19 Sep कर्नाटक सीएम का बड़ा फैसला: पश्चिमी घाट रिपोर्ट पर किसानों को नहीं निकाला जाएगा
✎ कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश करती है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल, पर्यावरण भूगोल) | GS Paper II — शासन (सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप, कमजोर वर्गों का संरक्षण), सामाजिक न्याय (आदिवासी कल्याण) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट, पर्यावरण प्रभाव आकलन), आपदा प्रबंधन
- Prelims: पश्चिमी घाट, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट, माधव गाडगिल रिपोर्ट, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA), वन अधिकार अधिनियम, 2006, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, वन संरक्षण अधिनियम, 1980
- Essay: विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण: एक सतत संतुलन की खोज, स्थानीय समुदायों के अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन
त्वरित पुनरावृत्ति: कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने की सिफारिश करती है, जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने वन विभाग को पश्चिमी घाट में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर पारंपरिक कृषकों को बेदखली नोटिस जारी न करने का निर्देश दिया है। यह निर्णय पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESA) के रूप में प्रस्तावित क्षेत्रों में रहने वाले किसानों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है।
पृष्ठभूमि
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर फैली एक पर्वत श्रृंखला है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों से होकर गुजरती है। यह जैव विविधता के हॉटस्पॉट के रूप में विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।
- पर्यावरण और वन मंत्रालय (Ministry of Environment and Forests) ने पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए सिफारिशें देने हेतु 2010 में माधव गाडगिल की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (Western Ghats Ecology Expert Panel – WGEEP) का गठन किया था।
- गाडगिल समिति ने 2011 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें पश्चिमी घाट के लगभग 75% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट को स्थानीय समुदायों और राज्य सरकारों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि इसमें खनन, उत्खनन और बड़े बांधों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया था।
- गाडगिल रिपोर्ट के विरोध के बाद, मंत्रालय ने 2012 में के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह (High-Level Working Group – HLWG) का गठन किया, जिसका उद्देश्य गाडगिल रिपोर्ट की समीक्षा करना और पश्चिमी घाट के संरक्षण और सतत विकास के लिए एक ‘समग्र’ दृष्टिकोण सुझाना था।
- कस्तूरीरंगन समिति ने 2013 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें पश्चिमी घाट के लगभग 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश की थी। इस रिपोर्ट ने ‘नो-गो’ क्षेत्रों के बजाय ‘रेड’, ‘ऑरेंज’ और ‘ग्रीन’ क्षेत्रों में वर्गीकरण का प्रस्ताव रखा और कुछ विकासात्मक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया।
- केंद्र सरकार ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर पश्चिमी घाट में ESA के लिए एक मसौदा अधिसूचना (Draft Notification) जारी की है, जिस पर विभिन्न राज्य सरकारों और स्थानीय समुदायों से प्रतिक्रियाएं मांगी गई हैं।
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्या हैं?
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखते हुए क्षेत्र के सतत विकास को सुनिश्चित करना था।
- इसने पश्चिमी घाट के कुल भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 37% (लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के रूप में नामित करने की सिफारिश की।
- रिपोर्ट ने ESA के भीतर खनन, उत्खनन, थर्मल पावर प्लांट और अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया।
- इसमें मौजूदा बस्तियों, कृषि क्षेत्रों और बागानों को ESA के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की गई थी, ताकि स्थानीय समुदायों की आजीविका प्रभावित न हो।
- रिपोर्ट ने स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ ग्राम सभाओं (Gram Sabhas) के माध्यम से संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोण का प्रस्ताव रखा।
- ESA की अवधारणा पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 (Environment Protection Act, 1986) के तहत आती है, जो केंद्र सरकार को पर्यावरण की रक्षा और सुधार के लिए उपाय करने का अधिकार देती है।
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) वे क्षेत्र होते हैं जिन्हें उनके उच्च पारिस्थितिक महत्व और जैव विविधता के कारण विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होती है। इन क्षेत्रों में विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित किया जाता है ताकि पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006) वन में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को वन भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें आजीविका, निवास और खेती के अधिकार शामिल हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| कस्तूरीरंगन रिपोर्ट | पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के निर्धारण हेतु सिफारिशें। |
| पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) | पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित क्षेत्र जहाँ विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध होता है। |
| पश्चिमी घाट | जैव विविधता हॉटस्पॉट, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, भारत के पश्चिमी तट के समानांतर पर्वत श्रृंखला। |
| वन अधिकार अधिनियम, 2006 | वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें भूमि अधिकार भी शामिल हैं। |
| पारंपरिक कृषक | वे समुदाय जो पीढ़ियों से वन भूमि पर खेती करते आ रहे हैं। |
महत्व
पर्यावरण संरक्षण
- कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट जैसे महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्रों के संरक्षण के लिए एक ढाँचा प्रदान करती है।
- ESA का निर्धारण नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों को अनियंत्रित विकास से बचाने में मदद करता है।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- ESA अधिसूचना से पारंपरिक कृषकों और वन-निवासी समुदायों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
- सरकार का यह निर्णय स्थानीय समुदायों के हितों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने के महत्व को दर्शाता है।
शासन और नीति निर्माण
- यह मामला केंद्र और राज्य सरकारों के बीच पर्यावरण नीतियों के कार्यान्वयन में समन्वय की आवश्यकता को उजागर करता है।
- जनता के परामर्श और स्थानीय चिंताओं को नीति निर्माण प्रक्रिया में शामिल करने का महत्व स्पष्ट होता है।
चुनौतियाँ
1. पर्यावरण बनाम विकास
- पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है।
- ESA के रूप में अधिसूचित क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं पर प्रतिबंध से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास
2. समुदाय के अधिकार और आजीविका
- पारंपरिक कृषकों को बेदखली नोटिस जारी करने से उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान पर खतरा उत्पन्न होता है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन में चुनौतियाँ, विशेषकर भूमि दावों के सत्यापन में।
यूपीएससी लिंक: आदिवासी अधिकार, सामाजिक न्याय
3. केंद्र-राज्य संबंध
- केंद्र सरकार द्वारा ESA पर मसौदा अधिसूचना जारी करना और राज्य सरकार द्वारा उस पर आपत्ति जताना संघीय ढाँचे में तनाव पैदा कर सकता है।
- पर्यावरण नीतियों के कार्यान्वयन में राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र के नियामक अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
4. सर्वेक्षण और सीमांकन
- ESA क्षेत्रों का सटीक भौतिक सर्वेक्षण और मानव बस्तियों का पहचान करना एक जटिल प्रक्रिया है।
- केरल मॉडल जैसे वैकल्पिक सर्वेक्षण तरीकों पर विचार करना, जो स्थानीय विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल, पर्यावरण प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| ESA अधिसूचना | पारंपरिक कृषकों की बेदखली का डर और आजीविका का नुकसान। |
| वन भूमि पर अतिक्रमण | वन विभाग द्वारा नए अतिक्रमणों को रोकने और पारंपरिक कृषकों को परेशान न करने के बीच संतुलन। |
| वन अधिकार अधिनियम, 2006 | भूमि दावों के लिए 75 वर्ष की आवश्यकता को कम करने की मांग। |
| भौतिक सर्वेक्षण | प्रस्तावित ESA में मानव बस्तियों और खेती वाले क्षेत्रों की सटीक पहचान की आवश्यकता। |
| स्थानीय परामर्श | नीति निर्माण में स्थानीय लोगों की राय और सुझावों को शामिल करने का महत्व। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act, 2006)
आगे की राह
- पारंपरिक कृषकों के अधिकारों की रक्षा करते हुए पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक संरक्षण को सुनिश्चित करना।
- ESA के सीमांकन के लिए एक व्यापक और सहभागी भौतिक सर्वेक्षण आयोजित करना, जिसमें स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाए।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत भूमि दावों के लिए पात्रता मानदंड की समीक्षा करना और इसे अधिक समावेशी बनाना।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करना ताकि पर्यावरण नीतियों का सुचारु कार्यान्वयन हो सके।
- स्थानीय समुदायों की आजीविका के वैकल्पिक साधनों की पहचान करना और उन्हें बढ़ावा देना, यदि उनके पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित होते हैं।
- पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के बीच संतुलन साधने वाली नीतियों का निर्माण करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पश्चिमी घाट · कस्तूरीरंगन रिपोर्ट · पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र · वन अधिकार अधिनियम · पर्यावरण संरक्षण · आदिवासी अधिकार · संघवाद · राज्य-केंद्र संबंध · सतत विकास · पारंपरिक कृषक · जैव विविधता · स्थानीय स्वशासन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्य के बीच विधायी संबंध’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘वन और पर्यावरण समवर्ती सूची में’}
अवधारणा प्रवाह
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की सिफारिशें → पश्चिमी घाट में ESA का मसौदा अधिसूचना → पारंपरिक कृषकों की बेदखली का डर → राज्य सरकार का हस्तक्षेप और निर्देश → वन अधिकार अधिनियम के तहत भूमि दावों की मांग → पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक अधिकारों के बीच संतुलन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट के संरक्षण से संबंधित है।
2. यह रिपोर्ट माधव गाडगिल समिति की सिफारिशों का एक संशोधित रूप है।
3. वन अधिकार अधिनियम, 2006, पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों को मान्यता देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट विशेष रूप से पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए बनाई गई थी। कथन 2 सही है क्योंकि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट वास्तव में माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट की समीक्षा और संशोधन के रूप में प्रस्तुत की गई थी। कथन 3 सही है क्योंकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक वन निवासियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के वन अधिकारों को मान्यता देना है।
Q2. कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के संदर्भ में, ‘पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र’ (Ecologically Sensitive Areas – ESA) शब्द का क्या अर्थ है?
- ऐसे क्षेत्र जहाँ किसी भी प्रकार की मानवीय गतिविधि पूर्णतः प्रतिबंधित है।
- ऐसे क्षेत्र जहाँ केवल पर्यटन गतिविधियों की अनुमति है।
- ऐसे क्षेत्र जो संरक्षित क्षेत्रों (राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य) के 10 किलोमीटर के दायरे में आते हैं और जहाँ कुछ विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित किया जाता है।
- ऐसे क्षेत्र जहाँ केवल कृषि गतिविधियों की अनुमति है।
उत्तर: ऐसे क्षेत्र जो संरक्षित क्षेत्रों (राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य) के 10 किलोमीटर के दायरे में आते हैं और जहाँ कुछ विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित किया जाता है। — पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) वे क्षेत्र होते हैं जो संरक्षित क्षेत्रों (राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य) के आसपास स्थित होते हैं और जहाँ पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ विकासात्मक गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है। इसका उद्देश्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ के रूप में कार्य करना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकीय संरक्षण में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों और सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: पश्चिमी घाट का संक्षिप्त परिचय (जैव विविधता हॉटस्पॉट, भौगोलिक विस्तार) और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का संदर्भ (माधव गाडगिल रिपोर्ट के बाद, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित).
2. कस्तूरीरंगन रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें: पारिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र (ESA) का निर्धारण (37% क्षेत्र), गतिविधियों का वर्गीकरण (लाल, नारंगी, हरा), खनन, थर्मल पावर प्लांट, प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध, स्थानीय समुदायों की भागीदारी.
3. रिपोर्ट की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण:
a. सकारात्मक पक्ष: जैव विविधता संरक्षण में महत्व, पश्चिमी घाट के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा, वैज्ञानिक आधार पर वर्गीकरण.
b. नकारात्मक पक्ष/आलोचना: स्थानीय समुदायों, विशेषकर पारंपरिक कृषकों और आदिवासियों पर संभावित प्रभाव (विस्थापन, आजीविका का नुकसान), विकास परियोजनाओं पर प्रतिबंध से आर्थिक विकास में बाधा, राज्यों के साथ परामर्श की कमी का आरोप, केरल मॉडल जैसे वैकल्पिक सुझावों की अनदेखी.
4. पारंपरिक वनवासियों के अधिकारों और सतत विकास के बीच संतुलन की चुनौतियाँ:
a. आजीविका बनाम संरक्षण: वनवासियों की कृषि, वनोपज पर निर्भरता और संरक्षण कानूनों के बीच टकराव.
b. वन अधिकार अधिनियम, 2006 का कार्यान्वयन: भूमि दावों की प्रक्रिया में देरी, सामुदायिक वन अधिकारों की पहचान में चुनौतियाँ.
c. संघवाद का मुद्दा: केंद्र द्वारा ESA अधिसूचना और राज्य सरकारों की आपत्तियाँ (कर्नाटक के मुख्यमंत्री का हालिया निर्देश), स्थानीय स्वशासन की भूमिका.
d. सतत विकास मॉडल: पारिस्थितिकी पर्यटन, स्थानीय स्तर पर आधारित हरित उद्योगों को बढ़ावा देना, पारंपरिक ज्ञान का उपयोग.
5. निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सतत विकास के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए एक समावेशी और सहभागी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें राज्यों और स्थानीय हितधारकों की सक्रिय भागीदारी हो।
स्रोत: The Hindu
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: कर्नाटक के मुख्यमंत्री द्वारा ‘कस्तूरीरंगन रिपोर्ट’ के संदर्भ में वन विभाग को दिए गए निर्देश के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: <br>1. यह रिपोर्ट पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) द्वारा प्रस्तुत की गई थी। <br>2. मुख्यमंत्री ने वन विभाग को पारंपरिक कृषकों को बेदखली नोटिस जारी न करने का निर्देश दिया है। <br>3. यह निर्देश मुख्य रूप से वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत पारंपरिक वन निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए है। <br>उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 2 और 3 — कथन 1 गलत है क्योंकि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) द्वारा नहीं, बल्कि डॉ. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (HLWG) द्वारा प्रस्तुत की गई थी। कथन 2 और 3 सही हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री ने पारंपरिक कृषकों को बेदखली नोटिस जारी न करने का निर्देश दिया है, जो वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत उनके अधिकारों की रक्षा के लिए है।
Mains: कर्नाटक में ‘कस्तूरीरंगन रिपोर्ट’ के क्रियान्वयन के संबंध में वन विभाग द्वारा उठाए गए कदमों का विश्लेषण कीजिए। पारंपरिक कृषकों के अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई नीतिगत पहलों का मूल्यांकन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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