07 Aug परिसीमन बिल पर डीएमके की रणनीति: दक्षिण राज्यों के राजनीतिक भविष्य पर बड़ा फैसला
✎ परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करके 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था और शासन | GS Paper II — संघवाद
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, लोकसभा सीटें, जनसंख्या नियंत्रण, प्रतिनिधित्व का सिद्धांत, संविधान संशोधन
- Essay: भारत में संघवाद और क्षेत्रीय असमानताएँ, जनसांख्यिकी, लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व का भविष्य
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करके ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी DMK ने परिसीमन विधेयक पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह संसद में बिल का आधिकारिक मसौदा आने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लेगी। पार्टी के अनुसार, विधेयक के प्रत्येक प्रावधान और बिंदु का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा, विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया जाएगा कि उनके द्वारा पूर्व में दिए गए सुझावों को बिल में शामिल किया गया है या नहीं। यह बयान ऐसे समय में आया है जब परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर लोकसभा में तीखी बहस हो चुकी है और दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक विवाद गहराया हुआ है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करना है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
- पहला परिसीमन आयोग 1952 में गठित किया गया था। अब तक चार परिसीमन आयोग (1952, 1963, 1973 और 2002) गठित किए जा चुके हैं।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का अंतिम परिसीमन 2002 में किया गया था, जो 2001 की जनगणना पर आधारित था।
- संविधान के 84वें संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न किया जाए। 87वें संशोधन अधिनियम, 2003 ने कुल सीटों की संख्या को अपरिवर्तित रखते हुए 2001 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन की अनुमति दी।
- दक्षिण भारतीय राज्यों को यह आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण आगामी परिसीमन में उनका प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
- केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए दावा किया है कि नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
परिसीमन आयोग क्या है?
- परिसीमन आयोग एक उच्च-शक्ति वाला निकाय है जिसका कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
- यह आयोग भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और भारत के चुनाव आयोग (Election Commission of India) के सहयोग से कार्य करता है।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- आयोग का मुख्य कार्य जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करना है, ताकि सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके।
- यह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या और उनके स्थानों का भी निर्धारण करता है।
- आयोग अपनी रिपोर्ट सीधे सरकार को सौंपता है, जिसे बाद में संसद के समक्ष रखा जाता है। संसद या राज्य विधानसभाओं को इसमें कोई संशोधन करने की शक्ति नहीं होती है।
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन का आधार | जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन, जो राज्यों की जनसंख्या वृद्धि को सीधे प्रभावित करता है। |
| प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन | जनसंख्या के अनुसार सीटों का आवंटन, जिससे कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है और दूसरों का घट सकता है। |
| लोकसभा सीटों में वृद्धि | प्रस्तावित विधेयक में लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है, जिससे संसद में कुल प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। |
| दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ | दक्षिण के राज्यों को डर है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। |
| DMK का रुख | DMK ने विधेयक के अंतिम मसौदे का अध्ययन करने के बाद ही अपना समर्थन या विरोध तय करने की बात कही है, जिसमें उनके पुराने सुझावों को शामिल करने पर जोर दिया गया है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- परिसीमन (Delimitation) का सीधा संबंध राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से है, विशेषकर लोकसभा में उनकी सीटों की संख्या से।
- यह राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है, क्योंकि जनसंख्या वृद्धि दर के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है।
- दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के लिए उनके पुरस्कार या दंड से जुड़ी हैं।
सामाजिक महत्व
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व समान हो।
- यह सुनिश्चित करता है कि विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व हो, जिससे समावेशी शासन को बढ़ावा मिलता है।
संवैधानिक महत्व
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है, जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
- यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है जो निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को अद्यतन करता है ताकि जनसंख्या में बदलाव को दर्शाया जा सके।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व
- जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, उन्हें डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से लोकसभा में उनकी सीटें कम हो सकती हैं।
- यह उन राज्यों को हतोत्साहित कर सकता है जिन्होंने राष्ट्रीय हित में परिवार नियोजन कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. संघवाद पर प्रभाव
- यदि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटता है, तो यह संघवाद की भावना को कमजोर कर सकता है, जहाँ राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में उचित आवाज मिलनी चाहिए।
- इससे केंद्र और दक्षिणी राज्यों के बीच तनाव बढ़ सकता है, जिससे राष्ट्रीय एकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
3. राजनीतिक सहमति का अभाव
- परिसीमन एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति आवश्यक है, लेकिन वर्तमान में इस पर तीखी बहस और असहमति है।
- विधेयक के पारित होने और उसके कार्यान्वयन में राजनीतिक गतिरोध एक बड़ी चुनौती हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संसद, विधायी प्रक्रिया
4. सीटों में वृद्धि का प्रभाव
- लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव संसद के आकार और कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा।
- इससे संसद भवन में बैठने की व्यवस्था, बहस के लिए समय का आवंटन और सदस्यों के प्रभावी प्रतिनिधित्व पर सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संसद, संसदीय कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनसंख्या आधारित परिसीमन | दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने की आशंका, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। |
| संघीय संतुलन | राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति के असंतुलन से संघवाद की भावना को ठेस पहुँचने का डर। |
| राजनीतिक ध्रुवीकरण | परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति का अभाव, जिससे विधायी प्रक्रिया में बाधा आ सकती है। |
| संसदीय क्षमता | लोकसभा सीटों में प्रस्तावित वृद्धि से संसद के प्रभावी कामकाज और सदस्यों के प्रतिनिधित्व पर संभावित दबाव। |
| DMK के सुझावों का समावेश | DMK द्वारा दिए गए पुराने सुझावों को नए विधेयक में शामिल न किए जाने पर पार्टी के विरोध की संभावना। |
आगे की राह
- परिसीमन के लिए एक सर्वसम्मत फार्मूला विकसित किया जाए जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न करे।
- केंद्र सरकार को दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए व्यापक परामर्श और संवाद स्थापित करना चाहिए।
- एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों का अध्ययन करे और एक न्यायसंगत समाधान प्रस्तुत करे।
- परिसीमन के लिए एक ‘स्थिरता खंड’ (Stability Clause) पर विचार किया जा सकता है, जो जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखे।
- संसद में विधेयक पर व्यापक बहस और चर्चा सुनिश्चित की जाए, जिसमें सभी राजनीतिक दलों के विचारों को सुना जाए और उचित संशोधनों पर विचार किया जाए।
- परिसीमन आयोग को अधिक स्वायत्तता और पारदर्शिता के साथ कार्य करने की अनुमति दी जाए, ताकि उसके निर्णय निष्पक्ष और स्वीकार्य हों।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन आयोग · जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व · संसदीय निर्वाचन क्षेत्र · अनुच्छेद 82 · अनुच्छेद 170 · संघवाद · दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ · लोकसभा सीटें · विधानसभा सीटें · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश · संवैधानिक संशोधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘विधानसभा सीटों का परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
जनगणना के आँकड़े जारी होते हैं। → परिसीमन आयोग का गठन होता है। → आयोग निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करता है। → जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है। → संसद में परिसीमन विधेयक पेश किया जाता है। → विधेयक पर राजनीतिक बहस और सहमति का प्रयास होता है। → परिसीमन लागू होने के बाद चुनाव होते हैं।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को 2001 की जनगणना तक के लिए स्थगित कर दिया था।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने सीटों के परिसीमन को 2001 की जनगणना तक के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन यह 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया है। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
2. आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और उनके पास कानून का बल होता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 2 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त। मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त इसके पदेन सदस्य होते हैं। कथन 2 सही है। आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और उनके पास कानून का बल होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन की अवधारणा और इसके संवैधानिक प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। क्या जनसंख्या-आधारित परिसीमन भारत के संघवाद के लिए एक चुनौती प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिसीमन की अवधारणा:** निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया, जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर सीटों का समान वितरण सुनिश्चित करना।
2. **संवैधानिक प्रावधान:**
* **अनुच्छेद 82:** संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार।
* **अनुच्छेद 170:** राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित।
* **परिसीमन आयोग:** संरचना (सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, राज्य चुनाव आयुक्त), कार्य और आदेशों की प्रकृति (अंतिम, अदालती चुनौती से परे)।
* **स्थगन:** 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा 2001 तक और फिर 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा 2026 तक सीटों के समायोजन पर रोक।
3. **जनसंख्या-आधारित परिसीमन और संघवाद पर चुनौती (दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में):**
* **दक्षिण की चिंताएँ:** जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व का डर।
* **प्रतिनिधित्व का असंतुलन:** अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों को अधिक सीटें मिलने की संभावना, जिससे राजनीतिक शक्ति का ध्रुवीकरण हो सकता है।
* **संघीय संतुलन पर प्रभाव:** संघवाद के सिद्धांत (राज्यों की समानता) के विरुद्ध, जहाँ राज्यों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलता है।
* **राज्यों के प्रोत्साहन पर नकारात्मक प्रभाव:** जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित करना।
4. **समालोचनात्मक परीक्षण (विपरीत तर्क/संतुलित दृष्टिकोण):**
* **लोकतंत्र का सिद्धांत:** ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व आवश्यक।
* **समान प्रतिनिधित्व:** यह सुनिश्चित करना कि सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व समान हो, चाहे वे किसी भी राज्य में रहते हों।
* **सरकार का तर्क:** केंद्र सरकार का दावा है कि नए मॉडल से दक्षिणी राज्यों की आनुपातिक हिस्सेदारी पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।
* **वैकल्पिक समाधान:** प्रतिनिधित्व के लिए जनसंख्या के साथ-साथ अन्य कारकों (जैसे भौगोलिक क्षेत्र, विकास संकेतक) पर विचार करने की संभावना।
5. **निष्कर्ष:** परिसीमन एक जटिल संवैधानिक और राजनीतिक मुद्दा है जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन के बीच संतुलन बनाने की चुनौती प्रस्तुत करता है। एक न्यायसंगत समाधान की आवश्यकता है जो सभी राज्यों की चिंताओं को दूर करे और भारत के संघीय ढांचे को मजबूत करे।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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