शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में दलबदल कानून पर सिब्बल की दलील, 18 अगस्त को अगली सुनवाई

शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में सिब्बल बोले- दलबदल के पाप को बढ़ावा नहीं दे सकते; 18 अगस्त को फिर सुनवाई — concept mind map

शिवसेना विवाद: सुप्रीम कोर्ट में दलबदल कानून पर सिब्बल की दलील, 18 अगस्त को अगली सुनवाई

दलबदल कानून प्रक्रियाविधायक दल में टूट1-तिहाई सदस्यविभाजन माना जातादलबदल विरोधी कानून1985 में लागू10वीं अनुसूचीअयोग्यता का मामलापीठासीन अधिकारीन्यायिक समीक्षानिर्वाचन आयोगराजनीतिक दलों को मान्यतानियमन प्रक्रियासर्वोच्च न्यायालयकानून की व्याख्यालोकतांत्रिक सिद्धांतों
दलबदल कानून प्रक्रिया

✎ दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और लोकतांत्रिक शुचिता बनाए रखना है, जिसमें पीठासीन अधिकारी के अयोग्यता संबंधी निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका — संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इससे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का संगठन और कार्यप्रणाली।  |  GS Paper II — विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।
  • Prelims: दलबदल विरोधी कानून, दसवीं अनुसूची, अयोग्यता, विधानसभा अध्यक्ष, निर्वाचन आयोग, न्यायिक समीक्षा, लोकतांत्रिक शुचिता
  • Essay: लोकतंत्र में दलबदल: नैतिकता, कानून और संवैधानिक मूल्य।, संवैधानिक संस्थानों की भूमिका और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का संरक्षण।

त्वरित पुनरावृत्ति: दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और लोकतांत्रिक शुचिता बनाए रखना है, जिसमें पीठासीन अधिकारी के अयोग्यता संबंधी निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होते हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

महाराष्ट्र में शिवसेना से जुड़े राजनीतिक विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में लगातार सुनवाई चल रही है। इस मामले में मुख्य प्रश्न दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के उद्देश्यों और राजनीतिक दल में वास्तविक विभाजन तथा विधायक दल में टूट के बीच के अंतर की व्याख्या से संबंधित है। यह मामला दलबदल विरोधी कानून के तहत विधायकों की अयोग्यता और निर्वाचन आयोग (Election Commission) द्वारा राजनीतिक दलों को मान्यता देने की प्रक्रिया से जुड़े संवैधानिक और कानूनी पहलुओं को उजागर करता है, जिस पर न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

पृष्ठभूमि

  • दलबदल विरोधी कानून को 1985 में 52वें संविधान संशोधन (52nd Constitutional Amendment) अधिनियम द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़कर लाया गया था।
  • इस कानून का मुख्य उद्देश्य विधायकों और सांसदों द्वारा राजनीतिक दलबदल को रोकना था, जिससे सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित हो सके और खरीद-फरोख्त पर अंकुश लगाया जा सके।
  • दसवीं अनुसूची के तहत, यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, या पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करता है/मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  • अयोग्यता संबंधी मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) (लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष) के पास होता है।
  • किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (Kihoto Hollohan v. Zachillhu) मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्थापित किया था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन है।
  • कानून में यह भी प्रावधान था कि यदि किसी पार्टी के एक-तिहाई सदस्य अलग हो जाते हैं, तो उसे ‘विभाजन’ माना जाएगा और उन पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा। हालाँकि, 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा इस ‘विभाजन’ के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।
  • वर्तमान में, दलबदल विरोधी कानून से छूट केवल तभी मिलती है जब किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं।
  • निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों को मान्यता देने और चुनाव चिह्न आवंटित करने का कार्य करता है, खासकर जब किसी दल में आंतरिक विवाद उत्पन्न होता है।

दलबदल विरोधी कानून क्या है?

  • दलबदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में उल्लिखित एक प्रावधान है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
  • इसका प्राथमिक उद्देश्य निर्वाचित सदस्यों (सांसदों और विधायकों) द्वारा एक राजनीतिक दल से दूसरे दल में पाला बदलने पर रोक लगाना है, ताकि राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार को कम किया जा सके।
  • यह कानून उन सदस्यों को अयोग्य घोषित करता है जो स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ देते हैं या पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करते हैं।
  • अयोग्यता संबंधी निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (जैसे लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष) द्वारा लिए जाते हैं।
  • पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है, जिसका अर्थ है कि इसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • यह कानून किसी भी सदस्य को अयोग्य घोषित होने से छूट देता है यदि उसकी मूल पार्टी का किसी अन्य पार्टी में विलय हो जाता है, बशर्ते विलय करने वाले सदस्यों की संख्या मूल पार्टी के कुल सदस्यों की कम से कम दो-तिहाई हो।
  • इस कानून का उद्देश्य लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखना और मतदाताओं के जनादेश का सम्मान करना है, ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दल न बदलें।
  • यह कानून राजनीतिक दलों में अनुशासन बनाए रखने और सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
दलबदल विरोधी कानून (Anti-defection Law) विधायकों को राजनीतिक दलों के बीच बार-बार बदलने से रोकने और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु बनाया गया।
विधायक की अयोग्यता दलबदल के आधार पर विधायक की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान, जिससे दल-बदलुओं को हतोत्साहित किया जा सके।
राजनीतिक दल में विभाजन कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में दल के एक बड़े हिस्से के अलग होने पर दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं होता।
न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और निर्वाचन आयोग (Election Commission) के निर्णयों की संवैधानिक वैधता की जाँच करने की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति।
लोकतंत्र का संरक्षण न्यायपालिका की भूमिका यह सुनिश्चित करने में कि संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या इस प्रकार हो जिससे लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा हो।

महत्व

राजनीतिक स्थिरता पर प्रभाव

  • दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना है, जो विधायकों के बार-बार दल बदलने से उत्पन्न होती है।
  • इस कानून की व्याख्या का सीधा असर राज्यों और केंद्र में सरकारों की स्थिरता पर पड़ता है।

संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक मूल्य

  • सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या यह सुनिश्चित करती है कि संविधान के मूल सिद्धांतों और लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण हो।
  • यह विधायकों को जनता के जनादेश के खिलाफ जाकर दल बदलने से रोकने में मदद करता है।

विधायिका और न्यायपालिका के संबंध

  • यह मामला न्यायपालिका की न्यायिक समीक्षा की शक्ति और विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करने की उसकी भूमिका को रेखांकित करता है।
  • यह विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन और उनकी जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है।

निर्वाचन आयोग की भूमिका

  • यह विवाद निर्वाचन आयोग की राजनीतिक दलों के विभाजन और चुनाव चिह्न के आवंटन से संबंधित निर्णयों की समीक्षा के महत्व को दर्शाता है।
  • निर्वाचन आयोग के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि वे निष्पक्ष और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हों।

चुनौतियाँ

1. दलबदल विरोधी कानून की अस्पष्टता

  • कानून में ‘विभाजन’ और ‘विलय’ की परिभाषाओं को लेकर अस्पष्टता, जिससे कानूनी विवाद उत्पन्न होते हैं।
  • यह अस्पष्टता विधायकों को कानून की खामियों का फायदा उठाने का अवसर देती है।

2. अध्यक्ष की भूमिका पर प्रश्न

  • दलबदल के मामलों में सदन के अध्यक्ष (Speaker) के निर्णयों में देरी या पक्षपात की आशंका।
  • अध्यक्ष का निर्णय अक्सर राजनीतिक दबाव से प्रभावित हो सकता है, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

3. लोकतांत्रिक जनादेश का उल्लंघन

  • दलबदल से मतदाताओं द्वारा दिए गए जनादेश का उल्लंघन होता है, क्योंकि विधायक अपनी पार्टी बदलकर सरकार की स्थिरता को प्रभावित करते हैं।
  • यह मतदाताओं के विश्वास को कमजोर करता है और राजनीतिक व्यवस्था में अविश्वास पैदा करता है।

4. न्यायपालिका पर कार्यभार

  • दलबदल से संबंधित मामलों के बार-बार सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचने से न्यायपालिका पर कार्यभार बढ़ता है।
  • यह महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों पर न्यायालय का बहुमूल्य समय और संसाधन खर्च करता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
दलबदल राजनीतिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक जनादेश का उल्लंघन।
अध्यक्ष के निर्णय में देरी दलबदलुओं को अयोग्यता से बचने का अवसर और राजनीतिक सौदेबाजी को बढ़ावा।
पार्टी विभाजन की व्याख्या विधायक दल में टूट को पूरे राजनीतिक दल का विभाजन मानने से कानून का उद्देश्य कमजोर होता है।
चुनाव चिह्न का विवाद असली पार्टी और उसके चुनाव चिह्न को लेकर विवाद, जिससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका निर्वाचन आयोग और अध्यक्ष जैसे संस्थानों की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर सवाल।

आगे की राह

  • दलबदल विरोधी कानून में ‘विभाजन’ और ‘विलय’ की परिभाषाओं को स्पष्ट किया जाए ताकि कानूनी अस्पष्टता दूर हो।
  • सदन के अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता के मामलों पर निर्णय लेने के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाए।
  • अध्यक्ष की भूमिका को अधिक निष्पक्ष बनाने के लिए एक स्वतंत्र तंत्र या समिति का गठन किया जा सकता है।
  • निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों के विभाजन और चुनाव चिह्न के आवंटन से संबंधित मामलों में अधिक स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।
  • न्यायपालिका को दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या करते समय इसके मूल उद्देश्य और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए ताकि विधायकों में असंतोष की स्थिति कम हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

दलबदल विरोधी कानून · दसवीं अनुसूची · अयोग्यता का आधार · दल-बदल · विधायक दल में विभाजन · राजनीतिक दल में विभाजन · अध्यक्ष की भूमिका · न्यायिक समीक्षा · लोकतंत्र की सुरक्षा · संविधान की व्याख्या

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 102(2) और 191(2)’, ‘note’: ‘संसद/राज्य विधानमंडल सदस्यों की अयोग्यता’}
  • {‘article’: ‘दसवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘दलबदल विरोधी कानून का प्रावधान’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ और कार्य’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 122 और 212’, ‘note’: ‘संसद/राज्य विधानमंडल की कार्यवाही की न्यायिक समीक्षा’}

अवधारणा प्रवाह

विधायक दल में टूट  →  दलबदल विरोधी कानून का उल्लंघन  →  अयोग्यता का मामला  →  निर्वाचन आयोग का निर्णय  →  सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक समीक्षा  →  कानून की व्याख्या और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का संरक्षण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था।
2. यह अनुसूची संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करती है।
3. दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय भारत के राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था। कथन 2 भी सही है। यह अनुसूची संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करती है। कथन 3 गलत है। दल-बदल के मामलों में अयोग्यता पर अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष (लोकसभा अध्यक्ष या विधानसभा अध्यक्ष) द्वारा लिया जाता है, न कि राष्ट्रपति द्वारा।

Q2. अभिकथन (A): दलबदल विरोधी कानून का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और निर्वाचित प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत लाभ के लिए दल-बदल करने से हतोत्साहित करना है।
कारण (R): यह कानून सदस्यों को राजनीतिक दलों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखने और मतदाताओं के जनादेश का सम्मान करने के लिए बाध्य करता है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। दलबदल विरोधी कानून वास्तव में राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और दल-बदल को हतोत्साहित करने के लिए बनाया गया था, और यह सदस्यों को अपनी पार्टी के प्रति निष्ठा बनाए रखने के लिए बाध्य करता है। कारण (R) अभिकथन (A) का सही स्पष्टीकरण है क्योंकि यह कानून के उद्देश्य को स्पष्ट करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्यों की विवेचना कीजिए। हाल के न्यायिक निर्णयों के आलोक में इस कानून की प्रभावशीलता और इसमें निहित चुनौतियों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) का संक्षिप्त परिचय और इसे जोड़ने का उद्देश्य (52वां संविधान संशोधन, 1985)।
2. दलबदल विरोधी कानून के उद्देश्य: राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना, विधायकों को व्यक्तिगत लाभ के लिए दल-बदल से रोकना, मतदाताओं के जनादेश का सम्मान, खरीद-फरोख्त पर रोक।
3. कानून की प्रभावशीलता: कुछ हद तक राजनीतिक अस्थिरता को कम करने में सफलता, दल-बदल के मामलों में कमी।
4. निहित चुनौतियाँ और आलोचनात्मक परीक्षण:
a. अध्यक्ष की भूमिका: अध्यक्ष के निर्णयों में देरी और पक्षपात का आरोप (किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामला, 1992)।
b. ‘पार्टी में विभाजन’ और ‘विधायक दल में विभाजन’ के बीच अस्पष्टता: वास्तविक राजनीतिक दल में विभाजन बनाम केवल विधायक दल में टूट का मुद्दा।
c. सामूहिक दल-बदल: एक तिहाई या दो तिहाई सदस्यों द्वारा दल-बदल की छूट (अब समाप्त)।
d. न्यायिक समीक्षा का दायरा: अध्यक्ष के निर्णय की न्यायिक समीक्षा (किहोतो होलोहन मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय)।
e. लोकतंत्र पर प्रभाव: विधायकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश, पार्टी व्हिप का अत्यधिक प्रयोग।
f. निर्वाचन आयोग की भूमिका: चुनाव चिह्न विवादों में निर्वाचन आयोग की भूमिका और उसके न्यायिक पहलुओं से संबंध।
5. निष्कर्ष: कानून के महत्व को स्वीकार करते हुए, इसकी कमियों को दूर करने के लिए सुधारों की आवश्यकता पर बल, जैसे अध्यक्ष की भूमिका को तटस्थ बनाना या किसी स्वतंत्र निकाय को निर्णय लेने का अधिकार देना।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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