ओबीसी क्रीमी लेयर: आय एकमात्र आधार नहीं, केंद्र की याचिका खारिज

ओबीसी क्रीमी लेयर: आय एकमात्र आधार नहीं, केंद्र की याचिका खारिज

ओबीसी क्रीमी लेयर: आय एकमात्र आधार नहीं, केंद्र की याचिका खारिज

क्रीमी लेयर निर्धारण प्रक्रिया1992क्रीमी लेयर सिद्धांत1993केंद्र ने मानदंड तय किए2004वेतन को आय में जोड़ावर्तमानसुप्रीम कोर्ट का फैसला
क्रीमी लेयर निर्धारण प्रक्रिया

✎ क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल वेतन के आधार पर नहीं, बल्कि आय, माता-पिता के पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के समग्र मानदंडों पर होना चाहिए, क्योंकि आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से पिछड़े वर्ग तक पहुँचना चाहिए।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — Polity and Governance (संविधान के मूल अधिकार: अनुच्छेद 15(4), 16(4), 16(4A), 16(4B); सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका; न्यायिक समीक्षा; सामाजिक न्याय हेतु आरक्षण; राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग)
  • Prelims: क्रीमी लेयर (Creamy Layer) की अवधारणा और उसके मानदंड, इंद्रा साहनी वाद (Indra Sawhney Case, 1992) और 27 प्रतिशत OBC आरक्षण, अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 16(4B), अनुच्छेद 338B और 102वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा), 93वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2005 (शैक्षणिक संस्थानों में OBC आरक्षण), रोस्टर प्रणाली (Roster System) और रिक्तियों का आरक्षण, सिविल सेवा परीक्षा में OBC के लिए आयु और प्रयास सीमा की छूट बनाम सेवा आवंटन
  • Essay: सामाजिक न्याय बनाम अवसर की समानता: आरक्षण में ‘वास्तविक पिछड़ेपन’ की पहचान, क्रीमी लेयर: आर्थिक मानदंड और सामाजिक पिछड़ेपन की कसौटी के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल वेतन के आधार पर नहीं, बल्कि आय, माता-पिता के पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के समग्र मानदंडों पर होना चाहिए, क्योंकि आरक्षण का लाभ वास्तविक रूप से पिछड़े वर्ग तक पहुँचना चाहिए।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) के आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने संबंधी अपने 11 मार्च के फैसले को बरकरार रखा और केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें क्रियान्वयन के लिए दो वर्ष का समय माँगा गया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर की स्थिति केवल माता-पिता के वेतन के आधार पर तय नहीं की जा सकती, और उसके साथ पद तथा सामाजिक-आर्थिक स्थिति के मानदंड भी देखे जाने चाहिए। सिविल सेवा परीक्षा 2025 का परिणाम घोषित हो चुका है, किंतु सेवाओं का आवंटन लंबित है, इसलिए इसी सिद्धांत के आधार पर OBC अभ्यर्थियों का सेवा आवंटन होगा। साथ ही, पूर्व की पूर्ण हो चुकी नियुक्तियों और वरिष्ठता को पुनः नहीं खोला जाएगा। न्यायालय ने सरकार को नई आरक्षण एवं क्रीमी लेयर नीति बनाने की स्वतंत्रता भी दी, बशर्ते वह संविधान और न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप हो।

पृष्ठभूमि

  • वर्ष 1992 के इंद्रा साहनी वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को वैध माना, परंतु उन्नत (संपन्न) वर्ग को इससे बाहर रखने का सिद्धांत दिया, जिसे क्रीमी लेयर कहा गया।
  • 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum – OM) में केंद्र सरकार ने OBC में क्रीमी लेयर की सीमा और उसके मानदंड तय किए।
  • 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र में सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन को भी क्रीमी लेयर की आय में जोड़ने का निर्देश दिया गया, जिस पर न्यायालय ने भेदभाव की आशंका जताई।
  • अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान की शक्ति देते हैं; ये प्रावधान सामाजिक न्याय के उद्देश्य से जुड़े हैं और समानता के मूल अधिकार (अनुच्छेद 14–16) का अपवाद नहीं, बल्कि उसका विस्तार माने जाते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में भी माना है कि आरक्षण का लाभ उसी वर्ग तक पहुँचना चाहिए जो वास्तव में पिछड़ा है, इसलिए क्रीमी लेयर का सिद्धांत समय-समय पर पुनरीक्षित होता रहा है।

क्रीमी लेयर (Creamy Layer) क्या है?

  • क्रीमी लेयर से आशय OBC वर्ग के उस संपन्न हिस्से से है जो सामाजिक-आर्थिक रूप से उन्नत हो चुका है, इसलिए उसे आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है।
  • इसका संवैधानिक आधार अनुच्छेद 15(4), 16(4) और 16(4B) की व्याख्या में है; यह सिद्धांत इंद्रा साहनी वाद (1992) में प्रतिपादित हुआ।
  • वर्ष 2017 के संशोधन के अनुसार केंद्र सरकार के आरक्षण में क्रीमी लेयर की वार्षिक आय सीमा 8 लाख रुपये रखी गई थी।
  • मानदंडों में केवल आय ही नहीं, बल्कि माता-पिता के सरकारी या संवैधानिक पद, कृषि भूमि और आवासीय संपत्ति जैसे पहलू भी सम्मिलित होते हैं।
  • आय और पद दोनों मानदंड मिलकर यह तय करते हैं कि परिवार की सामाजिक स्थिति वास्तव में उन्नत है या नहीं; अकेले वेतन-आंकड़े पर निर्णय को न्यायालय ने अपर्याप्त माना है।
  • क्रीमी लेयर के बाहर के OBC अभ्यर्थी ही OBC आरक्षण का लाभ ले सकते हैं; इसे लागू करने का दायित्व प्रमाण-पत्र जारी करने वाले प्राधिकारी पर होता है।
  • अन्य पिछड़ा वर्ग की केंद्रीय सूची तैयार करने और उसके संबंध में सलाह देने का कार्य राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes – NCBC) करता है, जिसे 102वें संविधान संशोधन (2018) द्वारा अनुच्छेद 338B के अंतर्गत संवैधानिक दर्जा मिला।
  • क्रीमी लेयर पर संशोधन का अधिकार कार्यपालिका के पास है, परंतु उसका निर्धारण संवैधानिक सिद्धांतों और न्यायिक समीक्षा के दायरे में रहना अनिवार्य है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
निर्णय की प्रकृति सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने 11 मार्च का फैसला बरकरार रखा और केंद्र सरकार की दो वर्ष की मोहलत वाली याचिका खारिज की
निर्धारण का आधार क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं हो सकता; पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को भी समान रूप से देखना होगा
लागू होने का दायरा सिविल सेवा परीक्षा 2025 के अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes – OBC) उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर यह सिद्धांत लागू होगा
पूर्व नियुक्तियों पर प्रभाव पहले से पूरी हो चुकी नियुक्तियाँ, चयन प्रक्रियाएँ और वरिष्ठता अप्रभावित रहेंगी तथा पुरानी नियुक्तियाँ दोबारा नहीं खोली जाएँगी
पुराना कानूनी आधार 8 सितंबर 1993 का कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum – OM) और 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (Public Sector Undertaking – PSU) तथा निजी क्षेत्र के वेतन को आय में जोड़ा गया था
समय-सीमा छह माह की मूल मियाद पूरी होने पर न्यायालय ने क्रियान्वयन के लिए आठ सप्ताह की अतिरिक्त अवधि दी

महत्व

सामाजिक न्याय

  • क्रीमी लेयर का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ पिछड़े वर्ग के सबसे वंचित परिवारों तक पहुँचे, न कि उन्हीं परिवारों तक जो पहले से सक्षम हैं
  • इंदिरा साहनी मामला (Indra Sawhney Case, 1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने ओबीसी आरक्षण को वैध ठहराते हुए क्रीमी लेयर की अवधारणा को अपवर्जन के सिद्धांत के रूप में स्थापित किया था
  • वास्तविक पिछड़apन की पहचान के लिए केवल आय नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का समग्र मूल्यांकन आवश्यक है

संवैधानिक और विधिक

  • सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच भेदभाव को अनुच्छेद 14 की समानता की दृष्टि से अनुचित माना गया है
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से न्यायालय ने कार्यपालिका के नियम की व्याख्या की और उसे संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप बनाने का निर्देश दिया
  • सरकार को नई आरक्षण नीति बनाने की स्वतंत्रता है, परंतु वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सिद्धांतों के दायरे में रहेगी, जिससे विधिक निश्चितता बनी रहती है

प्रशासनिक और भर्ती प्रणाली

  • सेवा आवंटन के चरण में नियम बदलने से उम्मीदवारों के बीच अपेक्षा और निष्पक्षता का संतुलन बनाना आवश्यक होता है; न्यायालय ने पूर्व नियुक्तियों को सुरक्षित रखकर यही संतुलन साधा है
  • रोस्टर बिंदु (Roster Point) के अनुसार होने वाली सभी नियुक्तियाँ अब नई व्याख्या के अनुसार होंगी, जिससे भर्ती प्रक्रिया में एकरूपता आएगी

आर्थिक और वर्गीय आयाम

  • केवल वेतन के आंकड़ों पर आधारित मूल्यांकन सीमित होता है, क्योंकि वेतन, पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति अलग-अलग तरह से परिवार की वास्तविक स्थिति को दर्शाते हैं
  • संगठित और असंगठित क्षेत्र में आय के स्रोत भिन्न होते हैं, इसलिए एकल मानदंड से कई पात्र परिवार बाहर या अंदर हो सकते हैं

चुनौतियाँ

1. आय बनाम बहुआयामी मापदंड

  • केवल वेतन आधारित निर्धारण असंगठित क्षेत्र, कृषि और स्वरोजगार वाले परिवारों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को नहीं पकड़ पाता
  • पद, भूमि और सामाजिक स्थिति जैसे मानदंडों को लागू करने के लिए स्पष्ट और मापनीय परिभाषाएँ आवश्यक हैं

2. क्रियान्वयन की समय-सीमा और प्रशासनिक तैयारी

  • परीक्षा परिणाम घोषित हो चुका है, परंतु सेवा आवंटन लंबित है, इसलिए नए मानदंडों पर सत्यापन का काम तुरंत और व्यवस्थित ढंग से करना होगा
  • समय-सीमा बढ़ाए जाने से यह स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक तंत्र को पर्याप्त तैयारी का अवसर देना भी न्यायिक विवेक का हिस्सा है

3. कार्यपालिका की नीति-निर्माण स्वतंत्रता और न्यायिक हस्तक्षेप का संतुलन

  • सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य की नीति बनाने की स्वतंत्रता सरकार को दी है, परंतु उसकी सीमा भी तय की है
  • शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के अंतर्गत विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका तथा न्यायपालिका के निर्देशों के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है

4. पूर्व नियुक्तियों की सुरक्षा और न्याय की भावना

  • पूर्व नियुक्तियों और वरिष्ठता को न खोलने का निर्णय विधिक निश्चितता बनाए रखता है, परंतु कुछ पात्र उम्मीदवारों को इससे असंतोष हो सकता है
  • भूतलक्षी और भावी प्रभाव के बीच का यह संतुलन न्याय के सिद्धांत की व्याख्या का विषय बना रहता है

5. सत्यापन, दस्तावेज़ और पारदर्शिता

  • क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र के लिए आय, पद और संपत्ति का सत्यापन जटिल है और इसमें गलत प्रमाण पत्र जारी होने का जोखिम रहता है
  • अलग-अलग विभागों और राज्यों में प्रमाण पत्र के प्रारूप और मानक भिन्न होने से एकरूपता की समस्या उत्पन्न होती है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
आय-आधारित मूल्यांकन की सीमा असंगठित क्षेत्र और स्वरोजगार वाले परिवारों की वास्तविक स्थिति का सही आकलन कठिन
सरकारी और PSU/निजी कर्मचारियों में समानता पहले अलग-अलग मानदंड लागू होने से भेदभाव की शिकायत; अब एकरूप नियम की आवश्यकता
सेवा आवंटन में समय का दबाव परिणाम घोषित होने के बाद लंबित प्रक्रिया से उम्मीदवारों की अनिश्चितता और प्रशासनिक विलंब
पूर्व नियुक्तियों की सुरक्षा पुरानी नियुक्तियाँ न खुलने से विधिक स्थिरता, पर कुछ मामलों में न्याय की अपेक्षा अधूरी
प्रमाण पत्र में एकरूपता का अभाव विभिन्न राज्यों और विभागों में प्रारूप व सत्यापन प्रक्रिया भिन्न होने से गलत लाभ या वंचना का जोखिम

आगे की राह

  • क्रीमी लेयर निर्धारण के लिए आय, पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का स्पष्ट, मापनीय और सार्वजनिक रूप से ज्ञात मानदंड तय किया जाए
  • सरकारी, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों पर एक समान नियम लागू किया जाए, ताकि अनुच्छेद 14 की भावना सुनिश्चित हो
  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes – NCBC) की भूमिका को सुदृढ़ करते हुए आँकड़ों और सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों के आधार पर मानदंडों की समीक्षा की जाए
  • आय सीमा के संशोधन के लिए मुद्रास्फीति, वेतन-वृद्धि और जीवन-यापन लागत के आँकड़ों का नियमित उपयोग किया जाए
  • आय और पद संबंधी प्रमाण पत्रों के लिए डिजिटल सत्यापन प्रणाली विकसित की जाए, जिससे गलत प्रमाण पत्र और विलंब दोनों कम हों
  • सेवा आवंटन के चरण में रोस्टर बिंदुओं और क्रीमी लेयर सत्यापन को एक साथ पूरा करने की स्पष्ट समय-सारणी बनाई जाए
  • उम्मीदवारों को नियमों, दस्तावेज़ी आवश्यकताओं और अपील प्रक्रिया की जानकारी समय पर उपलब्ध कराई जाए
  • भविष्य की नीति बनाते समय सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांतों का पालन करते हुए संसदीय परामर्श और सार्वजनिक चर्चा को शामिल किया जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

क्रीमी लेयर (Creamy Layer) · अन्य पिछड़ा वर्ग (Other Backward Classes) / OBC · सामाजिक न्याय · इंद्रा साहनी मामला (Indra Sawhney Case, 1992) · अनुच्छेद 16(4) · सामाजिक-आर्थिक स्थिति · राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) · वास्तविक समानता · आरक्षण नीति का न्यायिक पुनरावलोकन · सिविल सेवा परीक्षा 2025 (Civil Services Examination 2025)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14: सार्वजनिक और निजी कर्मचारियों के बच्चों में भेदभाव
  • अनुच्छेद 16(1): सार्वजनिक नियुक्ति में अवसर की समानता
  • अनुच्छेद 16(4): पिछड़े वर्ग के लिए सेवाओं में आरक्षण का आधार

अवधारणा प्रवाह

1992 का इंदिरा साहनी मामला: ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर अपवर्जन का सिद्धांत स्थापित  →  8 सितंबर 1993 का कार्यालय ज्ञापन: क्रीमी लेयर की सीमा और मानदंड तय  →  14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र: सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम और निजी क्षेत्र का वेतन भी आय में जोड़ा गया  →  भेदभाव की शिकायत: सरकारी और अन्य क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के साथ असमान व्यवहार  →  सर्वोच्च न्यायालय का 11 मार्च का फैसला: केवल वेतन आधार अमान्य, पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी आवश्यक  →  केंद्र की दो वर्ष की मोहलत की याचिका खारिज; क्रियान्वयन के लिए आठ सप्ताह की अतिरिक्त अवधि  →  सिविल सेवा परीक्षा 2025 के सेवा आवंटन में लागू; पूर्व नियुक्तियाँ और वरिष्ठता सुरक्षित, आगे की नीति सिद्धांतों के भीतर

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इंद्रा साहनी मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण में क्रीमी लेयर को अपवर्जित करने के सिद्धांत को मान्यता दी।
2. अनुच्छेद 15(5) राज्य को शिक्षण संस्थानों में, जिनमें निजी अनुदान-रहित संस्थान भी सम्मिलित हैं, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध करने की शक्ति देता है।
3. अनुच्छेद 16(4) राज्य के लिए अन्य पिछड़े वर्गों को राज्य सेवाओं में आरक्षण देना अनिवार्य बनाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: इंद्रा साहनी (1992) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 27% OBC आरक्षण को वैध ठहराते हुए क्रीमी लेयर को बाहर रखने का सिद्धांत दिया। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 15(5) (93वाँ संशोधन, 2005) निजी अनुदान-रहित संस्थानों सहित प्रवेश में विशेष उपबंध की अनुमति देता है, जबकि अल्पसंख्यक संस्थान (अनुच्छेद 30(1)) इससे बाहर हैं। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 16(4) सक्षमकारी (enabling) उपबंध है, जो राज्य को आरक्षण का प्रावधान करने की अनुमति देता है, अनिवार्यता नहीं थोपता।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
कथन (A): सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता।
कारण (R): क्रीमी लेयर के निर्धारण में माता-पिता के पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति जैसे मानदंडों को भी देखना आवश्यक है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) सही है, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने वेतन-आधारित एकमात्र मानक को कानूनन उचित नहीं माना। (R) भी सही है और (A) की व्याख्या करता है, क्योंकि न्यायालय ने पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समग्र मूल्यांकन का अनिवार्य हिस्सा बताया है।

Q3. सूची-I (संवैधानिक उपबंध/निकाय) को सूची-II (विषय) से सुमेलित कीजिए:

सूची-I
A. अनुच्छेद 338B
B. अनुच्छेद 340
C. अनुच्छेद 16(4A)
D. अनुच्छेद 15(5)

सूची-II
(i) राज्य सेवाओं में पदोन्नति में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने की स्थिति में आरक्षण का उपबंध
(ii) शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु विशेष उपबंध, जिसमें निजी अनुदान-रहित संस्थान सम्मिलित हैं
(iii) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का संवैधानिक प्रावधान
(iv) सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग की नियुक्ति

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-iii, B-iv, C-i, D-ii
  2. A-iv, B-iii, C-ii, D-i
  3. A-iii, B-i, C-iv, D-ii
  4. A-ii, B-iii, C-i, D-iv

उत्तर: A-iii, B-iv, C-i, D-ii — अनुच्छेद 338B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग से संबंधित है (102वें संशोधन, 2018 द्वारा सम्मिलित)। अनुच्छेद 340 राष्ट्रपति को पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच हेतु आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 16(4A) SC/ST की पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित है, और अनुच्छेद 15(5) शिक्षण संस्थानों में विशेष उपबंध से।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ क्रीमी लेयर (Creamy Layer) का सिद्धांत सामाजिक न्याय और वास्तविक समानता के बीच संतुलन साधने का एक संवैधानिक उपकरण है। हाल के एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि केवल माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्धारण कानूनन उचित नहीं है। इंद्रा साहनी मामले (1992) से लेकर वर्तमान संदर्भ तक इस सिद्धांत के विकास का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि केवल आय-आधारित मानक अपनाने से कौन-सी संवैधानिक और व्यावहारिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: अनुच्छेद 15(4), 16(4) द्वारा पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध; अनुच्छेद 14 और 16(1) के समानता सिद्धांत के साथ तनाव; अनुच्छेद 335 (प्रशासनिक दक्षता) का संतुलन।
2. संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 340 (मंडल आयोग की पृष्ठभूमि), 338B (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, 102वाँ संशोधन, 2018), 342A (केंद्रीय सूची का निर्धारण)।
3. इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992): नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 27% OBC आरक्षण को वैध ठहराया; पिछड़ेपन का आधार मुख्यतः सामाजिक-शैक्षणिक; आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग को क्रीमी लेयर के रूप में अपवर्जित करने का सिद्धांत; आरक्षण की 50% सीमा का उल्लेख।
4. प्रशासनिक विकास: 8 सितंबर 1993 का कार्यालय ज्ञापन (OM) क्रीमी लेयर की सीमा तय करता है; 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र में PSU और निजी क्षेत्र के वेतन को आय में जोड़ने का निर्देश; न्यायालय के अनुसार इससे सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के बीच अनुचित भेदभाव पैदा हुआ।
5. अशोक कुमार ठाकुर बनाम भारत संघ (2008): क्रीमी लेयर अपवर्जन को संवैधानिक रूप से आवश्यक माना गया; 93वें संशोधन की वैधता की पुष्टि।
6. हालिया निर्णय (11 मार्च का फैसला, जिसे बाद में बरकरार रखा गया): वेतन एकमात्र मानक नहीं; माता-पिता का पद और सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी आवश्यक; केंद्र की दो वर्ष की मोहलत की याचिका खारिज; सिविल सेवा परीक्षा 2025 के OBC उम्मीदवारों के आवंटन पर लागू; पूर्व नियुक्तियों और वरिष्ठता पर प्रभाव नहीं; सरकार को संवैधानिक दायरे में नई नीति बनाने की स्वतंत्रता।
7. पक्ष में तर्क: आरक्षण का लाभ वास्तविक वंचितों तक पहुँचना; बहु-आयामी मानक से संवैधानिक दृष्टि के अनुरूप निर्णय।
8. विपक्ष/चुनौतियाँ: आय सत्यापन की कठिनाई (विशेषकर असंगठित क्षेत्र); मानदंडों की जटिलता और प्रशासनिक अनिश्चितता; नियुक्तियों में विलंब; आय-सीमा के वर्तमान स्तर (2017 में ₹8 लाख प्रति वर्ष) की समीक्षा का प्रश्न।
9. परिणाम का प्रश्न: यदि नीति में बदलाव हो तो लाभार्थियों की पहचान, डेटा-आधारित आकलन और प्रशासनिक पारदर्शिता आवश्यक; न्यायिक समीक्षा द्वारा मनमानी से सुरक्षा।
10. समापन: बहु-आयामी सामाजिक-आर्थिक सूचकांक, NCBC की भूमिका, नियमित समीक्षा और डेटा-आधारित नीति निर्माण की ओर संकेत करते हुए संतुलित निष्कर्ष।

स्रोत: jansatta.com


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