05 Sep छत्तीसगढ़ विधानसभा में 14 मंत्रियों की नियुक्ति पर हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू, जानिए संवैधानिक सीमा और विवाद
✎ अनुच्छेद 164(1क) राज्य मंत्रिपरिषद के आकार को विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित करता है, जो 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा स्थापित किया गया था।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद, शक्तियों का पृथक्करण | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
- Prelims: अनुच्छेद 164(1क), मंत्रिपरिषद का आकार, 91वां संविधान संशोधन अधिनियम, राज्य विधानसभा, उच्च न्यायालय, राज्यपाल
- Essay: संघवाद और संवैधानिक नैतिकता, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: अनुच्छेद 164(1क) राज्य मंत्रिपरिषद के आकार को विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित करता है, जो 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा स्थापित किया गया था।
यह खबर चर्चा में क्यों?
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में राज्य मंत्रिपरिषद में 14वें मंत्री की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई फिर से शुरू हो गई है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि 90 सदस्यीय विधानसभा के आधार पर, 14 मंत्रियों की नियुक्ति संवैधानिक रूप से निर्धारित 15 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन करती है, जो अनुच्छेद 164(1क) के तहत निर्धारित है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(1क) में प्रावधान है कि किसी राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
- यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन अधिनियम (91st Constitutional Amendment Act), 2003 द्वारा जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य बड़े आकार की मंत्रिमंडलों को रोकना और सरकारी खर्च को नियंत्रित करना था।
- छत्तीसगढ़ विधानसभा में कुल 90 सदस्य हैं। इस आधार पर, राज्य में मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 90 का 15 प्रतिशत, यानी 13.5 होनी चाहिए, जिसे पूर्णांक में 13 माना जाता है।
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि 14वें मंत्री की नियुक्ति इस संवैधानिक सीमा का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह 13 की अधिकतम संख्या से अधिक है।
- इस मामले में पहले सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में एक समान संवैधानिक मुद्दे से संबंधित कार्यवाही लंबित होने के कारण उच्च न्यायालय में सुनवाई रोक दी गई थी, लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय में वह मामला समाप्त होने के बाद सुनवाई फिर से शुरू हुई है।
अनुच्छेद 164(1क) और मंत्रिपरिषद का आकार
- अनुच्छेद 164(1क) भारतीय संविधान का एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो राज्य स्तर पर मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है।
- यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था।
- इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक अस्थिरता को कम करना और ‘आया राम गया राम’ की राजनीति पर अंकुश लगाना था, जहां विधायकों को मंत्री पद का लालच देकर दल-बदल के लिए प्रेरित किया जाता था।
- यह प्रावधान केंद्र सरकार के लिए भी अनुच्छेद 75(1क) के तहत समान सीमा निर्धारित करता है, जिसमें लोकसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक मंत्री नहीं हो सकते।
- इस संशोधन ने यह भी सुनिश्चित किया कि दल-बदल करने वाले विधायकों को मंत्री पद या किसी अन्य लाभ के पद के लिए अयोग्य ठहराया जाएगा।
- यह संवैधानिक प्रावधान सुशासन, वित्तीय अनुशासन और मंत्रिपरिषद की दक्षता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मंत्रिपरिषद का आकार | यह सुनिश्चित करता है कि सरकार का आकार अत्यधिक बड़ा न हो, जिससे प्रशासनिक दक्षता बनी रहे और सार्वजनिक धन का सदुपयोग हो। |
| संवैधानिक सीमा | संविधान के अनुच्छेद 164(1क) द्वारा निर्धारित 15% की सीमा, मनमाने ढंग से मंत्रियों की संख्या बढ़ाने पर रोक लगाती है। |
| लोकतांत्रिक जवाबदेही | सीमित मंत्रिपरिषद का अर्थ है कि प्रत्येक मंत्री अधिक जवाबदेह होता है और अपने विभाग के प्रति अधिक उत्तरदायी होता है। |
| न्यायिक समीक्षा | उच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन की जांच, संवैधानिक सर्वोच्चता और कानून के शासन को बनाए रखती है। |
| संघवाद का सिद्धांत | राज्यों को अपनी विधानसभाओं के आकार के अनुसार मंत्रिपरिषद बनाने की स्वतंत्रता, जबकि संवैधानिक सीमाओं का पालन करना आवश्यक है। |
महत्व
संवैधानिक महत्व
- यह मामला संविधान के अनुच्छेद 164(1क) के तहत मंत्रिपरिषद के आकार पर लगाई गई संवैधानिक सीमा की व्याख्या और प्रवर्तन से संबंधित है।
- यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को पुष्ट करता है, जिसके तहत न्यायपालिका विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच करती है।
शासन और प्रशासन
- मंत्रिपरिषद का उचित आकार प्रशासनिक दक्षता और प्रभावी शासन के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह सार्वजनिक धन के विवेकपूर्ण उपयोग को सुनिश्चित करता है, क्योंकि अधिक मंत्रियों का अर्थ है अधिक प्रशासनिक खर्च।
लोकतांत्रिक मूल्य
- यह मामला राजनीतिक दलों और सरकारों को संवैधानिक प्रावधानों का पालन करने के लिए बाध्य करता है, जिससे लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा होती है।
- यह नागरिकों के अधिकारों और संवैधानिक शासन के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने में न्यायपालिका की भूमिका को उजागर करता है।
चुनौतियाँ
1. संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन
- राज्य सरकारों द्वारा मंत्रिपरिषद के आकार पर संवैधानिक सीमा (अनुच्छेद 164(1क)) का संभावित उल्लंघन।
- यह राजनीतिक लाभ या गठबंधन की मजबूरियों के कारण हो सकता है, जिससे संवैधानिक नैतिकता कमजोर होती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-कार्यपालिका
2. न्यायिक सक्रियता और सीमाएं
- उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या और प्रवर्तन में न्यायिक सक्रियता की भूमिका।
- कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को बनाए रखने की चुनौती।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका-संरचना और कार्यप्रणाली
3. प्रशासनिक दक्षता पर प्रभाव
- अत्यधिक बड़ी मंत्रिपरिषद प्रशासनिक समन्वय और निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बना सकती है।
- यह विभागों के बीच अस्पष्टता और जवाबदेही की कमी का कारण बन सकता है।
यूपीएससी लिंक: शासन-प्रशासनिक सुधार
4. राजकोषीय बोझ
- अधिक मंत्रियों की नियुक्ति से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ता है, जिसमें वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं शामिल हैं।
- यह सार्वजनिक संसाधनों के कुशल आवंटन को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय नीति-व्यय प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मंत्रिपरिषद का आकार | संविधान के अनुच्छेद 164(1क) द्वारा निर्धारित 15% की सीमा का उल्लंघन। |
| संवैधानिक नैतिकता | राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी की प्रवृत्ति। |
| न्यायिक प्रक्रिया में देरी | समान मुद्दों पर विभिन्न न्यायालयों में लंबित मामलों के कारण न्यायिक प्रक्रिया में लगने वाला समय। |
| सार्वजनिक धन का उपयोग | अनावश्यक रूप से बड़ी मंत्रिपरिषद पर होने वाला अतिरिक्त व्यय। |
| शासन की गुणवत्ता | अत्यधिक बड़ी मंत्रिपरिषद के कारण प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही में कमी। |
आगे की राह
- संवैधानिक प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना, विशेषकर अनुच्छेद 164(1क) के तहत मंत्रिपरिषद के आकार की सीमा का।
- राजनीतिक दलों द्वारा संवैधानिक नैतिकता और सुशासन के सिद्धांतों को प्राथमिकता देना।
- न्यायपालिका द्वारा ऐसे मामलों में त्वरित और प्रभावी सुनवाई सुनिश्चित करना ताकि संवैधानिक उल्लंघन को रोका जा सके।
- सरकार द्वारा मंत्रिपरिषद के गठन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखना।
- नागरिक समाज और मीडिया द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के पालन पर निगरानी और जागरूकता बढ़ाना।
- कानूनी विशेषज्ञों और संवैधानिक निकायों द्वारा संवैधानिक प्रावधानों की स्पष्ट व्याख्या और मार्गदर्शन प्रदान करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मंत्रिपरिषद की संख्या · अनुच्छेद 164(1क) · संवैधानिक सीमा · दलबदल विरोधी कानून · संसदीय लोकतंत्र · संघवाद · न्यायिक समीक्षा · विधायिका की संरचना · कार्यपालिका की जवाबदेही · शासन में पारदर्शिता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 164(1क)’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद के आकार की संवैधानिक सीमा’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 13’, ‘note’: ‘कानूनों की न्यायिक समीक्षा’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य विधानसभा में मंत्रियों की नियुक्ति → मंत्रिपरिषद का आकार संवैधानिक सीमा से अधिक होना → याचिकाकर्ताओं द्वारा उच्च न्यायालय में चुनौती → उच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक प्रावधानों की जांच → न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संवैधानिक सर्वोच्चता का संरक्षण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 164(1क) के अनुसार, किसी राज्य में मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
2. यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था।
3. छोटे राज्यों के लिए, मंत्रिपरिषद के सदस्यों की न्यूनतम संख्या 12 निर्धारित की गई है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 164(1क) मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या को विधानसभा के 15% तक सीमित करता है। कथन 2 भी सही है। यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा जोड़ा गया था। कथन 3 भी सही है। छोटे राज्यों के लिए मंत्रिपरिषद की न्यूनतम संख्या 12 निर्धारित की गई है।
Q2. अभिकथन (A): किसी राज्य में मंत्रिपरिषद की संख्या पर संवैधानिक सीमा कार्यपालिका के आकार को नियंत्रित करने और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए लगाई गई है।
कारण (R): यह सीमा दलबदल विरोधी कानून को मजबूत करने और राजनीतिक अस्थिरता को कम करने में भी सहायक है।
सही विकल्प चुनें:
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि संवैधानिक सीमा का उद्देश्य कार्यपालिका के आकार को नियंत्रित करना और संसाधनों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करना है। कारण (R) भी सही है क्योंकि यह सीमा ‘आया राम गया राम’ की राजनीति को हतोत्साहित करती है और दलबदल के माध्यम से बड़े मंत्रिपरिषद बनाने की प्रवृत्ति को रोकती है, जिससे राजनीतिक स्थिरता बढ़ती है। R, A की सही व्याख्या भी है क्योंकि कार्यपालिका के आकार को नियंत्रित करने का एक प्रमुख कारण राजनीतिक अस्थिरता को रोकना भी है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ संविधान के अनुच्छेद 164(1क) के तहत मंत्रिपरिषद की संख्या पर लगाई गई संवैधानिक सीमा का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या यह प्रावधान भारत में संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने में सफल रहा है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अनुच्छेद 164(1क) का उल्लेख करें और बताएं कि यह मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है।
2. **प्रावधान का विवरण:** 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा इस प्रावधान को जोड़ने के कारणों पर प्रकाश डालें (दलबदल को रोकना, कार्यपालिका के आकार को तर्कसंगत बनाना, वित्तीय बोझ कम करना)।
3. **सफलताएं/सकारात्मक प्रभाव:**
* दलबदल विरोधी कानून को मजबूती मिली।
* ‘आया राम गया राम’ की राजनीति पर अंकुश।
* सरकार पर वित्तीय बोझ में कमी।
* छोटे और अधिक कुशल मंत्रिपरिषद का गठन।
* राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा।
4. **सीमाएं/चुनौतियाँ/समालोचना:**
* कभी-कभी क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व की कमी।
* मुख्यमंत्री पर अधिक शक्ति का केंद्रीकरण।
* मंत्रियों के बीच कार्यभार का असंतुलन।
* गठबंधन सरकारों में विभागों के बंटवारे में समस्या।
* कुछ मामलों में प्रावधान के उल्लंघन के प्रयास (जैसे छत्तीसगढ़ का वर्तमान मामला)।
5. **निष्कर्ष:** प्रावधान के महत्व को स्वीकार करते हुए, इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करें और संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने में इसकी भूमिका का संतुलित मूल्यांकन करें। न्यायिक सक्रियता और संवैधानिक नैतिकता के महत्व पर जोर दें।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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