16 Sep पीएमओ ही कर सकता है आईएएस अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी: केंद्र ने मद्रास हाईकोर्ट को बताया
✎ IAS अधिकारियों के आपराधिक मामलों में अभियोजन के लिए अंतिम सांविधिक मंज़ूरी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की टिप्पणियों के बाद दी जाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय | GS Paper IV — नीतिशास्त्र, सत्यनिष्ठा और अभिरुचि
- Prelims: IAS अधिकारियों का अभियोजन, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, लोक सेवक, मंज़ूरी प्रक्रिया
- Essay: भारत में सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन की चुनौतियाँ, जवाबदेही और दक्षता: लोक प्रशासन में संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: IAS अधिकारियों के आपराधिक मामलों में अभियोजन के लिए अंतिम सांविधिक मंज़ूरी प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की टिप्पणियों के बाद दी जाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों के आपराधिक मामलों में अभियोजन के लिए सांविधिक मंज़ूरी देने का अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के पास है। यह स्पष्टीकरण मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा IAS अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में मंज़ूरी मिलने में देरी पर उठाए गए सवाल के जवाब में दिया गया।
पृष्ठभूमि
- मद्रास उच्च न्यायालय एक ₹98.25 करोड़ के निगम निविदा अनियमितता मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें दो IAS अधिकारियों, के.एस. कंधसामी और के. विजया कार्तिकेयन के अभियोजन के लिए मंज़ूरी में देरी हुई थी।
- अदालत ने सवाल उठाया था कि IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए सक्षम प्राधिकारी कौन है और ऐसी मंज़ूरी प्राप्त करने में इतना लंबा समय क्यों लगता है।
- कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के संयुक्त सचिव ने अदालत को बताया कि फाइलें पहले केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को उसकी टिप्पणियों के लिए भेजी जाती हैं और फिर मंज़ूरी के लिए PMO को अग्रेषित की जाती हैं।
- यह मामला एक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन ‘अरप्पोर अय्यक्कम’ द्वारा दायर किया गया था, जिसमें ग्रेटर चेन्नई और कोयंबटूर नगर निगम अनुबंधों में कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था जो 2014 से 2018 के बीच हुई थीं।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) की धारा 19 के तहत लोक सेवकों के अभियोजन के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंज़ूरी आवश्यक है।
- अदालत ने भ्रष्टाचार के मामलों में मंत्रियों और IAS अधिकारियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया है।
IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंज़ूरी प्रक्रिया
- IAS अधिकारी अखिल भारतीय सेवा (All India Service) के सदस्य होते हैं और केंद्र सरकार के अधीन आते हैं, भले ही वे राज्य सरकारों में सेवारत हों।
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत, किसी भी लोक सेवक के खिलाफ अभियोजन शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से मंज़ूरी प्राप्त करना अनिवार्य है।
- IAS अधिकारियों के मामले में, केंद्र सरकार सक्षम प्राधिकारी है, और इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) अंतिम मंज़ूरी देने वाला निकाय है।
- प्रक्रिया के अनुसार, राज्य सरकार या जांच एजेंसी (जैसे DVAC) पहले केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को प्रस्ताव भेजती है।
- DoPT प्राप्त दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक जांच करता है, जो अक्सर हजारों पृष्ठों में होते हैं।
- जांच के बाद, DoPT इन फाइलों को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को उसकी टिप्पणियों और सिफारिशों के लिए भेजता है।
- CVC की टिप्पणियाँ प्राप्त होने के बाद, फाइलें अंतिम मंज़ूरी के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को अग्रेषित की जाती हैं।
- इस प्रक्रिया का उद्देश्य लोक सेवकों को दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से बचाना है, जबकि यह सुनिश्चित करना भी है कि भ्रष्टाचार के मामलों में उचित कार्रवाई हो।
- हालांकि, इस प्रक्रिया में अक्सर लगने वाला लंबा समय भ्रष्टाचार के मामलों के त्वरित निपटान में बाधा बन सकता है, जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय ने भी रेखांकित किया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| IAS अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी | यह प्रक्रिया भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों को भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजित करने के लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरी से संबंधित है। |
| सक्षम प्राधिकारी | केंद्र सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंजूरी देने वाला सक्षम प्राधिकारी है। |
| प्रक्रिया के चरण | मंजूरी के लिए फाइलें पहले केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) को उनकी टिप्पणियों के लिए भेजी जाती हैं, और फिर मंजूरी के लिए PMO को भेजी जाती हैं। |
| मंजूरी में देरी | न्यायालय ने भ्रष्टाचार के मामलों में नौकरशाहों पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी प्राप्त करने में लगने वाले अत्यधिक समय पर चिंता व्यक्त की है। |
| मामले का संदर्भ | यह मामला 98.25 करोड़ रुपये के निगम निविदा अनियमितता से संबंधित है, जिसमें दो IAS अधिकारियों के.एस. कंडासामी और के. विजया कार्तिकेयन के अभियोजन की मंजूरी में देरी हुई है। |
महत्व
शासन और जवाबदेही
- यह मामला लोक सेवकों, विशेषकर IAS अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं के महत्व को रेखांकित करता है।
- भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित मंजूरी से सुशासन और सार्वजनिक विश्वास को बढ़ावा मिलता है।
न्यायिक सक्रियता
- मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा मंजूरी में देरी पर सवाल उठाना न्यायिक सक्रियता का एक उदाहरण है, जो कार्यपालिका को समयबद्ध तरीके से कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
- यह न्यायपालिका की भूमिका को दर्शाता है कि वह शासन में पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करे।
प्रशासनिक सुधार
- यह घटना प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सुधार की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है, विशेष रूप से भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने में, ताकि अनावश्यक देरी से बचा जा सके।
- मंजूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने से भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों को बल मिलेगा।
चुनौतियाँ
1. मंजूरी प्रक्रिया में देरी
- IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंजूरी प्राप्त करने में अत्यधिक समय लगता है, जिससे भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय में देरी होती है।
- यह देरी भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों की प्रभावशीलता को कम कर सकती है और जनता के विश्वास को कमजोर कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही
2. जवाबदेही का अभाव
- मंजूरी में देरी से भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित करने में बाधा आती है, जिससे जवाबदेही की संस्कृति कमजोर पड़ सकती है।
- यह लोक सेवकों के बीच गलत काम करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकता है।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन, नैतिकता और अखंडता
3. प्रक्रियात्मक जटिलताएँ
- मंजूरी प्रक्रिया में कई स्तरों और विभागों (जैसे DoPT, CVC, PMO) का शामिल होना जटिलता और देरी का कारण बन सकता है।
- विशाल दस्तावेज़ों की जांच और अनुवाद में भी समय लगता है।
यूपीएससी लिंक: सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप
4. संस्थागत समन्वय
- राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच समन्वय की कमी भी मंजूरी प्रक्रिया में देरी का कारण बन सकती है।
- दस्तावेजों के आदान-प्रदान और सूचना के प्रवाह में बाधाएँ प्रक्रिया को धीमा कर सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंजूरी में देरी | भ्रष्टाचार के मामलों में न्याय में देरी, लोक सेवकों की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न। |
| सक्षम प्राधिकारी की स्पष्टता का अभाव | पूर्व में इस बात पर अस्पष्टता थी कि IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए कौन सा प्राधिकारी सक्षम है, जिससे प्रक्रिया में और देरी हुई। |
| प्रक्रियात्मक जटिलताएँ | फाइलों को विभिन्न विभागों (DoPT, CVC, PMO) से गुजरना पड़ता है, जिससे समय लगता है और नौकरशाही की बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। |
| दस्तावेज़ों की मात्रा और अनुवाद | राज्य सरकारों से प्राप्त हजारों पृष्ठों के दस्तावेज़ों की जांच और अनुवाद में लगने वाला समय देरी का एक प्रमुख कारण है। |
| भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों पर प्रभाव | देरी से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों और संगठनों (जैसे अरप्पोर इयक्कम) के प्रयासों की प्रभावशीलता कम होती है। |
आगे की राह
- IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंजूरी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और समयबद्ध किया जाए।
- मंजूरी के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी समय-सीमा निर्धारित की जाए, जिसका कड़ाई से पालन किया जाए।
- डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस का उपयोग करके दस्तावेज़ों के प्रसंस्करण और अनुमोदन को तेज किया जाए।
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए।
- भ्रष्टाचार के मामलों से संबंधित दस्तावेज़ों के अनुवाद और जांच के लिए विशेष प्रकोष्ठों का गठन किया जाए।
- न्यायपालिका द्वारा निगरानी को मजबूत किया जाए ताकि मंजूरी में अनावश्यक देरी को रोका जा सके।
- लोक सेवकों के लिए एक मजबूत नैतिक ढाँचा और आंतरिक सतर्कता तंत्र विकसित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
IAS अधिकारियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी · प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) · भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम · केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) · कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) · लोक सेवकों का अभियोजन · न्यायिक समीक्षा · जवाबदेही · सुशासन · संघवाद · प्रशासनिक सुधार · न्यायिक सक्रियता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 311’, ‘note’: ‘लोक सेवकों की सेवा शर्तों से संबंधित’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
भ्रष्टाचार का आरोप (निगम निविदा अनियमितता) → FIR दर्ज और जांच पूरी (DVAC द्वारा) → IAS अधिकारियों के अभियोजन के लिए मंजूरी की आवश्यकता → मंजूरी प्रक्रिया में देरी (DoPT, CVC, PMO) → मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा देरी पर सवाल → केंद्र सरकार द्वारा PMO को सक्षम प्राधिकारी बताना → जवाबदेही और सुशासन सुनिश्चित करने की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों पर आपराधिक मामलों में मुकदमा चलाने के लिए वैधानिक मंजूरी देने का अधिकार केवल प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के पास है।
2. ऐसी मंजूरी देने से पहले, फाइलों को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की टिप्पणियों के लिए भेजा जाता है।
3. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत लोक सेवकों के अभियोजन के लिए मंजूरी आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है। केंद्र सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि IAS अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए वैधानिक मंजूरी देने का अधिकार प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के पास है, लेकिन यह एकमात्र प्राधिकरण नहीं है; यह DoPT के माध्यम से एक प्रक्रिया का हिस्सा है। कथन 2 सही है। DoPT के संयुक्त सचिव ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया कि फाइलें पहले CVC की टिप्पणियों के लिए भेजी जाती हैं और फिर मंजूरी के लिए PMO को भेजी जाती हैं। कथन 3 सही है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19 लोक सेवकों के अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी को अनिवार्य करती है, ताकि उन्हें दुर्भावनापूर्ण अभियोजन से बचाया जा सके।
Q2. अभिकथन (A): लोक सेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन की मंजूरी में देरी से न्याय में बाधा आ सकती है और जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
कारण (R): अभियोजन की मंजूरी की प्रक्रिया में विभिन्न स्तरों पर फाइलों की विस्तृत जांच और परामर्श शामिल होता है, जिसमें समय लगता है।
उपर्युक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है। भ्रष्टाचार के मामलों में देरी से न्याय प्रणाली में विश्वास कम होता है और यह लोक सेवकों की जवाबदेही को कमजोर करता है। कारण (R) भी सही है। अभियोजन की मंजूरी एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें दस्तावेजों की विस्तृत जांच, CVC जैसी संस्थाओं से परामर्श और अंततः सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय शामिल होता है, जिसमें स्वाभाविक रूप से समय लगता है। R, A का सही स्पष्टीकरण भी है, क्योंकि यह देरी के कारणों को बताता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ लोक सेवकों के अभियोजन के लिए मंजूरी की प्रक्रिया में देरी अक्सर न्यायिक समीक्षा का विषय बन जाती है। इस प्रक्रिया की संवैधानिक और प्रशासनिक चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** लोक सेवकों के अभियोजन के लिए मंजूरी की आवश्यकता और इसके पीछे का उद्देश्य (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 19) का संक्षिप्त परिचय। हालिया मद्रास उच्च न्यायालय के मामले का संदर्भ।
2. **संवैधानिक चुनौतियाँ:**
* **अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार):** क्या मंजूरी की आवश्यकता लोक सेवकों को एक विशेष वर्ग बनाती है जो अन्य नागरिकों से भिन्न है, और क्या यह मनमाना नहीं है?
* **न्याय तक पहुंच:** मंजूरी में अत्यधिक देरी से पीड़ितों के न्याय तक पहुंचने में बाधा।
* **शक्तियों का पृथक्करण:** कार्यपालिका द्वारा न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप।
* **संविधान के मूल सिद्धांत:** जवाबदेही और कानून के शासन पर प्रभाव।
3. **प्रशासनिक चुनौतियाँ:**
* **प्रक्रियात्मक जटिलता:** DoPT, CVC और PMO जैसे कई स्तरों से गुजरने वाली लंबी और बोझिल प्रक्रिया।
* **दस्तावेजों की विशालता:** बड़ी संख्या में दस्तावेजों की जांच में लगने वाला समय।
* **निर्णय लेने में देरी:** सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्णय लेने में अनावश्यक विलंब।
* **राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना:** मंजूरी देने वाले प्राधिकारी पर राजनीतिक दबाव का आरोप।
* **पारदर्शिता की कमी:** मंजूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव।
4. **न्यायिक समीक्षा की भूमिका:**
* उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देरी पर की गई टिप्पणियाँ और निर्देश (जैसे मद्रास उच्च न्यायालय का वर्तमान मामला)।
* सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय (जैसे सुब्रमण्यम स्वामी बनाम मनमोहन सिंह, 2014) जिन्होंने मंजूरी प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने और पारदर्शिता लाने पर जोर दिया।
5. **सुधार के सुझाव:**
* समय-सीमा का निर्धारण।
* प्रक्रिया का सरलीकरण और डिजिटलीकरण।
* पारदर्शिता में वृद्धि।
* भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित जांच और निर्णय के लिए विशेष तंत्र।
6. **निष्कर्ष:** लोक सेवकों की सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए, एक कुशल, पारदर्शी और समयबद्ध मंजूरी प्रक्रिया की वकालत।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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