पश्चिमी हिमालय में तेज़ गर्मी, बर्फ़ पिघलने का सबसे बड़ा खतरा: नया अध्ययन

Western Himalaya warming faster, will lose most snow: What recent study found — labelled illustration

पश्चिमी हिमालय में तेज़ गर्मी, बर्फ़ पिघलने का सबसे बड़ा खतरा: नया अध्ययन

3D cutaway: Western Himalaya warming faster, will lose most snow
3D cutaway: Western Himalaya warming faster, will lose most snow

Western Himalaya  ·  Snow cover  ·  Cryospheric resources  ·  Monsoon dynamics  ·  Seasonal water  ·  Temperature rise

✎ पश्चिमी हिमालय जलवायु परिवर्तन के कारण अन्य हिमालयी क्षेत्रों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे सर्दियों में तीव्र हिमपात का नुकसान होगा, जिसके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक परिणाम होंगे।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव)  |  GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण, आपदा प्रबंधन)
  • Prelims: पश्चिमी हिमालय, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, हिमपात का नुकसान, तापमान वृद्धि, पर्यावरण संवेदनशीलता
  • Essay: जलवायु परिवर्तन: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव और चुनौतियाँ, सतत विकास के लिए हिमालयी क्षेत्र का संरक्षण: आवश्यकता और उपाय

त्वरित पुनरावृत्ति: पश्चिमी हिमालय जलवायु परिवर्तन के कारण अन्य हिमालयी क्षेत्रों की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे सर्दियों में तीव्र हिमपात का नुकसान होगा, जिसके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक परिणाम होंगे।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी हिमालय (जिसमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश शामिल हैं) मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, और आने वाले वर्षों में यहाँ हिमपात का सबसे तीव्र नुकसान होगा। इस अध्ययन ने 1901 से 2020 तक के 120 वर्षों के तापमान रिकॉर्ड और आठ वैश्विक जलवायु मॉडलों का उपयोग करके हिमालय के तीन क्षेत्रों में तापमान वृद्धि और हिमपात के नुकसान का विश्लेषण किया है, साथ ही यह भी बताया है कि यह परिवर्तन 2100 तक किस हद तक जा सकता है।

पृष्ठभूमि

  • हिमालयी क्षेत्र विश्व की सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत है और करोड़ों लोगों की आजीविका को प्रभावित करता है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे ध्रुवीय क्षेत्रों और उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
  • हिमालय को अक्सर एक एकल प्रणाली के रूप में देखा जाता है, लेकिन यह अध्ययन दर्शाता है कि इसके विभिन्न खंड (पश्चिमी, मध्य और पूर्वी) जलवायु परिवर्तन के प्रति अलग-अलग संवेदनशीलता प्रदर्शित करते हैं।
  • तापमान वृद्धि से न केवल हिमपात कम होता है, बल्कि यह जल सुरक्षा, कृषि, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के जीवन पर भी गहरा प्रभाव डालता है।
  • अध्ययन में पाया गया है कि पश्चिमी हिमालय में सर्दियाँ वसंत ऋतु की तुलना में तेजी से गर्म हो रही हैं, और रात का तापमान दिन के अधिकतम तापमान से अधिक तेजी से बढ़ रहा है।
  • उच्च उत्सर्जन परिदृश्यों के तहत, पश्चिमी हिमालय में सर्दियों का तापमान 7°C से अधिक बढ़ सकता है, जिससे सदी के अंत तक वसंत ऋतु में हिमपात का नुकसान कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य की तुलना में तीन गुना अधिक हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र पर इसके प्रभाव

  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पृथ्वी के औसत तापमान और मौसम के पैटर्न में दीर्घकालिक बदलाव को संदर्भित करता है, जिसका मुख्य कारण मानवीय गतिविधियाँ, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन का जलना है।
  • हिमालयी क्षेत्र ‘तीसरा ध्रुव’ (Third Pole) कहलाता है क्योंकि यहाँ ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे बड़ा हिम और ग्लेशियर भंडार है। यह क्षेत्र वैश्विक जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
  • अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी हिमालय में तापमान वृद्धि की दर मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक है, जो इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
  • कम हिमपात का अर्थ है कि सतह अधिक काली हो जाती है, जो अधिक गर्मी को अवशोषित करती है, जिससे और अधिक बर्फ पिघलती है – यह एक ‘सकारात्मक प्रतिक्रिया लूप’ (Positive Feedback Loop) है।
  • सर्दियों में कम हिमपात का मतलब है कि पिघलने वाले महीनों के लिए कम बर्फ जमा होती है, जिससे नदियों में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, खासकर शुष्क मौसम में।
  • तापमान में वृद्धि और हिमपात के नुकसान से जलविद्युत उत्पादन, कृषि (विशेषकर सेब और अन्य नकदी फसलों), पर्यटन और स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।
  • यह अध्ययन भविष्य के जलवायु मॉडल और ऐतिहासिक डेटा का संयोजन करके 2100 तक के संभावित परिदृश्यों का आकलन करता है, जिससे नीति निर्माताओं को अनुकूलन और शमन रणनीतियाँ बनाने में मदद मिल सकती है।
  • उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में, 2081-2100 तक पश्चिमी हिमालय में सर्दियाँ 7.18°C, मध्य में 6.71°C और पूर्वी हिमालय में 5.82°C अधिक गर्म हो सकती हैं, जो 1900 के दशक की शुरुआत की तुलना में है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
पश्चिमी हिमालय में तीव्र तापन लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के क्षेत्रों में तापमान में तेजी से वृद्धि, जो मध्य और पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों की तुलना में अधिक है।
सर्दियों का तेजी से गर्म होना सर्दियों में तापमान में वृद्धि वसंत ऋतु की तुलना में अधिक है, जिससे बर्फ जमा होने की प्रक्रिया बाधित होती है।
रात के तापमान में वृद्धि दिन के तापमान की तुलना में रात के तापमान में अधिक तेजी से वृद्धि हो रही है, जो बर्फ के पिघलने की दर को प्रभावित करता है।
उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में 7°C से अधिक तापन उच्च उत्सर्जन की स्थिति में पश्चिमी हिमालय की सर्दियों में 7°C से अधिक की वृद्धि हो सकती है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय परिणाम होंगे।
बर्फबारी में कमी पश्चिमी हिमालय में बर्फबारी में सबसे अधिक कमी देखी जाएगी, जिससे जल सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होंगे।
पश्चिम से पूर्व की ओर तापन पैटर्न पूरे हिमालयी क्षेत्र में पश्चिम से पूर्व की ओर तापन का एक समान पैटर्न देखा जा रहा है, जिसमें पश्चिमी क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील है।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: हिमालयी क्षेत्र की अद्वितीय जैव विविधता (Biodiversity) और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • जल सुरक्षा पर संकट: हिमालयी ग्लेशियर (Glacier) दक्षिण एशिया की प्रमुख नदियों के स्रोत हैं। बर्फबारी में कमी और तेजी से पिघलने से इन नदियों के जल प्रवाह पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा, जिससे कृषि, पेयजल और पनबिजली उत्पादन प्रभावित होगा।
  • आपदाओं का जोखिम: ग्लेशियरों के पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और भूस्खलन (Landslide) जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ जाएगा।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • कृषि और आजीविका: हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की आजीविका मुख्य रूप से कृषि और पर्यटन पर निर्भर करती है। बर्फबारी में कमी और मौसमी बदलाव कृषि पद्धतियों को बाधित करेंगे और पर्यटन को प्रभावित करेंगे।
  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: बढ़ते तापमान से वेक्टर-जनित रोगों (Vector-borne diseases) का प्रसार बढ़ सकता है और अत्यधिक गर्मी की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है, जिससे मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • विस्थापन और प्रवास: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण स्थानीय समुदायों को विस्थापन और प्रवास का सामना करना पड़ सकता है, जिससे सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न होंगी।

रणनीतिक महत्व

  • सीमा सुरक्षा: हिमालय भारत की उत्तरी सीमा का निर्माण करता है। इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले पर्यावरणीय बदलाव सीमा प्रबंधन और सुरक्षा चुनौतियों को बढ़ा सकते हैं।
  • भू-राजनीतिक निहितार्थ: जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण क्षेत्रीय देशों के बीच जल-साझाकरण समझौतों और संभावित संघर्षों पर असर पड़ सकता है।

चुनौतियाँ

1. जल संसाधनों पर दबाव

  • बर्फबारी में कमी से नदियों में जल प्रवाह अनियमित हो जाएगा, जिससे सिंचाई, पेयजल और पनबिजली उत्पादन प्रभावित होगा।
  • गर्मी के महीनों में पानी की कमी और सर्दियों में अप्रत्याशित बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

2. कृषि और खाद्य सुरक्षा

  • बदलते मौसम पैटर्न और तापमान वृद्धि से पारंपरिक फसल चक्र बाधित होंगे, जिससे कृषि उत्पादकता में कमी आएगी।
  • बागवानी और नकदी फसलों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे किसानों की आय प्रभावित होगी।

3. आपदा जोखिम में वृद्धि

  • ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि होगी।
  • अत्यधिक वर्षा और बादल फटने जैसी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ सकती है।

4. जैव विविधता का नुकसान

  • हिमालयी क्षेत्र की अद्वितीय वनस्पतियों और जीवों के आवास नष्ट हो जाएंगे, जिससे कई प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर पहुँच सकती हैं।
  • प्रजातियों के भौगोलिक वितरण में बदलाव आएगा, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ेगा।

5. स्थानीय समुदायों की आजीविका पर प्रभाव

  • पर्यटन और कृषि पर निर्भर स्थानीय लोगों की आय के स्रोत प्रभावित होंगे, जिससे गरीबी और बेरोजगारी बढ़ सकती है।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले विस्थापन से सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जल संकट नदियों में जल प्रवाह की अनिश्चितता, कृषि और पेयजल की कमी।
कृषि उत्पादकता में कमी बदलते मौसम पैटर्न से फसल चक्र बाधित, खाद्य सुरक्षा पर असर।
प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि GLOF, भूस्खलन, बादल फटने जैसी घटनाओं का बढ़ता जोखिम।
जैव विविधता का क्षरण हिमालयी वनस्पतियों और जीवों के आवासों का नुकसान, प्रजातियों का विलुप्त होना।
आजीविका का नुकसान पर्यटन और कृषि पर निर्भर समुदायों की आय प्रभावित, विस्थापन का खतरा।
बुनियादी ढाँचे पर दबाव बढ़ती आपदाओं से सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढाँचे को क्षति।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
  • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि (National Adaptation Fund for Climate Change)
  • हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन (National Mission for Sustaining the Himalayan Ecosystem)

आगे की राह

  • जलवायु परिवर्तन शमन (Climate Change Mitigation) प्रयासों को तेज करना, विशेष रूप से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (Greenhouse Gas Emissions) को कम करना।
  • हिमालयी क्षेत्रों के लिए विशिष्ट जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) रणनीतियों को विकसित करना और लागू करना।
  • जल संसाधन प्रबंधन (Water Resource Management) को सुदृढ़ करना, जिसमें जल संचयन (Water Harvesting) और कुशल सिंचाई (Efficient Irrigation) प्रणालियाँ शामिल हों।
  • आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली (Disaster Early Warning Systems) और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र (Disaster Response Mechanisms) को मजबूत करना।
  • स्थानीय समुदायों को जलवायु-लचीली कृषि (Climate-resilient Agriculture) पद्धतियों और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों के लिए प्रशिक्षित करना।
  • हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाना।
  • क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि साझा जल संसाधनों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन किया जा सके।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी (Scientific Research and Monitoring) को बढ़ाना ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके और नीति निर्माण में सहायता मिल सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पश्चिमी हिमालय · जलवायु परिवर्तन · ग्लोबल वार्मिंग · हिमपात हानि · पारिस्थितिक संवेदनशीलता · जल संसाधन · उच्च उत्सर्जन परिदृश्य · अनुकूलन रणनीतियाँ · हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र · स्थानीय जलवायु परिवर्तन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना’}

अवधारणा प्रवाह

उच्च ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन  →  पश्चिमी हिमालय में तीव्र तापन  →  सर्दियों में बर्फबारी में कमी  →  ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना  →  जल संसाधनों पर दबाव और आपदा जोखिम में वृद्धि  →  कृषि, आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हाल के एक अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी हिमालय मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।
2. अध्ययन में पाया गया कि पश्चिमी हिमालय में सर्दियाँ वसंत ऋतु की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रही हैं।
3. उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में, पश्चिमी हिमालय की सर्दियाँ 7°C से अधिक गर्म हो सकती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अध्ययन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पश्चिमी हिमालय मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। कथन 2 भी सही है क्योंकि अध्ययन में पाया गया है कि पश्चिमी हिमालय में सर्दियाँ वसंत ऋतु की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रही हैं। कथन 3 भी सही है क्योंकि अध्ययन के अनुसार उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में पश्चिमी हिमालय की सर्दियाँ 7°C से अधिक गर्म हो सकती हैं।

Q2. पश्चिमी हिमालय में हिमपात हानि के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. कम हिमपात का अर्थ है अधिक गहरा सतह, जो अधिक गर्मी को अवशोषित करती है।
2. गर्म सर्दियाँ पिघलने वाले महीनों के लिए कम बर्फ जमा होने का संकेत देती हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है क्योंकि अध्ययन में बताया गया है कि कम हिमपात से सतह अधिक गहरी हो जाती है, जिससे अधिक गर्मी अवशोषित होती है। कथन 2 भी सही है क्योंकि गर्म सर्दियाँ बर्फ के निर्माण के मौसम में कम बर्फ जमा होने का कारण बनती हैं, जो बाद के पिघलने वाले महीनों के लिए महत्वपूर्ण है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ हालिया अध्ययनों से पता चला है कि पश्चिमी हिमालय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति असाधारण रूप से संवेदनशील है, जिसमें मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में अधिक तेजी से तापमान वृद्धि और हिमपात हानि हो रही है। इस संवेदनशीलता के कारणों और इसके संभावित पारिस्थितिक तथा सामाजिक-आर्थिक परिणामों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: पश्चिमी हिमालय में जलवायु परिवर्तन के हालिया निष्कर्षों का संक्षिप्त उल्लेख करें (तेजी से तापमान वृद्धि, हिमपात हानि, सर्दियों का तेजी से गर्म होना)।
2. संवेदनशीलता के कारण:
a. भौगोलिक स्थिति: पश्चिमी विक्षोभ और अन्य वायुमंडलीय प्रणालियों का प्रभाव।
b. स्थलाकृति और ऊंचाई: विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएं जो इसे अधिक संवेदनशील बनाती हैं।
c. अल-नीनो (El Niño) जैसे वैश्विक जलवायु पैटर्न का प्रभाव।
d. ‘अल्बेडो प्रभाव’ (Albedo Effect): कम बर्फ का अर्थ है अधिक गहरा सतह, जो अधिक गर्मी अवशोषित करती है और बर्फ पिघलने की दर को बढ़ाती है।
e. मानवीय गतिविधियाँ: स्थानीय प्रदूषण और भूमि उपयोग परिवर्तन का योगदान।
3. पारिस्थितिक परिणाम:
a. जैव विविधता पर प्रभाव: विशिष्ट हिमालयी वनस्पतियों और जीवों का विस्थापन या विलुप्ति का खतरा।
b. ग्लेशियरों का पिघलना: जल संसाधनों पर दीर्घकालिक प्रभाव, नदियों के प्रवाह में परिवर्तन।
c. चरम मौसमी घटनाएँ: बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन की आवृत्ति में वृद्धि।
d. कृषि पैटर्न में बदलाव: फसल चक्र और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव।
4. सामाजिक-आर्थिक परिणाम:
a. जल सुरक्षा: निचले इलाकों में पीने के पानी और सिंचाई के लिए पानी की कमी।
b. आजीविका पर प्रभाव: कृषि, पशुपालन और पर्यटन पर निर्भर समुदायों के लिए चुनौतियाँ।
c. आपदा जोखिम: बुनियादी ढांचे और मानव जीवन के लिए खतरा।
d. ऊर्जा उत्पादन: जलविद्युत परियोजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव।
5. निष्कर्ष: इन चुनौतियों का सामना करने के लिए अनुकूलन और शमन रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी और नीतिगत हस्तक्षेप शामिल हों।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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