27 Jul गडकरी बनाम मेटा, एक्स: बॉम्बे हाईकोर्ट ने AI डीपफेक पर दी सजा की अनुमति
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: सूचना प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा
- Prelims: डीपफेक, मानहानि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, व्यक्तित्व अधिकार, E20 पहल, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय
- Essay: डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों का संतुलन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के नैतिक और कानूनी निहितार्थ
त्वरित पुनरावृत्ति: बॉम्बे उच्च न्यायालय ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को AI-जनित डीपफेक और मानहानिकारक सामग्री के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति दी है, जो डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता को उजागर करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने मेटा, एक्स कॉर्प और गूगल एलएलसी जैसी कंपनियों के खिलाफ मानहानिकारक AI-जनित डीपफेक वीडियो और हेरफेर की गई डिजिटल सामग्री को लेकर दीवानी मुकदमा दायर करने की अनुमति दी है। यह सामग्री उन्हें इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम और E20 पहल से गलत तरीके से जोड़ती है, जबकि ये कार्यक्रम पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा प्रशासित किए जाते हैं। इस निर्णय ने डीपफेक सामग्री से निपटने और ऑनलाइन मानहानि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के महत्व को रेखांकित किया है।
पृष्ठभूमि
- नितिन गडकरी ने अपनी याचिका में कहा है कि उनका मुकदमा सार्वजनिक चर्चा या सरकारी नीतियों की आलोचना को रोकने के लिए नहीं है, बल्कि उस सामग्री को हटाने के लिए है जो ‘स्पष्ट रूप से झूठी, मनगढ़ंत, दुर्भावनापूर्ण, अपमानजनक और घोर मानहानिकारक’ है।
- याचिका में कहा गया है कि डीपफेक वीडियो गडकरी के व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों (Personality and Publicity Rights) का उनकी सहमति के बिना अनधिकृत उपयोग करते हैं।
- मंत्री ने आरोप लगाया है कि कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने ऐसी पोस्ट और डीपफेक सामग्री प्रसारित की है, जिसमें उन्हें EBP और E20 पहलों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है और यह भी आरोप लगाया गया है कि उन्हें और उनके परिवार को इससे वित्तीय लाभ हुआ है।
- E20 पहल 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के उपयोग से संबंधित है, जिसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना और पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करना है। यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के दायरे में आता है।
- उच्च न्यायालय ने अंतरिम राहत, जिसमें अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction) भी शामिल है, के लिए उनके आवेदन पर बाद की तारीख में सुनवाई करेगा।
डीपफेक और मानहानि क्या है?
- डीपफेक (Deepfake) कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके बनाई गई ऐसी वीडियो या ऑडियो सामग्री है जिसमें किसी व्यक्ति के चेहरे या आवाज को किसी अन्य व्यक्ति के शरीर या आवाज पर इस तरह से आरोपित किया जाता है कि वह वास्तविक लगे।
- यह तकनीक अक्सर मौजूदा वीडियो, छवियों या ऑडियो को जोड़-तोड़ कर नई, भ्रामक सामग्री बनाने के लिए उपयोग की जाती है।
- डीपफेक का उपयोग दुष्प्रचार, गलत सूचना फैलाने, मानहानि करने या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने के लिए किया जा सकता है।
- मानहानि (Defamation) किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला कोई भी मौखिक या लिखित बयान है जो झूठा हो और जानबूझकर या लापरवाही से प्रकाशित किया गया हो।
- भारत में मानहानि दीवानी (Civil) और आपराधिक (Criminal) दोनों तरह का अपराध हो सकता है। दीवानी मानहानि में क्षतिपूर्ति (Damages) की मांग की जा सकती है, जबकि आपराधिक मानहानि में कारावास का प्रावधान है।
- भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 499 मानहानि को परिभाषित करती है और धारा 500 इसके लिए दंड का प्रावधान करती है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह असीमित नहीं है और इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जैसे मानहानि के आधार पर।
- व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) किसी व्यक्ति के नाम, छवि, आवाज और अन्य पहचान योग्य विशेषताओं के व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करने का अधिकार है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| डीपफेक (Deepfake) सामग्री | कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग करके बनाई गई भ्रामक वीडियो या ऑडियो सामग्री, जो किसी व्यक्ति को कुछ ऐसा कहते या करते हुए दिखाती है जो उसने वास्तव में नहीं किया है। |
| मानहानि (Defamation) का मुकदमा | किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाले झूठे बयानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई। |
| व्यक्तित्व अधिकार (Personality Rights) | किसी व्यक्ति के नाम, छवि और अन्य पहचान योग्य विशेषताओं के व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करने का अधिकार। |
| प्रचार अधिकार (Publicity Rights) | किसी व्यक्ति की पहचान के व्यावसायिक शोषण को नियंत्रित करने का अधिकार, विशेषकर सार्वजनिक हस्तियों के लिए। |
| E20 पहल | पेट्रोल में 20% इथेनॉल (Ethanol) मिश्रण का लक्ष्य, जिसका प्रशासन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय करता है। |
| मध्यस्थ (Intermediary) की भूमिका | मेटा (Meta), एक्स (X) और गूगल (Google) जैसे प्लेटफॉर्म जो उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा की गई सामग्री को होस्ट करते हैं। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- डीपफेक सामग्री समाज में गलत सूचना और दुष्प्रचार (Misinformation and Disinformation) के प्रसार को बढ़ावा देती है, जिससे सार्वजनिक बहस की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
- यह सार्वजनिक हस्तियों की प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है और उनके व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक जीवन को प्रभावित कर सकती है।
- नागरिकों के बीच अविश्वास और भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है, जिससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है।
कानूनी और नियामक महत्व
- यह मामला डीपफेक और एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए मौजूदा कानूनों की पर्याप्तता पर सवाल उठाता है।
- यह मध्यस्थों (Intermediaries) की जवाबदेही और सामग्री को हटाने की उनकी जिम्मेदारी पर प्रकाश डालता है।
- यह व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों के संरक्षण के महत्व को रेखांकित करता है, विशेषकर डिजिटल युग में।
तकनीकी महत्व
- एआई प्रौद्योगिकियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत तकनीकी समाधानों की आवश्यकता को दर्शाता है।
- डीपफेक सामग्री का पता लगाने और उसे हटाने के लिए एआई-आधारित उपकरणों के विकास को प्रोत्साहित करता है।
- एआई के नैतिक उपयोग और इसके संभावित नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर बल देता है।
शासन और सार्वजनिक जीवन में महत्व
- यह मामला सार्वजनिक कार्यालय धारकों की प्रतिष्ठा की सुरक्षा और उनके खिलाफ निराधार आरोपों को रोकने के महत्व पर जोर देता है।
- यह सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के बारे में सटीक जानकारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता को उजागर करता है।
- यह राजनीतिक विमर्श में सत्यनिष्ठा बनाए रखने और दुर्भावनापूर्ण प्रचार का मुकाबला करने की चुनौती प्रस्तुत करता है।
चुनौतियाँ
1. डीपफेक सामग्री की पहचान और नियंत्रण
- एआई-जनित डीपफेक सामग्री को वास्तविक सामग्री से अलग करना तेजी से मुश्किल होता जा रहा है।
- तेजी से फैलने वाली डीपफेक सामग्री को समय पर पहचानना और हटाना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – सूचना प्रौद्योगिकी
2. मध्यस्थों की जवाबदेही
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड की गई सामग्री के लिए उनकी जवाबदेही की सीमा निर्धारित करना जटिल है।
- सामग्री को हटाने के लिए कानूनी आदेशों का पालन सुनिश्चित करना और उनकी प्रभावशीलता की निगरानी करना।
यूपीएससी लिंक: शासन – ई-गवर्नेंस
3. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा का अधिकार
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Expression) और किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा के अधिकार (Right to Reputation) के बीच संतुलन स्थापित करना।
- वास्तविक आलोचना और दुर्भावनापूर्ण मानहानि के बीच अंतर करना।
यूपीएससी लिंक: संविधान – मौलिक अधिकार
4. कानूनी ढाँचे की पर्याप्तता
- डीपफेक और एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों की पर्याप्तता।
- डिजिटल युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए कानूनों में संशोधन या नए कानून बनाने की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: शासन – कानून और नीतियां
5. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
- डीपफेक सामग्री अक्सर विभिन्न देशों से उत्पन्न होती है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और समन्वय की आवश्यकता होती है।
- सीमा पार दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए वैश्विक मानकों और प्रोटोकॉल का अभाव।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध – वैश्विक समूह
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| डीपफेक का तेजी से प्रसार | गलत सूचना और दुष्प्रचार के कारण सार्वजनिक राय का हेरफेर। |
| कानूनी प्रवर्तन में देरी | डीपफेक सामग्री के कारण होने वाले नुकसान को रोकने में अदालती प्रक्रियाओं की धीमी गति। |
| तकनीकी समाधानों का अभाव | डीपफेक का पता लगाने और उसे हटाने के लिए प्रभावी एआई-आधारित उपकरणों की सीमित उपलब्धता। |
| मध्यस्थों का सीमित नियंत्रण | प्लेटफॉर्म पर अपलोड की गई विशाल सामग्री को नियंत्रित करने में उनकी अक्षमता। |
| व्यक्तित्व अधिकारों का उल्लंघन | सार्वजनिक हस्तियों की छवि और प्रतिष्ठा का अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग। |
| सार्वजनिक विश्वास का क्षरण | गलत सूचना के कारण संस्थानों और व्यक्तियों पर लोगों के विश्वास में कमी। |
आगे की राह
- डीपफेक सामग्री की पहचान और सत्यापन के लिए एआई-आधारित तकनीकों में निवेश को बढ़ावा देना।
- सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए सामग्री हटाने और उपयोगकर्ता की शिकायतों पर कार्रवाई करने हेतु स्पष्ट दिशानिर्देश और समय-सीमा निर्धारित करना।
- डीपफेक के खतरों और ऑनलाइन सामग्री की आलोचनात्मक सोच के बारे में सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाना।
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 जैसे मौजूदा कानूनों को मजबूत करना और डीपफेक से निपटने के लिए विशिष्ट प्रावधान शामिल करना।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना ताकि सीमा पार डीपफेक अभियानों का प्रभावी ढंग से मुकाबला किया जा सके।
- व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा विकसित करना, विशेषकर डिजिटल क्षेत्र में।
- न्यायिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना ताकि डीपफेक से संबंधित मामलों में त्वरित अंतरिम राहत प्रदान की जा सके।
- एआई के नैतिक विकास और उपयोग के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति तैयार करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
डीपफेक · कृत्रिम बुद्धिमत्ता · मानहानि · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · निजता का अधिकार · सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम · मध्यस्थ दिशानिर्देश · ई20 पहल · डिजिटल सामग्री · व्यक्तित्व अधिकार · प्रचार अधिकार · बॉम्बे उच्च न्यायालय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 19(1)(a)’, ‘note’: ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘गरिमा और प्रतिष्ठा का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
एआई का दुरुपयोग → डीपफेक सामग्री का निर्माण → गलत सूचना का प्रसार → व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान → कानूनी कार्रवाई और न्यायिक हस्तक्षेप → मध्यस्थों की जवाबदेही का निर्धारण → भविष्य के लिए नियामक ढाँचे का विकास
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. डीपफेक ऐसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता-जनित सामग्री है जो किसी व्यक्ति की छवि या आवाज को यथार्थवादी रूप से हेरफेर करती है।
2. भारत में डीपफेक से निपटने के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत कुछ प्रावधान लागू हो सकते हैं।
3. ई20 पहल का संबंध इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम से है, जिसका प्रशासन सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 2
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। डीपफेक कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके बनाई गई हेरफेर की गई सामग्री है। कथन 2 सही है। भारत में डीपफेक के लिए कोई विशिष्ट कानून नहीं है, लेकिन IT अधिनियम, 2000 के तहत मध्यस्थों की देयता और आपत्तिजनक सामग्री से संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं। कथन 3 गलत है। ई20 पहल का प्रशासन पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा किया जाता है, न कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा।
Q2. भारत में ‘व्यक्तित्व अधिकार’ (Personality Rights) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- यह केवल सार्वजनिक हस्तियों के लिए उपलब्ध एक संवैधानिक अधिकार है।
- यह किसी व्यक्ति के नाम, छवि या अन्य विशिष्ट पहचानकर्ताओं के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करता है।
- यह केवल कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत संरक्षित है।
- यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का एक उपसमूह है।
उत्तर: यह किसी व्यक्ति के नाम, छवि या अन्य विशिष्ट पहचानकर्ताओं के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करता है। — व्यक्तित्व अधिकार किसी व्यक्ति के नाम, छवि, आवाज या अन्य विशिष्ट पहचानकर्ताओं के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग को नियंत्रित करते हैं। यह एक कानूनी अवधारणा है जो व्यक्तियों को अपनी पहचान के व्यावसायिक शोषण से बचाती है। यह संवैधानिक अधिकार नहीं है और न ही केवल कॉपीराइट अधिनियम के तहत संरक्षित है, बल्कि विभिन्न कानूनों और न्यायिक निर्णयों के माध्यम से मान्यता प्राप्त है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ डीपफेक तकनीक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच एक जटिल संतुलन प्रस्तुत करती है। भारत में डीपफेक के बढ़ते खतरे के आलोक में, इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और डीपफेक से निपटने के लिए नियामक और तकनीकी उपायों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में डीपफेक के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के बीच के तनाव को स्पष्ट करें। बताएं कि कैसे डीपफेक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर सकता है और व्यक्तियों की निजता और प्रतिष्ठा का उल्लंघन कर सकता है। दूसरे भाग में, भारत में डीपफेक से निपटने के लिए मौजूदा कानूनी ढांचे (जैसे IT अधिनियम, 2000 और मध्यस्थ दिशानिर्देश) और उनकी सीमाओं पर चर्चा करें। अंत में, तकनीकी समाधानों (जैसे AI डिटेक्शन टूल) और नियामक उपायों (जैसे विशिष्ट कानून, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही बढ़ाना, जागरूकता अभियान) का सुझाव दें।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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