07 Aug डीएमके ने सीमांकन विधेयक पर समर्थन के लिए रखे तीन शर्तें
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने की क्षमता के…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिकाएँ – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण, जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व
- Essay: भारत में संघीय संतुलन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की चुनौतियाँ, जनसंख्या नियंत्रण बनाम राजनीतिक प्रतिनिधित्व: एक नैतिक दुविधा
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करता है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने की क्षमता के कारण यह संघीय संतुलन के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावनाओं के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। यह घटनाक्रम केंद्र और विपक्ष के बीच विधेयक के लिए समर्थन जुटाने के प्रयासों के बीच आया है, जो भारत के संघीय ढाँचे और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए महत्त्वपूर्ण निहितार्थ रखता है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
- भारत में, परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, और अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों को भी प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन करना होता है।
- दक्षिण भारतीय राज्य, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नया परिसीमन उनकी लोकसभा सीटों की संख्या को कम कर सकता है, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट जाएगा।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है विधायी निकाय वाले देश में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने या फिर से तय करने का कार्य।
- इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करके सभी नागरिकों के लिए समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
- परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है जिसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसमें सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
- आयोग का मुख्य कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं का निर्धारण करना, आरक्षित सीटों (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए) की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या लगभग समान हो।
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं के वोट का मूल्य समान रहे।
- परिसीमन के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे इसकी निष्पक्षता और अंतिम प्रकृति सुनिश्चित होती है।
- भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है – 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| परिसीमन पर संवैधानिक रोक | वर्तमान में लोकसभा सीटों का परिसीमन 1971 की जनगणना पर आधारित है और यह रोक नवीनतम जनगणना (जो 2027 में पूरी होने की उम्मीद है) के बाद समाप्त हो जाएगी। DMK इसे अगले 25 वर्षों तक जारी रखने की मांग कर रही है। |
| लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि | DMK सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में एकमुश्त 50% की वृद्धि चाहती है। यह मांग गृह मंत्री द्वारा अप्रैल में परिसीमन से संबंधित विधायी पैकेज पेश करते समय किए गए मौखिक वादे पर आधारित है। |
| राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची | DMK चाहती है कि विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची (Schedule) शामिल की जाए। |
| संवैधानिक संशोधन विधेयक | केंद्र सरकार एक नए परिसीमन अभ्यास को अंजाम देने के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावना तलाश रही है। ऐसे विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। |
| विपक्षी दलों से संपर्क | सरकार विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाने के लिए विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और DMK से संपर्क साध रही है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- परिसीमन का मुद्दा भारत के संघीय ढांचे और राज्यों के प्रतिनिधित्व को सीधे प्रभावित करता है, खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को देखते हुए।
- यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच शक्ति संतुलन और सहयोग की आवश्यकता को दर्शाता है, विशेष रूप से संवैधानिक संशोधनों के लिए।
- विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त करने के लिए सरकार के प्रयास संसदीय लोकतंत्र में आम सहमति के महत्व को उजागर करते हैं।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या लगभग समान रहे।
- सीटों को फ्रीज करने का निर्णय जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए लिया गया था, ताकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है, उन्हें संसदीय प्रतिनिधित्व में नुकसान न हो।
- संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता यह सुनिश्चित करती है कि परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों पर व्यापक राजनीतिक सहमति हो।
सामाजिक-आर्थिक महत्व
- जनसंख्या वृद्धि और उसके आधार पर सीटों का पुनर्वितरण विभिन्न राज्यों के बीच विकास और संसाधनों के वितरण को प्रभावित कर सकता है।
- बढ़ी हुई सीटों से विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व बेहतर हो सकता है, जिससे समावेशी शासन को बढ़ावा मिल सकता है।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व बनाम जनसंख्या नियंत्रण
- परिसीमन का आधार जनसंख्या है, लेकिन जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें डर है कि इससे उनका संसदीय प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
- यह चुनौती जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को दर्शाती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संघवाद, जनसंख्या नीति
2. संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत जुटाना
- संवैधानिक संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है।
- सरकार के पास अभी तक यह बहुमत नहीं है, जिससे विपक्षी दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो जाता है।
- यह चुनौती संसदीय रणनीति और राजनीतिक वार्ताओं की आवश्यकता को दर्शाती है।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया, संसद
3. राज्यों के बीच असंतुलन की आशंका
- यदि परिसीमन बिना किसी सुरक्षा उपाय के होता है, तो यह आशंका है कि उत्तर भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा।
- यह क्षेत्रीय असंतुलन संघवाद की भावना को कमजोर कर सकता है और राज्यों के बीच अविश्वास पैदा कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, क्षेत्रीय असमानताएं
4. राजनीतिक आम सहमति का अभाव
- विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस, परिसीमन अभ्यास के लिए किसी भी संवैधानिक संशोधन का विरोध कर रहे हैं।
- यह चुनौती महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीतिक आम सहमति बनाने में कठिनाई को उजागर करती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति, संसदीय कार्यप्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनसंख्या आधारित परिसीमन | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कम होने का डर। |
| संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत | सरकार के पास आवश्यक दो-तिहाई बहुमत का अभाव, विपक्षी समर्थन की आवश्यकता। |
| राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का असंतुलन | उत्तरी और दक्षिणी राज्यों के बीच सीटों के वितरण में संभावित असमानता। |
| DMK की शर्तें | परिसीमन पर 25 साल की रोक और लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि की मांग। |
| विपक्षी दलों का विरोध | परिसीमन अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन के प्रति कांग्रेस और अन्य दलों का विरोध। |
आगे की राह
- सरकार को सभी हितधारकों, विशेषकर राज्यों और राजनीतिक दलों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए ताकि आम सहमति बनाई जा सके।
- परिसीमन के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न करे।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों या वैकल्पिक फार्मूलों पर विचार किया जाना चाहिए।
- परिसीमन के संभावित प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि राज्यों की चिंताओं को दूर किया जा सके।
- संवैधानिक संशोधन विधेयक के प्रावधानों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए, जिसमें DMK जैसी पार्टियों द्वारा उठाई गई मांगों पर विचार किया जाए।
- संसदीय कार्य मंत्री को विपक्षी नेताओं के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना चाहिए ताकि विधेयक को पारित करने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनगणना · संवैधानिक संशोधन · संघवाद · प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश · संसदीय लोकतंत्र · राज्यों का प्रतिनिधित्व · संवैधानिक प्रावधान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘विधानसभाओं में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 368’, ‘note’: ‘संविधान संशोधन की प्रक्रिया’}
- {‘article’: ’42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976′, ‘note’: ‘लोकसभा सीटों को 2001 तक फ्रीज किया’}
- {‘article’: ’84वाँ संशोधन अधिनियम, 2001′, ‘note’: ‘लोकसभा सीटों को 2026 तक फ्रीज किया’}
अवधारणा प्रवाह
जनसंख्या वृद्धि और असमान वितरण → संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में अंतर → परिसीमन आयोग द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन → संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता (वर्तमान फ्रीज हटाने हेतु) → विभिन्न राज्यों और राजनीतिक दलों की चिंताएँ/मांगें → संसद में विधेयक पारित करने के लिए आम सहमति की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के आवंटन को वर्ष 2000 तक के लिए 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया गया था।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। 42वें संशोधन ने सीटों को 1971 की जनगणना के आधार पर वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर कर दिया था, जिसे बाद में 84वें संशोधन द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया। कथन 3 गलत है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती, लेकिन उनमें प्रक्रियात्मक त्रुटि होने पर चुनौती दी जा सकती है।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
2. आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और उनके पास कानून का बल होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 2 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त। मुख्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होते हैं। कथन 2 सही है। आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और उनके पास कानून का बल होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में परिसीमन प्रक्रिया के संवैधानिक आधार और उद्देश्यों की विवेचना कीजिए। दक्षिणी राज्यों द्वारा इस प्रक्रिया पर व्यक्त की जा रही चिंताओं पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और इसके महत्व को संक्षेप में बताएं।
2. संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 का उल्लेख करें, जो परिसीमन का प्रावधान करते हैं। 42वें, 84वें और 87वें संविधान संशोधनों का संदर्भ दें जिन्होंने सीटों को स्थिर किया था।
3. परिसीमन के उद्देश्य: ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करना, जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, भौगोलिक क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व, और आरक्षित सीटों का निर्धारण।
4. दक्षिणी राज्यों की चिंताएं: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त करने वाले दक्षिणी राज्यों को कम सीटें मिलने की आशंका, जिससे उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है। संघवाद पर संभावित प्रभाव और राज्यों के बीच असंतुलन।
5. समाधान/आगे की राह: DMK द्वारा प्रस्तावित 50% सीटों में वृद्धि, राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची, और जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रोत्साहन बनाए रखने के उपायों पर चर्चा करें। एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें जो प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण दोनों को महत्व दे।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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