17 Oct मध्य प्रदेश में सीबीएन द्वारा युवाओं के लिए नशा विरोधी पांच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित
✎ मादक पदार्थ नियंत्रण में आपूर्ति में कमी (NDPS Act, 1985 के तहत कानून प्रवर्तन) और मांग में कमी (जागरूकता, निवारक शिक्षा और पुनर्वास) दोनों आवश्यक स्तंभ हैं, और CBN वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन वैध अफीम खेती के नियंत्रण…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन (सरकारी योजनाएं, केंद्र-राज्य समन्वय और सार्वजनिक नीति का क्रियान्वयन) | GS Paper II — सामाजिक न्याय (युवा कल्याण और स्वास्थ्य से जुड़े सरकारी कार्यक्रम) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (मादक पदार्थों की तस्करी और संगठित अपराध के विरुद्ध कानून प्रवर्तन)
- Prelims: केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) और राष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (NCB) के बीच अंतर, मादक औषधि और मनोविक्षेपी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act, 1985), वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग और CBN की भूमिका, नारकोटिक्स आयुक्त, ग्वालियर और अफीम की वैध खेती का लाइसेंस तंत्र, अफीम पोस्त (Opium Poppy) की खेती और नीमच-मंदसौर क्षेत्र, मांग में कमी (Demand Reduction) बनाम आपूर्ति में कमी (Supply Reduction), नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA) और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ और अपराध कार्यालय (UNODC)
- Essay: युवा शक्ति का संरक्षण: मादक पदार्थों के विरुद्ध लड़ाई में कानून प्रवर्तन और निवारक शिक्षा का संतुलन, केवल दंड नहीं, जागरूकता भी: किसी राष्ट्र को नशा मुक्त बनाने में समाज और शिक्षण संस्थानों की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: मादक पदार्थ नियंत्रण में आपूर्ति में कमी (NDPS Act, 1985 के तहत कानून प्रवर्तन) और मांग में कमी (जागरूकता, निवारक शिक्षा और पुनर्वास) दोनों आवश्यक स्तंभ हैं, और CBN वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन वैध अफीम खेती के नियंत्रण की संस्था है, जबकि मादक पदार्थ तस्करी के समन्वय का कार्य NCB करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की मध्य प्रदेश इकाई ने अक्टूबर 2026 के दौरान नीमच, जावरा, जावद, मंदसौर और गरोठ के शैक्षणिक संस्थानों में मादक पदार्थों के विरुद्ध जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। ये कार्यक्रम ‘मिशन युवा रक्षा’ के अंतर्गत चलाए गए, और इन्हें ब्रह्माकुमारीज के सहयोग से संचालित किया गया। विज्ञप्ति के अनुसार, कार्यक्रमों में नीमच के स्वामी विवेकानन्द गवर्नमेंट पीजी कॉलेज, जावरा के सरदार पटेल कॉलेज ऑफ नर्सिंग, जावद के सीएम राइज गवर्नमेंट स्कूल, मंदसौर के सबाखेड़ा स्थित सीएम राइज स्कूल और गरोठ के संस्कार वैली हायर सेकेंडरी स्कूल के सैकड़ों छात्र, शिक्षक और कर्मचारी शामिल हुए। कार्यक्रमों में मादक पदार्थों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पारिवारिक जीवन और आजीविका पर पड़ने वाले प्रभावों की वैज्ञानिक जानकारी दी गई। इस पहल का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि CBN ने प्रवर्तन गतिविधियों के साथ निवारक जागरूकता और मांग में कमी की पहलों को भी समान महत्व देने की बात कही है। यह समाचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नशा-नियंत्रण नीति के उस दृष्टिकोण को दर्शाता है जिसमें आपूर्ति पर रोक के साथ-साथ युवाओं के व्यवहार में बदलाव पर भी ज़ोर दिया जाता है।
पृष्ठभूमि
- मादक पदार्थों से जुड़े अपराधों पर नियंत्रण के लिए भारत में मादक औषधि और मनोविक्षेपी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act, 1985) प्रमुख विधिक ढांचा है। यह अधिनियम मादक पदार्थों के उत्पादन, कब्ज़े, व्यापार और तस्करी को नियंत्रित करता है।
- केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (CBN) वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अधीन कार्य करता है। इसका मुख्य कार्य अफीम, पोस्त और कुछ अन्य मादक पदार्थों की वैध खेती, लाइसेंसिंग और नियंत्रण से जुड़ा है। जबकि मादक पदार्थों की तस्करी के विरुद्ध समन्वय का मुख्य कार्य राष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो (NCB) देखता है, जो गृह मंत्रालय के अधीन है।
- नीमच और मंदसौर का क्षेत्र परंपरागत रूप से अफीम पोस्त की खेती के लिए जाना जाता है। यहां अफीम की वैध खेती और उससे जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्था में जिला अफीम अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, इसलिए इस क्षेत्र में निवारक जागरूकता का महत्व और बढ़ जाता है।
- भारत सरकार ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के नेतृत्व में नशा मुक्त भारत अभियान (NMBA) चलाया है, जो मांग में कमी, उपचार और पुनर्वास पर केंद्रित है। मिशन युवा रक्षा जैसी पहलें इसी व्यापक नशा-विरोधी ढांचे के साथ तालमेल में देखी जा सकती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ और अपराध कार्यालय (UNODC) मादक पदार्थ नियंत्रण पर संधियों के क्रियान्वयन में सहायता करता है। भारत भी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नशा-नियंत्रण संधियों का पक्षकार है।
मादक पदार्थ नियंत्रण में मांग में कमी और आपूर्ति में कमी का ढांचा क्या है?
- मादक पदार्थ नियंत्रण की नीति मुख्यतः दो स्तंभों पर आधारित है: आपूर्ति में कमी (Supply Reduction), जिसमें उत्पादन, तस्करी और व्यापार पर रोक शामिल है, और मांग में कमी (Demand Reduction), जिसमें जागरूकता, निवारक शिक्षा, परामर्श और पुनर्वास आते हैं।
- आपूर्ति में कमी का मुख्य साधन NDPS Act, 1985 है, जिसके तहत मादक पदार्थों के अवैध उत्पादन, व्यापार और तस्करी पर कठोर दंड का प्रावधान है।
- CBN की भूमिका वैध अफीम उत्पादन के नियंत्रण और लाइसेंसिंग तक सीमित है, जबकि अवैध तस्करी के विरुद्ध कार्रवाई में NCB और राज्य पुलिस प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसलिए इन संस्थाओं के कार्यक्षेत्र अलग-अलग समझने चाहिए।
- मांग में कमी के उपायों में विद्यालय और महाविद्यालय स्तर पर निवारक शिक्षा, पीयर-आधारित कार्यक्रम, परिवार और समुदाय की भागीदारी तथा स्वास्थ्य-आधारित परामर्श शामिल हैं। इसका उद्देश्य मादक पदार्थों के प्रति व्यक्ति के निर्णय को प्रभावित करना है।
- गैर-सरकारी और आध्यात्मिक संगठनों, जैसे ब्रह्माकुमारीज, की सहभागिता सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाने और सरकारी कार्यक्रमों की पहुंच बढ़ाने में उपयोगी मानी जाती है।
- शासन की दृष्टि से यह मॉडल केंद्र सरकार की एजेंसी, राज्य प्रशासन और शैक्षणिक संस्थानों के समन्वय का उदाहरण है। इसमें जिला स्तर पर जिला अफीम अधिकारी जैसे अधिकारी स्थानीय क्रियान्वयन में भूमिका निभाते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 26 जून को मादक पदार्थों के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, जो इस विषय के वैश्विक महत्व को दर्शाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| संस्थागत भूमिका: केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (Central Bureau of Narcotics) की मध्य प्रदेश इकाई | वित्त मंत्रालय के अधीन यह ब्यूरो अफीम और मादक पदार्थों से जुड़े नियंत्रण का प्रमुख केंद्रीय निकाय है। राज्य स्तर की इकाई का सक्रिय होना केंद्र-राज्य समन्वय का व्यावहारिक उदाहरण है। |
| कार्यक्रम का स्वरूप: जागरूकता और निवारक शिक्षा | कार्यक्रम प्रवर्तन (कानूनी कार्रवाई) से आगे बढ़कर मांग-कमी की रणनीति पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य मादक पदार्थों के सेवन की प्रवृत्ति को पहले से रोकना है। |
| लक्षित वर्ग: शैक्षणिक संस्थानों के छात्र, शिक्षक और कर्मचारी | युवा आबादी को प्राथमिकता देने से दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव की संभावना बढ़ती है, क्योंकि मादक पदार्थों की लत अधिकांशतः किशोरावस्था और युवावस्था में शुरू होती है। |
| भागीदार संस्था: ब्रह्माकुमारीज | स्वैच्छिक और आध्यात्मिक संगठनों की सहभागिता से सरकारी कार्यक्रमों की स्वीकार्यता बढ़ती है और सामुदायिक स्तर पर सहयोग सुदृढ़ होता है। |
| भौगोलिक विस्तार: नीमच, जावरा, जावद, मंदसौर और गरोठ | ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों तक पहुँच से यह संकेत मिलता है कि जागरूकता का दायरा केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। |
| गतिविधियों का स्वरूप: सत्र, प्रश्नोत्तर, वीडियो, प्रस्तुति, ध्यान और पोस्टर | बहुमाध्यम (multi-modal) शिक्षण से जानकारी की ग्रहणशीलता बढ़ती है और प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित होती है। |
महत्व
सामाजिक और स्वास्थ्य महत्व
- मादक पदार्थों के दुरुपयोग से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देना सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से प्राथमिक निवारक उपाय है।
- संवादात्मक और सहभागी शिक्षण से युवाओं में व्यक्तिगत जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है, जो सामूहिक सामाजिक सुरक्षा का आधार बनता है।
- परिवार, विद्यालय और समुदाय को एक साथ जोड़कर मादक पदार्थों के विरुद्ध सामाजिक पूँजी का निर्माण होता है।
प्रशासनिक और नीतिगत महत्व
- प्रवर्तन और मांग-कमी के बीच संतुलन दिखाता है कि मादक पदार्थ नियंत्रण केवल दंडात्मक उपायों से पूरा नहीं होता।
- केंद्रीय एजेंसी का राज्य स्तर पर सक्रिय होना केंद्र और राज्य प्रशासन के बीच समन्वय की कार्यप्रणाली को दर्शाता है।
- जिला अफीम अधिकारी कार्यालय जैसी स्थानीय इकाइयों की भागीदारी से नीति का क्रियान्वयन ज़मीनी स्तर तक पहुँचता है।
आर्थिक और मानव संसाधन महत्व
- मादक पदार्थों का दुरुपयोग युवाओं की शिक्षा और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। निवारक शिक्षा से मानव संसाधन की उत्पादकता की रक्षा होती है।
- स्वस्थ और सक्षम युवा कार्यबल आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) की दीर्घकालिक शर्त है।
चुनौतियाँ
1. प्रभाव का मापन और मूल्यांकन
- जागरूकता कार्यक्रमों में उपस्थिति के आँकड़े तो दर्ज होते हैं, परंतु व्यवहार में वास्तविक बदलाव को मापना कठिन है।
- प्रतिज्ञा और सकारात्मक प्रतिक्रिया को दीर्घकालिक परिणाम में बदलने के लिए फॉलो-अप तंत्र आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: सुशासन में निष्पादन मूल्यांकन और नीति-प्रभाव विश्लेषण
2. प्रवर्तन और मांग-कमी के बीच संतुलन
- आपूर्ति पर नियंत्रण और मांग में कमी, दोनों की आवश्यकता है, परंतु संसाधनों का आवंटन अक्सर प्रवर्तन की ओर झुक जाता है।
- केवल दंडात्मक दृष्टिकोण से नशे की लत से ग्रस्त व्यक्ति पुनर्वास से वंचित रह सकता है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक नीति में संतुलन
3. समन्वय की जटिलता
- मादक पदार्थ नियंत्रण में केंद्रीय एजेंसियाँ, राज्य पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग की भूमिकाएँ आपस में जुड़ी हैं।
- केंद्र और राज्य के अधिकार-क्षेत्र का स्पष्ट बँटवारा न होने पर कार्यान्वयन में दोहराव या अंतराल उत्पन्न हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद और केंद्र-राज्य समन्वय
4. ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में पहुँच
- छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य परामर्श और पुनर्वास सेवाओं की उपलब्धता सीमित हो सकती है।
- जागरूकता सत्र का लाभ तभी टिकता है जब उसके बाद परामर्श और उपचार की सुलभ व्यवस्था हो।
यूपीएससी लिंक: ग्रामीण विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच
5. युवाओं में सामाजिक और डिजिटल प्रभाव
- सामाजिक माध्यमों और साथियों के दबाव के कारण मादक पदार्थों के प्रति आकर्षण बना रह सकता है।
- औपचारिक शैक्षणिक संस्थानों के बाहर के युवाओं तक पहुँचना अपेक्षाकृत कठिन है।
यूपीएससी लिंक: युवा नीति और सामाजिक सुरक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| प्रभाव मापन | उपस्थिति के आँकड़ों से व्यवहारगत परिवर्तन का प्रमाण नहीं मिलता, इसलिए नीति के परिणाम का आकलन सीमित रहता है। |
| प्रवर्तन बनाम मांग-कमी | संसाधनों का असंतुलित आवंटन निवारक शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित कर सकता है। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | एजेंसियों के बीच भूमिका-विभाजन स्पष्ट न हो तो कार्यान्वयन में दोहराव या अंतराल आ सकता है। |
| पुनर्वास सुविधाओं का अभाव | जागरूकता के बाद परामर्श और उपचार की सुलभ व्यवस्था न होने से निवारक प्रयास अधूरे रह जाते हैं। |
| संस्थानों से बाहर के युवा | विद्यालय और महाविद्यालय से बाहर के युवा इन कार्यक्रमों की पहुँच से दूर रह जाते हैं। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- मिशन युवा रक्षा
- नशा मुक्त भारत अभियान
आगे की राह
- जागरूकता कार्यक्रमों के बाद छात्रों के लिए परामर्श और सहायता केंद्रों की स्थापना की जाए, ताकि निवारक शिक्षा का लाभ उपचार तक पहुँच में बदल सके।
- प्रभाव मूल्यांकन के लिए सर्वेक्षण-आधारित संकेतक (जैसे प्रतिभागियों के व्यवहार में परिवर्तन) विकसित किए जाएँ और उन्हें नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाए।
- प्रवर्तन एजेंसियों, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच स्पष्ट समन्वय-तंत्र और भूमिका-विभाजन निर्धारित हो।
- विद्यालय पाठ्यक्रम में जीवन-कौशल और स्वास्थ्य शिक्षा को नियमित रूप से शामिल किया जाए, ताकि जागरूकता एक बार का आयोजन न रहकर सतत प्रक्रिया बने।
- विद्यालय और महाविद्यालय से बाहर के युवाओं तक पहुँचने के लिए युवा क्लब, खेल संस्थाओं और स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों की सहभागिता बढ़ाई जाए।
- परिवारों और अभिभावकों को शामिल करने के लिए अभिभावक-शिक्षक संवाद में मादक पदार्थ निवारण को स्थायी विषय बनाया जाए।
- ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में पुनर्वास केंद्रों और प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- सामुदायिक नेतृत्व और स्थानीय स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित कर उन्हें ‘सक्रिय राजदूत’ की भूमिका में सशक्त किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मादक पदार्थ (Narcotic Drugs) · मांग-कमी (Demand Reduction) · आपूर्ति-कमी (Supply Reduction) · केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (Central Bureau of Narcotics) · मादक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act, 1985) · अनुच्छेद 47 (Article 47) · राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग-कमी कार्य योजना (National Action Plan for Drug Demand Reduction) · नशा मुक्त भारत अभियान (Nasha Mukt Bharat Abhiyaan) · निवारक शिक्षा (Preventive Education) · सार्वजनिक स्वास्थ्य बनाम अपराध-न्याय दृष्टिकोण (Public Health vs Criminal Justice Approach)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 47 — पोषाहार, स्वास्थ्य सुधार और मादक पदार्थों के हानिकारक सेवन पर राज्य का कर्तव्य
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 6 — लोक स्वास्थ्य, जिसमें राज्य की भूमिका जुड़ी है
अवधारणा प्रवाह
मादक पदार्थों के दुरुपयोग से युवाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य पर जोखिम उत्पन्न होता है। → केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की मध्य प्रदेश इकाई मिशन युवा रक्षा के अंतर्गत शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करती है। → ब्रह्माकुमारीज जैसे सहयोगी संगठनों के साथ सत्र, प्रश्नोत्तर और प्रस्तुतियों के माध्यम से वैज्ञानिक जानकारी दी जाती है। → प्रतिभागी व्यक्तिगत प्रतिज्ञा लेते हैं और परिवार व समुदाय में जागरूकता के सहयोगी बनते हैं। → निवारक शिक्षा और मांग-कमी की पहलें प्रवर्तन गतिविधियों को पूरक बनाकर नशा मुक्त भारत अभियान के उद्देश्य को आगे बढ़ाती हैं। → दीर्घकालिक परिणाम के लिए परामर्श, पुनर्वास और मूल्यांकन तंत्र के माध्यम से इन प्रयासों को सतत बनाना आवश्यक है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. Consider the following statements:
1. The Central Bureau of Narcotics functions under the Department of Revenue, Ministry of Finance.
2. The Narcotics Control Bureau functions under the Ministry of Finance.
3. Article 47 of the Constitution directs the State to bring about prohibition of the consumption of intoxicating drinks and drugs injurious to health, except for medicinal purposes.
How many of the above statements are correct?
- Only one
- Only two
- Only three
- All
उत्तर: Only two — कथन 1 सही है: केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो राजस्व विभाग (वित्त मंत्रालय) के अधीन है और अफीम की वैध खेती का नियमन करता है। कथन 2 गलत है: नारकोटिक्स नियंत्रण ब्यूरो (NCB) गृह मंत्रालय के अधीन है, जो NDPS अधिनियम के अंतर्गत मादक पदार्थों के अवैध व्यापार पर कार्रवाई करता है। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 47 राज्य के पोषाहार-स्तर और जीवन-स्तर को ऊँचा करने तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पदार्थों के प्रतिषेध का निर्देश देता है (नीति-निदेशक तत्व)। अतः उत्तर: केवल दो कथन सही हैं।
Q2. Assertion (A): Awareness programmes organised in schools and colleges form an essential component of the strategy to reduce the demand for narcotic drugs.
Reason (R): Initiation into drug use commonly occurs during adolescence and early youth, and preventive education at this stage can delay or prevent such initiation.
In the context of the above, which one of the following is correct?
- Both A and R are true and R is the correct explanation of A
- Both A and R are true but R is not the correct explanation of A
- A is true but R is false
- A is false but R is true
उत्तर: Both A and R are true and R is the correct explanation of A — A सही है: मादक पदार्थों की मांग-कमी (demand reduction) के लिए निवारक शिक्षा और जागरूकता को मुख्य उपाय माना जाता है। R भी सही है: मादक पदार्थों का सेवन प्रायः किशोरावस्था और युवावस्था में शुरू होता है, इसलिए इस आयु में निवारक शिक्षा प्रारंभ को रोकने में प्रभावी होती है। R, A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि प्रारंभ को रोकना ही मांग-कमी का मूल लक्ष्य है।
Q3. Which Article of the Constitution of India, under the Directive Principles of State Policy, directs the State to bring about prohibition of the consumption of drugs injurious to health, except for medicinal purposes?
- Article 39
- Article 42
- Article 47
- Article 51A
उत्तर: Article 47 — अनुच्छेद 47 नीति-निदेशक तत्वों के अंतर्गत आता है और राज्य के पोषाहार-स्तर, जीवन-स्तर तथा लोक-स्वास्थ्य में सुधार का कर्तव्य निर्धारित करता है। इसी में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पदार्थों के सेवन के प्रतिषेध का उल्लेख है। अनुच्छेद 39 समान आजीविका और संसाधनों के वितरण से संबंधित है, अनुच्छेद 42 कार्य की न्यायोचित व मानवीय दशाओं से, तथा अनुच्छेद 51A मौलिक कर्तव्यों से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मादक पदार्थों की समस्या को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मानना अपर्याप्त है। राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग-कमी कार्य योजना और शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रमों के संदर्भ में मांग-कमी और आपूर्ति-कमी की रणनीतियों के संतुलन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या ऐसे जागरूकता अभियान परिवार और समुदाय की सहभागिता के बिना दीर्घकालिक रूप से प्रभावी रह सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: मादक पदार्थों के प्रति संवैधानिक दृष्टिकोण। अनुच्छेद 47 (नीति-निदेशक तत्व) राज्य को स्वास्थ्य-हानिकारक मादक पदार्थों के प्रतिषेध का निर्देश देता है; अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार, स्वास्थ्य सहित) से इसका संबंध। हाल की घटना: केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की मध्य प्रदेश इकाई द्वारा नीमच, जावरा, जावद, मंदसौर और गरोठ में अक्टूबर 2026 में आयोजित पाँच कार्यक्रम, जिनमें ब्रह्माकुमारीज का सहयोग रहा।
2. वैधानिक ढाँचा: मादक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) का आपूर्ति-नियंत्रण का कठोर ढाँचा; अफीम की खेती का लाइसेंस-आधारित नियमन (मध्य प्रदेश व राजस्थान के अधिसूचित क्षेत्र); अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ: एकल अभिसमय 1961, मनःप्रभावी पदार्थ अभिसमय 1971, और अवैध व्यापार विरोधी अभिसमय 1988।
3. मांग-कमी का नीतिगत ढाँचा: राष्ट्रीय मादक पदार्थ मांग-कमी कार्य योजना (2014, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय); नशा मुक्त भारत अभियान (2020, उसी मंत्रालय द्वारा, जिसका लक्ष्य जिलों और शैक्षणिक संस्थानों में जागरूकता, पुनर्वास व सामुदायिक भागीदारी है); उपचार एवं पुनर्वास केंद्रों की भूमिका।
4. विमर्श के संतुलित पक्ष: (क) दंडात्मक/आपूर्ति-केंद्रित दृष्टिकोण: तस्करी और अवैध उत्पादन पर रोक से उपलब्धता घटती है; (ख) सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टिकोण: लत को रोग मानना, हानि-न्यूनीकरण (harm reduction) और पुनर्वास; पुर्तगाल का 2001 का विनिक्रिमिनलाइजेशन मॉडल उदाहरण के रूप में, परंतु भारत की सामाजिक-कानूनी परिस्थितियाँ भिन्न हैं, अतः इसे सीधे अपनाना विवादास्पद है। निष्कर्ष: दोनों का संतुलन आवश्यक।
5. प्रभावशीलता का परीक्षण: जागरूकता कार्यक्रमों का मूल्यांकन सहभागिता संख्या से नहीं, व्यवहार-परिवर्तन और प्रारंभ-दर में कमी से होना चाहिए। सीमाएँ: एकल-सत्र कार्यक्रमों का अल्पकालिक प्रभाव, प्रभाव-मूल्यांकन के स्पष्ट संकेतकों का अभाव, और परिवार-समुदाय की भागीदारी के बिना निरंतरता की कमी।
6. परिवार व समुदाय की भूमिका: सहपाठी प्रभाव, परिवार की निगरानी, स्थानीय स्वशासन और स्वयंसेवी संगठनों की भागीदारी; पंचायती राज संस्थाओं की सक्रिय भूमिका; ब्रह्माकुमारीज जैसे संगठनों के साथ सहयोगात्मक मॉडल का मूल्यांकन।
7. निष्कर्ष: मांग-कमी और आपूर्ति-कमी को परस्पर पूरक मानते हुए, स्थायी सफलता के लिए निवारक शिक्षा, उपचार-पुनर्वास और सामुदायिक सहभागिता की एकीकृत व्यवस्था आवश्यक है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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