22 Sep कर्नाटक विधानमंडल ने केंद्र से ईएसए को अधिसूचित वन तक सीमित रखने की मांग का प्रस्ताव पारित किया

✎ पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के ऐसे बफर जोन हैं जहाँ जैव विविधता के संरक्षण हेतु कुछ गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है, और पश्चिमी घाट के संदर्भ में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने ऐसे…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भौतिक भूगोल) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन)
- Prelims: पश्चिमी घाट, पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA), कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, माधव गाडगिल रिपोर्ट, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, राज्य और केंद्र संबंध, जैव विविधता हॉटस्पॉट, वन्यजीव संरक्षण
- Essay: विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण: एक संतुलनकारी कार्य, संघवाद और पर्यावरणीय शासन में राज्यों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) संरक्षित क्षेत्रों के आसपास के ऐसे बफर जोन हैं जहाँ जैव विविधता के संरक्षण हेतु कुछ गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है, और पश्चिमी घाट के संदर्भ में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जिसे लेकर राज्यों की अपनी चिंताएं हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक विधानमंडल के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें केंद्र सरकार से पश्चिमी घाट के संरक्षण पर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के अनुसार पहचाने गए पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) को केवल अधिसूचित वनों तक सीमित करने का आग्रह किया है। राज्य ने केंद्र से एक वर्ष का समय भी मांगा है ताकि इन क्षेत्रों का भौतिक सर्वेक्षण किया जा सके और रिपोर्ट में कथित कमियों को दूर करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया जा सके।
पृष्ठभूमि
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों से होकर गुजरती है।
- इसे जैव विविधता के आठ ‘हॉटस्पॉट’ में से एक के रूप में मान्यता प्राप्त है और यह कई स्थानिक प्रजातियों का घर है।
- पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए सिफारिशें देने हेतु दो समितियों का गठन किया था: पहली, माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) और दूसरी, के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय कार्य समूह (HLWG)।
- गाडगिल रिपोर्ट (2011) ने पश्चिमी घाट के लगभग 75% क्षेत्र को पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसे स्थानीय विरोध और राज्य सरकारों की आपत्तियों का सामना करना पड़ा।
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट (2013) ने गाडगिल रिपोर्ट की समीक्षा की और पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को ESA के रूप में नामित करने का सुझाव दिया, जिसमें खनन, उत्खनन और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई।
- केंद्र सरकार ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर ESA के संबंध में कई मसौदा अधिसूचनाएँ जारी की हैं, लेकिन राज्यों की चिंताओं के कारण अंतिम अधिसूचना अभी तक जारी नहीं की गई है।
- कर्नाटक सरकार का मानना है कि वर्तमान मसौदा अधिसूचना में कृषि/बागवानी/वृक्षारोपण भूमि, मानव बस्तियों और सार्वजनिक गतिविधियों वाले क्षेत्रों को भी ESA में शामिल किया गया है, जिससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हो रही है।
पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या हैं?
- पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Areas – ESA) पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित किए जाते हैं।
- इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों जैसे संरक्षित क्षेत्रों के आसपास 10 किलोमीटर के दायरे में ‘शॉक एब्जॉर्बर’ या बफर जोन के रूप में कार्य करने के लिए नामित किया जाता है।
- ESA का उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के आसपास कुछ गतिविधियों को विनियमित करके इन क्षेत्रों में उच्च जैव विविधता वाले क्षेत्रों की रक्षा करना है।
- इन क्षेत्रों में कुछ गतिविधियों को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जा सकता है, जबकि अन्य को विनियमित किया जा सकता है, जैसे कि खनन, उत्खनन, प्रदूषणकारी उद्योग, बड़े पैमाने पर निर्माण और पर्यटन गतिविधियाँ।
- ESA का निर्धारण करते समय स्थानीय समुदायों की आजीविका और विकास संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होता है, ताकि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाया जा सके।
- कर्नाटक का प्रस्ताव ESA के दायरे को लगभग 16,000 वर्ग किलोमीटर तक कम करने की मांग करता है, जिसमें केवल अधिसूचित वन शामिल हों और मानव बस्तियों, कृषि भूमि आदि को बाहर रखा जाए।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट | पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए गठित एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट, जिसने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) की पहचान की। |
| पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) | पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित क्षेत्र जहाँ कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधित या विनियमित किया जाता है ताकि पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा की जा सके। |
| कर्नाटक विधानसभा का संकल्प | केंद्र सरकार से ESA को केवल अधिसूचित वनों तक सीमित रखने और कृषि/बागवानी/मानव बस्तियों को बाहर रखने का आग्रह। |
| भौतिक सर्वेक्षण | राज्य द्वारा प्रस्तावित एक वर्ष के भीतर ESA क्षेत्रों का जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण, ताकि सटीक सीमांकन किया जा सके। |
| उच्च-स्तरीय समिति | सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित होने वाली समिति, जो कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की ‘कमियों’ को दूर करने के उपाय सुझाएगी। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास
- यह मुद्दा पर्यावरण संरक्षण (पश्चिमी घाट की जैव विविधता) और स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को दर्शाता है।
- ESA के सीमांकन से खनन, उद्योग और कुछ कृषि गतिविधियों पर प्रतिबंध लग सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार प्रभावित हो सकते हैं।
संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- राज्य विधानसभा का संकल्प केंद्र सरकार की मसौदा अधिसूचना के विरुद्ध है, जो पर्यावरण शासन में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय की आवश्यकता को उजागर करता है।
- यह दर्शाता है कि पर्यावरण संबंधी निर्णय लेते समय राज्यों की विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों और चिंताओं को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी
- संकल्प में ग्राम पंचायत स्तर पर जन प्रतिनिधियों की समिति बनाने का प्रस्ताव है, जो पर्यावरण नीतियों में स्थानीय भागीदारी के महत्व को रेखांकित करता है।
- स्थानीय लोगों की चिंताओं को दूर करना और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना नीतियों की स्वीकार्यता और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है।
नीति निर्माण में वैज्ञानिकता और जमीनी हकीकत
- राज्य द्वारा भौतिक सर्वेक्षण और सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति के गठन का प्रस्ताव रिपोर्ट में ‘कमियों’ को दूर करने और जमीनी हकीकत के आधार पर नीति बनाने की आवश्यकता को दर्शाता है।
- यह वैज्ञानिक रिपोर्टों को स्थानीय संदर्भ में अनुकूलित करने की चुनौती को भी सामने लाता है।
चुनौतियाँ
1. पर्यावरण संरक्षण और आजीविका का संतुलन
- पश्चिमी घाट जैसे जैव विविधता हॉटस्पॉट का संरक्षण आवश्यक है, लेकिन साथ ही वहाँ रहने वाले लाखों लोगों की कृषि, बागवानी और अन्य आजीविका संबंधी गतिविधियों को भी सुनिश्चित करना होगा।
- ESA के कठोर प्रतिबंधों से स्थानीय समुदायों में विस्थापन और आर्थिक नुकसान का भय उत्पन्न होता है, जिससे संघर्ष की स्थिति बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; सतत विकास; सामाजिक न्याय
2. केंद्र-राज्य समन्वय का अभाव
- पर्यावरण संबंधी मामलों में केंद्र और राज्यों के बीच प्रभावी समन्वय की कमी से नीतियों का कार्यान्वयन बाधित हो सकता है।
- राज्यों की आपत्तियों को सुने बिना केंद्र द्वारा अधिसूचना जारी करने से संघवाद की भावना प्रभावित होती है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य संबंध; संघवाद; पर्यावरण शासन
3. सीमांकन में त्रुटियाँ और अस्पष्टता
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में ESA के सीमांकन को लेकर स्थानीय स्तर पर कई आपत्तियाँ हैं, जिनमें कृषि भूमि, मानव बस्तियों और सार्वजनिक गतिविधियों वाले क्षेत्रों को भी शामिल करने का आरोप है।
- अस्पष्ट सीमांकन से स्थानीय लोगों में भ्रम और अनिश्चितता पैदा होती है, जिससे भूमि उपयोग संबंधी विवाद बढ़ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन; भूमि उपयोग नीति
4. नीति निर्माण में स्थानीय भागीदारी की कमी
- पर्यावरण नीतियों के निर्माण में अक्सर स्थानीय समुदायों और हितधारकों की पर्याप्त भागीदारी नहीं होती है, जिससे उनकी चिंताओं और आवश्यकताओं को नजरअंदाज किया जा सकता है।
- नीतियों की स्वीकार्यता और प्रभावी कार्यान्वयन के लिए स्थानीय लोगों का विश्वास और सहयोग प्राप्त करना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: शासन; सहभागी लोकतंत्र; नीति निर्माण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ESA का विस्तार | कर्नाटक सरकार चाहती है कि ESA केवल अधिसूचित वनों तक सीमित रहे, जबकि वर्तमान मसौदा अधिसूचना में 20,668 वर्ग किमी क्षेत्र शामिल है। |
| आजीविका पर प्रभाव | कृषि/बागवानी/वृक्षारोपण भूमि, मानव बस्तियों और सार्वजनिक गतिविधियों वाले क्षेत्रों को ESA में शामिल करने से स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होने का डर। |
| रिपोर्ट में कमियाँ | राज्य सरकार का मानना है कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में ‘कमियाँ’ हैं, जिन्हें दूर करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति की आवश्यकता है। |
| भौतिक सर्वेक्षण की आवश्यकता | सटीक सीमांकन और जमीनी हकीकत को समझने के लिए एक वर्ष के भीतर भौतिक सर्वेक्षण की मांग। |
| केंद्र की मसौदा अधिसूचना | राज्य चाहता है कि केंद्र ESA पर अंतिम निर्णय लेने से पहले राज्य की रिपोर्ट और विस्तृत चर्चा का इंतजार करे। |
आगे की राह
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी संवाद और समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए ताकि पश्चिमी घाट के संरक्षण और स्थानीय समुदायों की आजीविका के बीच संतुलन बनाया जा सके।
- राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित भौतिक सर्वेक्षण को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए, जिसमें राजस्व सर्वेक्षण संख्या के आधार पर वनों और मानव बस्तियों का स्पष्ट सीमांकन हो।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति को कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की ‘कमियों’ की पहचान करनी चाहिए और स्थानीय हितधारकों की चिंताओं को दूर करने वाले व्यवहार्य समाधान सुझाने चाहिए।
- ESA के सीमांकन और प्रबंधन में स्थानीय समुदायों, ग्राम पंचायतों और विशेषज्ञों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि नीतियों की स्वीकार्यता और प्रभावी कार्यान्वयन हो सके।
- केंद्र सरकार को राज्य की रिपोर्ट और सिफारिशों पर विचार करने के बाद ही ESA पर अंतिम अधिसूचना जारी करनी चाहिए, जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो।
- पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसरों और सतत विकास मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि उन पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पश्चिमी घाट · पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) · कस्तूरीरंगन रिपोर्ट · माधव गाडगिल रिपोर्ट · पर्यावरण संरक्षण · संघवाद · राज्य-केंद्र संबंध · सतत विकास · जैव विविधता · स्थानीय आजीविका · पर्यावरण प्रभाव आकलन · वन संरक्षण अधिनियम
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्य के बीच विधायी शक्तियों का वितरण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 252’, ‘note’: ‘दो या अधिक राज्यों के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय परिषद के माध्यम से केंद्र-राज्य समन्वय’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘राज्य द्वारा पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘नागरिकों का पर्यावरण संरक्षण का मौलिक कर्तव्य’}
अवधारणा प्रवाह
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट में ESA की पहचान की। → केंद्र सरकार ने ESA पर मसौदा अधिसूचना जारी की। → कर्नाटक विधानसभा ने संकल्प पारित कर ESA को सीमित करने का आग्रह किया। → राज्य सरकार ने भौतिक सर्वेक्षण और उच्च-स्तरीय समिति का प्रस्ताव किया। → केंद्र और राज्य के बीच ESA के अंतिम सीमांकन पर सहमति की आवश्यकता।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पश्चिमी घाट यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल है।
2. माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की तुलना में अधिक कठोर उपाय सुझाए थे।
3. पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) की अवधारणा पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित की जाती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। पश्चिमी घाट को 2012 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।
कथन 2 सही है। गाडगिल रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने का सुझाव दिया था, जबकि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट ने लगभग 37% क्षेत्र को ESA के रूप में चिह्नित किया।
कथन 3 सही है। ESA को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाता है, जिसका उद्देश्य विशिष्ट क्षेत्रों में विकास गतिविधियों को विनियमित करना है।
Q2. कस्तूरीरंगन रिपोर्ट निम्नलिखित में से किस क्षेत्र के संरक्षण से संबंधित है?
- पूर्वी हिमालय
- पश्चिमी घाट
- सुंदरबन डेल्टा
- थार रेगिस्तान
उत्तर: पश्चिमी घाट — कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित है। इसे माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट की समीक्षा के लिए गठित किया गया था।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के सीमांकन से जुड़े विवादों की आलोचनात्मक जांच कीजिए। इस संदर्भ में, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संघवाद के सिद्धांतों को कैसे संतुलित किया जा सकता है, चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. **परिचय:** पश्चिमी घाट का महत्व (जैव विविधता हॉटस्पॉट, यूनेस्को स्थल) और ESA की अवधारणा का संक्षिप्त परिचय। कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और उसके मुख्य सुझाव।
2. **ESA सीमांकन से जुड़े विवाद:**
* **स्थानीय आजीविका पर प्रभाव:** कृषि, बागवानी और मानव बस्तियों को ESA में शामिल करने पर चिंता।
* **विकास बनाम संरक्षण:** पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आर्थिक विकास के बीच संतुलन की चुनौती।
* **सर्वेक्षण की सटीकता:** रिपोर्ट में ‘कमी’ और भौतिक सर्वेक्षण की आवश्यकता।
* **राज्य सरकारों की आपत्तियां:** कर्नाटक जैसे राज्यों द्वारा ESA क्षेत्र को कम करने की मांग।
* **माधव गाडगिल रिपोर्ट से तुलना:** गाडगिल रिपोर्ट के अधिक कठोर सुझावों और उसके बाद के विरोध का उल्लेख।
3. **संघवाद के सिद्धांतों का संतुलन:**
* **सहकारी संघवाद:** केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श और सहयोग का महत्व।
* **पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986:** केंद्र की विधायी शक्ति और राज्यों की कार्यान्वयन भूमिका।
* **स्थानीय स्वशासन की भूमिका:** ग्राम पंचायत स्तर पर प्रतिनिधियों को शामिल करने का महत्व।
* **समवर्ती सूची:** पर्यावरण संरक्षण समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
* **सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय:** पर्यावरण संरक्षण से संबंधित न्यायिक हस्तक्षेपों का संदर्भ (यदि कोई प्रासंगिक हो)।
4. **आगे का रास्ता/निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता, जिसमें वैज्ञानिक साक्ष्य, स्थानीय हित और सतत विकास के लक्ष्य शामिल हों। भौतिक सर्वेक्षण, जनभागीदारी और केंद्र-राज्य संवाद के माध्यम से आम सहमति बनाने पर जोर।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक विधानमंडल द्वारा केंद्र सरकार को ‘कस्तूरीरंगन रिपोर्ट’ के संदर्भ में ‘इको-सेंसिटिव जोन (ESA)’ को केवल अधिसूचित वन क्षेत्रों तक सीमित रखने का प्रस्ताव पारित करने का मुख्य कारण क्या था?
- A. राज्य के वन अधिकारियों द्वारा ESA के विस्तार का विरोध
- B. राज्य के किसानों एवं आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा
- C. राज्य के पर्यटन उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव
- D. राज्य सरकार द्वारा वन संरक्षण नीति में बदलाव
उत्तर: B. राज्य के किसानों एवं आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा — कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में प्रस्तावित ESA के व्यापक क्षेत्रों से राज्य के किसानों एवं आदिवासी समुदायों के आजीविका एवं भूमि अधिकारों पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को रोकने हेतु विधानमंडल ने केंद्र से ESA को केवल अधिसूचित वन क्षेत्रों तक सीमित रखने का आग्रह किया।
Mains: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में प्रस्तावित ‘इको-सेंसिटिव जोन (ESA)’ के संदर्भ में कर्नाटक सरकार द्वारा केंद्र सरकार को प्रस्तावित संशोधन हेतु विधानमंडल में पारित प्रस्ताव के प्रमुख कारणों एवं इसके राज्य के सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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