डीएमके ने सीमांकन विधेयक का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

DMK lays down conditions to support delimitation Bill — diagram

डीएमके ने सीमांकन विधेयक का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

Delimitation Bill ProcessConstitutional Amendment BProposed in ParliamentNeeds 2/3 majorityDelimitation CommissionHigh-powered bodyOrders have legal forceState Assembly SeatsRedrawn per CensusArticle 170 appliesLok Sabha SeatsRedrawn per CensusArticle 82 applies
Delimitation Bill Process

✎ परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन कर 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है, जिससे संघवाद…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, संसद और राज्य विधायिकाएँ, केंद्र-राज्य संबंध  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (जनसांख्यिकीय परिवर्तन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव)
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, संविधान संशोधन, लोकसभा सीटों का निर्धारण, जनसंख्या नियंत्रण, संघवाद
  • Essay: भारतीय संघवाद में केंद्र-राज्य संबंधों की बदलती गतिशीलता, जनसंख्या नियंत्रण और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन यह जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है, जिससे संघवाद पर बहस छिड़ जाती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावना के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। यह घटनाक्रम विपक्षी दलों के साथ सरकार के संवाद के प्रयासों के बीच आया है, क्योंकि संवैधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

पृष्ठभूमि

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना। इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के कारण सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या को समान करना है।
  • भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्च शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्यों को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों को विभाजित करने का अधिकार देता है।
  • भारत में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है – 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
  • इसका उद्देश्य उन राज्यों को दंडित होने से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सफलतापूर्वक लागू किए थे।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है विधायी निकाय वाले देश या प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
  • भारत में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने का कार्य परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए, जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या को समान करना है।
  • परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा जा सके।
  • परिसीमन का आधार आमतौर पर नवीनतम जनगणना के आंकड़े होते हैं, हालांकि वर्तमान में 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों को स्थिर रखा गया है।
  • परिसीमन का प्रभाव राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ता है, खासकर उन राज्यों पर जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, क्योंकि उनकी जनसंख्या कम होने के कारण उन्हें कम सीटें मिल सकती हैं।
  • यह प्रक्रिया संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन पर रोक (Delimitation Freeze) जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहन देने और दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण।
लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि सभी राज्यों के लिए प्रतिनिधित्व में समानुपातिक वृद्धि सुनिश्चित करने का प्रस्ताव।
राज्य-वार सीटों की अनुसूची प्रत्येक राज्य के लिए आवंटित सीटों की संख्या में पारदर्शिता और निश्चितता प्रदान करना।
1971 की जनगणना पर आधारित रोक वर्तमान में, लोकसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना पर आधारित है, जो 2027 में समाप्त हो रहा है।
संवैधानिक संशोधन विधेयक परिसीमन अभ्यास को लागू करने के लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
DMK की शर्तें DMK ने परिसीमन विधेयक को समर्थन देने के लिए 1976 के संशोधन पर आधारित रोक को 25 साल और बढ़ाने और लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि की मांग की है।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन विधेयक पर DMK का रुख केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है।
  • यह विधेयक संघवाद (Federalism) और राज्यों के प्रतिनिधित्व के संबंध में महत्वपूर्ण बहस को जन्म देगा।
  • दक्षिणी राज्यों की चिंताएँ, विशेष रूप से जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण सीटों के नुकसान की आशंका, इस मुद्दे के केंद्र में हैं।

संवैधानिक महत्व

  • यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में संशोधन का प्रस्ताव कर सकता है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन से संबंधित हैं।
  • परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को प्राप्त करना है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि में भिन्नता के कारण यह जटिल हो जाता है।
  • यह विधेयक भारत के संसदीय लोकतंत्र की संरचना और प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को प्रभावित करेगा।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • परिसीमन का प्रभाव विभिन्न राज्यों के विकास एजेंडा और केंद्रीय योजनाओं में उनकी हिस्सेदारी पर पड़ सकता है।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को सीटों के नुकसान की आशंका से जनसंख्या नीति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • यह विधेयक विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बीच राजनीतिक शक्ति के पुनर्वितरण को प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व का संतुलन

  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि नए परिसीमन से लोकसभा में उनकी सीटों की संख्या कम हो सकती है।
  • यह चुनौती जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य और राज्यों के उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की है।

2. संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत जुटाना

  • परिसीमन के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
  • सरकार के लिए विपक्षी दलों, विशेषकर INDIA गठबंधन के सदस्यों का समर्थन प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है।

3. राज्यों के बीच अविश्वास

  • दक्षिणी राज्य, विशेष रूप से तमिलनाडु, परिसीमन को अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर हमले के रूप में देखते हैं।
  • यह राज्यों के बीच अविश्वास और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।

4. राजनीतिक सहमति का अभाव

  • विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस, किसी भी परिसीमन अभ्यास के संवैधानिक संशोधन का विरोध कर रहे हैं।
  • विधेयक के स्वरूप और सार पर राजनीतिक सहमति का अभाव इसे पारित करने में बाधा उत्पन्न कर सकता है।

5. समयबद्धता और जनगणना के मुद्दे

  • वर्तमान रोक नवीनतम जनगणना के बाद समाप्त हो रही है, जिसके 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है।
  • जनगणना में देरी और परिसीमन प्रक्रिया की जटिलताएँ इस मुद्दे को और भी चुनौतीपूर्ण बनाती हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रतिनिधित्व दक्षिणी राज्यों को लोकसभा सीटों में कमी का डर है, जिससे जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित किया जा सकता है।
संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत सरकार के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना कठिन है, जिससे विधेयक के पारित होने में बाधा आ सकती है।
संघवाद पर प्रभाव परिसीमन राज्यों के बीच असमानता बढ़ा सकता है और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण यह मुद्दा राजनीतिक दलों के बीच गहरे मतभेद पैदा कर सकता है, जिससे राष्ट्रीय सहमति बनाना मुश्किल होगा।
सीटों का पुनर्वितरण नए परिसीमन से विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों के बीच राजनीतिक शक्ति का पुनर्वितरण होगा, जिससे असंतोष पैदा हो सकता है।
समय-सीमा और प्रक्रिया परिसीमन एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें जनगणना के आंकड़ों का उपयोग और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • केंद्र सरकार को सभी राजनीतिक दलों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक उचित तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, जैसे कि सीटों की संख्या में वृद्धि या विशेष प्रावधान।
  • परिसीमन के सिद्धांतों और विधियों पर एक राष्ट्रीय सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि यह प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो।
  • संवैधानिक संशोधन विधेयक के स्वरूप और सार को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए और सभी हितधारकों के साथ साझा किया जाना चाहिए।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों और उनके प्रभावों का अध्ययन करे।
  • जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहन और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने वाले समाधानों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • परिसीमन प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए जनगणना के आंकड़ों को शीघ्रता से अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।
  • राज्यों के बीच विश्वास बहाली के उपायों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि संघवाद की भावना को मजबूत किया जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनगणना · संवैधानिक संशोधन · संघवाद · संसदीय लोकतंत्र · प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय परिवर्तन · राज्यों का प्रतिनिधित्व · संसदीय कार्य मंत्री · DMK · INDIA गठबंधन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 82’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
  • {‘अनुच्छेद 170’: ‘राज्य विधानसभाओं में सीटों की संरचना’}
  • {‘संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976’: ‘परिसीमन पर रोक’}
  • {‘संविधान (एक सौ इकतीसवाँ संशोधन) विधेयक’: ‘प्रस्तावित परिसीमन विधेयक’}
  • {‘अनुच्छेद 368’: ‘संविधान संशोधन की प्रक्रिया’}

अवधारणा प्रवाह

जनसंख्या वृद्धि में भिन्नता  →  राज्यों के प्रतिनिधित्व में असमानता  →  परिसीमन की आवश्यकता  →  संवैधानिक संशोधन विधेयक का प्रस्ताव  →  राजनीतिक दलों के बीच मतभेद  →  परिसीमन पर DMK की शर्तें  →  विधेयक के पारित होने में चुनौतियाँ

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. अध्यक्ष: भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त
2. पदेन सदस्य: संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त
3. सहयोगी सदस्य: संबंधित राज्य के सभी लोकसभा और विधानसभा सदस्य
उपरोक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — युग्म 1 सही सुमेलित नहीं है। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त इसके पदेन सदस्य होते हैं। युग्म 2 सही सुमेलित है। संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त आयोग के पदेन सदस्य होते हैं। युग्म 3 सही सुमेलित नहीं है। सहयोगी सदस्य संबंधित राज्य के लोकसभा और विधानसभा सदस्यों में से राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, न कि सभी सदस्य।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ परिसीमन क्या है और भारत में इसके संवैधानिक प्रावधान क्या हैं? हाल ही में DMK द्वारा परिसीमन विधेयक के समर्थन के लिए रखी गई शर्तों के आलोक में, भारत में संघीय प्रतिनिधित्व पर परिसीमन के संभावित प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा और उद्देश्य से शुरुआत करें। भारत के संविधान में परिसीमन से संबंधित अनुच्छेद (जैसे अनुच्छेद 82, 170, 330, 332) और संवैधानिक संशोधनों (जैसे 42वां, 84वां, 87वां) का उल्लेख करें। DMK द्वारा रखी गई तीन प्रमुख शर्तों (1971 की जनगणना पर आधारित सीटों की संख्या को 25 साल और फ्रीज करना, सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि, और विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की अनुसूची) का विवरण दें। संघीय प्रतिनिधित्व पर परिसीमन के संभावित प्रभावों का विश्लेषण करें, जिसमें दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों में संभावित कमी, उत्तर भारतीय राज्यों की सीटों में वृद्धि, जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों पर प्रभाव, राज्यों के बीच शक्ति संतुलन में बदलाव, और राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना शामिल है। इन प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण करते हुए संघवाद के सिद्धांतों और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत पर इसके निहितार्थों पर चर्चा करें। निष्कर्ष में, एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें कि कैसे परिसीमन को संघीय संतुलन और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए लागू किया जा सकता है।

स्रोत: The Hindu


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