तमिलनाडु में मुर्गे की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं: डीजीपी कार्यालय ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया

No blanket ban imposed on rooster fights in Tamil Nadu, DGP’s office tells Madras High Court — diagram

तमिलनाडु में मुर्गे की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं: डीजीपी कार्यालय ने मद्रास उच्च न्यायालय को बताया

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Court-Executive accountability

✎ मुर्गा लड़ाई पर पुलिस महानिदेशक का परिपत्र जुए और पशु क्रूरता को रोकने के लिए था, न कि इस पारंपरिक गतिविधि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए, जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय में स्पष्ट किया गया है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान और राजव्यवस्था  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
  • Prelims: मुर्गा लड़ाई, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, तमिलनाडु जुआ अधिनियम, मद्रास उच्च न्यायालय, राज्य पुलिस महानिदेशक, रिट याचिका
  • Essay: परंपरा और आधुनिक कानून के बीच संतुलन, पशु अधिकार और मानवीय मनोरंजन

त्वरित पुनरावृत्ति: मुर्गा लड़ाई पर पुलिस महानिदेशक का परिपत्र जुए और पशु क्रूरता को रोकने के लिए था, न कि इस पारंपरिक गतिविधि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए, जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय में स्पष्ट किया गया है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु के पुलिस महानिदेशक (DGP) कार्यालय ने मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि सितंबर 2025 में जारी उनके परिपत्र का उद्देश्य मुर्गा लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं था। इस परिपत्र का मुख्य उद्देश्य जुए और पक्षियों के प्रति क्रूरता (जैसे चाकू/ब्लेड बांधना या आँखें सिलना) को रोकना था। यह स्पष्टीकरण एक याचिका के जवाब में आया है, जिसमें याचिकाकर्ता ने ग्रामीण मंदिर उत्सवों के दौरान मुर्गा लड़ाई की अनुमति देने का आग्रह किया था।

पृष्ठभूमि

  • तमिलनाडु में मुर्गा लड़ाई एक पारंपरिक गतिविधि है, विशेषकर ग्रामीण मंदिर उत्सवों के दौरान।
  • मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने मई 2024 में अवलोकन किया था कि मुर्गा लड़ाई कई स्थानों पर सट्टेबाजी और जुए के लिए आयोजित की जा रही थी, जो तमिलनाडु जुआ अधिनियम, 1930 की धारा 12 के तहत निषिद्ध है।
  • अगस्त 2025 में, मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ ने पुलिस को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि मुर्गा लड़ाई के दौरान न तो कोई जुआ हो और न ही किसी प्रकार की क्रूरता हो, तथा कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
  • इन अदालती आदेशों के अनुपालन में, पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने सितंबर 2025 में एक परिपत्र जारी किया था।
  • याचिकाकर्ता आर. अरुण कुमार ने 2025 के परिपत्र को रद्द करने और इरोड तथा नामक्कल जिलों में ग्रामीण मंदिर उत्सवों के दौरान मुर्गा लड़ाई की अनुमति देने के लिए एक रिट याचिका दायर की थी।
  • पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने स्पष्ट किया कि परिपत्र का उद्देश्य अदालती आदेशों को लागू करना था, न कि अपनी स्वतंत्र/वैधानिक/विधायी शक्ति का प्रयोग करके मुर्गा लड़ाई के हर रूप पर प्रतिबंध लगाना।

मुर्गा लड़ाई और संबंधित कानूनी पहलू

  • मुर्गा लड़ाई एक पारंपरिक खेल है जिसमें दो मुर्गों को आपस में लड़ाया जाता है, अक्सर उनके पैरों पर तेज ब्लेड या चाकू बांधे जाते हैं।
  • भारत में, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) जानवरों के प्रति क्रूरता को प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम का उद्देश्य अनावश्यक दर्द या पीड़ा पहुँचाने वाले कृत्यों को रोकना है।
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में मुर्गा लड़ाई जैसी गतिविधियों में जानवरों के प्रति क्रूरता के पहलुओं पर विचार किया है।
  • जुआ और सट्टेबाजी से संबंधित गतिविधियाँ भारतीय कानून के तहत विभिन्न राज्य जुआ अधिनियमों (जैसे तमिलनाडु जुआ अधिनियम, 1930) द्वारा विनियमित और प्रतिबंधित हैं।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) भारतीय संविधान की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जिसके तहत न्यायालय विधायिका और कार्यपालिका द्वारा पारित कानूनों और आदेशों की संवैधानिकता की जांच कर सकते हैं।
  • रिट याचिका (Writ Petition) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत दायर की जा सकती है, ताकि मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन या अन्य कानूनी उद्देश्यों के लिए अदालती आदेश प्राप्त किए जा सकें।
  • कार्यपालिका (Executive) द्वारा जारी परिपत्र या निर्देश अक्सर मौजूदा कानूनों या अदालती आदेशों को लागू करने के लिए होते हैं, और वे स्वयं कोई नया कानून नहीं बना सकते।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मद्रास उच्च न्यायालय का स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि तमिलनाडु में मुर्गों की लड़ाई पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल जुए और पक्षियों के प्रति क्रूरता को रोकना है।
DGP/HoPF का परिपत्र (2025) यह परिपत्र मुर्गों की लड़ाई के दौरान जुए और क्रूरता (जैसे चाकू/ब्लेड बांधना, आँखें सिलना) को रोकने के लिए जारी किया गया था, न कि किसी वैध गतिविधि पर प्रतिबंध लगाने के लिए।
न्यायालय के आदेशों का अनुपालन DGP/HoPF के कार्यालय ने स्पष्ट किया कि परिपत्र न्यायालय के पूर्व आदेशों (मदुरै पीठ और चेन्नई पीठ) के अनुपालन में जारी किया गया था, न कि किसी स्वतंत्र विधायी शक्ति के तहत।
याचिका का निपटान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उस याचिका का निपटान किया जिसमें 2025 के परिपत्र को रद्द करने और मंदिर उत्सवों के दौरान मुर्गों की लड़ाई की अनुमति देने का आग्रह किया गया था।

महत्व

न्यायिक सक्रियता और शासन

  • यह मामला दर्शाता है कि कैसे न्यायपालिका (Judiciary) कार्यकारी (Executive) निकायों को उनके अधिकार क्षेत्र और शक्तियों के प्रयोग के संबंध में जवाबदेह ठहराती है।
  • यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ न्यायालय यह सुनिश्चित करते हैं कि कार्यकारी कार्रवाई कानून के दायरे में हो।

पशु कल्याण और नैतिक मुद्दे

  • यह घटना पशु क्रूरता (Animal Cruelty) की रोकथाम और पशु कल्याण कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
  • यह समाज में नैतिक मूल्यों और जानवरों के प्रति मानवीय व्यवहार को बढ़ावा देने के महत्व को दर्शाता है।

राज्य प्रशासन और कानून प्रवर्तन

  • यह राज्य पुलिस बल (State Police Force) के लिए कानून प्रवर्तन (Law Enforcement) में स्पष्टता और दिशा-निर्देशों के महत्व को उजागर करता है।
  • यह दर्शाता है कि कैसे प्रशासनिक परिपत्रों को न्यायालय के आदेशों के अनुरूप होना चाहिए और उनका उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए।

चुनौतियाँ

1. कानूनों का अस्पष्ट कार्यान्वयन

  • परिपत्र की भाषा में अस्पष्टता के कारण मुर्गों की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध की गलतफहमी पैदा हुई, जिससे कानूनी चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं।
  • यह दर्शाता है कि कार्यकारी आदेशों और परिपत्रों को स्पष्ट और सटीक होना चाहिए ताकि गलत व्याख्या से बचा जा सके।

2. परंपरा बनाम आधुनिक कानून

  • मुर्गों की लड़ाई जैसी पारंपरिक गतिविधियों को नियंत्रित करने में चुनौती, जहाँ स्थानीय रीति-रिवाज पशु कल्याण और जुआ विरोधी कानूनों के साथ टकराते हैं।
  • यह सांस्कृतिक प्रथाओं और संवैधानिक मूल्यों (जैसे पशुओं के प्रति दया) के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता को दर्शाता है।

3. पशु क्रूरता की रोकथाम

  • मुर्गों की लड़ाई में जुए और क्रूरता को पूरी तरह से रोकना एक चुनौती बनी हुई है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ ऐसी प्रथाएँ गहरी जड़ें जमा चुकी हैं।
  • प्रभावी निगरानी और प्रवर्तन तंत्र की कमी के कारण कानूनों का उल्लंघन जारी रह सकता है।

4. कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग

  • यह आशंका कि कार्यकारी निकाय (Executive Bodies) अपनी शक्तियों का प्रयोग बिना उचित कानूनी आधार के कर सकते हैं, जिससे नागरिकों के अधिकारों का हनन हो सकता है।
  • न्यायालयों की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है कि कार्यकारी कार्रवाई कानून के शासन (Rule of Law) के अनुरूप हो।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
परिपत्र की व्याख्या DGP के परिपत्र की गलत व्याख्या से भ्रम और अनावश्यक मुकदमेबाजी हुई।
पारंपरिक प्रथाओं का विनियमन मुर्गों की लड़ाई जैसी पारंपरिक गतिविधियों को विनियमित करने में संतुलन बनाना, ताकि क्रूरता और जुए को रोका जा सके, लेकिन वैध गतिविधियों पर प्रतिबंध न लगे।
कानून प्रवर्तन की चुनौतियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में जुए और पशु क्रूरता को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए पुलिस के लिए चुनौतियाँ।
न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता कार्यकारी आदेशों की वैधता और दायरे को स्पष्ट करने के लिए न्यायालयों के हस्तक्षेप की आवश्यकता।

आगे की राह

  • कार्यकारी आदेशों और परिपत्रों को स्पष्ट, सटीक और कानूनी रूप से सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए ताकि गलत व्याख्या से बचा जा सके।
  • पशु कल्याण कानूनों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, ताकि पशु क्रूरता को रोका जा सके।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों को पशु क्रूरता और जुए से संबंधित कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उचित प्रशिक्षण और संसाधन प्रदान किए जाने चाहिए।
  • पारंपरिक प्रथाओं और आधुनिक कानूनों के बीच संतुलन बनाने के लिए संवाद और परामर्श को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • न्यायपालिका को कार्यकारी कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा जारी रखनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे कानून के शासन के अनुरूप हैं।
  • पशु कल्याण बोर्ड (Animal Welfare Board) जैसी संस्थाओं को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि वे पशु क्रूरता की रोकथाम में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पशु क्रूरता निवारण · राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत · न्यायिक सक्रियता · कार्यपालिका की शक्तियाँ · मौलिक अधिकार · राज्य सूची · उच्च न्यायालय के निर्देश · कानून का शासन · परंपरागत खेल · जुआ निषेध

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण और वन्यजीवों का संरक्षण’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘जीव-जंतुओं के प्रति दया का मौलिक कर्तव्य’}

अवधारणा प्रवाह

याचिकाकर्ता ने मुर्गों की लड़ाई की अनुमति मांगी।  →  DGP के 2025 के परिपत्र पर मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्टीकरण मांगा।  →  DGP कार्यालय ने स्पष्ट किया कि परिपत्र जुए और क्रूरता को रोकने के लिए था।  →  न्यायालय ने स्पष्टीकरण दर्ज किया और याचिका का निपटान किया।  →  यह घटना न्यायिक समीक्षा और कार्यकारी जवाबदेही को दर्शाती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48 पशुधन के संरक्षण और संवर्धन से संबंधित है।
2. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशुओं पर अनावश्यक क्रूरता को रोकने का प्रावधान करता है।
3. राज्य सूची में ‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण’ विषय शामिल है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 48 राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने तथा गायों और बछड़ों एवं अन्य दुधारू तथा वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है। यह पशुधन के संरक्षण से संबंधित है।
कथन 2 सही है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, भारत में पशुओं पर अनावश्यक क्रूरता को रोकने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है।
कथन 3 सही नहीं है। ‘पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण’ विषय संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (Concurrent List) में शामिल है, न कि राज्य सूची में।

Q2. कथन (A): मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में मुर्गा लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि केवल जुए और पक्षियों के प्रति क्रूरता को रोकने का निर्देश दिया है।
कारण (R): पुलिस महानिदेशक (DGP) का कार्यालय न्यायिक आदेशों को लागू करने के लिए कार्यकारी निर्देश जारी कर सकता है, लेकिन स्वतंत्र रूप से कानून बनाने की शक्ति नहीं रखता।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — कथन (A) सही है। समाचार के अनुसार, मद्रास उच्च न्यायालय ने मुर्गा लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि केवल जुए और पक्षियों के प्रति क्रूरता (जैसे चाकू/ब्लेड बांधना या आँखें सिलना) को रोकने का निर्देश दिया है।
कारण (R) भी सही है। पुलिस महानिदेशक का कार्यालय एक कार्यकारी निकाय है जो न्यायिक आदेशों और मौजूदा कानूनों को लागू करने के लिए परिपत्र (circular) या निर्देश जारी कर सकता है, लेकिन उसके पास स्वतंत्र रूप से कानून बनाने या किसी गतिविधि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की विधायी शक्ति नहीं होती है।
कारण (R) कथन (A) का सही स्पष्टीकरण है क्योंकि DGP कार्यालय ने अपने परिपत्र में पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया, बल्कि न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप केवल क्रूरता और जुए को रोकने का प्रयास किया, जो उसकी कार्यकारी शक्तियों के दायरे में आता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और कार्यकारी शक्तियों (Executive Powers) के मध्य संतुलन स्थापित करने में उच्च न्यायालयों की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, पशु कल्याण से संबंधित मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के निहितार्थों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. न्यायिक सक्रियता की परिभाषा और उसके महत्व का संक्षिप्त परिचय दें।
2. कार्यकारी शक्तियों की प्रकृति और उसकी सीमाओं को स्पष्ट करें।
3. न्यायिक सक्रियता और कार्यकारी शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करने में उच्च न्यायालयों की भूमिका का विश्लेषण करें। इसमें न्यायिक समीक्षा (Judicial Review), रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) और नीतिगत मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप के उदाहरण शामिल करें।
4. वर्तमान संदर्भ (मुर्गा लड़ाई) का उल्लेख करते हुए पशु कल्याण से संबंधित मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप के निहितार्थों पर चर्चा करें। इसमें पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, अनुच्छेद 48ए (पर्यावरण का संरक्षण) और अनुच्छेद 51ए(जी) (प्राणियों के प्रति दया) जैसे संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करें।
5. न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को संतुलित रूप से प्रस्तुत करें, विशेषकर जब यह कार्यकारी क्षेत्र में अतिक्रमण करता प्रतीत होता है।
6. निष्कर्ष में, न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता और उसकी सीमाओं पर प्रकाश डालते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।

स्रोत: The Hindu

Tamil Nadu PCS (TNPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: तमिलनाडु में मुर्गे की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी मामले में पुलिस महानिदेशालय (DGP) कार्यालय द्वारा किस न्यायालय को सूचित किया गया है कि राज्य में ऐसा कोई प्रतिबंध लागू नहीं है?

  1. मद्रास उच्च न्यायालय
  2. सर्वोच्च न्यायालय
  3. तमिलनाडु राज्य मानवाधिकार आयोग
  4. तमिलनाडु पशु कल्याण बोर्ड

उत्तर: मद्रास उच्च न्यायालय — तमिलनाडु पुलिस महानिदेशालय (DGP) कार्यालय द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय को सूचित किया गया है कि राज्य में मुर्गे की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध लागू नहीं है।

Mains: तमिलनाडु में मुर्गे की लड़ाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी विवाद में पुलिस महानिदेशालय (DGP) कार्यालय द्वारा प्रस्तुत तर्कों का विश्लेषण करते हुए, राज्य सरकार द्वारा पशु कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है? अपने उत्तर में संबंधित कानूनी एवं प्रशासनिक उपायों पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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