29 Sep उत्तराखंड में 54 धारा-नौलों का पारंपरिक विधि से पुनरुद्धार, सीमेंट का न्यूनतम प्रयोग
✎ उत्तराखंड के धारा-नौलों का पारंपरिक विधियों से पुनरुद्धार जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो आधुनिक तकनीकों के साथ प्राचीन ज्ञान का समन्वय करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय संस्कृति और विरासत | GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
- Prelims: धारा-नौला, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARA), पारंपरिक जल स्रोत, उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, भूकंपीय सुरक्षा, जीरो-सीमेंट स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग, जल संरक्षण, विरासत संरक्षण
- Essay: जल संरक्षण: आवश्यकता, चुनौतियाँ और पारंपरिक समाधान, सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: उत्तराखंड के धारा-नौलों का पारंपरिक विधियों से पुनरुद्धार जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो आधुनिक तकनीकों के साथ प्राचीन ज्ञान का समन्वय करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उत्तराखंड सरकार ने राज्य के 54 ऐतिहासिक धारा-नौलों (पारंपरिक जल स्रोतों) के पुनरुद्धार की योजना बनाई है। इस योजना की मुख्य विशेषता यह है कि इन नौलों का जीर्णोद्धार पुरातन निर्माण विधियों का उपयोग करके किया जाएगा, जिसमें सीमेंट-कंक्रीट का यथासंभव उपयोग नहीं किया जाएगा। यह पहल स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (SARA) के सहयोग से जलागम प्रबंधन निदेशालय द्वारा आयोजित एक राज्य स्तरीय तकनीकी कार्यशाला के बाद सामने आई है।
पृष्ठभूमि
- उत्तराखंड में धारा-नौले सदियों से पेयजल और सिंचाई के महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं। ये केवल जल स्रोत ही नहीं, बल्कि राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन स्थापत्य कला के प्रतीक भी हैं।
- समय के साथ, शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और रखरखाव की कमी के कारण कई धारा-नौले सूख गए हैं या उनकी स्थिति खराब हो गई है, जिससे स्थानीय समुदायों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है।
- इन पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार न केवल जल सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी बहाल करने में मदद करेगा।
- पारंपरिक निर्माण विधियों का उपयोग करने का निर्णय इन संरचनाओं की मूल पहचान और भूकंपीय झटकों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है, जैसा कि विशेषज्ञों ने बताया है।
- यह परियोजना ग्राम पंचायतों के सहयोग से रिचार्ज जोन में चाल-खाल (जल संचयन गड्ढे) और कंटूर ट्रेंच (समोच्च खाइयाँ) के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करेगी, जिससे भूजल स्तर में सुधार होगा।
- इस पहल में जियो-टैगिंग, जीआईएस मैपिंग और डेटा संग्रहण जैसी आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग किया जाएगा ताकि परियोजना की निगरानी और प्रभावशीलता सुनिश्चित की जा सके।
धारा-नौले क्या हैं?
- धारा-नौले उत्तराखंड और हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले पारंपरिक जल स्रोत हैं, जिन्हें प्राकृतिक झरनों या भूमिगत जल धाराओं से पानी प्राप्त होता है।
- ये आमतौर पर पत्थर से निर्मित संरचनाएं होती हैं, जिनमें पानी एकत्र करने और उसे उपयोग के लिए उपलब्ध कराने की व्यवस्था होती है।
- इनका निर्माण प्राचीन काल में स्थानीय कारीगरों द्वारा किया जाता था, जो बिना सीमेंट के पत्थरों की कॉर्बेलिंग (corbelling) और लोड-बेयरिंग (load-bearing) तकनीकों का उपयोग करते थे।
- धारा-नौले केवल पेयजल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये स्थानीय समुदायों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग भी रहे हैं, जहाँ लोग पानी भरने के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल भी करते थे।
- इनकी स्थापत्य कला अक्सर स्थानीय देवी-देवताओं की मूर्तियों और नक्काशी से सुसज्जित होती है, जो इन्हें धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व प्रदान करती है।
- पारंपरिक रूप से निर्मित ये संरचनाएं भूकंपीय झटकों के प्रति अधिक प्रतिरोधी मानी जाती हैं, क्योंकि इनमें लचीलापन होता है और ये भूगर्भीय गतिविधियों के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकती हैं।
- इनका पुनरुद्धार जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पुरातन निर्माण विधि का उपयोग | उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन स्थापत्य कला का संरक्षण। |
| सीमेंट-कंक्रीट का न्यूनतम उपयोग | पारंपरिक जल स्रोतों की प्राकृतिक संरचना और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखना। |
| भूकंपीय झटकों से सुरक्षा | पारंपरिक पत्थर कॉर्बेलिंग और लोड-बेयरिंग तकनीकें संरचनाओं को सुरक्षित रखती हैं। |
| वैज्ञानिक एवं पारिस्थितिकीय प्रक्रिया | जल स्रोतों का पुनरुद्धार वैज्ञानिक सिद्धांतों और पर्यावरणीय स्थिरता पर आधारित। |
| जियो-टैगिंग और GIS मैपिंग | जल स्रोतों की सटीक पहचान, निगरानी और प्रभावी प्रबंधन में सहायक। |
| ग्राम पंचायतों का सहयोग | स्थानीय समुदायों की भागीदारी से परियोजना की सफलता और दीर्घकालिक रखरखाव सुनिश्चित करना। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- जल संरक्षण: धारा-नौले पारंपरिक जल स्रोत हैं, जिनका पुनरुद्धार स्थानीय जल सुरक्षा को बढ़ाएगा और भूजल स्तर को रिचार्ज करने में मदद करेगा।
- पारिस्थितिकीय संतुलन: प्राकृतिक निर्माण विधियों का उपयोग पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव को कम करेगा और जैव विविधता के संरक्षण में सहायक होगा।
सांस्कृतिक और विरासत
- सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: धारा-नौले उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन स्थापत्य कला के प्रतीक हैं, जिनका पुनरुद्धार राज्य की विरासत को सहेजने में मदद करेगा।
- पारंपरिक ज्ञान का पुनरुत्थान: पुरानी निर्माण विधियों का उपयोग स्थानीय कारीगरों और पारंपरिक ज्ञान को पुनर्जीवित करेगा।
सामाजिक और आर्थिक
- ग्रामीण आजीविका: जल स्रोतों की उपलब्धता ग्रामीण समुदायों, विशेषकर कृषि और पशुपालन पर निर्भर लोगों के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार करेगी।
- आपदा न्यूनीकरण: स्वस्थ जल स्रोत और रिचार्ज जोन बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों को कम करने में सहायक हो सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. पारंपरिक ज्ञान और कौशल की कमी
- आधुनिक निर्माण विधियों के प्रचलन के कारण पारंपरिक निर्माण तकनीकों में प्रशिक्षित कारीगरों की कमी।
- नई पीढ़ी में इन प्राचीन कौशलों के हस्तांतरण का अभाव।
यूपीएससी लिंक: कला एवं संस्कृति, विरासत संरक्षण
2. सामग्री की उपलब्धता और गुणवत्ता
- सीमेंट-कंक्रीट के विकल्प के रूप में पारंपरिक निर्माण सामग्री (जैसे स्थानीय पत्थर, चूना) की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- पुनरुद्धार के लिए आवश्यक पारंपरिक सामग्रियों की गुणवत्ता बनाए रखना।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, संसाधन प्रबंधन
3. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- बदलते वर्षा पैटर्न और भूजल स्तर में गिरावट से पारंपरिक जल स्रोतों पर दबाव।
- अत्यधिक वर्षा या सूखे की स्थिति में इन स्रोतों के रखरखाव की चुनौती।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
4. समुदाय की भागीदारी और जागरूकता
- स्थानीय समुदायों को इन जल स्रोतों के महत्व और संरक्षण में उनकी भूमिका के प्रति जागरूक करना।
- दीर्घकालिक रखरखाव और प्रबंधन के लिए समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
यूपीएससी लिंक: शासन, सामाजिक न्याय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पारंपरिक तकनीकों का क्षरण | आधुनिकता के कारण प्राचीन निर्माण विधियों और ज्ञान का लुप्त होना। |
| जल स्रोतों का सूखना | शहरीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण जल स्तर में गिरावट। |
| प्रदूषण | मानवीय गतिविधियों और अपशिष्ट के कारण जल स्रोतों का दूषित होना। |
| रखरखाव का अभाव | सामुदायिक स्वामित्व और सरकारी सहायता की कमी के कारण स्रोतों का जीर्ण-शीर्ण होना। |
| पर्याप्त वित्तपोषण | बड़े पैमाने पर पुनरुद्धार परियोजनाओं के लिए निरंतर और पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता। |
आगे की राह
- पारंपरिक निर्माण तकनीकों में स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षित करने और उनके कौशल को बढ़ावा देने के लिए कार्यशालाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
- स्थानीय रूप से उपलब्ध और टिकाऊ निर्माण सामग्री के उपयोग को प्रोत्साहित करना तथा उनकी आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना।
- जल स्रोतों के पुनरुद्धार और रखरखाव में ग्राम पंचायतों तथा स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना।
- भूजल रिचार्ज (Recharge) क्षेत्रों की पहचान करना और वहां चाल-खाल (पारंपरिक जल संचयन संरचनाएं) व कंटूर ट्रेंच (Contour Trench) जैसे उपाय लागू करना।
- वैज्ञानिक डेटा (जैसे जियो-टैगिंग, GIS मैपिंग) का उपयोग करके जल स्रोतों की निगरानी और उनके स्वास्थ्य का नियमित मूल्यांकन करना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल स्रोतों के पुनरुद्धार और प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ विकसित करना।
- विरासत संरक्षण विशेषज्ञों और पारिस्थितिकीविदों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना ताकि पुनरुद्धार कार्य वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टिकोणों से प्रभावी हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
धारा-नौला · पारंपरिक जल स्रोत · उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत · जल संरक्षण · पारिस्थितिकीय संतुलन · आपदा प्रबंधन · स्थानीय वास्तुकला · जीरो-सीमेंट संरचना · भूगर्भीय जल पुनर्भरण · सामुदायिक भागीदारी
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A(g)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
उत्तराखंड के धारा-नौलों का जीर्ण-शीर्ण होना → पारंपरिक जल स्रोतों और विरासत का क्षरण → राज्य सरकार द्वारा पुनरुद्धार योजना का निर्माण → पुरातन विधियों और न्यूनतम सीमेंट-कंक्रीट का उपयोग → जल संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण → स्थानीय समुदायों और पारिस्थितिकी को लाभ
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. उत्तराखंड में धारा-नौलों के पुनरुद्धार से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. धारा-नौला केवल जलापूर्ति के स्रोत हैं और इनका कोई सांस्कृतिक महत्व नहीं है।
2. पुनरुद्धार में यथासंभव सीमेंट-कंक्रीट का उपयोग नहीं किया जाएगा।
3. पारंपरिक नौलों की जीरो-सीमेंट संरचनाएं भूकंपीय झटकों से सुरक्षित रहती हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि धारा-नौला उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन स्थापत्य कला के जीवंत प्रतीक भी हैं। कथन 2 सही है क्योंकि योजना में पारंपरिक तकनीकों को प्राथमिकता दी जाएगी और सीमेंट-कंक्रीट का इस्तेमाल यथासंभव नहीं किया जाएगा। कथन 3 सही है क्योंकि जीरो-सीमेंट स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग पर व्याख्यान में बताया गया कि प्राचीन नौलों में बिना सीमेंट के पत्थरों की कॉर्बेलिंग और लोड-बेयरिंग तकनीक संरचनाओं को भूकंपीय झटकों से सुरक्षित रखती है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (सारा)’ के संभावित उद्देश्यों को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है?
- राज्य में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना।
- पारंपरिक जल स्रोतों और नदियों के पुनरुद्धार एवं संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करना।
- शहरी क्षेत्रों में आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करना।
- राज्य की पर्यटन क्षमता का विपणन करना।
उत्तर: पारंपरिक जल स्रोतों और नदियों के पुनरुद्धार एवं संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करना। — स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी (सारा) का नाम ही इसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है, जो झरनों (स्प्रिंग) और नदियों (रिवर) के पुनरुद्धार (रिजुवेनेशन) पर केंद्रित है। यह पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उत्तराखंड में धारा-नौलों के पारंपरिक पुनरुद्धार की पहल न केवल जल संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति और आपदा प्रबंधन में भी सहायक है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और बताइए कि ऐसी पहलें अन्य हिमालयी राज्यों के लिए कैसे प्रेरणा बन सकती हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** धारा-नौलों का संक्षिप्त परिचय और उत्तराखंड में उनके महत्व को बताएं।
2. **जल संरक्षण में महत्व:** स्पष्ट करें कि कैसे ये स्रोत भूगर्भीय जल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में सहायक हैं और पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।
3. **स्थानीय संस्कृति और विरासत:** वर्णन करें कि धारा-नौला कैसे उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, प्राचीन स्थापत्य कला और सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। पारंपरिक निर्माण विधियों (जैसे जीरो-सीमेंट स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग, कॉर्बेलिंग, लोड-बेयरिंग तकनीक) का उल्लेख करें।
4. **आपदा प्रबंधन में भूमिका:** बताएं कि पारंपरिक संरचनाएं भूकंपीय झटकों के प्रति अधिक प्रतिरोधी कैसे होती हैं और आधुनिक कंक्रीट संरचनाओं की तुलना में प्राकृतिक आपदाओं में कैसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। भूस्खलन (Landslides) और बाढ़ (Floods) के संदर्भ में उनके महत्व पर चर्चा करें।
5. **समालोचनात्मक परीक्षण:** पहल की चुनौतियों और सीमाओं पर चर्चा करें, जैसे कि रखरखाव की लागत, विशेषज्ञ कारीगरों की कमी, शहरीकरण का दबाव, और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव।
6. **अन्य हिमालयी राज्यों के लिए प्रेरणा:** बताएं कि कैसे यह मॉडल (पारंपरिक ज्ञान का उपयोग, सामुदायिक भागीदारी, पारिस्थितिकीय संतुलन) अन्य हिमालयी राज्यों के लिए जल संकट, आपदा भेद्यता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए एक स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है। उदाहरण के तौर पर हिमाचल प्रदेश, सिक्किम आदि का उल्लेख करें।
7. **निष्कर्ष:** पहल के दीर्घकालिक लाभों और सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals) के साथ इसके सामंजस्य पर बल दें।
स्रोत: amarujala.com
Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: उत्तराखंड सरकार द्वारा हाल ही में घोषित ‘ऐतिहासिक धारा-नौलों के पुनरुद्धार’ योजना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. इस योजना के तहत धारा-नौलों के पुनरुद्धार में सीमेंट-कंक्रीट का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबंधित किया गया है। 2. यह योजना केवल राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों तक सीमित है। 3. पुनरुद्धार कार्य में पारंपरिक निर्माण तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- केवल 1
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 3 — योजना में सीमेंट-कंक्रीट के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध है तथा पारंपरिक तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, किंतु यह योजना राज्य के सभी धारा-नौलों तक विस्तारित है, न कि केवल तीर्थ स्थलों तक।
Mains: उत्तराखंड सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘ऐतिहासिक धारा-नौलों के पुनरुद्धार’ योजना के प्रमुख उद्देश्यों एवं इसकी राज्य के जल संसाधन संरक्षण एवं सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में महत्ता का वर्णन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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