ओडिशा डीजीपी चयन प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट में यूपीएससी का फैसला, जानिए पूरा मामला

UPSC agrees in Supreme Court to defer Odisha DGP selection meeting — diagram

ओडिशा डीजीपी चयन प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट में यूपीएससी का फैसला, जानिए पूरा मामला

ओडिशा डीजीपी चयन प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट में यूपीएससी का फैसला, जानिए पूरा मामला — उड़ीसा डीजीपी चयन प्रक्रिया विवाद की प्रमुख घटनाएं
आरेख: उड़ीसा डीजीपी चयन प्रक्रिया विवाद की प्रमुख घटनाएं

✎ प्रकाश सिंह वाद (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और पुलिस बल में सुधार लाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे, जिसमें UPSC द्वारा सूचीबद्ध वरिष्ठ…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा
  • Prelims: पुलिस महानिदेशक (DGP), प्रकाश सिंह वाद, अनुच्छेद 142, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य पुलिस बल, पुलिस सुधार
  • Essay: भारत में पुलिस सुधारों की आवश्यकता और चुनौतियाँ, न्यायिक सक्रियता और कार्यपालिका पर इसका प्रभाव

त्वरित पुनरावृत्ति: प्रकाश सिंह वाद (2006) में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और पुलिस बल में सुधार लाने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए थे, जिसमें UPSC द्वारा सूचीबद्ध वरिष्ठ अधिकारियों में से चयन और दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल शामिल है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने ओडिशा के पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन को अंतिम रूप देने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की बैठक को अगली सुनवाई तक स्थगित करने का निर्देश दिया है। यह याचिका ओडिशा DGP चयन प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह वाद में दिए गए निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाती है, जिसमें एक कनिष्ठ अधिकारी को सूची में शामिल करने का प्रयास किया गया था।

पृष्ठभूमि

  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 के प्रकाश सिंह वाद में पुलिस सुधारों पर ऐतिहासिक निर्णय दिया था, जिसका उद्देश्य पुलिस बल को राजनीतिक और अन्य बाहरी दबावों से मुक्त करना था।
  • इस निर्णय में, न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए निर्देश दिया कि DGP का चयन राज्य सरकारों द्वारा UPSC द्वारा सूचीबद्ध तीन सबसे वरिष्ठ और मेधावी अधिकारियों में से किया जाना चाहिए।
  • न्यायालय ने ‘कार्यवाहक DGP’ (acting DGP) की अवधारणा को समाप्त कर दिया और यह भी निर्देश दिया कि राज्य पुलिस प्रमुखों का न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल होना चाहिए।
  • जुलाई 2018 और मार्च 2019 के बाद के सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों ने नियुक्ति तंत्र का विस्तृत विवरण दिया, जिसमें संबंधित राज्य द्वारा वर्तमान DGP की सेवानिवृत्ति से तीन महीने पहले UPSC को एक प्रस्ताव भेजना शामिल है।
  • UPSC उपयुक्त अधिकारियों का एक पैनल तैयार करेगा, और राज्य उस सूचीबद्ध अधिकारियों में से एक को तुरंत DGP के रूप में नियुक्त करेगा।
  • वर्तमान विवाद में आरोप है कि ओडिशा सरकार एक ऐसे कनिष्ठ अधिकारी को उम्मीदवारों की सूची में शामिल करने का प्रयास कर रही थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई से ठीक एक दिन पहले पदोन्नति दी गई थी।

प्रकाश सिंह वाद और पुलिस सुधार

  • प्रकाश सिंह वाद 2006 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय है, जिसने भारत में पुलिस सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए।
  • इस वाद का मुख्य उद्देश्य पुलिस बल को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाना, उसकी स्वायत्तता सुनिश्चित करना और उसे अधिक जवाबदेह बनाना था।
  • न्यायालय ने सात प्रमुख निर्देश जारी किए, जिनमें से एक DGP की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह योग्यता और वरिष्ठता पर आधारित हो, न कि राजनीतिक पसंद पर।
  • DGP के लिए न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया ताकि अधिकारी बिना किसी भय या पक्षपात के कार्य कर सकें।
  • न्यायालय ने राज्य सुरक्षा आयोग (State Security Commission) की स्थापना का भी निर्देश दिया, जिसका कार्य पुलिस के कामकाज की निगरानी करना और नीतिगत दिशानिर्देश देना है।
  • इसके अतिरिक्त, पुलिस स्थापना बोर्ड (Police Establishment Board) और पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) की स्थापना का भी निर्देश दिया गया ताकि आंतरिक स्थानांतरण/पोस्टिंग और नागरिकों की शिकायतों का समाधान किया जा सके।
  • इन सुधारों का लक्ष्य पुलिस बल को एक पेशेवर, निष्पक्ष और सेवा-उन्मुख संगठन बनाना है, जो कानून के शासन को प्रभावी ढंग से बनाए रख सके।
  • हालांकि, इन निर्देशों के कार्यान्वयन में राज्यों द्वारा अक्सर देरी या आंशिक अनुपालन देखा गया है, जिसके कारण न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता बनी रहती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
DGP चयन प्रक्रिया राज्यों में पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करना।
प्रकाश सिंह निर्णय, 2006 पुलिस सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम, जिसका उद्देश्य पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करना है।
निश्चित कार्यकाल DGP को कम से कम दो साल का निश्चित कार्यकाल प्रदान करना, ताकि वे स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें।
UPSC की भूमिका DGP पद के लिए योग्य अधिकारियों का एक पैनल तैयार करने में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की केंद्रीय भूमिका।
अनुच्छेद 142 का प्रयोग सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करके न्याय सुनिश्चित करना और संवैधानिक रिक्तता को भरना।

महत्व

शासन और प्रशासन

  • यह मामला पुलिस प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है।
  • DGP जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अनियमितता से बचने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि राज्य सरकारें सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करें और मनमानी नियुक्तियों से बचें।

न्यायिक सक्रियता और पुलिस सुधार

  • सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप पुलिस सुधारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, विशेषकर प्रकाश सिंह मामले में दिए गए निर्देशों के संदर्भ में।
  • यह पुलिस बल को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने और उनकी कार्यप्रणाली में व्यावसायिकता लाने के प्रयासों को मजबूत करता है।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से कार्यपालिका के निर्णयों की वैधता की जांच की जाती है, जो संवैधानिक सिद्धांतों को बनाए रखने में मदद करता है।

संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध

  • यह मामला संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच शक्तियों के संतुलन को प्रभावित करता है।
  • UPSC की भूमिका केंद्र सरकार के एक निकाय के रूप में राज्यों की नियुक्तियों में एक निश्चित मानक स्थापित करती है।
  • राज्यों को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करना होता है, जो न्यायिक सर्वोच्चता (Judicial Supremacy) को दर्शाता है।

चुनौतियाँ

1. पुलिस सुधारों का धीमा कार्यान्वयन

  • प्रकाश सिंह निर्णय के 18 साल बाद भी, कई राज्यों में पुलिस सुधारों का पूर्ण कार्यान्वयन नहीं हो पाया है।
  • राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और निहित स्वार्थों के कारण सुधारों को लागू करने में बाधाएं आती हैं।

2. DGP चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी

  • कुछ राज्यों में DGP के चयन में अभी भी मनमानी और राजनीतिक प्रभाव का आरोप लगता है।
  • योग्य और वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी कर कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नत करने के प्रयास देखे जाते हैं।

3. कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव

  • जब राज्य सरकारें न्यायिक निर्देशों का पालन नहीं करती हैं, तो कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।
  • यह संवैधानिक संतुलन और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित करता है।

4. पुलिस बल का राजनीतिकरण

  • पुलिस बल का राजनीतिकरण (Politicisation) उसकी निष्पक्षता और व्यावसायिकता को कमजोर करता है।
  • यह कानून और व्यवस्था बनाए रखने की पुलिस की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
DGP चयन में अनियमितता सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह निर्णय का उल्लंघन और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी।
कनिष्ठ अधिकारी को शामिल करने का प्रयास योग्यता और वरिष्ठता के सिद्धांतों की अनदेखी, जिससे पुलिस बल का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
न्यायिक निर्देशों की अवहेलना राज्य सरकारों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन न करना, जिससे संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।
पुलिस बल का राजनीतिकरण पुलिस की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नकारात्मक प्रभाव, जिससे कानून और व्यवस्था प्रभावित होती है।
निश्चित कार्यकाल का उल्लंघन DGP को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए निर्धारित न्यूनतम कार्यकाल की अनदेखी।

आगे की राह

  • राज्य सरकारों को सर्वोच्च न्यायालय के प्रकाश सिंह निर्णय और उसके बाद के सभी निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
  • DGP चयन प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी और योग्यता-आधारित बनाया जाना चाहिए, जिसमें वरिष्ठता और अनुभव को महत्व दिया जाए।
  • UPSC को DGP पद के लिए अधिकारियों का पैनल तैयार करते समय सभी निर्धारित मानदंडों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
  • पुलिस बल को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
  • पुलिस सुधारों के कार्यान्वयन की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए और गैर-अनुपालन के लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
  • DGP को कम से कम दो साल का निश्चित कार्यकाल प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि वे स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से कार्य कर सकें।
  • न्यायपालिका को अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुलिस सुधारों के कार्यान्वयन की निगरानी जारी रखनी चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्रकाश सिंह वाद · पुलिस सुधार · DGP चयन प्रक्रिया · सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश · अनुच्छेद 142 · संघवाद · राज्य पुलिस बल · UPSC की भूमिका · कार्यकाल की सुरक्षा · राजनीतिक हस्तक्षेप

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 142’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की असाधारण शक्तियाँ’}

अवधारणा प्रवाह

ओडिशा DGP चयन प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप।  →  सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई।  →  याचिका में प्रकाश सिंह निर्णय के उल्लंघन का आरोप।  →  सर्वोच्च न्यायालय ने UPSC को बैठक स्थगित करने का निर्देश दिया।  →  न्यायिक हस्तक्षेप से चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हुई।  →  पुलिस सुधारों और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हुई।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ वाद (2006) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस महानिदेशक (DGP) के पद को राजनीतिक या अन्य बाहरी दबावों से मुक्त रखने का निर्देश दिया था।
2. न्यायालय ने DGP के चयन के लिए राज्य सरकारों को UPSC द्वारा सूचीबद्ध तीन वरिष्ठतम और योग्य अधिकारियों में से चुनने का निर्देश दिया।
3. इस निर्णय में DGP का न्यूनतम निश्चित कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित किया गया था।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1, 2 और 3 तीनों सही हैं। प्रकाश सिंह वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधारों के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए थे, जिनमें DGP के चयन, कार्यकाल और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति के प्रावधान शामिल थे।

Q2. निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को ‘पूर्ण न्याय’ (complete justice) करने के लिए असाधारण शक्तियों का प्रयोग करने की अनुमति देता है, जैसा कि प्रकाश सिंह वाद में किया गया था?

  1. अनुच्छेद 32
  2. अनुच्छेद 142
  3. अनुच्छेद 226
  4. अनुच्छेद 136

उत्तर: अनुच्छेद 142 — अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को उन मामलों में ‘पूर्ण न्याय’ करने के लिए ऐसे आदेश पारित करने की शक्ति प्रदान करता है जहाँ कोई विशिष्ट कानून या प्रक्रिया उपलब्ध न हो। प्रकाश सिंह वाद में पुलिस सुधारों के लिए दिशानिर्देश जारी करते समय न्यायालय ने इसी शक्ति का प्रयोग किया था।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ प्रकाश सिंह वाद (2006) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए दिशानिर्देशों के आलोक में पुलिस महानिदेशक (DGP) के चयन और कार्यकाल में सुधारों की आवश्यकता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ये दिशानिर्देश पुलिस बल में राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने में सफल रहे हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: प्रकाश सिंह वाद (2006) और उसके महत्व का संक्षिप्त उल्लेख, जिसमें पुलिस सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया गया था।
2. प्रकाश सिंह वाद के प्रमुख दिशानिर्देश: DGP के चयन (UPSC द्वारा सूचीबद्ध वरिष्ठतम अधिकारियों में से), न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल, कार्यवाहक DGP की अवधारणा को समाप्त करना, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति जैसे बिंदुओं को विस्तार से समझाएँ। अनुच्छेद 142 का उल्लेख करें।
3. सुधारों की आवश्यकता: पुलिस बल में राजनीतिक हस्तक्षेप के दुष्परिणामों, जवाबदेही की कमी, मनमाने तबादलों और पदोन्नति, तथा कानून-व्यवस्था पर इसके नकारात्मक प्रभावों पर चर्चा करें।
4. दिशानिर्देशों की सफलता का आलोचनात्मक परीक्षण: इन दिशानिर्देशों ने कुछ हद तक स्थिरता और स्वायत्तता प्रदान की है, लेकिन कई राज्यों में अभी भी इनके उल्लंघन (जैसे कार्यवाहक DGP की नियुक्ति, चयन प्रक्रिया में देरी, राजनीतिक प्रभाव) के उदाहरण मिलते हैं। हालिया समाचारों में ओडिशा DGP चयन प्रक्रिया जैसे उदाहरणों का उल्लेख करें।
5. चुनौतियाँ और सीमाएँ: संघवाद के सिद्धांत, राज्य सरकारों की स्वायत्तता, और इन दिशानिर्देशों को कानून में बदलने की अनिच्छा जैसी चुनौतियों पर प्रकाश डालें।
6. निष्कर्ष: पुलिस सुधारों के महत्व को दोहराते हुए, दिशानिर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन और विधायी समर्थन की आवश्यकता पर बल दें ताकि पुलिस बल की स्वतंत्रता और व्यावसायिकता सुनिश्चित हो सके।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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