08 Sep केरल के मथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान में मिला लाइकेन का नया प्रजाति
✎ लाइकेन कवक और शैवाल के बीच एक सहजीवी संबंध हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अक्सर पर्यावरण प्रदूषण के संकेतक के रूप में कार्य करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता | GS Paper III — संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और गिरावट, पर्यावरण प्रभाव आकलन
- Prelims: लाइकेन, मथिकट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान, जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र, सहजीवी संबंध, पर्यावरण संकेतक, पश्चिमी घाट, संरक्षित क्षेत्र
- Essay: जैव विविधता का संरक्षण: वर्तमान चुनौतियाँ और भविष्य की राह, पर्यावरण संतुलन में सूक्ष्मजीवों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: लाइकेन कवक और शैवाल के बीच एक सहजीवी संबंध हैं, जो पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अक्सर पर्यावरण प्रदूषण के संकेतक के रूप में कार्य करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के मथिकट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान (Mathikettan Shola National Park) में लाइकेन (Lichen) की एक नई प्रजाति ‘बुएलिया महाराजाएन्सिस’ (Buellia maharajensis) की खोज की गई है। यह इस राष्ट्रीय उद्यान में खोजी गई लाइकेन की चौथी प्रजाति है, जो इडुक्की के संथानपारा के पास स्थित है। यह खोज महाराजा कॉलेज, एर्नाकुलम के शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा लाइकेन विविधता सर्वेक्षण के दौरान की गई और इसके निष्कर्ष हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘ताइवानिया’ में प्रकाशित हुए हैं।
पृष्ठभूमि
- मथिकट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान केरल के इडुक्की जिले में स्थित है और पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा है।
- यह उद्यान 12.82 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और 21 नवंबर, 2003 को केरल सरकार द्वारा इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था।
- शोला वन (Shola forests) दक्षिण भारत के उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले उष्णकटिबंधीय पर्वतीय वन हैं, जो घास के मैदानों के साथ मिश्रित होते हैं।
- लाइकेन, कवक और शैवाल (या साइनोबैक्टीरिया) के बीच एक सहजीवी संबंध का परिणाम है, जहाँ दोनों जीव एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं।
- शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में लगभग 250 लाइकेन प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया है, जिनमें से लगभग 60 प्रजातियाँ केरल में पहली बार और 15 प्रजातियाँ भारत में पहली बार दर्ज की गई हैं।
- नई खोजी गई प्रजाति ‘बुएलिया महाराजाएन्सिस’ एक सैक्सीकोलस लाइकेन (saxicolous lichen) है, जो सीधे चट्टानों की सतहों पर लगभग 1,351 मीटर की ऊंचाई पर उगती है।
लाइकेन क्या हैं और इनका पारिस्थितिक महत्व क्या है?
- लाइकेन एक अद्वितीय जीव हैं जो कवक (fungus) और शैवाल (algae) या साइनोबैक्टीरिया (cyanobacteria) के बीच एक सहजीवी संबंध (symbiotic relationship) से बनते हैं।
- कवक शैवाल को सुरक्षा और नमी प्रदान करता है, जबकि शैवाल प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) के माध्यम से कवक के लिए भोजन का उत्पादन करता है।
- लाइकेन विभिन्न प्रकार के आवासों में पाए जाते हैं, जिनमें चट्टानें, पेड़ की छाल, मिट्टी और यहाँ तक कि नंगी चट्टानें भी शामिल हैं।
- इन्हें अक्सर ‘प्रदूषण संकेतक’ (pollution indicators) के रूप में जाना जाता है क्योंकि वे वायु प्रदूषण, विशेष रूप से सल्फर डाइऑक्साइड के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। स्वच्छ हवा वाले क्षेत्रों में इनकी प्रचुरता होती है।
- लाइकेन पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे कि मृदा निर्माण में सहायता करना, पोषक तत्वों का चक्रण करना और कई छोटे जीवों के लिए आवास प्रदान करना।
- वे खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, विशेष रूप से आर्कटिक और अल्पाइन क्षेत्रों में, जहाँ वे बारहसिंगा और अन्य शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन का एक प्रमुख स्रोत हैं।
- लाइकेन में विभिन्न औषधीय गुण भी पाए जाते हैं और पारंपरिक चिकित्सा में इनका उपयोग किया जाता रहा है।
- मथिकट्टन शोला जैसे अव्यवस्थित वन पारिस्थितिकी तंत्र (undisturbed forest ecosystems) लाइकेन के विकास और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो जैव विविधता के स्वास्थ्य का संकेत देते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| नई लाइकेन प्रजाति की खोज | केरल के मथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान में ‘बुएलिया महाराजाएन्सिस’ नामक लाइकेन की नई प्रजाति की पहचान। यह पार्क में खोजी गई चौथी लाइकेन प्रजाति है। |
| स्थान और ऊंचाई | यह लाइकेन चट्टानी सतहों (सैक्सिकोलस लाइकेन) पर उगता है और लगभग 1,351 मीटर की ऊंचाई पर पाया गया है। |
| शोध दल | महाराजा कॉलेज, एर्नाकुलम और CSIR-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (NBRI), लखनऊ के शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा खोज। |
| पारिस्थितिक संकेतक | लाइकेन आमतौर पर अव्यवस्थित वन पारिस्थितिकी तंत्रों में पाए जाते हैं, जो स्वस्थ पर्यावरण का संकेत देते हैं। |
| मथिकेट्टन शोला का महत्व | यह राष्ट्रीय उद्यान लाइकेन के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र (हब) के रूप में मान्यता प्राप्त है, जहाँ लगभग 250 लाइकेन प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं। |
| संरक्षण का प्रभाव | पार्क को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने के बाद लाइकेन की वृद्धि में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जो आवास संरक्षण के महत्व को दर्शाता है। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- जैव विविधता संरक्षण: नई प्रजाति की खोज भारत की समृद्ध जैव विविधता को उजागर करती है और इसके संरक्षण के प्रयासों को बल देती है।
- पारिस्थितिक स्वास्थ्य संकेतक: लाइकेन वायु प्रदूषण के प्रति संवेदनशील होते हैं, अतः उनकी उपस्थिति किसी क्षेत्र के स्वच्छ पर्यावरण और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देती है।
- शोला वन पारिस्थितिकी तंत्र का महत्व: मथिकेट्टन शोला जैसे अद्वितीय शोला वन पारिस्थितिकी तंत्रों के महत्व को रेखांकित करता है, जो कई स्थानिक प्रजातियों का घर हैं।
वैज्ञानिक और अनुसंधान
- वर्गीकरण विज्ञान (Taxonomy) में योगदान: यह खोज वर्गीकरण विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो प्रजातियों की पहचान और वर्गीकरण को आगे बढ़ाती है।
- अनुसंधान को प्रोत्साहन: यह खोज भारत में लाइकेन विज्ञान (Lichenology) और वनस्पति विज्ञान (Botany) में आगे के शोध को प्रोत्साहित करती है।
- शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका: महाराजा कॉलेज, एर्नाकुलम जैसे शैक्षणिक संस्थानों की जैव विविधता अनुसंधान में महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
नीति और शासन
- संरक्षित क्षेत्रों की प्रभावशीलता: यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना जैव विविधता के संरक्षण में प्रभावी है।
- पर्यावरण नीति निर्माण: ऐसी खोजें पर्यावरण संरक्षण नीतियों को मजबूत करने और संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों की सुरक्षा के लिए प्रेरित करती हैं।
चुनौतियाँ
1. जैव विविधता का नुकसान
- जलवायु परिवर्तन, आवास विनाश और प्रदूषण के कारण लाइकेन सहित कई प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा।
- अज्ञात प्रजातियों के विलुप्त होने का जोखिम इससे पहले कि उनकी खोज या अध्ययन किया जा सके।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – जैव विविधता का संरक्षण
2. पर्यावास का विखंडन और क्षरण
- मानवीय गतिविधियों जैसे कृषि विस्तार, शहरीकरण और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के कारण प्राकृतिक आवासों का नुकसान।
- यह लाइकेन जैसे संवेदनशील जीवों के लिए आवश्यक ‘अव्यवस्थित वन पारिस्थितिकी तंत्र’ को बाधित करता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
3. प्रदूषण का प्रभाव
- वायु प्रदूषण, विशेष रूप से सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड, लाइकेन के लिए अत्यधिक हानिकारक हैं।
- औद्योगिक और शहरी विकास से उत्पन्न प्रदूषण लाइकेन की वृद्धि और अस्तित्व को खतरे में डालता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी – प्रदूषण और उसका नियंत्रण
4. अनुसंधान और क्षमता निर्माण में कमी
- भारत में लाइकेन विज्ञान जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञता और अनुसंधान सुविधाओं की कमी।
- जैव विविधता के दस्तावेजीकरण और निगरानी के लिए पर्याप्त मानव संसाधन और वित्तीय सहायता का अभाव।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान और प्रौद्योगिकी – अनुसंधान एवं विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अज्ञात प्रजातियों का विलुप्त होना | कई प्रजातियों की खोज होने से पहले ही वे मानवीय गतिविधियों के कारण विलुप्त हो सकती हैं। |
| संरक्षित क्षेत्रों पर दबाव | संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ और अतिक्रमण इन नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों को खतरे में डालते हैं। |
| जलवायु परिवर्तन के प्रभाव | बदलते मौसम पैटर्न और तापमान लाइकेन जैसे संवेदनशील जीवों के वितरण और अस्तित्व को प्रभावित कर सकते हैं। |
| पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता की कमी | जैव विविधता के महत्व और संरक्षण की आवश्यकता के बारे में आम जनता में जागरूकता का अभाव। |
| वैज्ञानिक डेटा का एकीकरण | विभिन्न संस्थानों द्वारा एकत्र किए गए जैव विविधता डेटा को एकीकृत करने और साझा करने में चुनौतियाँ। |
आगे की राह
- जैव विविधता सर्वेक्षण और दस्तावेजीकरण को मजबूत करना, विशेष रूप से कम खोजे गए क्षेत्रों और प्रजाति समूहों पर ध्यान केंद्रित करना।
- संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन और निगरानी को सुनिश्चित करना, ताकि उनके भीतर के आवासों को अव्यवस्थित रखा जा सके।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और प्रदूषण नियंत्रण के लिए कड़े उपाय लागू करना, जो लाइकेन जैसे संवेदनशील जीवों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- लाइकेन विज्ञान और अन्य विशिष्ट जैव विविधता अनुसंधान क्षेत्रों में क्षमता निर्माण, जिसमें शोधकर्ताओं को प्रशिक्षण और पर्याप्त वित्तीय सहायता शामिल है।
- स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण प्रयासों में शामिल करना और उन्हें पारिस्थितिक तंत्र के महत्व के बारे में शिक्षित करना।
- अंतर-संस्थागत सहयोग को बढ़ावा देना, ताकि वैज्ञानिक डेटा और विशेषज्ञता को साझा किया जा सके और एकीकृत संरक्षण रणनीतियाँ विकसित की जा सकें।
- पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से आम जनता में जैव विविधता के महत्व के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
लाइकेन · जैव विविधता · पर्यावरण संकेतक · मैथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान · पश्चिमी घाट · संरक्षित क्षेत्र · पारिस्थितिकी संतुलन · पादप वर्गीकरण · वन पारिस्थितिकी तंत्र · जलवायु परिवर्तन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘राज्य पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का प्रयास करेगा।’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार।’}
अवधारणा प्रवाह
मथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान में लाइकेन की नई प्रजाति की खोज। → लाइकेन की उपस्थिति स्वस्थ और अव्यवस्थित पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देती है। → राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा और संरक्षण प्रयासों ने लाइकेन के विकास को बढ़ावा दिया। → यह खोज जैव विविधता के महत्व और उसके संरक्षण की आवश्यकता को उजागर करती है। → जैव विविधता संरक्षण के लिए प्रभावी नीतियों और अनुसंधान को मजबूत करने की आवश्यकता। → स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र मानव कल्याण और सतत विकास के लिए आवश्यक।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. लाइकेन शैवाल और कवक के बीच एक सहजीवी संबंध का परिणाम हैं।
2. लाइकेन वायु प्रदूषण के अच्छे संकेतक माने जाते हैं।
3. भारत में लाइकेन की सबसे अधिक विविधता पश्चिमी घाट में पाई जाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। लाइकेन शैवाल (या साइनोबैक्टीरिया) और कवक के बीच एक सहजीवी संबंध है, जहाँ दोनों एक-दूसरे को लाभ पहुँचाते हैं। कथन 2 सही है। लाइकेन वायु प्रदूषण, विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, इसलिए उन्हें पर्यावरण संकेतक के रूप में उपयोग किया जाता है। कथन 3 गलत है। भारत में लाइकेन की सबसे अधिक विविधता हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाती है, न कि पश्चिमी घाट में।
Q2. मैथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान किस राज्य में स्थित है?
- कर्नाटक
- केरल
- तमिलनाडु
- आंध्र प्रदेश
उत्तर: केरल — मैथिकेट्टन शोला राष्ट्रीय उद्यान केरल राज्य के इडुक्की जिले में स्थित है। यह पश्चिमी घाट के महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में से एक है।
Q3. अभिकथन (A): लाइकेन अव्यवस्थित वन पारिस्थितिकी तंत्रों में पनपते हैं।
कारण (R): संरक्षित क्षेत्रों में लाइकेन की वृद्धि में उल्लेखनीय विस्तार देखा गया है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। लाइकेन आमतौर पर उन वन पारिस्थितिकी तंत्रों में पाए जाते हैं जहाँ मानवीय हस्तक्षेप कम होता है। कारण (R) भी सही है। मैथिकेट्टन शोला जैसे संरक्षित क्षेत्रों में लाइकेन की वृद्धि में वृद्धि देखी गई है क्योंकि ये क्षेत्र उनके लिए अनुकूल, अव्यवस्थित आवास प्रदान करते हैं। इस प्रकार, कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ लाइकेन के पारिस्थितिक महत्व पर चर्चा कीजिए और भारत में जैव विविधता संरक्षण में राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** लाइकेन की संक्षिप्त परिभाषा (शैवाल और कवक का सहजीवी संबंध) और उनके महत्व का उल्लेख।
2. **लाइकेन का पारिस्थितिक महत्व:**
* **पर्यावरण संकेतक:** वायु प्रदूषण (विशेषकर सल्फर डाइऑक्साइड) के प्रति संवेदनशीलता।
* **पायनियर प्रजातियाँ:** नंगे चट्टानों पर उगकर मृदा निर्माण में भूमिका।
* **खाद्य स्रोत:** आर्कटिक और अल्पाइन क्षेत्रों में कुछ जीवों के लिए भोजन।
* **नाइट्रोजन स्थिरीकरण:** कुछ लाइकेन में साइनोबैक्टीरिया द्वारा नाइट्रोजन स्थिरीकरण।
* **जैव विविधता का हिस्सा:** पारिस्थितिकी तंत्र की समग्र स्वास्थ्य का सूचक।
3. **भारत में जैव विविधता संरक्षण में राष्ट्रीय उद्यानों की भूमिका:**
* **स्व-स्थाने संरक्षण (In-situ conservation):** प्राकृतिक आवासों में प्रजातियों का संरक्षण।
* **महत्वपूर्ण आवासों का संरक्षण:** लुप्तप्राय प्रजातियों और अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्रों (जैसे शोला वन) की रक्षा।
* **वैज्ञानिक अनुसंधान:** जैव विविधता अध्ययन और नई प्रजातियों की खोज के लिए प्रयोगशालाएँ (मैथिकेट्टन शोला में लाइकेन की खोज का उदाहरण)।
* **पारिस्थितिकी संतुलन:** जल चक्र, मृदा संरक्षण और जलवायु विनियमन में योगदान।
* **जन जागरूकता:** पर्यावरण शिक्षा और संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
* **कानूनी ढाँचा:** वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत कानूनी सुरक्षा।
4. **चुनौतियाँ और आगे की राह:** मानव-वन्यजीव संघर्ष, अतिक्रमण, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, अपर्याप्त प्रबंधन। संरक्षण प्रयासों को मजबूत करने के उपाय।
5. **निष्कर्ष:** लाइकेन और राष्ट्रीय उद्यानों के महत्व को रेखांकित करते हुए जैव विविधता संरक्षण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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