भारत-यूरोपीय संघ ऊर्जा सहयोग: 2026 में हुई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक

विद्युत और नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा राज्यमंत्री श्रीपद नाइक ने यूरोपीय संसद की उद्योग, अनुसंधान और ऊर्जा समिति के प्रतिनि — diagram

भारत-यूरोपीय संघ ऊर्जा सहयोग: 2026 में हुई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक

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✎ भारत और यूरोपीय संघ ऊर्जा सुरक्षा, निम्न कार्बन विकास और नई प्रौद्योगिकियों के माध्यम से एक मजबूत और टिकाऊ ऊर्जा साझेदारी स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
  • Prelims: भारत-यूरोपीय संघ संबंध, ऊर्जा सुरक्षा, गैर-जीवाश्म ईंधन, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), हरित हाइड्रोजन, कार्बन बाज़ार, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर
  • Essay: ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का महत्व, जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत और यूरोपीय संघ ऊर्जा सुरक्षा, निम्न कार्बन विकास और नई प्रौद्योगिकियों के माध्यम से एक मजबूत और टिकाऊ ऊर्जा साझेदारी स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

विद्युत और नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा राज्यमंत्री श्रीपद नाइक ने 24 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में यूरोपीय संसद की उद्योग, अनुसंधान और ऊर्जा समिति (ITRE) के प्रतिनिधिमंडल के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इस बैठक में भारत और यूरोपीय संघ के बीच विद्युत क्षेत्र में चल रहे सहयोग की समीक्षा की गई और इसे और मजबूत करने के तरीकों पर चर्चा की गई, जिसमें ऊर्जा सुरक्षा, निम्न कार्बन विकास और नई प्रौद्योगिकियां प्रमुख विषय रहे।

पृष्ठभूमि

  • भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्तंभ है, जो दोनों पक्षों की ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं और जलवायु परिवर्तन लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक है।
  • भारत तेजी से अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत और विश्वसनीय ऊर्जा प्रणाली विकसित करने पर केंद्रित है।
  • भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil Fuel) आधारित ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए हैं और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDC) के लक्ष्यों को समय से पहले हासिल करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
  • यूरोपीय संघ भी जलवायु तटस्थता (Climate Neutrality) के लक्ष्यों के साथ ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) में अग्रणी भूमिका निभा रहा है, जिससे भारत के साथ सहयोग के अवसर बढ़ रहे हैं।
  • दोनों पक्ष भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) में भी महत्वपूर्ण प्रगति कर रहे हैं, जो व्यापार और निवेश संबंधों को और गहरा करेगा।
  • कार्बन बाज़ार (Carbon Market) और कार्बन मूल्य निर्धारण (Carbon Pricing) जैसे तंत्र वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन को कम करने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन गए हैं, जिन पर दोनों पक्षों के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ।
  • कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism – CBAM) यूरोपीय संघ द्वारा प्रस्तावित एक नीति है जिसका उद्देश्य उन आयातों पर कार्बन शुल्क लगाना है जो यूरोपीय संघ के भीतर उत्पादित वस्तुओं की तुलना में कम कठोर जलवायु नीतियों वाले देशों से आते हैं।

भारत-यूरोपीय संघ ऊर्जा सहयोग के प्रमुख क्षेत्र

  • ऊर्जा सुरक्षा: सुरक्षित, मजबूत और टिकाऊ ऊर्जा प्रणालियों के विकास के लिए निरंतर संवाद और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान।
  • निम्न कार्बन विकास: जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाने के लिए सहयोग।
  • परमाणु ऊर्जा: परमाणु प्रौद्योगिकियों, विशेष रूप से छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (Small Modular Reactors) में सहयोग और अनुसंधान।
  • नवीकरणीय ऊर्जा: गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता को बढ़ाना, जिसमें सौर और पवन ऊर्जा शामिल है।
  • हरित हाइड्रोजन: हरित हाइड्रोजन (Green Hydrogen) उत्पादन, भंडारण और उपयोग में प्रौद्योगिकियों का विकास और साझाकरण।
  • ऊर्जा भंडारण: दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण (Long-duration Energy Storage) समाधानों का विकास और तैनाती।
  • डिजिटल बिजली प्रणाली: स्मार्ट ग्रिड (Smart Grid) समाधानों और डिजिटल बिजली प्रणाली प्रौद्योगिकियों को अपनाना।
  • कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS): कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए इन प्रौद्योगिकियों में सहयोग।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
ऊर्जा सुरक्षा भारत और यूरोपीय संघ दोनों के लिए ऊर्जा स्रोतों की उपलब्धता, सामर्थ्य और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।
कम कार्बन विकास जलवायु परिवर्तन से निपटने और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों और नीतियों को बढ़ावा देना।
परमाणु ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाने के लिए परमाणु प्रौद्योगिकियों में सहयोग।
कार्बन बाजार और मूल्य निर्धारण कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करने वाले तंत्रों पर विचार-विमर्श।
नई प्रौद्योगिकियां दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण, डिजिटल बिजली प्रणाली, हरित हाइड्रोजन और कार्बन कैप्चर जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता व्यापार बाधाओं को कम करके आर्थिक संबंधों को मजबूत करना और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग से दोनों क्षेत्रों में निवेश और व्यापार के नए अवसर खुलेंगे, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा मिलेगा।
  • हरित प्रौद्योगिकियों के विकास और तैनाती से नई नौकरियां सृजित होंगी और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहन मिलेगा।
  • मुक्त व्यापार समझौता ऊर्जा संबंधी उत्पादों और सेवाओं के व्यापार को सुगम बनाएगा, जिससे लागत कम होगी और दक्षता बढ़ेगी।

सामरिक महत्व

  • ऊर्जा सुरक्षा पर सहयोग से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं में स्थिरता आएगी और भू-राजनीतिक जोखिम कम होंगे।
  • भारत और यूरोपीय संघ के बीच मजबूत ऊर्जा साझेदारी वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
  • यह सहयोग भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता को बढ़ाएगा और विविध ऊर्जा स्रोतों तक पहुंच सुनिश्चित करेगा।

पर्यावरणीय महत्व

  • कम कार्बन विकास और हरित प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी।
  • नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy), हरित हाइड्रोजन और परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी।
  • कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) जैसी प्रौद्योगिकियां औद्योगिक उत्सर्जन को कम करने में सहायक होंगी।

तकनीकी महत्व

  • दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण, डिजिटल बिजली प्रणाली और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों में सहयोग से नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
  • विशेषज्ञता और ज्ञान के आदान-प्रदान से दोनों पक्ष ऊर्जा क्षेत्र में नवीनतम तकनीकी प्रगति का लाभ उठा सकेंगे।
  • यह सहयोग ऊर्जा दक्षता (Energy Efficiency) में सुधार और स्मार्ट ग्रिड समाधानों के विकास में मदद करेगा।

चुनौतियाँ

1. कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM)

  • यूरोपीय संघ का CBAM भारत के निर्यात पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, खासकर ऊर्जा-गहन उद्योगों पर।
  • भारतीय उद्योगों को CBAM के अनुरूप होने के लिए अपनी उत्पादन प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं, जिससे लागत बढ़ सकती है।

2. तकनीकी हस्तांतरण और वित्तपोषण

  • उन्नत हरित प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण और तैनाती के लिए पर्याप्त वित्तपोषण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।
  • विकासशील देशों के लिए उच्च लागत वाली प्रौद्योगिकियों को अपनाना एक चुनौती हो सकती है।

3. ऊर्जा संक्रमण की गति

  • जीवाश्म ईंधन से स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में संक्रमण की गति को बनाए रखना एक चुनौती है, खासकर बढ़ती ऊर्जा मांग के संदर्भ में।
  • ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए संक्रमण को संतुलित करना महत्वपूर्ण है।

4. नियामक और नीतिगत सामंजस्य

  • भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऊर्जा नीतियों और विनियमों में सामंजस्य स्थापित करना जटिल हो सकता है।
  • कार्बन बाजारों और मूल्य निर्धारण तंत्रों पर एक साझा दृष्टिकोण विकसित करना चुनौतीपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) भारतीय निर्यात पर संभावित नकारात्मक प्रभाव और अनुपालन लागत में वृद्धि।
उन्नत प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण उच्च लागत और विकासशील देशों के लिए पर्याप्त वित्तपोषण की उपलब्धता।
ऊर्जा मिश्रण में विविधता ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना।
नीतिगत और नियामक भिन्नताएं सहयोग को सुगम बनाने के लिए दोनों पक्षों के बीच नीतियों और विनियमों में सामंजस्य स्थापित करना।
दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण बड़े पैमाने पर और लागत प्रभावी भंडारण समाधानों का विकास और तैनाती।

आगे की राह

  • कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) के प्रभावों को कम करने के लिए भारत और यूरोपीय संघ के बीच रचनात्मक संवाद और समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण अपनाना।
  • हरित प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण और तैनाती के लिए वित्तीय सहायता और तकनीकी विशेषज्ञता साझा करने हेतु एक मजबूत तंत्र स्थापित करना।
  • ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों को संतुलित करने के लिए एक साझा रोडमैप विकसित करना, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता पर जोर दिया जाए।
  • कार्बन बाजारों और कार्बन मूल्य निर्धारण पर सर्वोत्तम प्रथाओं और अनुभवों का आदान-प्रदान करना, जिससे एक प्रभावी वैश्विक कार्बन मूल्य निर्धारण प्रणाली विकसित हो सके।
  • दीर्घकालिक ऊर्जा भंडारण, डिजिटल बिजली प्रणाली और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में संयुक्त अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना।
  • भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्रता से अंतिम रूप देना, जिससे ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और व्यापार को बढ़ावा मिले।
  • नियमित उच्च-स्तरीय संवाद और विशेषज्ञ आदान-प्रदान के माध्यम से ऊर्जा साझेदारी को मजबूत करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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अवधारणा प्रवाह

भारत-यूरोपीय संघ द्विपक्षीय बैठक  →  ऊर्जा सुरक्षा और कम कार्बन विकास पर चर्चा  →  हरित प्रौद्योगिकियों और कार्बन बाजारों में सहयोग  →  भारत के NDC लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता  →  वैश्विक जलवायु लक्ष्यों की दिशा में प्रगति  →  आर्थिक संवृद्धि और सतत विकास

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के लक्ष्यों को निर्धारित समय से काफी पहले हासिल कर लिया है।
2. भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग केवल नवीकरणीय ऊर्जा तक ही सीमित है।
3. कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) एक ऐसा तंत्र है जो उन उत्पादों पर कार्बन शुल्क लगाता है जो यूरोपीय संघ में आयात किए जाते हैं और जिनके उत्पादन में उच्च कार्बन उत्सर्जन होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि भारत ने गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा क्षमता के अपने NDC लक्ष्यों को समय से पहले हासिल कर लिया है। कथन 2 गलत है क्योंकि भारत और यूरोपीय संघ के बीच सहयोग परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण और डिजिटल बिजली प्रणाली प्रौद्योगिकियों सहित कई क्षेत्रों में है। कथन 3 सही है क्योंकि CBAM का उद्देश्य यूरोपीय संघ के बाहर से आयातित वस्तुओं पर कार्बन लागत लगाना है ताकि घरेलू उद्योगों को समान अवसर मिल सकें।

Q2. भारत में ‘राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन’ का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?

  1. केवल परिवहन क्षेत्र में हाइड्रोजन के उपयोग को बढ़ावा देना।
  2. देश को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना।
  3. जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता बढ़ाना।
  4. केवल औद्योगिक क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को कम करना।

उत्तर: देश को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाना। — राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाना है, जिससे देश की ऊर्जा सुरक्षा बढ़े और डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के प्रमुख आयामों पर चर्चा कीजिए। भारत के ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों को प्राप्त करने में यह सहयोग किस प्रकार सहायक हो सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में भारत और यूरोपीय संघ के बीच ऊर्जा सहयोग के विभिन्न पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए, जैसे ऊर्जा सुरक्षा, कम कार्बन विकास, परमाणु ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, कार्बन बाजार और नई प्रौद्योगिकियां। इसके बाद, यह विश्लेषण करना होगा कि यह सहयोग भारत के ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों (जैसे गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता बढ़ाना, NDC लक्ष्य प्राप्त करना, ऊर्जा भंडारण और स्मार्ट ग्रिड अपनाना) को प्राप्त करने में कैसे योगदान दे सकता है। कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे उभरते मुद्दों पर भी चर्चा की जा सकती है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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