मिशन ‘आगमन’: कैसे स्काईरूट के विक्रम-1 ने लिखी नई इतिहास की पटकथा, UPSC-समेत PCS परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण

मिशन ‘आगमन’: कैसे स्काईरूट के विक्रम-1 ने लिखी नई इतिहास की पटकथा, UPSC-समेत PCS परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS पेपर III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी)  |  GS पेपर III — भारतीय अर्थव्यवस्था (निजीकरण और आर्थिक विकास)
  • Prelims: विक्रम-1, स्काईरूट एयरोस्पेस, मिशन आगमन, IN-SPACe, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, निजी अंतरिक्ष क्षेत्र
  • Essay: भारत के आर्थिक विकास में निजी क्षेत्र की भूमिका, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: भारत के भविष्य का प्रवेश द्वार

त्वरित पुनरावृत्ति: विक्रम-1, स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट है, जिसने ‘मिशन आगमन’ के तहत सफलतापूर्वक उपग्रहों को कक्षा में स्थापित कर भारत को निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाले देशों की सूची में शामिल किया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, भारत के पहले निजी तौर पर विकसित कक्षीय रॉकेट ‘विक्रम-1’ ने अपनी पहली उड़ान ‘मिशन आगमन’ के तहत सफलतापूर्वक उपग्रहों को लगभग 450 किलोमीटर की कक्षा में स्थापित किया। यह उपलब्धि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक बदलाव का प्रतीक है, जो अब तक राज्य एकाधिकार से ‘बहु-अभिनेता अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र’ की ओर बढ़ रहा है। इस प्रक्षेपण के साथ, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में, ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) ऐतिहासिक रूप से कक्षीय रॉकेटों के डिजाइन, निर्माण और प्रक्षेपण का एकमात्र कार्य करता रहा है।
  • विक्रम-1 का विकास स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) नामक एक निजी भारतीय कंपनी द्वारा किया गया है, जिसने डिजाइन से लेकर विनिर्माण और अंतिम संयोजन तक सभी कार्य स्वयं किए हैं।
  • यह रॉकेट भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है।
  • यह ‘विक्रम-एस’ के बाद स्काईरूट का दूसरा रॉकेट है, जो नवंबर 2022 में ‘मिशन प्रारंभ’ के तहत प्रक्षेपित एक छोटा, एकल-चरण वाला उप-कक्षीय रॉकेट था। विक्रम-1 एक पूर्ण कक्षीय यान है, जो उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर सकता है।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर स्काईरूट एयरोस्पेस को बधाई दी, और IN-SPACe के अध्यक्ष पवन गोयनका ने इसे ‘भारत का क्षण’ बताया।

विक्रम-1 क्या है?

  • विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर विकसित कक्षीय-श्रेणी का प्रक्षेपण यान है, जिसे स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित किया गया है।
  • यह छोटे उपग्रहों के लिए एक ‘कैब सेवा’ की तरह है, जो ISRO के PSLV और GSLV जैसे बड़े सरकारी प्रक्षेपण यानों की तुलना में अधिक लचीला और मांग पर उपलब्ध है।
  • विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर है, जो वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
भारत का पहला निजी कक्षीय रॉकेट भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करता है।
स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा निर्मित निजी भारतीय कंपनियों की उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी क्षमताओं को दर्शाता है।
मिशन आगमन (Aagaman) विक्रम-1 की पहली कक्षीय उड़ान, भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर।
450 किमी की कक्षा में पेलोड स्थापित छोटे उपग्रहों के लिए सटीक और अनुकूलित कक्षीय सेवाओं की क्षमता।
विक्रम साराभाई के नाम पर भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक को श्रद्धांजलि और उनकी विरासत का सम्मान।
कार्बन-कंपोजिट सामग्री का उपयोग रॉकेट के हल्केपन और दक्षता में वृद्धि, भविष्य की प्रौद्योगिकियों का संकेत।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • निजी क्षेत्र की भागीदारी से अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में वृद्धि और नए रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
  • छोटे उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी, जिससे विदेशी मुद्रा अर्जित करने की क्षमता बढ़ेगी।
  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, जिससे लागत प्रभावी समाधान और नई सेवाओं का विकास होगा।

सामरिक महत्व

  • भारत को अमेरिका और चीन के बाद निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाला तीसरा देश बनाता है, जिससे वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में इसकी स्थिति मजबूत होती है।
  • अंतरिक्ष संपत्तियों तक पहुंच में विविधता लाकर राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को बढ़ाता है।
  • सरकारी एजेंसियों (जैसे ISRO) पर निर्भरता कम करता है, जिससे वे बड़े और अधिक जटिल मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

वैज्ञानिक और तकनीकी महत्व

  • विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण छलांग है।
  • निजी क्षेत्र द्वारा विकसित उन्नत प्रणोदन प्रणालियों (जैसे कलाम-1200, कलाम-250, कलाम-100) और सामग्री विज्ञान (कार्बन-कंपोजिट) का प्रदर्शन।
  • अंतरिक्ष अनुसंधान और विकास के लिए नए रास्ते खोलता है, जिससे वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा मिलता है।

सामाजिक महत्व

  • युवाओं और उद्यमियों को अंतरिक्ष क्षेत्र में नवाचार और करियर बनाने के लिए प्रेरित करता है।
  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के लाभों को आम जनता तक पहुंचाने में मदद करता है, जैसे बेहतर संचार, मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन।
  • भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Self-Reliant India) पहल को मजबूत करता है, जो स्वदेशी क्षमताओं के विकास पर केंद्रित है।

चुनौतियाँ

1. नियामक ढाँचा और लाइसेंसिंग

  • निजी अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए स्पष्ट और सुव्यवस्थित नियामक प्रक्रियाओं की आवश्यकता है।
  • लाइसेंसिंग और अनुमोदन में देरी से निजी कंपनियों के लिए परिचालन चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।

2. वित्तपोषण और निवेश

  • अंतरिक्ष क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए पर्याप्त निजी और सार्वजनिक निवेश आकर्षित करना।
  • उच्च जोखिम वाले अंतरिक्ष उद्यमों के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण समाधान सुनिश्चित करना।

3. बुनियादी ढाँचा और सुविधाएं

  • निजी खिलाड़ियों के लिए पर्याप्त परीक्षण सुविधाओं, प्रक्षेपण स्थलों और अन्य आवश्यक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता।
  • ISRO के साथ बुनियादी ढांचे के साझाकरण और पहुंच से संबंधित चुनौतियां।

4. मानव संसाधन और कौशल विकास

  • अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती निजी भागीदारी का समर्थन करने के लिए कुशल कार्यबल का विकास।
  • विशेषज्ञता और प्रतिभा को आकर्षित करना और बनाए रखना।

5. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रतिस्पर्धा

  • वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अन्य देशों और निजी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए उचित नीतियों का विकास।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
नियामक अस्पष्टता निजी कंपनियों के लिए परिचालन अनिश्चितता और निवेश में बाधा।
उच्च पूंजीगत लागत अंतरिक्ष परियोजनाओं के लिए पर्याप्त और सतत वित्तपोषण की आवश्यकता।
तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव उन्नत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के विकास और कार्यान्वयन के लिए कुशल कार्यबल की कमी।
सरकारी एकाधिकार से संक्रमण ISRO और निजी क्षेत्र के बीच भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का स्पष्ट सीमांकन।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने और बाजार हिस्सेदारी हासिल करने की चुनौती।
सुरक्षा और गोपनीयता निजी अंतरिक्ष मिशनों से संबंधित डेटा और प्रौद्योगिकी की सुरक्षा सुनिश्चित करना।

आगे की राह

  • एक स्पष्ट, स्थिर और पारदर्शी राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति विकसित करना जो निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दे।
  • निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए ‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस’ प्रणाली लागू करना ताकि नियामक बाधाओं को कम किया जा सके।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को प्रोत्साहित करना।
  • अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे (जैसे प्रक्षेपण स्थल, परीक्षण सुविधाएं) तक निजी खिलाड़ियों की पहुंच को सुगम बनाना।
  • अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग में कौशल विकास कार्यक्रमों को बढ़ावा देना ताकि कुशल कार्यबल तैयार किया जा सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और साझेदारी को बढ़ावा देना ताकि नवीनतम तकनीकों और वैश्विक बाजार तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।
  • छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए मांग-संचालित सेवाओं को प्रोत्साहित करना और ‘अंतरिक्ष टैक्सी’ मॉडल को बढ़ावा देना।
  • अंतरिक्ष मलबे (space debris) के प्रबंधन और सतत अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए दिशानिर्देश स्थापित करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

निजी अंतरिक्ष क्षेत्र · विक्रम-1 रॉकेट · अंतरिक्ष सुधार · IN-SPACe · आत्मनिर्भर भारत · अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था · प्रौद्योगिकी नवाचार · मेक इन इंडिया · स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र · अंतरिक्ष नीति

अवधारणा प्रवाह

सरकार का अंतरिक्ष क्षेत्र में एकाधिकार  →  IN-SPACe जैसी संस्थाओं का गठन  →  निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र का खुलना  →  स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विक्रम-1 का विकास  →  मिशन आगमन के तहत विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण  →  भारत में निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता का उदय  →  बहु-अभिनेता अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र का विकास

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. विक्रम-1 रॉकेट के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित कक्षीय रॉकेट है।
2. इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया था।
3. यह एक चार-चरणीय रॉकेट है जिसमें केवल ठोस-ईंधन वाले चरण शामिल हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 2
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं। विक्रम-1 भारत का पहला निजी तौर पर विकसित कक्षीय रॉकेट है और इसे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया था। कथन 3 गलत है क्योंकि विक्रम-1 एक चार-चरणीय रॉकेट है जिसमें तीन ठोस-ईंधन वाले चरण और एक तरल-ईंधन वाला कक्षीय समायोजन मॉड्यूल (OAM) शामिल है।

Q2. भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विक्रम-S भारत का पहला निजी रॉकेट था, जो एक उप-कक्षीय प्रक्षेपण था।
2. IN-SPACe भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की एक वाणिज्यिक शाखा है।
3. निजी कंपनियों को कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाला तीसरा देश बनने में भारत को सफलता मिली है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है, विक्रम-S स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा प्रक्षेपित भारत का पहला निजी रॉकेट था। कथन 2 गलत है, IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) ISRO की वाणिज्यिक शाखा नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने और विनियमित करने के लिए भारत सरकार की एक स्वायत्त नोडल एजेंसी है। कथन 3 गलत है, भारत अमेरिका और चीन के बाद निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाला तीसरा देश बन गया है, लेकिन यह कथन ‘निजी कंपनियों को’ के बजाय ‘भारत को’ होना चाहिए, क्योंकि यह देश की क्षमता को दर्शाता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ हाल ही में विक्रम-1 रॉकेट के सफल प्रक्षेपण ने भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक संरचनात्मक बदलाव का संकेत दिया है। भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के महत्व और इसके संभावित लाभों का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में विक्रम-1 के सफल प्रक्षेपण का उल्लेख करते हुए भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के महत्व को रेखांकित करें। दूसरे भाग में, निजी भागीदारी से होने वाले संभावित लाभों जैसे नवाचार को बढ़ावा, आर्थिक संवृद्धि, रोजगार सृजन, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के लोकतंत्रीकरण पर चर्चा करें। साथ ही, चुनौतियों और चिंताओं, यदि कोई हो, का भी उल्लेख करें, जैसे नियामक ढाँचा, सुरक्षा संबंधी मुद्दे और ISRO की भूमिका में परिवर्तन। अंत में, एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के भविष्य के लिए निजी भागीदारी के महत्व को उजागर करे।

स्रोत: Times of India


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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