04 Sep डब्ल्यूएमओ का अल नीनो पूर्वानुमान: 2027 तक भारत पर प्रभाव
✎ अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के गर्म होने से उत्पन्न होती है और वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, जिससे भारत में आमतौर पर कमजोर मानसून और गर्म सर्दियों की स्थिति बनती…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (जलवायु विज्ञान) | GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन, भारतीय अर्थव्यवस्था
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, ENSO, भारतीय मानसून, वैश्विक तापन, रबी फसलें, WMO, IMD
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारत की खाद्य सुरक्षा, प्राकृतिक आपदाएँ और उनका सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के गर्म होने से उत्पन्न होती है और वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, जिससे भारत में आमतौर पर कमजोर मानसून और गर्म सर्दियों की स्थिति बनती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने हाल ही में घोषणा की है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में प्रचलित अल नीनो (El Nino) की स्थिति फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है और आने वाले महीनों में यह और अधिक तीव्र हो सकती है। यह भारत सहित दुनिया भर में वर्षा और तापमान के पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है, जिससे बाढ़, सूखे और अत्यधिक गर्मी का खतरा बढ़ सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने भी सितंबर के लिए अपने पूर्वानुमान में अल नीनो की स्थिति के फरवरी तक बने रहने की बात कही है, जो भारत के लिए इसके संभावित प्रभावों को और महत्वपूर्ण बनाता है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो दक्षिणी दोलन (ENSO) एक जलवायु घटना है जिसकी विशेषता मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के साथ समुद्री तापमान में परिवर्तन और वायुमंडल में उतार-चढ़ाव है।
- अल नीनो ENSO के तीन चरणों में से एक है, जो ग्रह पर गर्म प्रभाव डालता है, जबकि इसका विपरीत चरण ला नीना (La Nina) आमतौर पर शीतलन प्रभाव डालता है। ENSO का एक तटस्थ चरण भी होता है।
- अल नीनो की स्थिति आमतौर पर भारत में कम वर्षा का कारण बनती है, जिससे मानसून प्रभावित होता है। अगस्त 2026 में भारत में कुल वर्षा में 16 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी, जिसका मुख्य कारण अल नीनो था।
- IMD के अनुसार, अगस्त 2026 भारत का 1901 के बाद से सबसे गर्म अगस्त था, जिसका एक कारण अल नीनो को माना गया है।
- सितंबर 2026 के लिए IMD ने लंबी अवधि के औसत (LPA) के 91 प्रतिशत से कम वर्षा का अनुमान लगाया है, जो 1971-2020 के आंकड़ों के आधार पर लगभग 167.9 मिमी है।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो एक जटिल जलवायु पैटर्न है जो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान के गर्म होने से उत्पन्न होता है।
- यह ‘अल नीनो दक्षिणी दोलन’ (ENSO) नामक एक बड़े चक्र का गर्म चरण है, जिसमें ला नीना (शीतल चरण) और एक तटस्थ चरण भी शामिल हैं।
- यह आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होता है और 9 से 12 महीने तक रहता है, लेकिन वर्तमान पूर्वानुमान इसे फरवरी 2027 तक बनाए रखने का संकेत देते हैं।
- अल नीनो के दौरान, प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में गर्म पानी पश्चिम की ओर बहने के बजाय पूर्व की ओर बढ़ता है, जिससे व्यापारिक हवाएँ कमजोर पड़ जाती हैं।
- यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बदलता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी वर्षा और बाढ़ आती है, जबकि अन्य में सूखा और गर्मी पड़ती है।
- भारत में, अल नीनो आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है, जिससे कम वर्षा होती है और सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- यह सर्दियों के तापमान को भी प्रभावित कर सकता है, जिससे असामान्य रूप से गर्म सर्दियाँ हो सकती हैं, जो विशेष रूप से रबी फसलों के लिए हानिकारक है।
- इसका नाम स्पेनिश में ‘छोटा लड़का’ या ‘बाल मसीह’ के नाम पर रखा गया है क्योंकि यह अक्सर क्रिसमस के आसपास प्रशांत तट पर दिखाई देता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अल नीनो (El Nino) की निरंतरता | विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के अनुसार, अल नीनो की स्थिति फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है और यह एक बहुत मजबूत घटना में बदल सकती है। |
| भारत पर प्रभाव | भारत में वर्षा और तापमान के पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव, जिससे बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी का खतरा बढ़ जाता है। |
| IMD का पूर्वानुमान | भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सितंबर के लिए सामान्य से कम वर्षा (LPA के 91% से कम) का अनुमान लगाया है और अगस्त 2026 को 1901 के बाद से सबसे गर्म अगस्त बताया है। |
| ला नीना (La Nina) | अल नीनो का विपरीत चरण, जो आमतौर पर शीतलन प्रभाव डालता है। |
| दीर्घकालिक औसत (LPA) | किसी विशेष क्षेत्र में एक लंबी अवधि (आमतौर पर 30 से 50 वर्ष) में दर्ज की गई वर्षा का औसत, जिसका उपयोग मौसम के पूर्वानुमान के लिए बेंचमार्क के रूप में किया जाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव: कम वर्षा और उच्च तापमान से खरीफ और रबी दोनों फसलों को नुकसान हो सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय प्रभावित होगी।
- मुद्रास्फीति (Inflation) का दबाव: कृषि उत्पादों की कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा और आम जनता पर बोझ पड़ेगा।
- जल संसाधनों पर दबाव: सूखे की स्थिति से पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए जल की उपलब्धता कम हो सकती है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
सामाजिक महत्व
- स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: अत्यधिक गर्मी और सूखे से हीटस्ट्रोक, जल-जनित बीमारियों और कुपोषण का खतरा बढ़ सकता है, खासकर कमजोर आबादी के बीच।
- ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव: कृषि पर निर्भर ग्रामीण समुदायों की आजीविका सीधे प्रभावित होगी, जिससे गरीबी और ग्रामीण-शहरी प्रवासन बढ़ सकता है।
- सामाजिक अशांति का खतरा: जल और खाद्य संसाधनों की कमी से सामाजिक तनाव और संघर्ष बढ़ सकता है।
पर्यावरणीय महत्व
- जैव विविधता पर प्रभाव: बदलती जलवायु परिस्थितियाँ पारिस्थितिक तंत्रों और जैव विविधता को बाधित कर सकती हैं, जिससे कुछ प्रजातियों के अस्तित्व पर खतरा आ सकता है।
- वन अग्नि का बढ़ता जोखिम: शुष्क परिस्थितियाँ और उच्च तापमान वन अग्नि (Forest fires) के जोखिम को बढ़ा सकते हैं, जिससे पर्यावरण और वायु गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
- भूजल स्तर में कमी: कम वर्षा के कारण भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) कम हो सकता है, जिससे भूजल स्तर में गिरावट आएगी।
चुनौतियाँ
1. कृषि क्षेत्र पर प्रभाव
- फसल उत्पादन में कमी: अल नीनो के कारण कम वर्षा और उच्च तापमान से खरीफ और रबी दोनों फसलों की पैदावार प्रभावित होगी, जिससे खाद्य सुरक्षा पर खतरा मंडराएगा।
- किसानों की आय में गिरावट: फसल खराब होने से किसानों की आय में कमी आएगी, जिससे ग्रामीण संकट और ऋणग्रस्तता बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: कृषि, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण विकास
2. जल प्रबंधन
- जल संकट: कम मानसूनी वर्षा से जलाशयों में जल स्तर कम हो जाएगा, जिससे पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए जल की कमी हो सकती है।
- भूजल का अत्यधिक दोहन: सतही जल की कमी के कारण भूजल पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे भूजल स्तर में और गिरावट आएगी।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन, सिंचाई, पर्यावरण
3. मुद्रास्फीति और आर्थिक स्थिरता
- खाद्य मुद्रास्फीति: कृषि उत्पादन में कमी से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे समग्र मुद्रास्फीति बढ़ेगी और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ेगा।
- आर्थिक संवृद्धि (Economic growth) पर प्रभाव: कृषि क्षेत्र का कमजोर प्रदर्शन समग्र आर्थिक संवृद्धि को धीमा कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, मुद्रास्फीति, आर्थिक विकास
4. सार्वजनिक स्वास्थ्य
- गर्मी से संबंधित बीमारियाँ: अत्यधिक गर्मी और हीटवेव से हीटस्ट्रोक और अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
- जल-जनित रोग: जल की कमी और गुणवत्ता में गिरावट से जल-जनित बीमारियों का प्रसार बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन
5. ऊर्जा क्षेत्र
- जलविद्युत उत्पादन में कमी: जलाशयों में कम जल स्तर से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है।
- तापमान वृद्धि से ऊर्जा मांग में वृद्धि: उच्च तापमान से एयर कंडीशनिंग की मांग बढ़ेगी, जिससे बिजली ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
यूपीएससी लिंक: ऊर्जा सुरक्षा, बुनियादी ढाँचा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कम मानसूनी वर्षा | कृषि उत्पादन में कमी, जल संकट, खाद्य सुरक्षा पर खतरा। |
| उच्च तापमान | रबी फसलों पर ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ, ऊर्जा की बढ़ती मांग। |
| खाद्य मुद्रास्फीति | कृषि उत्पादों की कमी से कीमतों में वृद्धि, आम जनता पर आर्थिक बोझ। |
| ग्रामीण आजीविका | किसानों की आय में गिरावट, ग्रामीण संकट, प्रवासन में वृद्धि। |
| जल संसाधन प्रबंधन | पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक उपयोग के लिए जल की कमी। |
आगे की राह
- मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना ताकि किसानों और संबंधित हितधारकों को समय पर जानकारी मिल सके।
- सूखा-प्रतिरोधी फसलों की किस्मों को बढ़ावा देना और फसल विविधीकरण (Crop diversification) को प्रोत्साहित करना।
- जल संरक्षण और प्रबंधन तकनीकों को अपनाना, जैसे वर्षा जल संचयन (Rainwater harvesting), सूक्ष्म सिंचाई (Micro-irrigation) और भूजल पुनर्भरण।
- किसानों को वित्तीय सहायता और बीमा कवरेज प्रदान करना ताकि वे फसल खराब होने के प्रभावों का सामना कर सकें।
- खाद्य भंडारण और वितरण प्रणालियों को मजबूत करना ताकि खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और कीमतों में स्थिरता लाई जा सके।
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाना ताकि जलविद्युत पर निर्भरता कम हो सके और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन रणनीतियों को लागू करना, जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना भी शामिल है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो · ला नीना · ENSO · जलवायु परिवर्तन · भारतीय मानसून · कृषि पर प्रभाव · खाद्य सुरक्षा · तापमान वृद्धि · रबी फसलें · आपदा प्रबंधन · मौसम विज्ञान · दीर्घकालिक औसत (LPA)
अवधारणा प्रवाह
अल नीनो की स्थिति का विकास → प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि → वैश्विक और क्षेत्रीय मौसम पैटर्न में बदलाव → भारत में कम मानसूनी वर्षा और उच्च तापमान → कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो दक्षिणी दोलन (ENSO) प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान में बदलाव से जुड़ा एक जलवायु घटना है।
2. अल नीनो की स्थिति आमतौर पर भारत में कम वर्षा और उच्च तापमान से जुड़ी होती है।
3. ला नीना, अल नीनो का विपरीत चरण है, और इसका आमतौर पर शीतलन प्रभाव होता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1: ENSO प्रशांत महासागर में समुद्र के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में उतार-चढ़ाव को संदर्भित करता है, जिसमें अल नीनो, ला नीना और तटस्थ चरण शामिल हैं। यह कथन सही है।
कथन 2: अल नीनो की स्थिति अक्सर भारतीय मानसून को कमजोर करती है, जिससे वर्षा में कमी और तापमान में वृद्धि होती है। यह कथन सही है।
कथन 3: ला नीना अल नीनो का ठंडा चरण है, जो आमतौर पर वैश्विक स्तर पर शीतलन प्रभाव डालता है और भारत में अच्छी वर्षा से जुड़ा होता है। यह कथन सही है।
Q2. अभिकथन (A): विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने फरवरी 2027 तक अल नीनो की स्थिति बने रहने का अनुमान लगाया है।
कारण (R): अल नीनो की स्थिति भारत में वर्षा और तापमान के पैटर्न को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकती है, जिससे बाढ़, सूखे और अत्यधिक गर्मी का खतरा बढ़ जाता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि WMO ने हाल ही में अल नीनो के फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना व्यक्त की है। कारण (R) भी सही है क्योंकि अल नीनो भारतीय मौसम पर गहरा प्रभाव डालता है, जिससे वर्षा में कमी और तापमान में वृद्धि होती है, जो सूखे और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं को जन्म दे सकता है। R, A की सही व्याख्या है क्योंकि WMO का अनुमान इन्हीं संभावित प्रभावों के कारण महत्वपूर्ण है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो की वर्तमान स्थिति और इसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना भारत के कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा के लिए क्या चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है? इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले संभावित कदमों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अल नीनो और इसके भारतीय मानसून पर सामान्य प्रभावों का संक्षिप्त परिचय। WMO के हालिया अनुमान का उल्लेख।
2. **कृषि क्षेत्र पर चुनौतियाँ:**
* **मानसून वर्षा में कमी:** खरीफ और रबी दोनों फसलों पर प्रभाव।
* **तापमान वृद्धि:** विशेष रूप से रबी फसलों (जैसे गेहूँ) पर ‘टर्मिनल हीट स्ट्रेस’ का खतरा।
* **जल संकट:** सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता में कमी।
* **फसल उत्पादन में गिरावट:** किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव।
* **कीटों और बीमारियों का प्रकोप:** बदलते मौसम पैटर्न के कारण।
3. **खाद्य सुरक्षा पर चुनौतियाँ:**
* **खाद्यान्न उत्पादन में कमी:** चावल, गेहूँ जैसी प्रमुख फसलों का उत्पादन प्रभावित।
* **मुद्रास्फीति (Inflation):** खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि।
* **आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान:** भंडारण और वितरण पर दबाव।
* **ग्रामीण आजीविका पर प्रभाव:** गरीबी और कुपोषण में वृद्धि का जोखिम।
4. **संभावित सरकारी कदम:**
* **मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** IMD और अन्य एजेंसियों की भूमिका को मजबूत करना।
* **फसल विविधीकरण:** कम पानी वाली और सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना।
* **सिंचाई प्रबंधन:** सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर) और जल संचयन को बढ़ावा देना।
* **बीमा योजनाएँ:** प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का प्रभावी कार्यान्वयन।
* **अनुसंधान और विकास:** जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकों और उन्नत बीज किस्मों का विकास।
* **खाद्य भंडार और वितरण:** सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को मजबूत करना और बफर स्टॉक बनाए रखना।
* **किसानों को वित्तीय सहायता:** संकटग्रस्त किसानों के लिए सहायता पैकेजों पर विचार।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए वैश्विक प्रयासों में भागीदारी।
5. **निष्कर्ष:** अल नीनो के दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने के लिए एक समग्र और बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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