झारखंड हाईकोर्ट में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मिली मंजूरी, जानें पूरी प्रक्रिया

झारखंड हाईकोर्ट को मिलेंगे तीन नए जज: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दी नियुक्ति की मंजूरी, बढ़ेगी न्यायिक ताकत — labelled illustration

झारखंड हाईकोर्ट में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मिली मंजूरी, जानें पूरी प्रक्रिया

✎ उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिश पर की जाती है, जो न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, कार्यपालिका और न्यायपालिका का संगठन व कार्यप्रणाली
  • Prelims: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम, न्यायिक नियुक्तियाँ, अनुच्छेद 217, अनुच्छेद 124, न्यायिक स्वतंत्रता
  • Essay: भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही, न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की सिफारिश पर की जाती है, जो न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम (Supreme Court Collegium) ने झारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court) में तीन न्यायिक अधिकारियों को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस मंजूरी के बाद, इन नियुक्तियों से उच्च न्यायालय में लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आने और न्यायिक कार्यों को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान के तहत, उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करती है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India), संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श किया जाता है।
  • कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए विकसित एक प्रणाली है, जो न्यायिक निर्णयों के माध्यम से स्थापित हुई है।
  • कॉलेजियम प्रणाली में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के परामर्श से सिफारिशें करता है।
  • न्यायिक नियुक्तियों में देरी न्यायपालिका पर बोझ बढ़ाती है और न्याय तक पहुंच को प्रभावित करती है, इसलिए समय पर नियुक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं।

उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया

  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश के अलावा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में) से परामर्श करते हैं।
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम भी संबंधित उच्च न्यायालय के लिए न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश करता है।
  • इन सिफारिशों को केंद्रीय कानून मंत्रालय के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम को भेजा जाता है, जो उनकी समीक्षा करता है और राष्ट्रपति को अंतिम सिफारिश भेजता है।
  • राष्ट्रपति इन सिफारिशों पर मुहर लगाते हैं और नियुक्ति वारंट जारी करते हैं।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए, कम से कम दस वर्षों तक न्यायिक पद धारण किया हो, या कम से कम दस वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय या दो या अधिक ऐसे न्यायालयों का लगातार अधिवक्ता रहा हो।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता और दक्षता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण।
सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम प्रणाली उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की सिफारिश करने वाली प्रणाली।
न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति निचली न्यायपालिका के अनुभवी सदस्यों को उच्च न्यायालयों में पदोन्नत करना, जो न्यायिक अनुभव का लाभ उठाता है।
लंबित मामलों का निपटारा न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से लंबित मामलों की सुनवाई और निपटारे में तेजी आती है, जिससे न्याय तक पहुंच बेहतर होती है।
न्यायिक शक्ति में वृद्धि नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से उच्च न्यायालय की समग्र न्यायिक क्षमता और कार्यभार संभालने की शक्ति बढ़ती है।

महत्व

न्यायिक महत्व

  • झारखंड उच्च न्यायालय में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से न्यायिक कार्यप्रणाली को मजबूती मिलेगी, जिससे मामलों के त्वरित निपटारे में सहायता मिलेगी।
  • यह कदम उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की कमी को आंशिक रूप से दूर करेगा, जिससे न्यायिक दक्षता में सुधार होगा और न्याय तक पहुंच आसान होगी।

शासन और प्रशासन

  • न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया में कॉलेजियम की मंजूरी के बाद संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है, जो विधि के शासन को बनाए रखता है।
  • न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या से न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

सामाजिक प्रभाव

  • लंबित मामलों में कमी से नागरिकों को समय पर न्याय मिलेगा, जिससे न्यायपालिका में जनता का विश्वास बढ़ेगा।
  • न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति से निचली न्यायपालिका में कार्यरत योग्य व्यक्तियों को प्रोत्साहन मिलता है, जो न्यायिक सेवा को और अधिक आकर्षक बनाता है।

चुनौतियाँ

1. न्यायिक रिक्तियाँ

  • उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े रहते हैं, जिससे न्यायिक कार्य प्रभावित होता है और मामलों का बोझ बढ़ता है।
  • रिक्तियों के कारण न्यायिक प्रणाली पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे न्याय वितरण में देरी होती है।

2. कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना

  • कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता (Transparency) और जवाबदेही (Accountability) की कमी को लेकर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं।
  • यह प्रणाली ‘न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति’ के रूप में देखी जाती है, जिससे कार्यपालिका की भूमिका सीमित हो जाती है।

3. न्यायिक विलंब

  • न्यायाधीशों की कमी और न्यायिक प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण बड़ी संख्या में मामले लंबित रहते हैं, जिससे न्याय मिलने में अत्यधिक देरी होती है।
  • न्यायिक विलंब से नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन होता है और आर्थिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

4. बुनियादी ढाँचे की कमी

  • न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ न्यायिक बुनियादी ढाँचे, जैसे अदालती कक्ष, सहायक कर्मचारी और तकनीकी सुविधाओं की भी आवश्यकता होती है, जिसमें अक्सर कमी देखी जाती है।
  • पर्याप्त बुनियादी ढाँचे के अभाव में नए न्यायाधीशों की नियुक्ति का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
न्यायाधीशों की रिक्तियाँ उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों के मुकाबले वास्तविक संख्या कम होना, जिससे कार्यभार बढ़ता है।
कॉलेजियम की कार्यप्रणाली नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के आरोप, जिससे प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
न्यायिक विलंब मामलों के निपटारे में लगने वाला अत्यधिक समय, जिससे नागरिकों को न्याय मिलने में देरी होती है और न्यायपालिका पर बोझ बढ़ता है।
बुनियादी ढाँचे का अभाव न्यायाधीशों और अदालतों के लिए पर्याप्त भौतिक और तकनीकी संसाधनों की कमी, जिससे न्यायिक दक्षता प्रभावित होती है।
न्यायिक सक्रियता बनाम संयम न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप की सीमा को लेकर बहस, जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को प्रभावित करती है।

आगे की राह

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए कॉलेजियम प्रणाली में सुधार किए जाने चाहिए।
  • उच्च न्यायालयों में रिक्तियों को समयबद्ध तरीके से भरने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए ताकि न्यायिक कार्य प्रभावित न हो।
  • न्यायिक बुनियादी ढाँचे, जैसे कि अदालती कक्ष, तकनीकी सुविधाएं और सहायक कर्मचारियों में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए।
  • न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि वे उच्च न्यायालयों में प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।
  • लंबित मामलों के त्वरित निपटारे के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्रों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने और डिजिटलीकरण को अपनाने पर जोर दिया जाना चाहिए।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच न्यायिक नियुक्तियों और बुनियादी ढाँचे के विकास में बेहतर समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

न्यायिक नियुक्तियाँ · उच्च न्यायालय · सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम · न्यायिक स्वतंत्रता · न्यायिक जवाबदेही · न्यायाधीशों की कमी · लंबित मामले · संविधान का अनुच्छेद 217

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 217’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 224’, ‘note’: ‘अपर और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 50’, ‘note’: ‘कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण’}

अवधारणा प्रवाह

सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की बैठक  →  उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश  →  केंद्र सरकार द्वारा सिफारिशों पर विचार  →  राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की मंजूरी  →  नए न्यायाधीशों की नियुक्ति की अधिसूचना जारी  →  उच्च न्यायालय की न्यायिक शक्ति में वृद्धि  →  लंबित मामलों के निपटारे में तेजी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
2. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह अनिवार्य नहीं होती है।
3. कॉलेजियम प्रणाली का उल्लेख भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम में CJI और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश होते हैं। कथन 2 गलत है। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सलाह अनिवार्य होती है। कथन 3 गलत है। कॉलेजियम प्रणाली संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है, बल्कि यह न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है।

Q2. भारत में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
कथन I: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
कथन II: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ संबंधित राज्य के राज्यपाल और उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है।
  2. कथन I गलत है, लेकिन कथन II सही है।
  3. कथन I और कथन II दोनों सही हैं।
  4. कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।

उत्तर: कथन I सही है, लेकिन कथन II गलत है। — कथन I सही है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा CJI और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है। यदि किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति की जा रही है, तो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है। कथन II गलत है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श किया जाता है, न कि उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से (क्योंकि वही नियुक्त हो रहे होते हैं)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में सफल रही है, या इसमें सुधार की आवश्यकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 217) का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **नियुक्ति प्रक्रिया:** कॉलेजियम प्रणाली के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन करें, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम और उच्च न्यायालय कॉलेजियम की भूमिका शामिल हो।
3. **न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में सफलता:**
* कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करना।
* न्यायिक नियुक्तियों में विशेषज्ञता और अनुभव को प्राथमिकता।
* न्यायपालिका की स्वायत्तता बनाए रखना।
4. **कॉलेजियम प्रणाली की आलोचनाएँ और सुधार की आवश्यकता:**
* **अपारदर्शिता:** चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी।
* **भाई-भतीजावाद:** पक्षपात और भाई-भतीजावाद के आरोप।
* **जवाबदेही का अभाव:** कॉलेजियम के निर्णयों की कोई बाहरी समीक्षा नहीं।
* **न्यायाधीशों की कमी:** नियुक्तियों में देरी और रिक्तियों का बढ़ना।
* **राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का संदर्भ:** NJAC के गठन और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसे असंवैधानिक घोषित करने का उल्लेख।
5. **सुझाए गए सुधार:**
* पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता बढ़ाना।
* नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों की संतुलित भूमिका।
* एक स्थायी सचिवालय का गठन।
* योग्यता-आधारित चयन पर अधिक जोर।
6. **निष्कर्ष:** न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक प्रभावी और पारदर्शी नियुक्ति प्रणाली की आवश्यकता पर बल दें।

स्रोत: amarujala.com

Jharkhand PCS (JPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: झारखंड उच्च न्यायालय में हाल ही में कितने नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा मंजूरी प्रदान की गई है?

  1. 1
  2. 2
  3. 3
  4. 4

उत्तर: 3 — सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा झारखंड उच्च न्यायालय में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति को मंजूरी दी गई है, जिससे न्यायिक क्षमता में वृद्धि होगी।

Mains: झारखंड उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम की भूमिका की विवेचना कीजिए। साथ ही, झारखंड राज्य में न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं प्रभाविता सुनिश्चित करने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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