28 Sep सेना प्रमुख का बड़ा बयान: जीत जमीन से ही तय होती है, तकनीक नहीं बदल सकती युद्ध की प्रकृति
✎ आधुनिक युद्ध में तकनीक और सूचना युद्ध के बढ़ते महत्व के बावजूद, सेना प्रमुख ने 'जमीनी स्थिति' को सैन्य सफलता का अंतिम और ठोस पैमाना बताया है, जिसके लिए आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और दुष्प्रचार से निपटने की क्षमता आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध
- Prelims: आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन, सूचना युद्ध, हाइब्रिड युद्ध, सैन्य रणनीति, साइबर सुरक्षा, रक्षा अधिग्रहण
- Essay: बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की सुरक्षा चुनौतियाँ और समाधान, तकनीक और युद्ध: अवसर और खतरे
त्वरित पुनरावृत्ति: आधुनिक युद्ध में तकनीक और सूचना युद्ध के बढ़ते महत्व के बावजूद, सेना प्रमुख ने ‘जमीनी स्थिति’ को सैन्य सफलता का अंतिम और ठोस पैमाना बताया है, जिसके लिए आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन और दुष्प्रचार से निपटने की क्षमता आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में सैन्य अभियानों में ‘जमीनी स्थिति’ के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक युद्ध की लड़ाइयों को छोटा कर सकती है, लेकिन युद्ध की अवधि नहीं। इसके साथ ही, उन्होंने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाले दुष्प्रचार (disinformation) के खतरों पर भी प्रकाश डाला, जो आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- आधुनिक युद्धों में पारंपरिक सैन्य संघर्ष के साथ-साथ गैर-पारंपरिक तत्व जैसे साइबर हमले, दुष्प्रचार और आर्थिक दबाव भी शामिल हो गए हैं, जिसे हाइब्रिड युद्ध (Hybrid Warfare) कहा जाता है।
- भारत सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर विशेष जोर दे रही है, ताकि महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी निर्भरता कम हो सके।
- सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म सूचना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इनका उपयोग दुष्प्रचार और मनोवैज्ञानिक युद्ध (Psychological Warfare) के लिए भी किया जा सकता है, जिससे जनता की राय प्रभावित होती है।
- सैन्य प्रौद्योगिकी में प्रगति, जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), ड्रोन और साइबर हथियार, युद्ध के मैदान को तेजी से बदल रहे हैं।
- भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखने और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी रक्षा क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है।
सैन्य रणनीति में ‘जमीनी स्थिति’ और आधुनिक युद्ध के आयाम
- सेना प्रमुख के अनुसार, सैन्य जीत का ठोस और उपयोगी पैमाना आज भी जमीन और क्षेत्रीय नियंत्रण है, भले ही तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए।
- इसका अर्थ है कि अंतिम विजय और क्षेत्र पर नियंत्रण सैनिकों द्वारा जमीन पर ही सुनिश्चित किया जाता है, जो सैन्य अभियानों का मूल आधार बना हुआ है।
- आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन का लक्ष्य भारत में रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास, निर्माण, रखरखाव और उन्नयन की पूर्ण क्षमता विकसित करना है, ताकि विदेशी निर्भरता समाप्त हो सके।
- यह न केवल भारत की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि देश को वैश्विक रक्षा निर्यातक (Defence Exporter) के रूप में भी स्थापित करेगा।
- सोशल मीडिया के माध्यम से होने वाला दुष्प्रचार वास्तविक युद्ध की तस्वीर को धुंधला कर सकता है और भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
- आधुनिक युद्धों में तकनीक लड़ाइयों की अवधि कम कर सकती है, लेकिन पूरे युद्ध की अवधि को आवश्यक रूप से छोटा नहीं करती, क्योंकि संघर्षों में विराम और निरंतरता अब सैन्य रणनीति का हिस्सा बन गए हैं।
- सैनिक को क्षमता विकास के केंद्र में रखना महत्वपूर्ण है, यह सुनिश्चित करते हुए कि नई तकनीकें जमीन पर मौजूद सैनिकों की प्रभावशीलता और सुरक्षा को बढ़ाएं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सैन्य सफलता का पैमाना | सेना प्रमुख के अनुसार, सैन्य अभियानों की सफलता का ठोस और उपयोगी पैमाना आज भी ‘जमीन’ और ‘क्षेत्रीय नियंत्रण’ है, न कि केवल तकनीकी प्रगति। |
| आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन | भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने की आवश्यकता है, जिसमें डिजाइन, विकास, निर्माण, रखरखाव और उन्नयन की पूरी क्षमता शामिल हो। यह दूसरे देशों पर निर्भरता कम करेगा। |
| सोशल मीडिया का प्रभाव | आधुनिक युद्ध में सोशल मीडिया पर प्रसारित सूचनाएँ और विभिन्न नैरेटिव वास्तविक युद्ध की तस्वीर को धुंधला कर सकते हैं और भ्रम पैदा कर सकते हैं। |
| तकनीक और युद्ध की प्रकृति | तकनीक लड़ाई की अवधि को कम कर सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि पूरे युद्ध को जल्दी समाप्त कर दे। संघर्षों के बीच विराम अब सैन्य रणनीति का हिस्सा बन रहे हैं। |
| सैनिक केंद्रित क्षमता विकास | सैन्य तकनीक विकसित करते समय यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि नई क्षमताएं जमीन पर मौजूद सैनिक की कितनी मदद करती हैं, सैनिक को क्षमता विकास के केंद्र में रखा जाना चाहिए। |
| स्वदेशी तकनीक का अप्रचलित होना | घरेलू रक्षा उत्पाद विकसित करते समय यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि भारत में विकसित की जा रही तकनीक इस्तेमाल में आने तक पुरानी न पड़ जाए (इंडिजिनस ऑब्सोलेसेंस)। |
महत्व
सामरिक महत्व
- यह भारत की रक्षा तैयारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बाहरी निर्भरता को कम करता है और देश की संप्रभुता की रक्षा करता है।
- आत्मनिर्भरता से भारत क्षेत्रीय शक्ति के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है और वैश्विक रक्षा बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है।
आर्थिक महत्व
- घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने से रोजगार सृजन होता है, औद्योगिक विकास होता है और अर्थव्यवस्था को गति मिलती है।
- रक्षा निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है और व्यापार घाटा कम होता है।
सामाजिक महत्व
- सोशल मीडिया के दुष्प्रचार (Disinformation) से निपटने की क्षमता समाज में स्थिरता बनाए रखने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
- सैन्य सफलता की वास्तविक माप के बारे में स्पष्टता सार्वजनिक धारणा को सही दिशा देती है और राष्ट्रीय मनोबल को बनाए रखती है।
चुनौतियाँ
1. रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता
- उच्च तकनीक वाले रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास और निर्माण के लिए पर्याप्त अनुसंधान एवं विकास (Research & Development) क्षमता और बुनियादी ढाँचे का अभाव।
- गुणवत्ता नियंत्रण, लागत-प्रभावशीलता और वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आंतरिक सुरक्षा
2. स्वदेशी तकनीक का अप्रचलित होना
- तेजी से बदलती सैन्य तकनीक के युग में, घरेलू स्तर पर विकसित की जा रही तकनीक के बाजार में आने से पहले ही पुरानी हो जाने का जोखिम।
- नवीनतम तकनीकों को अपनाने और उन्हें उत्पादन चक्र में तेजी से एकीकृत करने की चुनौती।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, रक्षा प्रौद्योगिकी
3. सोशल मीडिया दुष्प्रचार का मुकाबला
- दुष्प्रचार और गलत सूचनाओं के तेजी से प्रसार को रोकना और वास्तविक तथ्यों को जनता तक पहुँचाना।
- सूचना युद्ध (Information Warfare) में प्रभावी ढंग से भाग लेने और अपने नैरेटिव को स्थापित करने की क्षमता विकसित करना।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-3: आंतरिक सुरक्षा, संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती
4. आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति
- लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों और बीच-बीच में तेज लड़ाई के दौर के लिए सैन्य रणनीति और प्रशिक्षण को अनुकूलित करना।
- पारंपरिक और गैर-पारंपरिक युद्ध (Hybrid Warfare) के खतरों से निपटने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना।
यूपीएससी लिंक: सामान्य अध्ययन-3: आंतरिक सुरक्षा, सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियाँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| रक्षा आयात पर निर्भरता | राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए रणनीतिक भेद्यता और भू-राजनीतिक दबावों का जोखिम। |
| तकनीकी अप्रचलन | घरेलू रक्षा उत्पादों का वैश्विक मानकों से पीछे रह जाना, जिससे सैन्य क्षमता प्रभावित होती है। |
| सूचना युद्ध | दुष्प्रचार और गलत सूचनाओं के माध्यम से जनता को भ्रमित करना और राष्ट्रीय मनोबल को कमजोर करना। |
| सैन्य आधुनिकीकरण | बदलती युद्ध तकनीकों और खतरों के अनुरूप सेना को आधुनिक उपकरणों और प्रशिक्षण से लैस करने की आवश्यकता। |
आगे की राह
- रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना।
- रक्षा उत्पादन में ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) पहल को और मजबूत करना, जिसमें डिजाइन से लेकर उत्पादन तक स्वदेशीकरण पर जोर दिया जाए।
- साइबर सुरक्षा (Cyber Security) क्षमताओं को बढ़ाना और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करना।
- सैन्य प्रशिक्षण और रणनीति को आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति के अनुरूप ढालना, जिसमें प्रौद्योगिकी और सूचना युद्ध के पहलुओं को शामिल किया जाए।
- रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना ताकि स्वदेशी रूप से विकसित प्रौद्योगिकियों को तेजी से सेना में एकीकृत किया जा सके और ‘इंडिजिनस ऑब्सोलेसेंस’ के जोखिम को कम किया जा सके।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों तक पहुँच बनाना, साथ ही प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer) पर ध्यान केंद्रित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन · सैन्य अभियान की सफलता · क्षेत्रीय नियंत्रण · आधुनिक युद्ध · सोशल मीडिया दुष्प्रचार · तकनीकी अप्रचलन · रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता · भू-रणनीतिक महत्व · सैन्य रणनीति · आंतरिक सुरक्षा
अवधारणा प्रवाह
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता → घरेलू डिजाइन, विकास और निर्माण पर जोर → तकनीकी प्रगति और स्वदेशीकरण को बढ़ावा → सोशल मीडिया दुष्प्रचार से उत्पन्न चुनौतियाँ → सैन्य सफलता का ठोस पैमाना: जमीन और क्षेत्रीय नियंत्रण → राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की मजबूती
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ ने कहा कि तकनीक युद्ध की लड़ाइयों को छोटा कर सकती है, लेकिन युद्ध की अवधि नहीं।
2. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सैन्य जीत का ठोस पैमाना आज भी जमीन और क्षेत्रीय नियंत्रण है।
3. उन्होंने ‘स्वदेशी तकनीक के समय से पहले अप्रचलित हो जाने’ (Indigenous Obsolescence) के खतरे के बारे में भी बात की।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है क्योंकि सेना प्रमुख ने यही बात कही थी। कथन 2 भी सही है, उन्होंने जमीन और क्षेत्रीय नियंत्रण को सैन्य जीत का ठोस पैमाना बताया। कथन 3 भी सही है, उन्होंने घरेलू रक्षा उत्पादों के अप्रचलित होने के खतरे पर चिंता व्यक्त की थी।
Q2. अभिकथन (A): आधुनिक युद्ध में सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों की भूमिका के कारण वास्तविक युद्ध की तस्वीर धुंधली हो सकती है और भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है।
कारण (R): दुनियाभर के संघर्षों से जुड़ी सूचनाएं लगातार सोशल मीडिया पर सामने आती हैं, जिससे अलग-अलग नैरेटिव बनते हैं।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सोशल मीडिया पर प्रसारित जानकारी से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि सोशल मीडिया पर विभिन्न नैरेटिव के कारण ही वास्तविक स्थिति धुंधली होती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ आधुनिक युद्ध में ‘जमीनी स्थिति’ के महत्व पर सेना प्रमुख के हालिया बयान के आलोक में, भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता और ‘स्वदेशी तकनीकी अप्रचलन’ (Indigenous Obsolescence) की चुनौती का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** सेना प्रमुख के बयान का संदर्भ दें, जिसमें ‘जमीनी स्थिति’ को सैन्य सफलता का पैमाना बताया गया है और आधुनिक युद्ध में तकनीक व सोशल मीडिया की भूमिका का उल्लेख करें।
2. **आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की आवश्यकता:**
* राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए महत्वपूर्ण।
* आयात पर निर्भरता कम करना।
* तकनीकी संप्रभुता और सामरिक स्वायत्तता।
* ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल का संदर्भ।
* रक्षा निर्यात क्षमता का विकास।
3. **’स्वदेशी तकनीकी अप्रचलन’ (Indigenous Obsolescence) की चुनौती:**
* परिभाषा: घरेलू स्तर पर विकसित तकनीक का उपयोग में आने से पहले ही पुराना हो जाना।
* कारण: अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश की कमी, लंबी अधिग्रहण प्रक्रिया, तेजी से बदलती वैश्विक तकनीक।
* प्रभाव: सैन्य क्षमताओं पर नकारात्मक असर, संसाधनों की बर्बादी, विदेशी निर्भरता का बना रहना।
* समाधान: निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना, R&D में निवेश, नवाचार को बढ़ावा, त्वरित अधिग्रहण नीतियां।
4. **निष्कर्ष:** भारत के लिए ‘जमीनी स्थिति’ के महत्व को बनाए रखते हुए रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना और तकनीकी अप्रचलन की चुनौती से निपटना क्यों आवश्यक है, इस पर प्रकाश डालें।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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