02 Sep एल नीनो के खतरे: धान की खेती से बचें किसानों को चेतावनी
✎ एल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के गर्म होने की एक मौसमी घटना है जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकती है, जिससे कृषि क्षेत्र में जल-गहन फसलों के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि) | GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
- Prelims: एल नीनो, ला नीना, भारतीय मानसून, कृषि पद्धतियाँ, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि की चुनौतियाँ, भारत में जल सुरक्षा: मुद्दे और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: एल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के गर्म होने की एक मौसमी घटना है जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकती है, जिससे कृषि क्षेत्र में जल-गहन फसलों के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, तिरुपति जिले के कलेक्टर ने किसानों को आगामी महीनों में कम वर्षा के पूर्वानुमान और एल नीनो (El Nino) के संभावित प्रभाव के कारण धान की खेती से बचने की सलाह दी है। यह चेतावनी ऐसे समय में आई है जब किसान अक्टूबर में बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ सिंचाई के सुनिश्चित स्रोत उपलब्ध नहीं हैं। कलेक्टर ने किसानों से जल संरक्षण और वैकल्पिक कृषि पद्धतियों को अपनाने का आग्रह किया है।
पृष्ठभूमि
- एल नीनो एक जटिल मौसम पैटर्न है जो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से उत्पन्न होता है।
- यह वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है और भारत में मानसूनी वर्षा को कमजोर कर सकता है, जिससे सूखे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
- भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर करता है, जिससे एल नीनो का प्रभाव खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है।
- धान एक जल-गहन फसल है, जिसकी खेती के लिए पर्याप्त और सुनिश्चित जल आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
- जल उपलब्धता में कमी धान की पैदावार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है और किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
- सरकार और कृषि विशेषज्ञ किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और जल-कुशल कृषि पद्धतियों को अपनाने की सलाह देते हैं।
एल नीनो क्या है?
- एल नीनो दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) का गर्म चरण है, जिसे सामूहिक रूप से ENSO (El Nino-Southern Oscillation) के रूप में जाना जाता है।
- यह प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में सतही समुद्री जल के तापमान में असामान्य वृद्धि की विशेषता है।
- यह घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होती है और 9 से 12 महीने तक चल सकती है।
- एल नीनो के दौरान, पूर्वी प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएँ (Trade Winds) कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल देती हैं, जिससे गर्म पानी दक्षिण अमेरिका के तट की ओर प्रवाहित होता है।
- यह भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा पैटर्न, तापमान और चरम मौसमी घटनाओं को प्रभावित करता है।
- भारत में, एल नीनो अक्सर कमजोर मानसून और सूखे की स्थिति से जुड़ा होता है, जिससे कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- इसके विपरीत, ला नीना (La Nina) ENSO का ठंडा चरण है, जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर का सतही जल असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है, और यह अक्सर भारत में मजबूत मानसून और अधिक वर्षा से जुड़ा होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अल नीनो प्रभाव | कम वर्षा का पूर्वानुमान, विशेषकर अक्टूबर में बुवाई के लिए तैयार किसानों के लिए चिंता का विषय। |
| धान की खेती से बचने की सलाह | सुल्लुरपेटा और नायडू पेटा जैसे क्षेत्रों में किसानों को जोखिम से बचाने के लिए, जहाँ सिंचाई के सुनिश्चित स्रोत नहीं हैं। |
| जल उपलब्धता | तेलुगु गंगा नहर में केवल 10-12 TMC पानी उपलब्ध, जो जल संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। |
| कृषि एक्सपो और किसान मेला | किसानों को आधुनिक कृषि पद्धतियों, मशीनीकरण और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के बारे में शिक्षित करने का मंच। |
| प्री-मॉनसून ड्राई सोइंग (PMDS) बीज | मृदा उर्वरता में सुधार और जोखिम को कम करने के लिए अनाज, दालों और तिलहनों के मिश्रण की बुवाई की अवधारणा। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कम वर्षा और धान की खेती से बचने की सलाह से फसल उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
- वैकल्पिक फसलों को अपनाने और जल-कुशल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने से कृषि क्षेत्र की स्थिरता सुनिश्चित हो सकती है।
पर्यावरण महत्व
- अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएँ कृषि पद्धतियों और जल संसाधनों के प्रबंधन में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन की आवश्यकता को उजागर करती हैं।
- जल संरक्षण और मृदा स्वास्थ्य में सुधार के प्रयासों से दीर्घकालिक पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा।
सामाजिक महत्व
- किसानों को समय पर सलाह और सहायता प्रदान करना फसल विफलता के जोखिम को कम करने और ग्रामीण आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
- कृषि एक्सपो जैसे मंच किसानों को नई तकनीकों और ज्ञान से सशक्त करते हैं, जिससे उनकी निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होता है।
चुनौतियाँ
1. जल संकट और कृषि
- अल नीनो के कारण कम वर्षा का पूर्वानुमान उन क्षेत्रों में जल संकट को बढ़ा सकता है जहाँ सिंचाई के सुनिश्चित स्रोत नहीं हैं।
- धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों पर निर्भरता ऐसे समय में किसानों के लिए बड़ा जोखिम पैदा करती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि, सिंचाई और जल संसाधन
2. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- अल नीनो जैसी मौसमी घटनाएँ जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का संकेत हैं, जो भारतीय कृषि के लिए गंभीर चुनौतियाँ पेश करती हैं।
- किसानों को बदलते मौसम पैटर्न के अनुकूल बनाने के लिए नई कृषि पद्धतियों को अपनाना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन
3. किसानों की आय और जोखिम प्रबंधन
- फसल विफलता का जोखिम किसानों की आय को सीधे प्रभावित करता है, जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता और गरीबी बढ़ सकती है।
- किसानों को जोखिमों से बचाने के लिए प्रभावी फसल बीमा और वैकल्पिक आजीविका के अवसरों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि क्षेत्र में चुनौतियाँ, किसानों की आय
4. कृषि प्रौद्योगिकी का प्रसार
- आधुनिक कृषि मशीनीकरण, ड्रोन और मृदा परीक्षण जैसी तकनीकों को छोटे और सीमांत किसानों तक पहुँचाना एक चुनौती है।
- किसानों को इन तकनीकों के लाभों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: कृषि में प्रौद्योगिकी, कृषि विस्तार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अल नीनो प्रेरित वर्षा की कमी | फसल उत्पादन में गिरावट और जल संसाधनों पर दबाव। |
| धान की खेती पर निर्भरता | पानी की कमी वाले क्षेत्रों में किसानों के लिए उच्च जोखिम। |
| सिंचाई के सीमित स्रोत | विशेषकर सुल्लुरपेटा और नायडू पेटा जैसे क्षेत्रों में फसल सुरक्षा का अभाव। |
| किसानों की जागरूकता और अनुकूलन | बदलते मौसम पैटर्न के अनुसार कृषि पद्धतियों को बदलने में चुनौतियाँ। |
| मृदा स्वास्थ्य और उर्वरक उपयोग | मृदा की उर्वरता बनाए रखने और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग को कम करने की आवश्यकता। |
आगे की राह
- किसानों को अल नीनो के प्रभावों के बारे में समय पर और सटीक मौसम पूर्वानुमान तथा कृषि सलाह प्रदान की जाए।
- धान जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों के बजाय कम पानी वाली और सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा दिया जाए।
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) प्रणालियों, जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, को व्यापक रूप से अपनाया जाए।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) योजना के तहत मृदा परीक्षण को प्रोत्साहित किया जाए और संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर दिया जाए।
- प्री-मॉनसून ड्राई सोइंग (PMDS) जैसी नवीन कृषि तकनीकों और फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाए।
- किसानों को आधुनिक कृषि मशीनीकरण और ड्रोन जैसी तकनीकों के उपयोग के लिए प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
- फसल बीमा योजनाओं को और अधिक प्रभावी बनाया जाए ताकि किसानों को फसल विफलता के जोखिम से बचाया जा सके।
- जल संचयन (Water Harvesting) संरचनाओं के निर्माण और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) के प्रयासों को तेज किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो प्रभाव · जलवायु परिवर्तन · कृषि जोखिम प्रबंधन · फसल विविधीकरण · जल संरक्षण · सूखा प्रबंधन · कृषि प्रौद्योगिकी · मृदा स्वास्थ्य · खाद्य सुरक्षा · सिंचाई प्रणाली · किसानों की आय · सतत कृषि
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘कृषि राज्य सूची का विषय’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद’}
अवधारणा प्रवाह
अल नीनो घटना का विकास → भारत में कम वर्षा का पूर्वानुमान → जल संसाधनों पर दबाव में वृद्धि → धान जैसी पानी की अधिक खपत वाली फसलों के लिए जोखिम → किसानों को वैकल्पिक फसलों और जल संरक्षण की सलाह → कृषि पद्धतियों में बदलाव और अनुकूलन की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. अल नीनो घटना के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित है।
2. यह भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से अधिक मानसूनी वर्षा का कारण बनता है।
3. अल नीनो का प्रभाव वैश्विक मौसम पैटर्न पर पड़ सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में सूखा और अन्य में भारी वर्षा हो सकती है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है। कथन 2 गलत है। अल नीनो आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से कम मानसूनी वर्षा से जुड़ा है, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। कथन 3 सही है। अल नीनो का वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में सूखे, बाढ़ और अन्य चरम मौसमी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से ‘प्री-मॉनसून ड्राई सोइंग (PMDS)’ बीज अवधारणा का प्राथमिक उद्देश्य है/हैं?
1. मृदा उर्वरता में सुधार करना।
2. जल की कम उपलब्धता वाले क्षेत्रों में फसल उगाना।
3. कीटों और बीमारियों के प्रति फसलों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — प्री-मॉनसून ड्राई सोइंग (PMDS) बीज अवधारणा का प्राथमिक उद्देश्य विभिन्न अनाजों, दालों और तिलहनों के मिश्रण को बोकर मृदा उर्वरता में सुधार करना है। यह जल संरक्षण और जोखिम कम करने में भी सहायक हो सकता है, लेकिन इसका मुख्य फोकस मृदा स्वास्थ्य पर है जैसा कि खबर में बताया गया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं के कारण उत्पन्न कृषि चुनौतियों का सामना करने में फसल विविधीकरण और जल संरक्षण रणनीतियाँ किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं? भारत में इन रणनीतियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी उल्लेख कीजिए। (15 अंक)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. परिचय: अल नीनो और इसके भारतीय कृषि पर प्रभाव का संक्षिप्त परिचय।
2. फसल विविधीकरण की भूमिका: अल नीनो के प्रभावों को कम करने में फसल विविधीकरण (जैसे धान के बजाय कम पानी वाली फसलें) के महत्व को समझाना। इसमें मृदा स्वास्थ्य, आय स्थिरता और जोखिम प्रबंधन शामिल होगा।
3. जल संरक्षण रणनीतियों की भूमिका: जल संरक्षण तकनीकों (जैसे सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, नहरों का कुशल उपयोग) की आवश्यकता और उनके लाभों पर चर्चा।
4. सरकारी पहलें: भारत सरकार द्वारा फसल विविधीकरण और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए प्रमुख कदमों का उल्लेख। इसमें शामिल हो सकते हैं: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) जैसे अप्रत्यक्ष उपाय जो जल-गहन कृषि पर निर्भरता कम कर सकते हैं, और विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम।
5. चुनौतियाँ और आगे की राह: इन रणनीतियों को अपनाने में किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों (जैसे जागरूकता की कमी, प्रारंभिक लागत) और उनके समाधान के लिए नीतिगत सुझाव।
6. निष्कर्ष: सतत कृषि और जलवायु अनुकूलन के लिए इन रणनीतियों के समग्र महत्व पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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