27 Sep चीन ने बताया युद्धोत्तर वैश्विक व्यवस्था को बचाने का तरीका, UNGA में रखा पक्ष
✎ युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित वैश्विक ढांचा है, जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग को बनाए रखना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, एजेंसियां और मंच, उनकी संरचना, अधिदेश और कार्यप्रणाली। | GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध: विकसित और विकासशील देशों की नीतियों और राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव।
- Prelims: संयुक्त राष्ट्र (UN), संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly), सुरक्षा परिषद (Security Council), बहुपक्षवाद (Multilateralism), युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था (Postwar International Order), वैश्विक दक्षिण (Global South)
- Essay: बदलती वैश्विक व्यवस्था में बहुपक्षवाद की प्रासंगिकता और चुनौतियाँ।, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में प्रमुख शक्तियों की भूमिका।
त्वरित पुनरावृत्ति: युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित वैश्विक ढांचा है, जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग को बनाए रखना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने का आग्रह किया। उन्होंने भू-राजनीतिक संघर्षों, बढ़ते विकास अंतरालों और वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में बहुपक्षवाद की तात्कालिकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का उल्लंघन करने वाली एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों के बजाय संवाद के माध्यम से विवादों का निपटारा किया जाना चाहिए।
पृष्ठभूमि
- द्वितीय विश्व युद्ध (World War II) के बाद, अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी।
- संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था युद्धोपरांत वैश्विक स्थिरता का आधार बनी।
- हाल के वर्षों में, यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व में तनाव और अन्य भू-राजनीतिक विवादों ने इस व्यवस्था की चुनौतियों को बढ़ाया है।
- चीन जैसे बड़े देश अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में विशेष जिम्मेदारी निभाते हैं, और उनसे नियमों का पालन करने और कानून के शासन को बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है।
- वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की आवाज को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र में सुधार की मांग लगातार उठ रही है।
- संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 2758 (General Assembly resolution 2758) ने 25 अक्टूबर 1971 को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार को संयुक्त राष्ट्र में चीन के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी थी।
युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था क्या है?
- युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था से तात्पर्य द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा ढांचे से है।
- इस व्यवस्था का केंद्र संयुक्त राष्ट्र है, जिसे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने, राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध विकसित करने और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था।
- यह व्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय कानून, संधियों और समझौतों पर आधारित है, जिसका उद्देश्य संप्रभुता का सम्मान करना, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना और बल के प्रयोग से बचना है।
- सुरक्षा परिषद (Security Council) संयुक्त राष्ट्र का एक प्रमुख अंग है, जिसके पास अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके पांच स्थायी सदस्य (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) हैं जिनके पास वीटो शक्ति है।
- इस व्यवस्था ने वैश्विक व्यापार, विकास और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसमें WTO (विश्व व्यापार संगठन) जैसे संस्थान आर्थिक सहयोग को सुविधाजनक बनाते हैं।
- हाल के दशकों में, इस व्यवस्था को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिनमें आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा और प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा शामिल है।
- बहुपक्षवाद (Multilateralism) इस व्यवस्था का एक मुख्य सिद्धांत है, जिसमें कई देश साझा समस्याओं को हल करने और सामूहिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करते हैं।
- यह व्यवस्था ‘वैश्विक दक्षिण’ के देशों की बढ़ती भूमिका और आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए सुधारों की मांग का भी सामना कर रही है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| युद्धोपरांत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का संरक्षण | यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित संयुक्त राष्ट्र-केंद्रित प्रणाली और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था को बनाए रखने का आह्वान करता है, जो वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। |
| बहुपक्षवाद का समर्थन | भू-राजनीतिक संघर्षों और बढ़ती वैश्विक चुनौतियों के बीच बहुपक्षवाद (Multilateralism) को पहले से कहीं अधिक आवश्यक बताया गया है, जो वैश्विक सहयोग और सामूहिक समाधानों पर जोर देता है। |
| संवाद के माध्यम से विवादों का निपटारा | संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) का उल्लंघन करने वाली एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों के बजाय संवाद के माध्यम से विवादों को सुलझाने की वकालत की गई है, जो संघर्ष समाधान के शांतिपूर्ण तरीकों को बढ़ावा देता है। |
| प्रमुख देशों की जिम्मेदारी | प्रमुख देशों को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने में विशेष जिम्मेदारी निभाने और नियमों का पालन करने का आह्वान किया गया है, जिससे वैश्विक स्थिरता सुनिश्चित हो सके। |
| विकास अंतराल को कम करना | गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण को प्राथमिकता देते हुए एक संतुलित और समावेशी वैश्विक साझेदारी का आह्वान किया गया है, जिससे विकासशील देशों को लाभ मिल सके। |
| AI का जन-केंद्रित विकास | कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए विकसित करने, डिजिटल विभाजन को कम करने और सार्वभौमिक रूप से लाभकारी विकास को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। |
महत्व
भू-राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व
- यह बयान चीन की वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका और बहुपक्षवाद के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अंतर्राष्ट्रीय संबंध तनावपूर्ण हैं।
- यह संयुक्त राष्ट्र (UN) और अंतर्राष्ट्रीय कानून की केंद्रीयता पर जोर देता है, जो वैश्विक शासन और विवाद समाधान के लिए एक महत्वपूर्ण ढाँचा प्रदान करता है।
- मध्य पूर्व, यूक्रेन और क्यूबा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट मुद्दों पर चीन की स्थिति को स्पष्ट करता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता और संप्रभुता के सम्मान पर जोर देता है।
आर्थिक और विकास संबंधी महत्व
- यह विकासशील देशों के लिए गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने का आह्वान करता है, जो वैश्विक असमानताओं को कम करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- विकसित देशों से वित्तीय और जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने का आग्रह किया गया है, जो सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) को प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
- संरक्षणवाद (Protectionism) का विरोध और WTO-केंद्रित व्यापार प्रणाली का समर्थन वैश्विक मुक्त व्यापार और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
तकनीकी और सामाजिक महत्व
- AI के जन-केंद्रित विकास और डिजिटल विभाजन को कम करने पर जोर भविष्य की तकनीकी प्रगति को समावेशी और न्यायसंगत बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विविधता के सम्मान पर जोर विभिन्न सभ्यताओं के बीच समझ और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है।
भारत के लिए निहितार्थ
- भारत भी बहुपक्षवाद और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था का समर्थक रहा है, जिससे इस मुद्दे पर भारत और चीन के बीच कुछ हद तक वैचारिक समानता दिखती है।
- विकासशील देशों (Global South) की आवाज को मजबूत करने और संयुक्त राष्ट्र सुधारों की वकालत भारत के हितों के अनुरूप है, क्योंकि भारत भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता का आकांक्षी है।
- वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने के आह्वान, विशेषकर संवाद के माध्यम से विवादों को सुलझाने पर जोर, भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों के साथ मेल खाता है।
चुनौतियाँ
1. अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन
- कुछ प्रमुख शक्तियाँ संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए एकतरफा सैन्य कार्रवाइयाँ करती हैं, जिससे वैश्विक व्यवस्था कमजोर होती है।
- सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना की गई कार्रवाइयाँ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में अस्थिरता और अविश्वास पैदा करती हैं।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, वैश्विक शासन
2. भू-राजनीतिक संघर्ष और ध्रुवीकरण
- दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्ष और विभिन्न गुटों के बीच ध्रुवीकरण बहुपक्षीय सहयोग को बाधित करता है।
- यह संघर्ष समाधान के प्रयासों को जटिल बनाता है और वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा, संघर्ष समाधान
3. विकास अंतराल और असमानताएँ
- विकसित और विकासशील देशों के बीच बढ़ता विकास अंतराल, विशेषकर गरीबी, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण के क्षेत्रों में, वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौती है।
- विकसित देशों द्वारा वित्तीय और जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं को पूरा न करना इन अंतरालों को और बढ़ाता है।
यूपीएससी लिंक: सतत विकास, वैश्विक अर्थव्यवस्था
4. संरक्षणवाद और व्यापार युद्ध
- कुछ देशों द्वारा संरक्षणवादी नीतियों को अपनाना और WTO-केंद्रित व्यापार प्रणाली को कमजोर करना वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास को बाधित करता है।
- यह अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग को कम करता है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित करता है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, आर्थिक नीतियाँ
5. संयुक्त राष्ट्र सुधारों की आवश्यकता
- संयुक्त राष्ट्र के निकायों और अधिदेशों को मजबूत करने तथा ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि यह समकालीन वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।
- सुधारों की धीमी गति और सदस्य देशों के बीच आम सहमति की कमी एक चुनौती बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संगठन, संयुक्त राष्ट्र सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लंघन | द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय कानून की अवहेलना वैश्विक स्थिरता को खतरे में डालती है। |
| एकतरफा सैन्य कार्रवाइयाँ | संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन करने वाली और सुरक्षा परिषद की मंजूरी के बिना की गई सैन्य कार्रवाइयाँ संघर्षों को बढ़ाती हैं। |
| विकासशील देशों की उपेक्षा | गरीबी, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण जैसे मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान न देना और विकसित देशों द्वारा प्रतिबद्धताओं का सम्मान न करना वैश्विक असमानताओं को बढ़ाता है। |
| संरक्षणवाद का उदय | संरक्षणवादी नीतियाँ और WTO-केंद्रित प्रणाली को कमजोर करना वैश्विक व्यापार और आर्थिक सहयोग को बाधित करता है। |
| संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व का असंतुलन | संयुक्त राष्ट्र के निकायों में ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व वैश्विक शासन में असंतुलन पैदा करता है। |
आगे की राह
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए, जिसमें सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता शामिल हो।
- विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी जाए, और एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों से बचा जाए।
- बहुपक्षीय संस्थानों, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र को मजबूत किया जाए, ताकि वे समकालीन वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकें।
- विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संक्रमण पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- विकसित देशों को अपनी वित्तीय और जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं का सम्मान करना चाहिए, ताकि सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद मिल सके।
- WTO-केंद्रित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को बनाए रखा जाए और संरक्षणवाद का विरोध किया जाए, ताकि मुक्त और निष्पक्ष वैश्विक व्यापार को बढ़ावा मिल सके।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों का विकास जन-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ किया जाए, ताकि डिजिटल विभाजन को कम किया जा सके और सार्वभौमिक रूप से लाभकारी विकास सुनिश्चित हो सके।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित संयुक्त राष्ट्र के निकायों में सुधार किए जाएं, ताकि ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज को बढ़ाया जा सके और संगठन को अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी बनाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संयुक्त राष्ट्र (UN) · बहुपक्षवाद (Multilateralism) · अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था (International Order) · संयुक्त राष्ट्र चार्टर (UN Charter) · शांति और सुरक्षा (Peace and Security) · विकासशील देश (Global South) · सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals) · जलवायु वित्त (Climate Finance) · विश्व व्यापार संगठन (WTO) · कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) · संवाद और कूटनीति (Dialogue and Diplomacy) · अंतर्राष्ट्रीय कानून (International Law)
अवधारणा प्रवाह
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का उदय → संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय कानून पर आधारित व्यवस्था का निर्माण → भू-राजनीतिक संघर्षों और वैश्विक चुनौतियों का बढ़ना → बहुपक्षवाद और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता → शांति, सुरक्षा और विकास के लिए वैश्विक प्रयासों पर जोर
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) संयुक्त राष्ट्र का मुख्य विचार-विमर्श, नीति-निर्माण और प्रतिनिधि अंग है।
2. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) के स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति होती है।
3. संयुक्त राष्ट्र चार्टर अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को संहिताबद्ध करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा वास्तव में संयुक्त राष्ट्र का मुख्य विचार-विमर्श, नीति-निर्माण और प्रतिनिधि अंग है। कथन 2 सही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका) के पास वीटो शक्ति है। कथन 3 सही है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर एक संस्थापक संधि है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को संहिताबद्ध करती है, जिसमें राज्यों के बीच संबंध, संप्रभु समानता और बल के प्रयोग पर प्रतिबंध शामिल हैं।
Q2. अभिकथन (A): बहुपक्षवाद (Multilateralism) अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में सहयोग और समन्वय का एक दृष्टिकोण है।
कारण (R): यह वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और साझा हितों को बढ़ावा देने के लिए कई देशों के बीच सहयोग पर जोर देता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि बहुपक्षवाद वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में सहयोग और समन्वय का एक दृष्टिकोण है। कारण (R) भी सही है और अभिकथन की सही व्याख्या करता है, क्योंकि बहुपक्षवाद का मूल उद्देश्य वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने और साझा हितों को बढ़ावा देने के लिए कई देशों के बीच सहयोग स्थापित करना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण करें। साथ ही, वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में बहुपक्षवाद के महत्व पर भी चर्चा करें। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की संक्षिप्त परिभाषा से करें, जिसमें संयुक्त राष्ट्र की स्थापना और उसके सिद्धांतों का उल्लेख हो। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रमुख प्रावधानों (जैसे अनुच्छेद 1 और 2) और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका का विश्लेषण करें। शांति स्थापना, मानवाधिकारों की रक्षा, सतत विकास को बढ़ावा देने और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में इसकी सफलताओं और सीमाओं दोनों पर प्रकाश डालें। दूसरे भाग में, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, महामारी और आर्थिक असमानता जैसी समकालीन वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में बहुपक्षवाद के महत्व पर चर्चा करें। इसमें विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (जैसे WTO, WHO) की भूमिका और विकसित तथा विकासशील देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर जोर दें। निष्कर्ष में, एक मजबूत, समावेशी और न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए बहुपक्षवाद को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: news.un.org
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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