08 Aug परंपरागत व्यवसायों को बचाने के लिए नीति समर्थन जरूरी: विशेषज्ञ
✎ परंपरागत व्यवसायों का संरक्षण न केवल आर्थिक संवृद्धि और रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है, जिसके लिए मजबूत नीतिगत समर्थन और संवैधानिक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, सामाजिक मुद्दे | GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, विकास, रोजगार
- Prelims: परंपरागत व्यवसाय, सामाजिक समावेशन, आर्थिक असमानता, कौशल विकास, उद्यमिता, हस्तशिल्प, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs), संवैधानिक सुरक्षा उपाय
- Essay: बदलती अर्थव्यवस्था में परंपरागत व्यवसायों का भविष्य: चुनौतियाँ और अवसर, समावेशी विकास के लिए सामाजिक समावेशन की अनिवार्यता
त्वरित पुनरावृत्ति: परंपरागत व्यवसायों का संरक्षण न केवल आर्थिक संवृद्धि और रोजगार सृजन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है, जिसके लिए मजबूत नीतिगत समर्थन और संवैधानिक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
आंध्र विश्वविद्यालय में ‘बदलती अर्थव्यवस्था में परंपरागत व्यावसायिक समुदाय: सामाजिक समावेशन और समावेशी विकास की चुनौतियाँ’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार में वक्ताओं ने परंपरागत आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए मजबूत नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर बल दिया। विशेषज्ञों ने मशीनीकरण, कारखानों में निर्मित उत्पादों और अनियमित आय के कारण इन समुदायों के सामने आ रहे गंभीर आर्थिक तनाव को उजागर किया।
पृष्ठभूमि
- भारत में परंपरागत व्यवसाय सदियों से अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते रहे हैं।
- मशीनीकरण और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण परंपरागत व्यवसायों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी आय और बाजार पहुंच प्रभावित हुई है।
- बाजार तक अपर्याप्त पहुंच और बिचौलियों पर निर्भरता ने कारीगरों की कमाई को कम कर दिया है, जिससे वे आर्थिक रूप से कमजोर हुए हैं।
- कई परंपरागत व्यावसायिक समुदाय सामाजिक भेदभाव का भी सामना करते हैं, जिससे उनके लिए विकास के अवसर सीमित हो जाते हैं।
- लगभग 30% कारीगरों को बदलती बाजार स्थितियों के कारण अपने परंपरागत व्यवसायों से बाहर धकेल दिया गया है।
- सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, परंपरागत व्यावसायिक समुदायों को अभी भी गंभीर आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है।
परंपरागत व्यवसाय और उनके संरक्षण की आवश्यकता
- परंपरागत व्यवसाय (Traditional occupations) वे आजीविकाएँ हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं और अक्सर विशिष्ट कौशल, ज्ञान तथा सांस्कृतिक प्रथाओं से जुड़ी होती हैं। इनमें हस्तशिल्प, बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना, कृषि आधारित छोटे उद्योग और विभिन्न सेवाएँ शामिल हैं।
- ये व्यवसाय न केवल लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों को भी संरक्षित रखते हैं।
- इन व्यवसायों के संरक्षण से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है, स्थानीय समुदायों का सशक्तिकरण होता है और पलायन की समस्या को कम करने में मदद मिलती है।
- नीतिगत समर्थन के माध्यम से इन व्यवसायों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जा सकता है, कौशल उन्नयन (Skill upgradation) किया जा सकता है और वित्तीय सहायता प्रदान की जा सकती है।
- सामाजिक समावेशन (Social inclusion) सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है ताकि हाशिए पर पड़े परंपरागत व्यावसायिक समुदायों को मुख्यधारा में लाया जा सके और उन्हें समान अवसर मिल सकें।
- संवैधानिक सुरक्षा उपाय (Constitutional safeguards) और व्यावसायिक स्वतंत्रता (Occupational freedom) सुनिश्चित करना इन समुदायों के गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका के लिए आवश्यक है।
- सरकार की भूमिका इन व्यवसायों को पुनर्जीवित करने, बाजार पहुंच बढ़ाने और बिचौलियों की भूमिका को कम करने में महत्वपूर्ण है।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) क्षेत्र के तहत इन व्यवसायों को बढ़ावा देना आर्थिक संवृद्धि (Economic growth) और रोजगार सृजन में सहायक हो सकता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पारंपरिक व्यवसायों का संरक्षण | भारत की सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक विविधता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण। |
| सामाजिक समावेशन | इन समुदायों को मुख्यधारा में लाकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना। |
| आर्थिक स्थिरता | ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आजीविका के अवसरों को बनाए रखना। |
| कौशल और ज्ञान का हस्तांतरण | पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे विशिष्ट कौशल और शिल्प को जीवित रखना। |
| स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा | स्थानीय उत्पादों और सेवाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- पारंपरिक व्यवसाय भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, विशेषकर असंगठित क्षेत्र में।
- ये लाखों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं।
- इनके उत्पादों की वैश्विक बाजारों में भी मांग है, जिससे निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व
- पारंपरिक समुदाय भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक हैं।
- इन व्यवसायों का संरक्षण सामाजिक समरसता और समावेशी विकास के लिए आवश्यक है।
- यह विभिन्न समुदायों की पहचान और गरिमा को बनाए रखने में मदद करता है।
नीतिगत महत्व
- नीतिगत समर्थन से इन व्यवसायों को आधुनिक चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी।
- यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक विकास समावेशी हो और किसी भी वर्ग को पीछे न छोड़े।
- सरकारी हस्तक्षेप से बाजार की विफलताएं दूर होंगी और उचित आय सुनिश्चित होगी।
चुनौतियाँ
1. यांत्रिकीकरण और औद्योगिक उत्पादन
- मशीनों द्वारा निर्मित उत्पादों की तुलना में पारंपरिक हस्तनिर्मित उत्पादों की लागत अधिक होती है।
- बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण पारंपरिक कारीगरों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधन जुटाना, वृद्धि, विकास और रोजगार।
2. बाजार पहुंच का अभाव
- पारंपरिक कारीगरों को अक्सर अपने उत्पादों के लिए उचित बाजार नहीं मिल पाता है।
- बिचौलियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण उनकी आय कम हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि विपणन, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।
3. अनियमित आय और आर्थिक तनाव
- मांग में उतार-चढ़ाव और मौसमी प्रकृति के कारण पारंपरिक व्यवसायों में आय अनिश्चित रहती है।
- यह कारीगरों को गरीबी और आर्थिक असुरक्षा की ओर धकेलता है।
यूपीएससी लिंक: गरीबी और विकासात्मक मुद्दे।
4. सामाजिक भेदभाव
- कुछ पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े समुदायों को अभी भी सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
- यह उनके आर्थिक और सामाजिक उत्थान में बाधा डालता है।
यूपीएससी लिंक: कमजोर वर्गों का कल्याण, सामाजिक न्याय।
5. कौशल उन्नयन का अभाव
- आधुनिक तकनीकों और डिजाइनों के साथ तालमेल बिठाने के लिए कौशल उन्नयन की कमी।
- युवा पीढ़ी में पारंपरिक व्यवसायों के प्रति घटती रुचि।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन का विकास, कौशल विकास।
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| यांत्रिकीकरण | उत्पादन लागत में वृद्धि और प्रतिस्पर्धा में कमी। |
| बाजार पहुंच | बिचौलियों पर निर्भरता और उचित मूल्य का अभाव। |
| अनियमित आय | आर्थिक असुरक्षा और पलायन को बढ़ावा। |
| सामाजिक भेदभाव | समुदायों का हाशिए पर जाना और अवसरों की कमी। |
| कौशल उन्नयन | आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप कौशल का अभाव। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना (PM-VIKAS)
- राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM)
- एक जिला एक उत्पाद (ODOP) पहल
आगे की राह
- पारंपरिक व्यवसायों के लिए विशेष नीतिगत ढांचा तैयार करना।
- कारीगरों को सीधे बाजार से जोड़ने के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और डिजिटल मार्केटिंग को बढ़ावा देना।
- कौशल उन्नयन और आधुनिक डिजाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना।
- पारंपरिक उत्पादों के लिए भौगोलिक संकेतक (GI) टैग को बढ़ावा देना और उसका संरक्षण करना।
- वित्तीय समावेशन के माध्यम से आसान ऋण और पूंजी तक पहुंच सुनिश्चित करना।
- सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार करना ताकि कारीगरों को आर्थिक स्थिरता मिल सके।
- पारंपरिक व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाना।
- सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों (SHG) को मजबूत करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पारंपरिक व्यवसाय · नीतिगत समर्थन · सामाजिक समावेशन · समावेशी विकास · आर्थिक तनाव · बाजार पहुंच · मध्यस्थों पर निर्भरता · सामाजिक भेदभाव · मैकेनाइजेशन · हस्तशिल्प · संवैधानिक सुरक्षा · आजीविका का संरक्षण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(g)’, ‘नोट’: ‘कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘नोट’: ‘गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘नोट’: ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करना।’}
- {‘Article’: ‘अनुच्छेद 43’, ‘नोट’: ‘कामगारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि।’}
अवधारणा प्रवाह
यांत्रिकीकरण और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा → पारंपरिक उत्पादों की मांग में कमी → कारीगरों की आय में गिरावट → आर्थिक तनाव और आजीविका का नुकसान → पारंपरिक व्यवसायों का लुप्त होना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत में पारंपरिक व्यवसायों को मशीनीकरण और कारखाने में बने उत्पादों से आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है।
2. पारंपरिक व्यवसायों में लगे कारीगरों के लिए अपर्याप्त बाजार पहुंच और मध्यस्थों पर निर्भरता उनकी आय को कम करने वाले प्रमुख कारक हैं।
3. भारतीय संविधान पारंपरिक समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि मशीनीकरण और कारखाने में बने उत्पादों ने पारंपरिक व्यवसायों को गंभीर आर्थिक तनाव में डाल दिया है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अपर्याप्त बाजार पहुंच और मध्यस्थों पर निर्भरता कारीगरों की आय को कम करती है। कथन 3 गलत है क्योंकि भारतीय संविधान पारंपरिक समुदायों के सशक्तिकरण के लिए विभिन्न सुरक्षा उपाय प्रदान करता है, जैसे कि अनुच्छेद 15, 16, 17, 46 और पांचवीं एवं छठी अनुसूची।
Q2. पारंपरिक व्यवसायों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- सरकार की नीतियां पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- बदलती बाजार स्थितियां और सामाजिक भेदभाव पारंपरिक व्यवसायों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
- पारंपरिक व्यावसायिक समुदाय भारत की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक विकास में योगदान करते हैं।
- पारंपरिक व्यवसायों में लगे सभी कारीगरों को पर्याप्त बाजार पहुंच प्राप्त है और वे बिचौलियों पर निर्भर नहीं हैं।
उत्तर: पारंपरिक व्यवसायों में लगे सभी कारीगरों को पर्याप्त बाजार पहुंच प्राप्त है और वे बिचौलियों पर निर्भर नहीं हैं। — विकल्प (d) सही नहीं है। समाचार रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अपर्याप्त बाजार पहुंच और मध्यस्थों पर निर्भरता ने कारीगरों की आय को कम कर दिया है, जिसका अर्थ है कि सभी कारीगरों को पर्याप्त बाजार पहुंच प्राप्त नहीं है और वे बिचौलियों पर निर्भर हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में पारंपरिक व्यवसायों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का परीक्षण कीजिए। इन व्यवसायों के संरक्षण और संवर्धन में नीतिगत समर्थन तथा संवैधानिक सुरक्षा उपायों की भूमिका पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** पारंपरिक व्यवसायों का महत्व और भारतीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति तथा सामाजिक विकास में उनका योगदान।
2. **चुनौतियाँ:**
* **आर्थिक चुनौतियाँ:** मशीनीकरण, कारखाने में बने उत्पादों से प्रतिस्पर्धा, अनियमित आय, अपर्याप्त बाजार पहुंच, मध्यस्थों पर अत्यधिक निर्भरता, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें।
* **सामाजिक चुनौतियाँ:** सामाजिक भेदभाव, कौशल का हस्तांतरण न होना, युवा पीढ़ी का पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुंच।
* **नीतिगत चुनौतियाँ:** अपर्याप्त नीतिगत समर्थन, जागरूकता की कमी, ऋण तक सीमित पहुंच।
3. **नीतिगत समर्थन की भूमिका:**
* **सरकारी योजनाएँ:** कौशल विकास कार्यक्रम (जैसे प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना), ऋण सुविधाएँ (जैसे मुद्रा योजना, पीएम स्वनिधि), बाजार पहुंच में सुधार (जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ना, हस्तशिल्प मेलों का आयोजन)।
* **संरक्षण नीतियाँ:** भौगोलिक संकेतक (GI) टैग, पारंपरिक उत्पादों के लिए विशेष प्रोत्साहन, क्लस्टर विकास दृष्टिकोण।
* **जागरूकता और संवर्धन:** पारंपरिक कलाओं और शिल्पों को बढ़ावा देने के लिए अभियान।
4. **संवैधानिक सुरक्षा उपायों की भूमिका:**
* **मौलिक अधिकार:** अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता), अनुच्छेद 19 (व्यवसाय की स्वतंत्रता)।
* **राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP):** अनुच्छेद 38 (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय), अनुच्छेद 39 (आजीविका के पर्याप्त साधन), अनुच्छेद 46 (कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों का संवर्धन)।
* **विशेष प्रावधान:** पांचवीं और छठी अनुसूची के तहत जनजातीय क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान।
5. **निष्कर्ष:** पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता, जिसमें नीतिगत समर्थन, संवैधानिक सुरक्षा और सामाजिक जागरूकता शामिल हो, ताकि समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सके।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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