26 Sep मुख्य चुनाव आयुक्त की ‘सर्वोच्च’ भूमिका: चुनाव आयुक्तों को ‘गैर-कार्यात्मक’ बना रही चुनौती
✎ भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक, बहु-सदस्यीय निकाय है जो सामूहिक रूप से कार्य करता है, जहाँ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास समान शक्तियाँ होती हैं, और निर्णय बहुमत के सिद्धांत से लिए जाते हैं, जैसा कि…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संवैधानिक निकाय, कार्यप्रणाली, उत्तरदायित्व | GS Paper II — शासन – पारदर्शिता एवं जवाबदेही
- Prelims: भारत निर्वाचन आयोग (ECI), मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC), निर्वाचन आयुक्त (EC), बहु-सदस्यीय निकाय, सामूहिक कार्यप्रणाली, एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991), टी.एन. शेषन मामला, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023, अनुच्छेद 324
- Essay: लोकतंत्र में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का महत्व, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और जवाबदेही, सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक, बहु-सदस्यीय निकाय है जो सामूहिक रूप से कार्य करता है, जहाँ मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास समान शक्तियाँ होती हैं, और निर्णय बहुमत के सिद्धांत से लिए जाते हैं, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी रेखांकित किया है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के लगभग चार दशक पुराने एक निर्णय की चर्चा पुनः सामने आई है, जिसमें न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) स्वयं को अन्य निर्वाचन आयुक्तों (Election Commissioners – ECs) से श्रेष्ठ मानता है, तो निर्वाचन आयुक्त ‘गैर-कार्यात्मक’ या ‘अलंकारिक’ बनकर रह जाएंगे। यह चर्चा भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) के भीतर कथित एकतरफा कार्यप्रणाली और आंतरिक असहमति के आरोपों के संदर्भ में हो रही है, जो आयोग के बहु-सदस्यीय और सामूहिक कार्यप्रणाली के सिद्धांत पर सवाल उठाती है।
पृष्ठभूमि
- सर्वोच्च न्यायालय ने एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991) मामले में यह महत्वपूर्ण अवलोकन किया था कि यदि भारत निर्वाचन आयोग की ‘अनन्य और अनियंत्रित’ शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथों में छोड़ दी जाती हैं, तो यह लोकतांत्रिक शासन का उल्लंघन होगा।
- टी.एन. शेषन मामले में एक संविधान पीठ ने बहु-सदस्यीय भारत निर्वाचन आयोग को बरकरार रखा था और धनोआ निर्णय के तर्क को उद्धृत किया था कि ‘विशाल विवेकाधीन शक्तियाँ, वस्तुतः बिना किसी जाँच और संतुलन के, एक व्यक्ति के हाथों में नहीं छोड़ी जानी चाहिए’।
- न्यायालय ने तर्क दिया था कि यद्यपि एक अकेला और बुद्धिमान व्यक्ति सभी दबावों का सामना करने में सक्षम हो सकता है, फिर भी निर्वाचन आयोग के मामलों को एक से अधिक हाथों में सौंपना राजनीतिक रूप से उचित है, क्योंकि यह संस्था विशाल शक्तियों से लैस है और किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है।
- टी.एन. शेषन निर्णय में यह भी कहा गया था कि निर्वाचन आयुक्त वास्तव में निर्वाचन आयोग का हिस्सा हैं और ‘निर्णय लेने में उनकी बात होनी चाहिए’। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया था कि निर्वाचन आयुक्तों की भूमिका केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सलाह देने तक सीमित है।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में भी यह परिलक्षित होता है, जिसके अनुसार भारत निर्वाचन आयोग को सर्वसम्मति से या बहुमत की राय से अपना कार्य संचालित करना होता है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त को बैठकों की अध्यक्षता इस तरह से करनी चाहिए कि वह आयोग के अपने सहयोगियों का विश्वास जीत सके और उन्हें साथ लेकर चल सके। इसके विपरीत, यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त, जो एक बहु-सदस्यीय भारत निर्वाचन आयोग का अध्यक्ष है, अन्य सदस्यों को अपने अधीनस्थ मानता है, तो यह मुश्किल साबित होगा।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) क्या है?
- भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
- इसका उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में किया गया है, जो इसे संसद, राज्य विधानसभाओं, भारत के राष्ट्रपति और भारत के उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है।
- मूल रूप से, आयोग में केवल एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त होता था।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से ही पद से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- आयोग सामूहिक रूप से कार्य करता है और सभी मामलों पर बहुमत के सिद्धांत से निर्णय लेता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के पास समान शक्तियाँ होती हैं।
- भारत निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करके भारत में लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग (Multi-member Election Commission) | लोकतांत्रिक शासन में शक्तियों के केंद्रीकरण को रोकता है और निर्णय लेने में विविधता सुनिश्चित करता है। |
| सामूहिक कार्यप्रणाली (Collegial Functioning) | मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) के बीच समान भागीदारी और निर्णय लेने में बहुमत के सिद्धांत को बढ़ावा देता है। |
| स्वतंत्रता और निष्पक्षता (Independence and Impartiality) | निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखने और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आवश्यक है। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा निर्वाचन आयोग के कामकाज की संवैधानिक वैधता की जांच, लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा करती है। |
| शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers) | कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन सुनिश्चित करता है, जिससे किसी एक अंग द्वारा मनमानी को रोका जा सके। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- निर्वाचन आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, जो चुनावों की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है।
- यह सुनिश्चित करता है कि निर्वाचन आयोग के विशाल विवेकाधीन अधिकार किसी एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित न हों, जिससे मनमानी की संभावना कम हो।
- यह निर्णय लेने की प्रक्रिया में विविधता और व्यापक विचार-विमर्श को बढ़ावा देता है, जिससे अधिक संतुलित और स्वीकार्य निर्णय लिए जा सकें।
संवैधानिक महत्व
- उच्चतम न्यायालय के निर्णय निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्थिति और उसके बहु-सदस्यीय स्वरूप को सुदृढ़ करते हैं।
- यह संविधान के अनुच्छेद 324 (Article 324) के तहत निर्वाचन आयोग को प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में संतुलन और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- यह संवैधानिक निकायों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता के सिद्धांत को बनाए रखने में मदद करता है, जो भारत के संवैधानिक ढांचे के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रशासनिक महत्व
- यह निर्वाचन आयोग के भीतर एक स्वस्थ कार्य संस्कृति को बढ़ावा देता है, जहाँ सभी सदस्य समान भागीदार होते हैं न कि अधीनस्थ।
- यह निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- यह चुनावों के कुशल और प्रभावी संचालन के लिए आवश्यक है, क्योंकि महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
चुनौतियाँ
1. मुख्य निर्वाचन आयुक्त का प्रभुत्व
- यदि मुख्य निर्वाचन आयुक्त स्वयं को अन्य निर्वाचन आयुक्तों से श्रेष्ठ मानता है, तो यह आयोग के सामूहिक कार्यप्रणाली को बाधित कर सकता है।
- यह अन्य निर्वाचन आयुक्तों को ‘गैर-कार्यात्मक’ या ‘अलंकारिक’ बना सकता है, जिससे उनकी निर्णय लेने की शक्ति सीमित हो जाती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संवैधानिक निकाय, निर्वाचन आयोग की भूमिका और कार्यप्रणाली
2. आंतरिक असहमति और टकराव
- आयोग के सदस्यों के बीच असहमति या टकराव से महत्वपूर्ण निर्णयों में देरी हो सकती है या आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
- यह निर्वाचन आयोग की सार्वजनिक छवि और उसकी निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और आंतरिक कार्यप्रणाली
3. शक्तियों का केंद्रीकरण
- एक व्यक्ति के हाथों में निर्वाचन आयोग की ‘अनन्य और अनियंत्रित’ शक्तियाँ लोकतांत्रिक शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकती हैं।
- यह निर्णय लेने की प्रक्रिया में मनमानी और पक्षपात की संभावना को बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: शक्तियों का पृथक्करण और लोकतांत्रिक सिद्धांत
4. कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023) की धारा 18 (Section 18) के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लेने की आवश्यकता का उल्लंघन।
- यह अधिनियम के उद्देश्य को कमजोर करता है, जो सामूहिक निर्णय लेने को बढ़ावा देना है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक निकायों से संबंधित कानून और उनका क्रियान्वयन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुख्य निर्वाचन आयुक्त का वर्चस्व | निर्वाचन आयुक्तों को ‘गैर-कार्यात्मक’ या ‘अलंकारिक’ बनाना, सामूहिक निर्णय लेने में बाधा। |
| एकल व्यक्ति के हाथों में शक्ति | लोकतांत्रिक शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन, मनमानी और पक्षपात की संभावना। |
| आंतरिक असहमति का प्रभाव | आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल, महत्वपूर्ण निर्णयों में देरी। |
| कानूनी प्रावधानों का अनुपालन | मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत सामूहिक निर्णय लेने की आवश्यकता का उल्लंघन। |
| संस्थागत अखंडता | निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की धारणा को कमजोर करना। |
आगे की राह
- निर्वाचन आयोग के भीतर मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच समान सम्मान और सामूहिक निर्णय लेने की संस्कृति को बढ़ावा देना।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना, जिसमें सर्वसम्मति या बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान है।
- उच्चतम न्यायालय के निर्णयों, विशेषकर एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (S.S. Dhanoa versus Union of India) और टी.एन. शेषन मामले (T.N. Seshan case) में दिए गए निर्देशों का अक्षरशः पालन करना।
- निर्वाचन आयोग के सदस्यों के बीच किसी भी असहमति को आंतरिक रूप से और रचनात्मक तरीके से हल करने के लिए एक स्पष्ट तंत्र स्थापित करना।
- निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाना, ताकि जनता का विश्वास बना रहे।
- निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और स्वतंत्र बनाना, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना कम हो।
- चुनाव सुधारों पर निरंतर विचार-विमर्श और कार्यान्वयन, ताकि निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और दक्षता बनी रहे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भारत निर्वाचन आयोग · मुख्य निर्वाचन आयुक्त · निर्वाचन आयुक्त · सामूहिक कार्यप्रणाली · एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ · टी.एन. शेषन वाद · लोकतंत्र · संवैधानिक निकाय · बहु-सदस्यीय निकाय · मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 · न्यायिक समीक्षा · शक्तियों का पृथक्करण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण’}
अवधारणा प्रवाह
उच्चतम न्यायालय की चेतावनी: ‘श्रेष्ठ’ मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को ‘गैर-कार्यात्मक’ बना सकता है। → एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991) और टी.एन. शेषन मामले में न्यायालय का निर्णय: बहु-सदस्यीय निर्वाचन आयोग (ECI) की सामूहिक कार्यप्रणाली आवश्यक। → न्यायालय का तर्क: ‘अनन्य और अनियंत्रित’ शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथों में लोकतांत्रिक शासन का उल्लंघन करती हैं। → मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18: आयोग को सर्वसम्मति या बहुमत से कार्य करना चाहिए। → वर्तमान स्थिति: मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर एकतरफा आचरण के आरोप, आयोग के भीतर घर्षण। → परिणाम: निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर संभावित प्रभाव, लोकतांत्रिक सिद्धांतों का क्षरण।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त (Election Commissioners – ECs) शामिल होते हैं।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की शक्तियाँ और वेतन समान होते हैं।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं। कथन 2 सही है। 1991 के एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ वाद और टी.एन. शेषन वाद के बाद, निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के समान शक्तियाँ और वेतन प्राप्त हैं। कथन 3 गलत है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया के समान है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने का प्रावधान अब लागू नहीं है।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि भारत निर्वाचन आयोग को सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अन्य निर्वाचन आयुक्तों को अपने अधीनस्थ नहीं समझना चाहिए।
कारण (R): भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसके पास व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ हैं और लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए इसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता आवश्यक है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991) और टी.एन. शेषन वाद में निर्वाचन आयोग के सामूहिक कार्यप्रणाली के महत्व पर जोर दिया है। कारण (R) भी सही है। निर्वाचन आयोग एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय है जिसकी व्यापक शक्तियाँ हैं, और इसकी स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। कारण (R) अभिकथन (A) का सही स्पष्टीकरण भी है, क्योंकि आयोग की व्यापक शक्तियों और लोकतंत्र में इसकी भूमिका के कारण ही सामूहिक कार्यप्रणाली आवश्यक है ताकि शक्ति किसी एक व्यक्ति के हाथ में केंद्रित न हो।
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 के संबंध में सही है?
- यह अधिनियम निर्वाचन आयोग को केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त के बहुमत से निर्णय लेने का अधिकार देता है।
- यह अधिनियम भारत निर्वाचन आयोग को सर्वसम्मति से या बहुमत की राय से अपना कार्य संचालित करने की आवश्यकता पर जोर देता है।
- यह अधिनियम निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त से अधिक शक्तियाँ प्रदान करता है।
- यह अधिनियम निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को पूरी तरह से संसद के विवेक पर छोड़ देता है।
उत्तर: यह अधिनियम भारत निर्वाचन आयोग को सर्वसम्मति से या बहुमत की राय से अपना कार्य संचालित करने की आवश्यकता पर जोर देता है। — मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 में कहा गया है कि भारत निर्वाचन आयोग को सर्वसम्मति से या बहुमत की राय से अपना कार्य संचालित करना होगा। यह निर्वाचन आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली के सिद्धांत को वैधानिक रूप से मजबूत करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति के महत्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, हाल के ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023’ के प्रावधानों का मूल्यांकन कीजिए कि यह आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कैसे प्रभावित करता है। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की संवैधानिक स्थिति और इसकी बहु-सदस्यीय संरचना (मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त) का संक्षिप्त परिचय दें।
2. बहु-सदस्यीय प्रकृति का महत्व:
– एस.एस. धनोआ बनाम भारत संघ (1991) और टी.एन. शेषन वाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों का उल्लेख करें, जिसमें ‘सामूहिक कार्यप्रणाली’ (collegial functioning) और ‘समान शक्तियों’ पर जोर दिया गया था।
– लोकतंत्र में शक्ति के केंद्रीकरण को रोकने, निर्णय लेने में विविधता लाने और आयोग की निष्पक्षता व विश्वसनीयता बनाए रखने में इसके महत्व पर प्रकाश डालें।
– अन्य बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकायों (जैसे संघ लोक सेवा आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग) से तुलना करें।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 का मूल्यांकन:
– अधिनियम की धारा 18 का उल्लेख करें जो आयोग को सर्वसम्मति या बहुमत से कार्य करने की आवश्यकता पर बल देती है, जो सामूहिक कार्यप्रणाली के सिद्धांत को वैधानिक मान्यता देता है।
– अधिनियम के अन्य प्रासंगिक प्रावधानों (जैसे नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें) का विश्लेषण करें और चर्चा करें कि ये प्रावधान आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कैसे प्रभावित कर सकते हैं (सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर)।
– सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों और अधिनियम के बीच संभावित सामंजस्य या टकराव की स्थिति का विश्लेषण करें।
4. निष्कर्ष: भारत निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सामूहिक कार्यप्रणाली के महत्व को दोहराते हुए एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें, और भविष्य की चुनौतियों व सुधारों पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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