02 Sep मध्य प्रदेश: 47 साल बाद भी अधूरा रहा नर्मदा जल उपयोग, अब 2031 तक पूरा लक्ष्य
✎ मध्य प्रदेश सरकार वर्ष 2031 तक नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा आवंटित अपने पूरे 18.25 MAF नर्मदा जल का उपयोग करने के लिए 40 नई परियोजनाओं पर काम कर रही है, जो अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भौतिक भूगोल, जल संसाधन) | GS Paper II — राजव्यवस्था (संघवाद, अंतर-राज्यीय जल विवाद) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, सिंचाई, सतत विकास)
- Prelims: नर्मदा नदी, नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT), अंतर-राज्यीय जल विवाद, जल आवंटन, मिलियन एकड़-फीट (MAF), नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (NVDA)
- Essay: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान और सहयोगात्मक संघवाद, जल सुरक्षा और सतत विकास: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: मध्य प्रदेश सरकार वर्ष 2031 तक नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा आवंटित अपने पूरे 18.25 MAF नर्मदा जल का उपयोग करने के लिए 40 नई परियोजनाओं पर काम कर रही है, जो अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश को नर्मदा नदी के पानी में अपना हिस्सा मिले 47 साल हो चुके हैं, लेकिन राज्य अब तक अपने आवंटित 18.25 मिलियन एकड़-फीट (MAF) पानी का पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाया है। वर्तमान में लगभग 10 MAF पानी का ही उपयोग हो रहा है। राज्य सरकार ने अब वर्ष 2031 तक अपने पूरे हिस्से का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए लगभग 40 नई परियोजनाओं पर काम तेज कर दिया है, जिनमें से 36 परियोजनाएँ 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली हैं।
पृष्ठभूमि
- नर्मदा नदी भारत की पाँचवीं सबसे बड़ी नदी है और मध्य प्रदेश तथा गुजरात की ‘जीवन रेखा’ कहलाती है। यह मध्य प्रदेश के अमरकंटक पठार से निकलती है और पश्चिम की ओर बहते हुए खंभात की खाड़ी (अरब सागर) में गिरती है।
- नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (Narmada Water Disputes Tribunal – NWDT) का गठन वर्ष 1969 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) के तहत किया गया था।
- न्यायाधिकरण ने 12 दिसंबर, 1979 को अपना अंतिम फैसला दिया, जिसे केंद्र सरकार के राजपत्र में प्रकाशित किया गया था। इस फैसले में नर्मदा के कुल 28 MAF उपयोग योग्य पानी का चार राज्यों — मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र — के बीच बँटवारा किया गया था।
- इस फैसले के अनुसार, मध्य प्रदेश को सबसे अधिक 18.25 MAF पानी आवंटित किया गया, जबकि गुजरात को 9 MAF, राजस्थान को 0.50 MAF और महाराष्ट्र को 0.25 MAF पानी मिला।
- मध्य प्रदेश सरकार ने अपने आवंटित जल का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (Narmada Valley Development Authority – NVDA) जैसी संस्थाओं के माध्यम से विभिन्न सिंचाई और जल प्रबंधन परियोजनाएँ शुरू की हैं।
अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और उनका समाधान
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 (Article 262) अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है। यह संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के पानी के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
- अनुच्छेद 262 के तहत, संसद ने दो कानून बनाए हैं: नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956) और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956।
- नदी बोर्ड अधिनियम अंतर-राज्यीय नदी घाटियों के विनियमन और विकास के लिए नदी बोर्डों की स्थापना का प्रावधान करता है।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम केंद्र सरकार को अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए एक अस्थायी न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है। इस न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
- न्यायाधिकरण के निर्णय को किसी भी न्यायालय, यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय में भी चुनौती नहीं दी जा सकती है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ मामलों में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे को बनाए रखा है, विशेष रूप से प्रक्रियात्मक अनियमितताओं या संवैधानिक उल्लंघनों के संबंध में।
- भारत में कई प्रमुख अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद रहे हैं, जैसे कावेरी जल विवाद, कृष्णा जल विवाद और नर्मदा जल विवाद, जिनके समाधान के लिए न्यायाधिकरणों का गठन किया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का फैसला (1979) | नर्मदा नदी के पानी के बँटवारे को कानूनी रूप दिया, जिससे राज्यों को उनके हिस्से का पानी आवंटित हुआ। |
| मध्य प्रदेश को आवंटित जल | 18.25 मिलियन एकड़-फीट (MAF) जल का सबसे बड़ा हिस्सा, जो राज्य की कृषि और आर्थिक संवृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। |
| वर्तमान उपयोग | आवंटित जल का लगभग 10 MAF ही उपयोग हो पा रहा है, जो जल संसाधनों के अप्रयुक्त रहने को दर्शाता है। |
| लक्ष्य वर्ष 2031 | मध्य प्रदेश द्वारा अपने हिस्से के पूरे 18.25 MAF पानी का उपयोग करने का लक्ष्य, जिससे जल उपयोग दक्षता में सुधार होगा। |
| परियोजनाओं की संख्या | लगभग 40 परियोजनाएँ (जिनमें से 36 परियोजनाएँ ₹20,000 करोड़ से अधिक की हैं) जल उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए चल रही हैं। |
| परियोजनाओं का ज़ोन-वार विभाजन | अपर नर्मदा ज़ोन, जबलपुर ज़ोन आदि में परियोजनाओं का विभाजन, जिससे कार्यान्वयन में सुगमता और क्षेत्रीय आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- नर्मदा जल का पूर्ण उपयोग राज्य में कृषि उत्पादकता को बढ़ाएगा, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।
- सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को प्रोत्साहन मिलेगा और कृषि क्षेत्र में रोज़गार के अवसर सृजित होंगे।
- जल-आधारित उद्योगों और संबद्ध क्षेत्रों जैसे मत्स्य पालन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान बढ़ेगा।
सामाजिक महत्व
- पेयजल आपूर्ति में सुधार होगा, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ पानी की कमी है, जिससे नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार होगा।
- जल सुरक्षा सुनिश्चित होने से ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन (Migration) में कमी आ सकती है, क्योंकि आजीविका के अवसर स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होंगे।
- महिलाओं और बच्चों पर पानी लाने के बोझ में कमी आएगी, जिससे उन्हें शिक्षा और अन्य उत्पादक गतिविधियों में शामिल होने का अधिक समय मिलेगा।
पर्यावरणीय महत्व
- जल संसाधनों का कुशल उपयोग भूजल स्तर (Groundwater Level) को बनाए रखने में मदद कर सकता है, जिससे दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित होगी।
- सिंचाई के लिए सतही जल (Surface Water) के उपयोग से भूजल के अत्यधिक दोहन पर निर्भरता कम होगी, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहेगा।
- जल प्रबंधन परियोजनाओं में आधुनिक तकनीकों का उपयोग जल-जमाव (Waterlogging) और मिट्टी की लवणता (Soil Salinity) जैसी समस्याओं को कम करने में सहायक होगा।
शासन और नीतिगत महत्व
- यह परियोजनाएँ अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में एक मॉडल प्रस्तुत कर सकती हैं, जहाँ राज्यों को अपने आवंटित जल का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की आवश्यकता है।
- जल संसाधन प्रबंधन में राज्य की क्षमता और प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है, जिससे भविष्य की जल नीतियों के लिए एक मज़बूत आधार तैयार होता है।
- योजनाबद्ध तरीके से बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का कार्यान्वयन सुशासन (Good Governance) और प्रभावी नीति निर्माण का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
चुनौतियाँ
1. परियोजना कार्यान्वयन में देरी
- 47 साल बाद भी आवंटित जल का पूर्ण उपयोग न हो पाना परियोजनाओं के धीमे कार्यान्वयन को दर्शाता है।
- भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय मंज़ूरी और वित्तीय बाधाएँ परियोजनाओं में विलंब का कारण बन सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, विकास प्रक्रियाएँ
2. वित्तीय संसाधन और लागत
- ₹20,000 करोड़ से अधिक की 36 परियोजनाओं सहित कुल 40 परियोजनाएँ भारी वित्तीय निवेश की माँग करती हैं।
- परियोजनाओं की बढ़ती लागत और धन की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: सरकारी बजट, अवसंरचना
3. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का निर्णय होने के बावजूद, राज्यों के बीच जल के बँटवारे और उपयोग को लेकर तनाव बना रह सकता है।
- जल के कुशल उपयोग और अन्य राज्यों के साथ समन्वय बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
4. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
- बड़ी जल परियोजनाओं से विस्थापन, वन भूमि का नुकसान और पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- पर्यावरणीय स्थिरता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन, आपदा प्रबंधन
5. तकनीकी और रखरखाव संबंधी चुनौतियाँ
- आधुनिक सिंचाई तकनीकों और जल प्रबंधन प्रणालियों को अपनाने में तकनीकी विशेषज्ञता की कमी हो सकती है।
- परियोजनाओं के दीर्घकालिक रखरखाव और संचालन के लिए पर्याप्त संसाधनों और प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होगी।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अवसंरचना
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल उपयोग दक्षता | मध्य प्रदेश द्वारा अपने हिस्से के 18.25 MAF जल में से केवल 10 MAF का उपयोग, जो जल संसाधनों के अप्रयुक्त रहने को दर्शाता है। |
| परियोजनाओं का कार्यान्वयन | 40 परियोजनाओं का समय पर और प्रभावी ढंग से पूरा होना, जिसमें भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंज़ूरी जैसी बाधाएँ शामिल हैं। |
| वित्तीय प्रबंधन | ₹20,000 करोड़ से अधिक की लागत वाली परियोजनाओं के लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तपोषण सुनिश्चित करना। |
| अंतर-राज्यीय समन्वय | नर्मदा नदी बेसिन के अन्य राज्यों (गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र) के साथ जल बँटवारे और उपयोग पर प्रभावी समन्वय बनाए रखना। |
| पर्यावरणीय स्थिरता | परियोजनाओं के निर्माण और संचालन से होने वाले संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को कम करना और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना। |
| किसानों तक पहुँच | यह सुनिश्चित करना कि सिंचाई परियोजनाओं का लाभ छोटे और सीमांत किसानों तक पहुँचे, जिससे जल का न्यायसंगत वितरण हो। |
आगे की राह
- परियोजना कार्यान्वयन में तेज़ी लाने के लिए एक समयबद्ध कार्ययोजना (Time-bound Action Plan) विकसित की जाए और नियमित निगरानी की जाए।
- भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंज़ूरी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया जाए ताकि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी से बचा जा सके।
- परियोजनाओं के लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु नवीन वित्तपोषण मॉडल (Innovative Financing Models) तलाशे जाएँ।
- जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के लिए सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) प्रणालियों जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जाए।
- किसानों को जल प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों और फसल विविधीकरण के बारे में शिक्षित और प्रशिक्षित किया जाए।
- अंतर-राज्यीय समन्वय को मज़बूत करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषदों (Inter-State Councils) और जल संसाधन मंत्रालयों के बीच नियमित संवाद स्थापित किया जाए।
- परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन किया जाए और प्रभावित समुदायों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लिए प्रभावी योजनाएँ बनाई जाएँ।
- जल गुणवत्ता प्रबंधन और जल संरक्षण (Water Conservation) के उपायों को परियोजनाओं के डिज़ाइन और कार्यान्वयन में एकीकृत किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण · अंतर-राज्यीय जल विवाद · जल आवंटन · जल संसाधन प्रबंधन · सिंचाई क्षमता · सतत जल उपयोग · क्षेत्रीय विकास · जल सुरक्षा · बहुउद्देशीय परियोजनाएँ · अंतर-राज्यीय सहयोग
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
अवधारणा प्रवाह
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का फैसला (1979) → मध्य प्रदेश को 18.25 MAF जल का आवंटन → 47 वर्षों बाद भी केवल 10 MAF जल का उपयोग → जल संसाधनों का अप्रयुक्त रहना और आर्थिक नुकसान → राज्य सरकार द्वारा 2031 तक पूर्ण उपयोग का लक्ष्य → 40 परियोजनाओं का कार्यान्वयन और जल उपयोग दक्षता में वृद्धि → कृषि संवृद्धि, पेयजल सुरक्षा और आर्थिक विकास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (Narmada Water Disputes Tribunal) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
2. इसने मध्य प्रदेश को नर्मदा के कुल उपयोग योग्य जल का सबसे बड़ा हिस्सा आवंटित किया।
3. न्यायाधिकरण का अंतिम फैसला केंद्र सरकार के राजपत्र में 1979 में प्रकाशित हुआ था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत ही ऐसे न्यायाधिकरणों का गठन होता है। कथन 2 सही है क्योंकि मध्य प्रदेश को 18.25 एमएएफ (मिलियन एकड़-फीट) जल आवंटित किया गया था, जो अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक था। कथन 3 भी सही है क्योंकि न्यायाधिकरण का अंतिम फैसला 12 दिसंबर 1979 को राजपत्र में प्रकाशित हुआ था।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा राज्य नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण द्वारा आवंटित जल का एक लाभार्थी नहीं है?
- मध्य प्रदेश
- गुजरात
- महाराष्ट्र
- उत्तर प्रदेश
उत्तर: उत्तर प्रदेश — नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान को नर्मदा जल आवंटित किया था। उत्तर प्रदेश इस आवंटन का लाभार्थी नहीं था।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में न्यायाधिकरणों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के संदर्भ में मध्य प्रदेश द्वारा अपने आवंटित जल के पूर्ण उपयोग में आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों की पृष्ठभूमि और भारत में इनकी प्रासंगिकता।
2. **न्यायाधिकरणों की भूमिका:**
* अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत न्यायाधिकरणों के गठन का उद्देश्य।
* न्यायाधिकरणों की शक्तियाँ और कार्य (जैसे जल आवंटन, उपयोग के नियम तय करना)।
* न्यायाधिकरणों के निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति।
3. **आलोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ):**
* न्यायाधिकरणों द्वारा निर्णय देने में लगने वाला लंबा समय।
* राज्यों द्वारा निर्णयों को लागू करने में प्रतिरोध या देरी।
* तकनीकी विशेषज्ञता की कमी या डेटा की उपलब्धता से संबंधित मुद्दे।
* राजनीतिक हस्तक्षेप और राज्यों के बीच सहयोग की कमी।
* जलवायु परिवर्तन और बदलती जल उपलब्धता का प्रभाव।
4. **नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का संदर्भ:**
* न्यायाधिकरण द्वारा मध्य प्रदेश को आवंटित 18.25 एमएएफ जल का उल्लेख।
* मध्य प्रदेश द्वारा अपने आवंटित जल के पूर्ण उपयोग में आने वाली चुनौतियाँ (जैसे बुनियादी ढाँचे का अभाव, परियोजनाओं को पूरा करने में देरी, वित्तीय बाधाएँ, अंतर-राज्यीय समन्वय के मुद्दे)।
* वर्तमान स्थिति (लगभग 10 एमएएफ का उपयोग) और 2031 तक पूर्ण उपयोग की योजना।
5. **सुझाव/निष्कर्ष:** अंतर-राज्यीय जल विवादों के प्रभावी समाधान के लिए संस्थागत सुधार, डेटा साझाकरण, सहयोगात्मक संघवाद और त्वरित न्यायिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता।
स्रोत: amarujala.com
Madhya Pradesh PCS (MPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: मध्य प्रदेश द्वारा नर्मदा नदी के जल का पूर्ण उपयोग करने के लिए ‘हर बूंद के इस्तेमाल’ की योजना किस वर्ष तक पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है?
- 2025
- 2030
- 2031
- 2035
उत्तर: 2031 — मध्य प्रदेश सरकार ने नर्मदा नदी के जल का पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने के लिए ‘हर बूंद के इस्तेमाल’ की योजना को वर्ष 2031 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।
Mains: नर्मदा नदी के जल संसाधनों के पूर्ण उपयोग के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अपनाई जा रही प्रमुख रणनीतियों एवं चुनौतियों की चर्चा कीजिए। साथ ही, राज्य में जल संरक्षण एवं प्रबंधन में नवाचार को बढ़ावा देने हेतु सुझाव प्रस्तुत कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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