18 Sep यूएन रिपोर्ट: लैंगिक समानता में 171 साल लगेंगे, एसडीजी-5 लक्ष्य विफल

✎ लैंगिक समानता एक मौलिक मानवाधिकार और सतत विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि इसे प्राप्त करने की दिशा में वैश्विक प्रगति निराशाजनक रूप से धीमी है, जिसमें 2030 के SDG 5 लक्ष्यों को पूरा करने में…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — समाज, महिलाएँ और महिला संगठनों की भूमिका | GS Paper II — सामाजिक न्याय, विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप | GS Paper III — समावेशी विकास
- Prelims: सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5), लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण, संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women), लैंगिक अंतराल सूचकांक, वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट
- Essay: लैंगिक समानता: एक दूरस्थ स्वप्न या प्राप्त करने योग्य लक्ष्य?, भारत में महिला सशक्तिकरण की दिशा में चुनौतियाँ और आगे की राह
त्वरित पुनरावृत्ति: लैंगिक समानता एक मौलिक मानवाधिकार और सतत विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि इसे प्राप्त करने की दिशा में वैश्विक प्रगति निराशाजनक रूप से धीमी है, जिसमें 2030 के SDG 5 लक्ष्यों को पूरा करने में गंभीर चुनौतियाँ हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ‘जेंडर स्नैपशॉट 2026’ के अनुसार, लैंगिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में प्रगति बहुत धीमी है और वर्तमान दर से इसे हासिल करने में 171 साल लगेंगे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5) का कोई भी संकेतक 2030 की समय-सीमा तक पूरा होने की राह पर नहीं है, और लैंगिक समानता के लिए संस्थागत तंत्रों को धन की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
पृष्ठभूमि
- लैंगिक समानता (Gender Equality) संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) में से एक है, विशेष रूप से SDG 5, जिसका उद्देश्य 2030 तक लैंगिक समानता प्राप्त करना और सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाना है।
- SDG 5 के तहत भेदभाव समाप्त करना, लैंगिक आधारित हिंसा (Gender-Based Violence) को रोकना, बाल विवाह और महिला जननांग विकृति (Female Genital Mutilation) जैसी हानिकारक प्रथाओं को समाप्त करना, साथ ही नेतृत्व में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी और आर्थिक एवं संपत्ति अधिकारों को सुरक्षित करना शामिल है।
- वैश्विक स्तर पर, राजनीतिक शक्ति पुरुषों में केंद्रित है; रिपोर्ट के अनुसार, सात में से छह देशों का नेतृत्व पुरुष करते हैं। रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है।
- महिलाओं को राजनीतिक जीवन में प्रवेश करने में प्रणालीगत बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें चुनाव लड़ने की उच्च लागत और सार्वजनिक जीवन में हिंसा का खतरा शामिल है।
- दुनिया भर में लाखों महिलाएँ हिंसा और भेदभाव के गंभीर रूपों का सामना कर रही हैं, जिसमें कम उम्र में विवाह, महिला जननांग विकृति और अंतरंग साथी द्वारा हिंसा शामिल है।
- रिपोर्ट के अनुसार, किसी भी देश ने पूर्ण कानूनी समानता हासिल नहीं की है, और अध्ययन किए गए 131 देशों में से 51 प्रतिशत में अभी भी महत्वपूर्ण कानूनी अंतराल मौजूद हैं, विशेषकर महिलाओं के भूमि अधिकारों के संबंध में।
- लैंगिक असमानता को संबोधित करने वाले कार्यक्रमों के लिए विकास सहायता में कटौती की जा रही है, जिससे इस क्षेत्र में प्रगति और धीमी हो रही है।
लैंगिक समानता क्या है?
- लैंगिक समानता का अर्थ है कि सभी लिंगों के व्यक्तियों को समान अधिकार, अवसर और व्यवहार प्राप्त हों, और उनके साथ उनके लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न किया जाए।
- यह केवल महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सभी लैंगिक पहचान वाले व्यक्ति शामिल हैं।
- लैंगिक समानता का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पूरी तरह से विकसित कर सकें और समाज में समान रूप से योगदान कर सकें।
- इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, आर्थिक अवसर, राजनीतिक भागीदारी और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं तक समान पहुँच शामिल है।
- लैंगिक समानता एक मौलिक मानवाधिकार है और एक शांतिपूर्ण, समृद्ध और टिकाऊ दुनिया के लिए आवश्यक आधारशिला है।
- यह समाज के सभी स्तरों पर महिलाओं और पुरुषों के बीच शक्ति और संसाधनों के समान वितरण को भी संदर्भित करता है।
- लैंगिक असमानता के कारण महिलाओं को अक्सर हिंसा, भेदभाव और अवसरों से वंचित होना पड़ता है, जिससे उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।
- लैंगिक समानता प्राप्त करने से न केवल महिलाओं और लड़कियों को लाभ होता है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए आर्थिक विकास, गरीबी में कमी और बेहतर स्वास्थ्य परिणामों सहित व्यापक लाभ लाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लैंगिक समानता (Gender Equality) में धीमी प्रगति | संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट ‘जेंडर स्नैपशॉट 2026’ के अनुसार, लैंगिक समानता प्राप्त करने में 171 साल लगेंगे, जो 2030 के सतत विकास लक्ष्य (SDG 5) के लक्ष्य से बहुत दूर है। |
| राजनीतिक शक्ति में पुरुषों का प्रभुत्व | छह में से सात देशों का नेतृत्व पुरुष करते हैं। रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है (क्रमशः 10% और 20% से कम)। |
| हिंसा और भेदभाव | लगभग एक-तिहाई महिलाओं ने अपने जीवनकाल में साथी या यौन हिंसा का अनुभव किया है। 18 वर्ष से कम उम्र की लगभग पाँच में से एक लड़की का विवाह कर दिया जाता है। |
| कानूनी असमानताएँ | किसी भी देश ने पूर्ण कानूनी समानता हासिल नहीं की है, और 131 देशों में से 51% में महत्वपूर्ण कानूनी अंतराल हैं, विशेषकर भूमि अधिकारों के संबंध में। |
| लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए फंडिंग में कटौती | लैंगिक समानता को संबोधित करने वाले कार्यक्रमों के लिए फंडिंग 2021 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर है, जिससे प्रगति बाधित हो रही है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- लैंगिक असमानता महिलाओं के मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है और समाज के आधे हिस्से को निर्णय लेने की प्रक्रियाओं से वंचित करती है।
- यह महिलाओं के खिलाफ हिंसा, बाल विवाह और महिला जननांग विकृति (Female Genital Mutilation) जैसी हानिकारक प्रथाओं को बढ़ावा देती है, जिससे उनके स्वास्थ्य और गरिमा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
आर्थिक महत्व
- महिलाओं की आर्थिक और संपत्ति अधिकारों तक पहुँच की कमी आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन में बाधा डालती है।
- निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं की कम भागीदारी व्यापार, कानून और वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले निर्णयों में विविधता और समावेशिता को कम करती है, जिससे संभावित रूप से उप-इष्टतम परिणाम प्राप्त होते हैं।
शासन और लोकतांत्रिक महत्व
- राजनीतिक जीवन में महिलाओं की कम भागीदारी लोकतंत्र को कमजोर करती है, क्योंकि आधी आबादी की आवाज़ का अभाव होता है।
- लैंगिक समानता के लिए संस्थागत तंत्रों की फंडिंग में कटौती और शक्ति के क्षरण से शासन की जवाबदेही और प्रभावशीलता कम होती है।
चुनौतियाँ
1. राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी
- अधिकांश देशों में राजनीतिक शक्ति पुरुषों के हाथों में केंद्रित है, जिससे महिलाओं के लिए नेतृत्व की भूमिकाओं में प्रवेश करना मुश्किल हो जाता है।
- चुनाव लड़ने की उच्च लागत और सार्वजनिक जीवन में हिंसा का सामना करने से कई महिलाएँ राजनीति में आने से हतोत्साहित होती हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
2. लैंगिक आधारित हिंसा और भेदभाव
- दुनिया भर में लाखों महिलाएँ शारीरिक, यौन और भावनात्मक हिंसा का अनुभव करती हैं।
- बाल विवाह और महिला जननांग विकृति जैसी प्रथाएँ महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और समग्र कल्याण को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण
3. कानूनी और संपत्ति अधिकारों में असमानता
- किसी भी देश ने पूर्ण कानूनी समानता हासिल नहीं की है, और कई देशों में महिलाओं के भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधान नहीं हैं।
- यह महिलाओं के लिए भूमि स्वामित्व और सुरक्षित कार्यकाल में महत्वपूर्ण बाधाएँ पैदा करता है, उनकी आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित करता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, भूमि सुधार
4. लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए फंडिंग में कमी
- लैंगिक असमानता को संबोधित करने वाले कार्यक्रमों के लिए विकास सहायता फंडिंग में कटौती की जा रही है।
- लैंगिक समानता के लिए संस्थागत तंत्रों के परिचालन बजट में कटौती और उनकी संस्थागत शक्ति का क्षरण प्रगति को धीमा कर रहा है।
यूपीएससी लिंक: शासन, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| SDG 5 लक्ष्यों से विचलन | 2030 की समय-सीमा तक लैंगिक समानता के लिए कोई भी संकेतक पटरी पर नहीं है, जिससे वैश्विक प्रतिबद्धताओं पर सवाल उठते हैं। |
| नेतृत्व की भूमिकाओं में लैंगिक असंतुलन | राजनीति, व्यवसाय और न्यायपालिका में पुरुषों का अत्यधिक प्रभुत्व निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की आवाज़ को कम करता है। |
| महिलाओं के खिलाफ हिंसा की व्यापकता | दुनिया भर में लाखों महिलाएँ विभिन्न प्रकार की हिंसा का सामना करती हैं, जो उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है और उनके विकास में बाधा डालता है। |
| कानूनी और संस्थागत अंतराल | पूर्ण कानूनी समानता की कमी और लैंगिक समानता तंत्रों की कमजोर होती स्थिति प्रगति को बाधित करती है। |
| विकास सहायता में कटौती | लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए फंडिंग में कमी से इन मुद्दों को संबोधित करने की क्षमता कमजोर होती है। |
आगे की राह
- लैंगिक समानता के लिए सतत विकास लक्ष्य 5 (SDG 5) को प्राप्त करने के लिए वैश्विक प्रतिबद्धता और प्रयासों को मजबूत करना।
- राजनीतिक और आर्थिक निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कोटा, क्षमता निर्माण और वित्तीय सहायता जैसे उपाय लागू करना।
- महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने के लिए मजबूत कानूनी ढाँचे, प्रवर्तन तंत्र और जागरूकता अभियान विकसित करना।
- महिलाओं के भूमि अधिकारों सहित पूर्ण कानूनी समानता सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा कानूनों में सुधार करना और नए कानून बनाना।
- लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय फंडिंग को बढ़ाना और लैंगिक समानता के लिए संस्थागत तंत्रों को मजबूत करना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अवसरों तक महिलाओं की पहुँच में सुधार के लिए लक्षित नीतियाँ और कार्यक्रम लागू करना।
- लैंगिक रूढ़िवादिता और भेदभावपूर्ण सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने के लिए सामाजिक जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन अभियानों को बढ़ावा देना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
लैंगिक समानता · सतत विकास लक्ष्य 5 · महिलाओं का सशक्तिकरण · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · लैंगिक हिंसा · कानूनी समानता · भूमि अधिकार · विकास वित्तपोषण · संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट · सामाजिक न्याय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15(3)’, ‘note’: ‘महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(a)’, ‘note’: ‘पुरुष और स्त्री नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(d)’, ‘note’: ‘पुरुष और स्त्री दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243D’, ‘note’: ‘पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243T’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
लैंगिक असमानता में धीमी प्रगति → महिलाओं की राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी में कमी → लैंगिक आधारित हिंसा और भेदभाव की व्यापकता → कानूनी और संस्थागत असमानताएँ → लैंगिक समानता कार्यक्रमों के लिए फंडिंग में कटौती → मानवाधिकारों का उल्लंघन और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधा
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र की ‘जेंडर स्नैपशॉट 2026’ रिपोर्ट के अनुसार, लैंगिक समानता प्राप्त करने में 171 वर्ष लगेंगे।
2. सतत विकास लक्ष्य 5 (लैंगिक समानता) के सभी संकेतक 2030 की समय-सीमा तक पूरे होने की राह पर हैं।
3. रिपोर्ट बताती है कि विश्व स्तर पर छह में से सात देशों का नेतृत्व पुरुषों द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान प्रगति दर पर लैंगिक समानता प्राप्त करने में 171 वर्ष लगेंगे। कथन 2 गलत है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सतत विकास लक्ष्य 5 का एक भी संकेतक 2030 तक पूरा होने की राह पर नहीं है। कथन 3 सही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि छह में से सात देशों का नेतृत्व पुरुषों द्वारा किया जाता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन सा सतत विकास लक्ष्य (SDG) लैंगिक समानता से संबंधित है?
- SDG 1: गरीबी उन्मूलन
- SDG 3: अच्छा स्वास्थ्य और कल्याण
- SDG 5: लैंगिक समानता
- SDG 10: असमानताएँ कम करना
उत्तर: SDG 5: लैंगिक समानता — सतत विकास लक्ष्य 5 विशेष रूप से लैंगिक समानता प्राप्त करने और सभी महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाने पर केंद्रित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संयुक्त राष्ट्र की हालिया ‘जेंडर स्नैपशॉट 2026’ रिपोर्ट लैंगिक समानता की दिशा में धीमी प्रगति पर प्रकाश डालती है। भारत में लैंगिक समानता प्राप्त करने की चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा: परिचय में संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्षों का संक्षिप्त उल्लेख करें और भारत के संदर्भ में लैंगिक समानता की स्थिति पर प्रकाश डालें। मुख्य भाग में, भारत में लैंगिक समानता प्राप्त करने की चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण करें, जिसमें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी (जैसे संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी), आर्थिक असमानताएँ (जैसे श्रम बल में भागीदारी, वेतन अंतर, संपत्ति के अधिकार), सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ (जैसे पितृसत्तात्मक मानदंड, लैंगिक रूढ़िवादिता, शिक्षा तक पहुँच), और लैंगिक आधारित हिंसा (जैसे घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न) शामिल हैं। इसके बाद, इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदमों पर चर्चा करें। इसमें संवैधानिक प्रावधान (जैसे अनुच्छेद 14, 15, 39A), विधायी उपाय (जैसे घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005; कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013), विभिन्न योजनाएँ और कार्यक्रम (जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन), और संस्थागत तंत्र (जैसे राष्ट्रीय महिला आयोग) शामिल होने चाहिए। निष्कर्ष में, लैंगिक समानता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें नीतिगत हस्तक्षेप, सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।
स्रोत: news.un.org
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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