07 Aug डीएमके ने सीमांकन विधेयक के समर्थन के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण है, जो 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, संविधान (42वाँ संशोधन) अधिनियम, 1976, संविधान (84वाँ संशोधन) अधिनियम, 2002, लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण, संवैधानिक संशोधन विधेयक
- Essay: भारत में संघवाद: चुनौतियाँ और भविष्य का मार्ग, संसदीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का महत्त्व और उसकी चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण है, जो ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावनाओं के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। यह घटनाक्रम सरकार द्वारा विपक्षी दलों से संपर्क साधने के प्रयासों के बीच आया है, ताकि विधेयक के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत सुनिश्चित किया जा सके।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुन:निर्धारण करना।
- भारत में परिसीमन का मुख्य उद्देश्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या के समानुपातिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत का पालन हो सके।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद संसद एक परिसीमन अधिनियम लागू करती है। इसी प्रकार, अनुच्छेद 170 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों को भी परिसीमन अधिनियम के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है विधायी निकाय वाले देश या प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने की प्रक्रिया।
- भारत में, यह प्रक्रिया एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा की जाती है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से परिभाषित करना है, ताकि जनसंख्या में परिवर्तन के अनुसार प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
- यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक राज्य को लोकसभा में सीटों का आवंटन इस तरह से हो कि सीटों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासंभव समान हो।
- आयोग अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की पहचान भी करता है, जो उन क्षेत्रों में आरक्षित की जाती हैं जहाँ उनकी जनसंख्या का अनुपात अधिक होता है।
- परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसका उद्देश्य परिसीमन प्रक्रिया को राजनीतिक विवादों से बचाना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन पर संवैधानिक रोक | वर्तमान में 1971 की जनगणना पर आधारित सीटों की संख्या पर रोक है, जो 2027 में समाप्त हो रही है। DMK इसे अगले 25 वर्षों तक जारी रखने की मांग कर रही है। |
| लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि | DMK सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में एकमुश्त 50% वृद्धि का समर्थन करती है, जैसा कि गृह मंत्री ने पहले मौखिक रूप से वादा किया था। |
| प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की अनुसूची | DMK चाहती है कि विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची शामिल की जाए। |
| संवैधानिक संशोधन विधेयक | केंद्र सरकार परिसीमन के लिए एक संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने पर विचार कर रही है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। |
| विपक्षी दलों से संपर्क | सरकार विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाने हेतु विपक्षी दलों से संपर्क कर रही है। |
महत्व
राजनीतिक निहितार्थ
- परिसीमन (Delimitation) विधेयक पर DMK का रुख केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि विधेयक पारित कराने के लिए उसे दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
- विपक्षी दलों, विशेषकर INDIA गठबंधन के सदस्यों के साथ सरकार का संवाद, विधायी प्रक्रिया में आम सहमति बनाने के प्रयासों को दर्शाता है।
- परिसीमन का मुद्दा राज्यों के बीच सीटों के वितरण और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करेगा, जिससे संघवाद (Federalism) पर बहस छिड़ सकती है।
संवैधानिक महत्व
- संविधान में संशोधन के माध्यम से परिसीमन की प्रक्रिया, संविधान की मूल संरचना और संघीय ढांचे पर बहस को जन्म दे सकती है।
- सीटों की संख्या पर रोक को आगे बढ़ाने या हटाने का निर्णय भारतीय लोकतंत्र में जनसंख्या प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को प्रभावित करेगा।
सामाजिक-आर्थिक प्रभाव
- लोकसभा सीटों में वृद्धि से संसद में प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, जिससे विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समूहों की आवाजें बेहतर ढंग से सुनी जा सकेंगी।
- जनसंख्या वृद्धि के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण, विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों के लिए, विकास और संसाधनों के आवंटन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
चुनौतियाँ
1. संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत जुटाना
- संविधान संशोधन विधेयक पारित करने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो सरकार के लिए एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संसद, संविधान संशोधन
2. राज्यों के बीच असंतुलन की आशंका
- परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका है, क्योंकि उनकी जनसंख्या वृद्धि दर उत्तरी राज्यों की तुलना में कम रही है, जिससे राज्यों के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
3. राजनीतिक आम सहमति का अभाव
- विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस, परिसीमन अभ्यास के लिए किसी भी संवैधानिक संशोधन का विरोध कर रहे हैं, जिससे आम सहमति बनाना मुश्किल हो रहा है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: राजनीतिक दल, चुनाव
4. जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर प्रभाव
- यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है, तो यह उन राज्यों को दंडित कर सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे भविष्य में जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज: जनसंख्या नीति, विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सीटों की संख्या पर रोक | यदि 1971 की जनगणना के आधार पर रोक हटा दी जाती है, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। |
| संवैधानिक संशोधन | विधेयक पारित करने के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है, जो वर्तमान में एक चुनौती है। |
| राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व | जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से विभिन्न राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन आ सकता है। |
| संघीय ढाँचा | परिसीमन का मुद्दा राज्यों के अधिकारों और संघीय ढांचे पर बहस को तेज कर सकता है। |
आगे की राह
- सरकार को सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए ताकि परिसीमन विधेयक पर आम सहमति बनाई जा सके।
- परिसीमन के लिए एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए जो सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखे।
- जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित न करने के लिए वैकल्पिक तंत्रों पर विचार किया जाना चाहिए, जैसे कि सीटों के वितरण के लिए एक मिश्रित मानदंड।
- परिसीमन के संभावित प्रभावों पर एक विस्तृत श्वेत पत्र (White Paper) जारी किया जाना चाहिए ताकि सार्वजनिक बहस को बढ़ावा मिल सके।
- संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता और उसके निहितार्थों पर गहन चर्चा की जानी चाहिए ताकि संविधान के मूल सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित हो सके।
- राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग की भावना को बढ़ावा देने के लिए एक संघीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · जनसंख्या अनुपात · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · समानुपातिक प्रतिनिधित्व · दक्षिण भारतीय राज्य · जनसांख्यिकीय लाभांश · राजनीतिक प्रतिनिधित्व
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्यों की विधानसभाओं का परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘राज्य विधानसभाओं में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 368’, ‘note’: ‘संविधान में संशोधन की प्रक्रिया’}
अवधारणा प्रवाह
जनगणना पूरी होती है। → परिसीमन आयोग का गठन होता है। → परिसीमन आयोग सीटों का पुनर्वितरण करता है। → संसद में परिसीमन विधेयक प्रस्तुत किया जाता है। → विधेयक पारित होने पर सीटों का नया आवंटन होता है। → राज्यों का प्रतिनिधित्व बदल जाता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन (Delimitation) का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
2. भारत में परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों को 2001 की जनगणना तक के लिए फ्रीज कर दिया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग का गठन परिसीमन अधिनियम के तहत किया जाता है, जो संसद द्वारा पारित एक कानून है। यह सीधे संविधान द्वारा स्थापित नहीं है, लेकिन इसके आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और इसे किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों को 1971 की जनगणना के आधार पर 2000 तक के लिए फ्रीज कर दिया था, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
2. परिसीमन आयोग के सदस्यों में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष के रूप में, मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के पीछे के संवैधानिक सिद्धांतों का परीक्षण कीजिए। क्या आपको लगता है कि वर्तमान परिसीमन प्रक्रिया संघवाद और राज्यों के बीच समानता के सिद्धांत को चुनौती देती है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की अवधारणा और इसके संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 82 और 170) का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक सिद्धांत: ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ और ‘जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व’ जैसे सिद्धांतों की व्याख्या। 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों के स्थगन (फ्रीज) और 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा इसे 2026 तक बढ़ाने का उल्लेख।
3. संघवाद और समानता पर प्रभाव:
a. दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ: उन राज्यों को ‘दंडित’ किए जाने की आशंका जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
b. उत्तर भारतीय राज्यों का बढ़ता प्रतिनिधित्व: जनसंख्या वृद्धि के कारण लोकसभा में उनकी सीटों में संभावित वृद्धि, जिससे दक्षिणी राज्यों का सापेक्ष प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
c. राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक केंद्रीय अनुदान मिलने की संभावना, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है।
d. राजनीतिक असंतुलन: दक्षिणी राज्यों की आवाज़ कमजोर होने का डर, जिससे राष्ट्रीय नीतियों में उनकी भागीदारी कम हो सकती है।
4. पक्ष में तर्क:
a. लोकतांत्रिक सिद्धांत: जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है।
b. बदलते जनसांख्यिकीय पैटर्न: देश की बदलती आबादी को प्रतिबिंबित करना आवश्यक है।
c. राष्ट्रीय एकता: सभी क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना।
5. समालोचनात्मक विश्लेषण और निष्कर्ष: संघवाद और समानता के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए परिसीमन की आवश्यकता पर संतुलन बनाना। संभावित समाधानों पर चर्चा, जैसे कि राज्यसभा में प्रतिनिधित्व बढ़ाना, या भविष्य के परिसीमन के लिए एक हाइब्रिड मॉडल अपनाना जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को भी पुरस्कृत करे। DMK जैसी पार्टियों द्वारा प्रस्तावित 50% सीट वृद्धि या 1976 के फ्रीज को जारी रखने की मांग का उल्लेख।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments