डीएमके ने सीमांकन विधेयक का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

DMK lays down conditions to support delimitation Bill — diagram

डीएमके ने सीमांकन विधेयक का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

परिसीमन प्रक्रियासंसदविधायी निकायराज्य विधानसभाराज्य स्तरीय निर्वाचन क्षेत्रजनगणनाजनसंख्या आधारितपरिसीमन अधिनियमविधायी ढांचासंवैधानिक संशोधनदो-तिहाई बहुमत आवश्यक
परिसीमन प्रक्रिया

✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है और वर्तमान में लोकसभा व विधानसभा सीटों का स्थगन 2026 तक 1971 की जनगणना पर आधारित है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976, 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001, लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण, जनसंख्या नियंत्रण नीति
  • Essay: भारत में संघवाद: चुनौतियाँ और भविष्य की राह, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जनसंख्या गतिशीलता का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करने की प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है और वर्तमान में लोकसभा व विधानसभा सीटों का स्थगन 2026 तक 1971 की जनगणना पर आधारित है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावना के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। ये शर्तें विपक्ष तक पहुँचने के सरकार के प्रयासों के बीच आई हैं, क्योंकि संवैधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

पृष्ठभूमि

  • परिसीमन (Delimitation) का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
  • भारत में, परिसीमन का मुख्य उद्देश्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या के समानुपातिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है, और अनुच्छेद 170 के तहत राज्यों को भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का अधिकार है।
  • बाद में, 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इस स्थगन को वर्ष 2026 तक बढ़ा दिया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को और अधिक समय मिल सके और दक्षिणी राज्यों को नुकसान न हो, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया था।
  • वर्तमान में, लोकसभा की कुल सीटें 543 हैं, जिनमें से 530 राज्यों से और 13 केंद्र शासित प्रदेशों से आती हैं।
  • पिछला परिसीमन आयोग 2002 में गठित किया गया था, जिसने 2001 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित किया था, लेकिन सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया था।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का शाब्दिक अर्थ है विधायी निकाय वाले देश या प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने की प्रक्रिया।
  • भारत में, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है। यह आयोग एक उच्च-शक्ति वाला निकाय है जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • परिसीमन आयोग में एक सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं।
  • परिसीमन का मुख्य उद्देश्य सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या के समान प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना, भौगोलिक क्षेत्रों का उचित प्रतिनिधित्व करना और आरक्षित सीटों (अनुसूचित जाति/जनजाति) को आवश्यकतानुसार समायोजित करना है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, संसद प्रत्येक जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम बनाती है। इस अधिनियम के लागू होने के बाद, केंद्र सरकार एक परिसीमन आयोग का गठन करती है।
  • अनुच्छेद 170 राज्यों को भी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का अधिकार देता है, जो संसद द्वारा बनाए गए परिसीमन अधिनियम के अनुसार होता है।
  • परिसीमन आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित किया जाता है और वे एक निश्चित तिथि से प्रभावी होते हैं। इन आदेशों को संसद या राज्य विधानसभाओं द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है।
  • वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर 2026 तक के लिए स्थिर कर दी गई है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन पर संवैधानिक रोक वर्तमान में लोकसभा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना पर आधारित है, जिस पर 2027 में समाप्त होने वाली रोक लगी हुई है। DMK इसे अगले 25 वर्षों तक जारी रखना चाहती है।
लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि DMK सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की एकमुश्त वृद्धि का समर्थन करती है, जैसा कि गृह मंत्री ने मौखिक रूप से वादा किया था।
राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची DMK चाहती है कि प्रस्तावित विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची शामिल हो।
संवैधानिक संशोधन विधेयक केंद्र सरकार परिसीमन के लिए एक संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने पर विचार कर रही है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी।
विपक्ष का समर्थन सरकार विधेयक पारित कराने के लिए विपक्षी दलों, विशेषकर DMK और कांग्रेस से समर्थन जुटाने का प्रयास कर रही है।

महत्व

राजनीतिक निहितार्थ

  • परिसीमन विधेयक का पारित होना केंद्र सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण विधायी उपलब्धि होगी, खासकर जब उसे संवैधानिक संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है।
  • DMK की शर्तें दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक चिंताओं को दर्शाती हैं, जो जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण अपनी संसदीय सीटों में कमी की आशंका रखते हैं।
  • विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और DMK के साथ सरकार का संवाद, विधायी प्रक्रिया में आम सहमति बनाने के प्रयासों को दर्शाता है।

संघीय संरचना पर प्रभाव

  • परिसीमन का मुद्दा भारत की संघीय संरचना (Federal Structure) पर गहरा प्रभाव डालता है, क्योंकि यह राज्यों के प्रतिनिधित्व को सीधे प्रभावित करता है।
  • दक्षिणी राज्यों की मांग है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता को दंडित न किया जाए, बल्कि इसके बजाय उनके प्रतिनिधित्व को संरक्षित किया जाए।

संवैधानिक महत्व

  • यह मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 से संबंधित है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए परिसीमन का प्रावधान करते हैं।
  • परिसीमन पर संवैधानिक रोक को आगे बढ़ाना या हटाना भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों पर महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है।

चुनौतियाँ

1. संसदीय बहुमत प्राप्त करना

  • संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
  • विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेस और DMK के विरोध या शर्तों के कारण विधेयक को पारित कराना मुश्किल हो सकता है।

2. जनसंख्या और प्रतिनिधित्व का संतुलन

  • जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने वाले दक्षिणी राज्यों को डर है कि नया परिसीमन उनकी संसदीय सीटों को कम कर देगा, जिससे उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान होगा।
  • जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखने और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के बीच संतुलन बनाना एक जटिल कार्य है।

3. राज्यों के बीच असंतोष

  • परिसीमन के मुद्दे पर विभिन्न राज्यों के बीच असंतोष पैदा हो सकता है, खासकर यदि दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं किया जाता है।
  • यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को कमजोर कर सकता है।

4. राजनीतिक आम सहमति का अभाव

  • परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक आम सहमति बनाना कठिन है, क्योंकि इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के निहित स्वार्थ शामिल होते हैं।
  • विधेयक के ‘रूप और सार’ पर स्पष्टता की कमी भी विपक्षी दलों के समर्थन को प्रभावित कर सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।
दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या नियंत्रण के कारण दक्षिणी राज्यों को अपनी लोकसभा सीटों में कमी का डर है।
DMK की शर्तें DMK ने विधेयक को समर्थन देने के लिए सीटों पर रोक जारी रखने और 50% वृद्धि जैसी शर्तें रखी हैं।
केंद्र-राज्य संबंध परिसीमन का मुद्दा राज्यों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है और संघीय तनाव बढ़ा सकता है।
राजनीतिक आम सहमति विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच इस संवेदनशील मुद्दे पर आम सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण है।

आगे की राह

  • सरकार को सभी हितधारकों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों और विपक्षी दलों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए ताकि उनकी चिंताओं को समझा जा सके और उनका समाधान किया जा सके।
  • एक ऐसा फार्मूला विकसित करना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित किए बिना ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखे और सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करे।
  • संवैधानिक संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार करते समय DMK द्वारा प्रस्तावित शर्तों, जैसे सीटों पर रोक जारी रखना और 50% वृद्धि, पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
  • विधेयक के प्रावधानों और राज्यों पर इसके संभावित प्रभावों के बारे में पारदर्शिता और स्पष्टता बनाए रखी जानी चाहिए ताकि राजनीतिक आम सहमति बनाई जा सके।
  • परिसीमन आयोग की सिफारिशों को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिए, जिसमें सभी राजनीतिक दलों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए।
  • दीर्घकालिक समाधानों पर विचार किया जाना चाहिए जो भारत की बदलती जनसांख्यिकी को समायोजित करते हुए संघीय संतुलन और राज्यों के प्रतिनिधित्व को बनाए रखें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनगणना · संवैधानिक संशोधन · अनुच्छेद 82 · अनुच्छेद 170 · संघवाद · प्रतिनिधित्व · जनसांख्यिकीय लाभांश · संसदीय लोकतंत्र

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 82: संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम
  • अनुच्छेद 170: राज्यों की विधानसभाओं की संरचना
  • अनुच्छेद 368: संविधान में संशोधन की शक्ति

अवधारणा प्रवाह

केंद्र सरकार परिसीमन विधेयक लाने पर विचार करती है।  →  DMK विधेयक को समर्थन देने के लिए शर्तें रखती है।  →  सरकार विधेयक पारित कराने के लिए विपक्षी समर्थन जुटाने का प्रयास करती है।  →  संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।  →  परिसीमन का मुद्दा संघीय संतुलन और राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।  →  जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. वर्तमान में लोकसभा सीटों का परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है।
3. 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन पर रोक को 2026 तक बढ़ा दिया।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। वर्तमान में लोकसभा सीटों का परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है। कथन 3 सही है। 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन पर रोक को 2026 तक बढ़ा दिया है।

Q2. परिसीमन आयोग के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
2. आयोग के आदेशों को लोकसभा और संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखा जाता है, लेकिन उनमें कोई संशोधन करने की अनुमति नहीं होती।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 2 भी सही है। आयोग के आदेशों को लोकसभा और संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखा जाता है, लेकिन उनमें कोई संशोधन करने की अनुमति नहीं होती।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ परिसीमन के उद्देश्य और प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए। भारत में लोकसभा सीटों के आगामी परिसीमन से उत्पन्न होने वाली संभावित चुनौतियों और चिंताओं का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा और संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 82, 170) से शुरुआत करें। परिसीमन आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली का उल्लेख करें। इसके बाद, आगामी परिसीमन (जो 2026 के बाद 2027 की जनगणना के आधार पर होगा) से जुड़ी चिंताओं पर प्रकाश डालें, जैसे कि दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका, जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित करना, संघवाद पर प्रभाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण की संभावना। इन चुनौतियों के संभावित समाधानों और विभिन्न हितधारकों के विचारों (जैसे DMK की शर्तें) पर भी चर्चा करें। निष्कर्ष में, निष्पक्ष और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के महत्व पर बल दें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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