08 Aug पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के लिए नीति समर्थन क्यों आवश्यक है?
✎ पारंपरिक व्यवसायों का संरक्षण न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका सुनिश्चित करने और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है, जिसके लिए मजबूत नीतिगत समर्थन अपरिहार्य…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय समाज, सामाजिक मुद्दे | GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास
- Prelims: पारंपरिक व्यवसाय, असंगठित क्षेत्र, सामाजिक समावेशन, आर्थिक सशक्तिकरण, नीतिगत समर्थन, कारीगर समुदाय, कुटीर उद्योग, ग्रामोद्योग
- Essay: बदलती अर्थव्यवस्था में पारंपरिक व्यवसायों का महत्व और चुनौतियाँ, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के लिए पारंपरिक व्यवसायों का संरक्षण
त्वरित पुनरावृत्ति: पारंपरिक व्यवसायों का संरक्षण न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका सुनिश्चित करने और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भी आवश्यक है, जिसके लिए मजबूत नीतिगत समर्थन अपरिहार्य है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
आंध्र विश्वविद्यालय में ‘बदलती अर्थव्यवस्था में पारंपरिक व्यावसायिक समुदाय: सामाजिक समावेशन और समावेशी विकास की चुनौतियाँ’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसमें विशेषज्ञों ने पारंपरिक आजीविका को सुरक्षित रखने और इन समुदायों को आर्थिक तनाव से बचाने के लिए मजबूत नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर बल दिया।
पृष्ठभूमि
- भारत में पारंपरिक व्यवसाय अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, लेकिन मशीनीकरण, कारखानों में बने उत्पाद और अनियमित आय के कारण गंभीर आर्थिक तनाव का सामना कर रहे हैं।
- बाजार तक अपर्याप्त पहुंच और बिचौलियों पर निर्भरता ने कारीगरों की आय को कम कर दिया है, जिससे लगभग 30% कारीगर अपने पारंपरिक व्यवसायों से बाहर हो गए हैं।
- सामाजिक भेदभाव अभी भी कई पारंपरिक व्यावसायिक समुदायों को प्रभावित करता है, जिससे उनके लिए समावेशी विकास की राह में बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।
- सरकार की भूमिका पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण और इन समुदायों के सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसके लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों और नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।
- भारत की विशाल ग्रामीण आबादी का एक बड़ा हिस्सा पारंपरिक व्यवसायों पर निर्भर है, जो उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनाता है।
- वैश्वीकरण और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव ने पारंपरिक कौशल और उत्पादों के लिए नए बाजार अवसर भी पैदा किए हैं, लेकिन साथ ही प्रतिस्पर्धा भी बढ़ाई है।
पारंपरिक व्यवसाय और उनका महत्व
- पारंपरिक व्यवसाय वे आजीविकाएँ हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं, अक्सर विशिष्ट कौशल, ज्ञान और सांस्कृतिक प्रथाओं से जुड़ी होती हैं। इनमें हस्तशिल्प, बुनाई, मिट्टी के बर्तन बनाना, कृषि आधारित कुटीर उद्योग और विभिन्न सामुदायिक सेवाएं शामिल हैं।
- ये व्यवसाय भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय ज्ञान प्रणालियों के संरक्षक हैं, जो देश की विविधता को दर्शाते हैं।
- पारंपरिक व्यवसाय असंगठित क्षेत्र (Unorganised Sector) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और बड़ी संख्या में लोगों, विशेषकर ग्रामीण और हाशिए पर पड़े समुदायों को रोजगार प्रदान करते हैं।
- ये स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करते हैं, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं और ग्रामीण-शहरी प्रवास को कम करने में सहायक होते हैं।
- पारंपरिक व्यवसायों का संरक्षण न केवल आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करता है, बल्कि सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) और लैंगिक समानता को भी बढ़ावा देता है, क्योंकि इनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ कार्यरत हैं।
- इन व्यवसायों को आधुनिक बाजार की चुनौतियों, जैसे सस्ते औद्योगिक उत्पादों से प्रतिस्पर्धा, कच्चे माल की कमी, और विपणन की समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
- नीतिगत समर्थन में कौशल उन्नयन, प्रौद्योगिकी का उपयोग, ऋण तक पहुंच, बाजार संपर्क और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का प्रावधान शामिल होना चाहिए ताकि इन व्यवसायों को पुनर्जीवित किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पारंपरिक व्यवसाय · नीतिगत समर्थन · सामाजिक समावेशन · समावेशी विकास · बाजार पहुंच · यंत्रीकरण का प्रभाव · आर्थिक तनाव · संवैधानिक सुरक्षा उपाय · कारीगर समुदाय · कौशल विकास · उद्यमिता प्रोत्साहन · सरकारी हस्तक्षेप
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. पारंपरिक व्यवसायों में लगे समुदायों को अक्सर यंत्रीकरण और कारखाने में बने उत्पादों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
2. अपर्याप्त बाजार पहुंच और बिचौलियों पर निर्भरता कारीगरों की आय को कम कर सकती है।
3. भारतीय संविधान पारंपरिक समुदायों के सशक्तिकरण के लिए कोई सुरक्षा उपाय प्रदान नहीं करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। पारंपरिक व्यवसायों को यंत्रीकरण और बड़े पैमाने पर उत्पादन से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। साथ ही, अपर्याप्त बाजार पहुंच और बिचौलियों पर निर्भरता उनकी आय को कम करती है। कथन 3 गलत है, भारतीय संविधान विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से कमजोर वर्गों और समुदायों के सशक्तिकरण के लिए सुरक्षा उपाय प्रदान करता है, जिसमें पारंपरिक समुदायों के अधिकार भी शामिल हो सकते हैं।
Q2. पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा उपाय सबसे प्रभावी हो सकता है?
- केवल वित्तीय सहायता प्रदान करना।
- बाजार पहुंच में सुधार और कौशल उन्नयन कार्यक्रम शुरू करना।
- यंत्रीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना।
- पारंपरिक उत्पादों के निर्यात पर उच्च शुल्क लगाना।
उत्तर: बाजार पहुंच में सुधार और कौशल उन्नयन कार्यक्रम शुरू करना। — पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के लिए केवल वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है। बाजार पहुंच में सुधार (जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मेलों के माध्यम से) और कारीगरों के कौशल को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार उन्नत करना (जैसे डिजाइन, पैकेजिंग) उन्हें बदलते बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में मदद करेगा। यंत्रीकरण पर प्रतिबंध लगाना अव्यावहारिक और विकास विरोधी है, जबकि निर्यात पर शुल्क लगाने से उनकी आय कम हो सकती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ बदलती अर्थव्यवस्था में पारंपरिक व्यवसायों के सामने आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। इन व्यवसायों को संरक्षित करने और बढ़ावा देने में नीतिगत समर्थन की भूमिका का विस्तार से वर्णन कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** पारंपरिक व्यवसायों का संक्षिप्त परिचय और भारतीय अर्थव्यवस्था, संस्कृति व सामाजिक विकास में उनका योगदान।
2. **चुनौतियाँ:**
* **आर्थिक चुनौतियाँ:** यंत्रीकरण, कारखाने में बने उत्पादों से प्रतिस्पर्धा, अनियमित आय, अपर्याप्त बाजार पहुंच, बिचौलियों पर निर्भरता, कम आय।
* **सामाजिक चुनौतियाँ:** सामाजिक भेदभाव, कौशल के प्रति घटता आकर्षण, अगली पीढ़ी का पलायन।
* **अन्य चुनौतियाँ:** कच्चे माल की उपलब्धता, ऋण तक पहुंच का अभाव, आधुनिक तकनीकों का अभाव।
3. **नीतिगत समर्थन की भूमिका:**
* **बाजार पहुंच:** ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय मेलों में भागीदारी, सरकारी खरीद में प्राथमिकता।
* **कौशल विकास और उन्नयन:** पारंपरिक कौशल को आधुनिक मांग के अनुरूप ढालने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, डिजाइन और पैकेजिंग में सुधार।
* **वित्तीय सहायता:** आसान ऋण, सब्सिडी, मुद्रा योजना जैसी योजनाएं।
* **संरक्षण और संवर्धन:** भौगोलिक संकेतक (GI) टैग, पारंपरिक कलाओं और शिल्पों के लिए विशेष बोर्ड/निगम।
* **सामाजिक सुरक्षा:** कारीगरों के लिए बीमा, पेंशन योजनाएं।
* **संवैधानिक सुरक्षा उपाय:** अनुच्छेद 19(1)(g) (पेशा चुनने की स्वतंत्रता) और राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (DPSP) जैसे अनुच्छेद 39, 43 का संदर्भ, जो आजीविका और काम के अधिकार की बात करते हैं।
* **सरकारी योजनाएं:** ‘प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना’ (PM-VIKAS), ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) जैसी पहलों का उल्लेख।
4. **निष्कर्ष:** पारंपरिक व्यवसायों के संरक्षण के महत्व पर जोर देते हुए, एक समग्र और बहुआयामी नीतिगत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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