्च कर योगदान के बावजूद, उन्हें केंद्रीय करों के हस्तांतरण में पर्याप्त हिस्सा नहीं मिल रहा है, जिससे राजकोषीय असंतुलन पैदा हो रहा है।
- 15वें वित्त आयोग (15th Finance Commission) द्वारा कर्नाटक के हिस्से में कमी और विशेष अनुदानों की गैर-रिहाई इस असंतुलन का एक उदाहरण है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. परिसीमन और प्रतिनिधित्व का मुद्दा
- लोकसभा सीटों के परिसीमन के लिए 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखने की मांग है ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम न हो।
- यदि 2026 के बाद नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन होता है, तो दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों में कमी आने की आशंका है, जिससे उनकी ‘आवाज’ कमजोर होगी।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक निकाय, चुनावी सुधार
3. आर्थिक प्रदर्शन और पुरस्कार
- दक्षिणी राज्य तर्क देते हैं कि उनके उच्च आर्थिक प्रदर्शन, GDP में योगदान और FDI आकर्षण को केंद्रीय निधियों के वितरण में अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
- वर्तमान वितरण मानदंड अक्सर जनसंख्या और क्षेत्र जैसे कारकों को अधिक महत्व देते हैं, जिससे आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों को लगता है कि उन्हें दंडित किया जा रहा है।
यूपीएससी लिंक: आर्थिक विकास, क्षेत्रीय असंतुलन
4. वित्त आयोग के मानदंड
- वित्त आयोग द्वारा अपनाए गए मानदंड, जैसे कि आय अंतर, जनसंख्या, क्षेत्र और वन क्षेत्र, राज्यों के हिस्से को निर्धारित करते हैं। इन मानदंडों पर दक्षिणी राज्यों को आपत्ति है।
- कर्नाटक का हिस्सा 15वें वित्त आयोग में 4.7% से घटकर 3.6% हो गया, जिससे राज्य को ₹65,000 करोड़ का अनुमानित नुकसान हुआ।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक निकाय, वित्त आयोग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कर हस्तांतरण में कमी | दक्षिणी राज्यों को लगता है कि उनके उच्च कर योगदान के बावजूद, उन्हें केंद्रीय करों के विभाज्य पूल (Divisible Pool) में कम हिस्सा मिल रहा है। |
| परिसीमन में 1971 की जनगणना का आधार | नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन से जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटों में कमी आ सकती है, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटेगा। |
| विशेष अनुदानों की गैर-रिहाई | 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित विशेष और राज्य-विशिष्ट अनुदानों का जारी न होना राज्यों के वित्तीय नियोजन को बाधित करता है। |
| आर्थिक प्रदर्शन को कम महत्व | राजकोषीय हस्तांतरण के मानदंडों में आर्थिक प्रदर्शन के बजाय जनसंख्या जैसे कारकों को अधिक महत्व देने से आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों को ‘दंडित’ महसूस होता है। |
| समानता बनाम इक्विटी | राज्यों के बीच समानता (सभी को समान व्यवहार) और इक्विटी (आवश्यकताओं और योगदान के आधार पर उचित व्यवहार) के बीच संतुलन स्थापित करने में चुनौती। |
आगे की राह
- केंद्र-राज्य राजकोषीय संबंधों पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस आयोजित की जाए, जिसमें सभी राज्यों की चिंताओं को सुना जाए और एक निष्पक्ष समाधान खोजा जाए।
- वित्त आयोग के मानदंडों की समीक्षा की जाए ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को दंडित न किया जाए और उनके आर्थिक प्रदर्शन को उचित महत्व दिया जाए।
- परिसीमन के लिए एक सर्वसम्मत दृष्टिकोण विकसित किया जाए, जिसमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
- केंद्र सरकार को वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित सभी विशेष और राज्य-विशिष्ट अनुदानों को समय पर जारी करना चाहिए ताकि राज्यों के वित्तीय नियोजन में स्थिरता आए।
- राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग बढ़ाने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) और क्षेत्रीय परिषदों (Zonal Councils) जैसे मंचों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाए।
- एक ऐसा तंत्र विकसित किया जाए जो राज्यों के आर्थिक योगदान को मान्यता दे और उन्हें विकास के लिए प्रोत्साहित करे, जबकि साथ ही पिछड़े क्षेत्रों के विकास की आवश्यकता को भी पूरा करे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राजकोषीय संघवाद · वित्त आयोग · कर विचलन · परिसीमन · जनसंख्या मानदंड · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · दक्षिणी राज्य · आर्थिक असमानता · संवैधानिक प्रावधान · क्षेत्रीय परिषदें · लोकसभा सीटें
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 280’, ‘note’: ‘वित्त आयोग का गठन और कार्य’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 268-281’, ‘note’: ‘केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 81’, ‘note’: ‘लोकसभा की संरचना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘परिसीमन अधिनियम के तहत सीटों का समायोजन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय परिषद का गठन’}
अवधारणा प्रवाह
दक्षिणी राज्यों का उच्च आर्थिक योगदान → केंद्र सरकार को अधिक कर राजस्व → वित्त आयोग द्वारा निधियों का हस्तांतरण → राज्यों को प्राप्त हिस्से में कमी का अनुभव → परिसीमन में प्रतिनिधित्व खोने का डर → केंद्र-राज्य राजकोषीय और राजनीतिक तनाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग का गठन किया जाता है।
2. वित्त आयोग की सिफारिशें केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी होती हैं।
3. 15वें वित्त आयोग ने राज्यों को केंद्रीय करों के शुद्ध आगम का 41% हिस्सा देने की सिफारिश की थी।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग का गठन किया जाता है। कथन 2 गलत है। वित्त आयोग की सिफारिशें केवल सलाहकार प्रकृति की होती हैं और केंद्र सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती हैं, हालांकि सरकार आमतौर पर उन्हें मानती है। कथन 3 सही है। 15वें वित्त आयोग ने राज्यों को केंद्रीय करों के शुद्ध आगम का 41% हिस्सा देने की सिफारिश की थी।
Q2. परिसीमन आयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का अंतिम परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया था।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग का गठन संसद द्वारा बनाए गए परिसीमन अधिनियम के तहत भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। कथन 3 गलत है। भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का अंतिम परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया था, लेकिन सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दी गई थी। वर्तमान में, सीटों की संख्या 2026 तक स्थिर है।
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद अंतर-राज्यीय परिषदों (Inter-State Councils) के गठन का प्रावधान करता है?
- अनुच्छेद 262
- अनुच्छेद 263
- अनुच्छेद 280
- अनुच्छेद 292
उत्तर: अनुच्छेद 263 — अनुच्छेद 263 राष्ट्रपति को अंतर-राज्यीय परिषदों के गठन का अधिकार देता है, ताकि राज्यों के बीच विवादों की जांच और चर्चा की जा सके तथा उनके सामान्य हितों के विषयों पर समन्वय स्थापित किया जा सके।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) के संदर्भ में, दक्षिणी राज्यों द्वारा कर विचलन (Tax Devolution) और परिसीमन (Delimitation) में ‘निष्पक्षता’ की मांग के पीछे के तर्कों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये मांगें भारत में संघवाद के सिद्धांतों के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करती हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** राजकोषीय संघवाद और परिसीमन के संदर्भ में दक्षिणी राज्यों की ‘निष्पक्षता’ की मांग का संक्षिप्त परिचय दें।
2. **कर विचलन में निष्पक्षता की मांग के तर्क:**
* **आर्थिक योगदान:** दक्षिणी राज्यों का उच्च GDP योगदान और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका (जैसे 33% GDP, 20% जनसंख्या)।
* **जनसंख्या नियंत्रण:** जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण वित्त आयोग के आवंटन में हिस्सेदारी में कमी।
* **राजकोषीय घाटा:** 15वें वित्त आयोग द्वारा राज्यों को हुए अनुमानित नुकसान (जैसे कर्नाटक का ₹65,000 करोड़ का नुकसान)।
* **विशेष अनुदान:** 15वें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित विशेष अनुदानों का जारी न होना।
* **मांग:** केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 50% तक बढ़ाने और आर्थिक प्रदर्शन को अधिक महत्व देने की मांग।
3. **परिसीमन में निष्पक्षता की मांग के तर्क:**
* **जनसंख्या मानदंड:** 1971 की जनगणना को परिसीमन का आधार बनाए रखने की मांग।
* **प्रतिनिधित्व में कमी का डर:** जनसंख्या वृद्धि को आधार बनाने पर लोकसभा में दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित कमी।
* **लोकसभा की सीटों की संख्या:** मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने और महिला आरक्षण को इन्हीं सीटों के भीतर समायोजित करने की मांग।
4. **संघवाद के सिद्धांतों के लिए चुनौती:**
* **सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद:** क्या ये मांगें सहकारी संघवाद के बजाय प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देती हैं?
* **जनसंख्या बनाम विकास:** जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरस्कृत करने और आर्थिक योगदान को महत्व देने के बीच संतुलन का मुद्दा।
* **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 280 (वित्त आयोग) और अनुच्छेद 82 (परिसीमन) के तहत निहित सिद्धांतों पर प्रभाव।
* **क्षेत्रीय असंतुलन:** क्षेत्रीय असंतुलन और राज्यों के बीच बढ़ती खाई का जोखिम।
5. **निष्कर्ष:** इन मांगों के महत्व को स्वीकार करते हुए, संघवाद के संतुलन और राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए एक समावेशी और न्यायसंगत समाधान की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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