08 Aug मेकेडाटू परियोजना: सीडब्ल्यूसी ने कर्नाटक से संशोधित डीपीआर मांगा, जानिए पूरा मामला
✎ मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना है, जो कावेरी जल विवाद और अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन के संदर्भ में केंद्रीय जल आयोग के अनुमोदन की प्रतीक्षा कर रही है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद | GS Paper III — पर्यावरण: पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन, जल संसाधन प्रबंधन
- Prelims: मेकेदाटू परियोजना, कावेरी जल विवाद, केंद्रीय जल आयोग (CWC), कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), उपभोक्ता जल उपयोग
- Essay: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान: चुनौतियाँ और आगे की राह, संघवाद और जल संसाधन प्रबंधन: एक संतुलनकारी कार्य
त्वरित पुनरावृत्ति: मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना है, जो कावेरी जल विवाद और अंतर-राज्यीय जल प्रबंधन के संदर्भ में केंद्रीय जल आयोग के अनुमोदन की प्रतीक्षा कर रही है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदाटू संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना की संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को वापस कर दिया है। आयोग ने कर्नाटक से कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और अपनी टिप्पणियों के अनुपालन में एक संशोधित DPR प्रस्तुत करने को कहा है। CWC ने पाया है कि परियोजना में प्रस्तावित उपभोक्ता जल उपयोग (consumptive use of water) आवंटित मात्रा से अधिक है।
पृष्ठभूमि
- मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक संतुलन जलाशय और पेयजल परियोजना है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु महानगरीय क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना है।
- इस परियोजना को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है, क्योंकि तमिलनाडु का मानना है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम निर्णय का उल्लंघन करती है।
- कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन 1990 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था ताकि कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विवादों का समाधान किया जा सके।
- सर्वोच्च न्यायालय ने 16 फरवरी, 2018 को अपने आदेश में कर्नाटक के शहरी और ग्रामीण आबादी के लिए कुल 6.5 tmcft (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) उपभोक्ता जल उपयोग को अंतिम रूप दिया और आवंटित किया था।
- कर्नाटक ने जनवरी 2019 में पहली बार CWC को DPR प्रस्तुत की थी, जिसमें 4.75 tmcft अतिरिक्त उपभोक्ता जल उपयोग का प्रस्ताव था।
- बाद में, 21 अप्रैल, 2026 को संशोधित योजना में शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना जैसे अतिरिक्त घटक शामिल किए गए और प्रस्तावित उपभोक्ता उपयोग को बढ़ाकर 6.95 tmcft कर दिया गया, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवंटित मात्रा से अधिक है।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) और अंतर-राज्यीय जल विवाद
- केंद्रीय जल आयोग जल संसाधन के क्षेत्र में देश का एक प्रमुख तकनीकी संगठन है, जो जल संसाधन विकास और प्रबंधन के लिए विभिन्न राज्यों को तकनीकी सलाह प्रदान करता है।
- यह सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, नेविगेशन, पेयजल आपूर्ति और जल शक्ति विकास के लिए परियोजनाओं की योजना, जांच, डिजाइन, निगरानी और मूल्यांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद (Inter-State Water Disputes) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 262 के तहत संसद को अंतर-राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने की शक्ति प्रदान की गई है।
- संसद ने इस शक्ति का प्रयोग करते हुए नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 अधिनियमित किए हैं।
- अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 केंद्र सरकार को किसी भी अंतर-राज्यीय नदी विवाद के समाधान के लिए एक न्यायाधिकरण (Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।
- इन न्यायाधिकरणों के निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होते हैं, और सर्वोच्च न्यायालय आमतौर पर इन विवादों में हस्तक्षेप नहीं करता है, हालांकि, न्यायाधिकरण के निर्णय की व्याख्या या कार्यान्वयन से संबंधित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका हो सकती है।
- DPR (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) किसी भी बड़ी परियोजना के लिए एक विस्तृत दस्तावेज होता है, जिसमें परियोजना के सभी तकनीकी, आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं का विस्तृत विवरण होता है, जो अनुमोदन के लिए आवश्यक होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मेकेदाटू परियोजना का उद्देश्य | बेंगलुरु महानगरीय क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना। |
| परियोजना की क्षमता (प्रारंभिक) | 4.75 tmcft (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) अतिरिक्त उपभोग्य जल। |
| संशोधित परियोजना की क्षमता | 6.95 tmcft अतिरिक्त उपभोग्य जल। |
| कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का आवंटन | कर्नाटक के शहरी और ग्रामीण आबादी के लिए कुल 6.5 tmcft उपभोग्य जल। |
| केंद्रीय जल आयोग (CWC) की आपत्ति | प्रस्तावित उपभोग्य जल आवंटन से अधिक है। |
| परियोजना के अतिरिक्त घटक | शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना और कावेरी नदी पर डायवर्जन वियर। |
महत्व
जल सुरक्षा और शहरीकरण
- बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते महानगरों के लिए पेयजल की बढ़ती मांग को पूरा करने में परियोजना का महत्व है।
- शहरीकरण के कारण जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव को प्रबंधित करने की चुनौती को उजागर करता है।
अंतर-राज्यीय जल विवाद
- यह परियोजना कावेरी नदी जल विवाद में कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चल रहे तनाव का एक और उदाहरण है।
- न्यायाधिकरण के निर्णयों और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- नदी घाटी परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव, जैसे कि पारिस्थितिकी तंत्र पर असर और विस्थापन, महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु हैं।
- सतत जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।
संघवाद और संस्थागत भूमिका
- केंद्रीय जल आयोग (CWC) जैसी केंद्रीय संस्थाओं की भूमिका अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान और परियोजना मूल्यांकन में महत्वपूर्ण है।
- सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांतों के तहत राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय की आवश्यकता को दर्शाता है।
चुनौतियाँ
1. अंतर-राज्यीय जल विवाद
- कावेरी जल विवाद एक दीर्घकालिक और संवेदनशील मुद्दा है, जिसमें राज्यों के बीच विश्वास की कमी एक बड़ी बाधा है।
- सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और न्यायाधिकरण के निर्णयों का अनुपालन सुनिश्चित करना जटिल है, खासकर जब राज्य अपनी आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध
2. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव
- बड़े बांधों और जलाशयों के निर्माण से वनों का कटाव, जैव विविधता का नुकसान और स्थानीय समुदायों का विस्थापन हो सकता है।
- परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और सामाजिक प्रभाव आकलन (SIA) की पारदर्शिता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रभाव आकलन, सतत विकास
3. तकनीकी और वित्तीय व्यवहार्यता
- परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता, विशेष रूप से जल उपलब्धता और भंडारण क्षमता के निर्धारण में सटीकता महत्वपूर्ण है।
- परियोजनाओं की लागत में वृद्धि और वित्तपोषण के मुद्दे अक्सर देरी और लागत में वृद्धि का कारण बनते हैं।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढांचा विकास, परियोजना प्रबंधन
4. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव और जल उपलब्धता की अनिश्चितता नदी घाटी परियोजनाओं की दीर्घकालिक योजना को प्रभावित करती है।
- भविष्य की जल आवश्यकताओं का अनुमान लगाना और उसके अनुसार परियोजनाओं को डिजाइन करना एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, जल संसाधन प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल आवंटन से अधिक प्रस्तावित उपयोग | कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन। |
| संशोधित DPR में अतिरिक्त घटक | परियोजना के दायरे में वृद्धि और इसके संभावित प्रभावों पर नए सिरे से मूल्यांकन की आवश्यकता। |
| भंडारण क्षमता का आधार | प्रस्तावित मेकेदाटू जलाशय की लाइव स्टोरेज क्षमता के निर्धारण में उचित आधार की कमी। |
| अंतर-राज्यीय सहमति का अभाव | तमिलनाडु द्वारा परियोजना पर लगातार आपत्ति, जिससे विवाद और बढ़ सकता है। |
| पेयजल बनाम अन्य उपयोग | पेयजल के लिए जल के उपयोग को प्राथमिकता देने और अन्य उपयोगों (जैसे बिजली उत्पादन) के बीच संतुलन स्थापित करना। |
आगे की राह
- केंद्रीय जल आयोग (CWC) के निर्देशों का पालन करते हुए कर्नाटक को संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) प्रस्तुत करनी चाहिए, जिसमें सभी आपत्तियों का समाधान हो।
- राज्यों को जल विवादों के समाधान के लिए संवाद और सहयोग का मार्ग अपनाना चाहिए, जिससे सहकारी संघवाद मजबूत हो।
- परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन और पारदर्शी मूल्यांकन किया जाना चाहिए, जिसमें सभी हितधारकों की भागीदारी सुनिश्चित हो।
- जल संसाधनों के कुशल उपयोग और प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों, जैसे वर्षा जल संचयन और अपशिष्ट जल उपचार, को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए जल संसाधन प्रबंधन योजनाओं को लचीला और अनुकूलनीय बनाया जाना चाहिए।
- न्यायाधिकरणों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का सम्मान और अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
- अंतर-राज्यीय जल विवादों के स्थायी समाधान के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय जल नीति की आवश्यकता है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मेकेदाटू परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · केंद्रीय जल आयोग (CWC) · विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) · कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · जल आवंटन · सहकारी संघवाद · पर्यावरण प्रभाव आकलन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
अवधारणा प्रवाह
कर्नाटक ने मेकेदाटू परियोजना का DPR CWC को सौंपा। → CWC ने प्रस्तावित जल उपयोग को आवंटन से अधिक पाया। → CWC ने संशोधित DPR जमा करने का निर्देश दिया। → परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के आवंटन का उल्लंघन करती है। → अंतर-राज्यीय जल विवाद और केंद्रीय संस्था की भूमिका उजागर हुई।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेकेदाटू परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
2. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था।
3. केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन एक तकनीकी संगठन है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। मेकेदाटू परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर एक संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना के रूप में प्रस्तावित है। कथन 2 सही है। CWDT का गठन अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था, जो राज्यों के बीच जल विवादों को सुलझाने के लिए एक वैधानिक तंत्र प्रदान करता है। कथन 3 सही है। CWC जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन एक प्रमुख तकनीकी संगठन है, जो देश में जल संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित है।
Q2. अभिकथन (A): केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कर्नाटक की मेकेदाटू परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को वापस कर दिया है।
कारण (R): प्रस्तावित परियोजना में जल का उपभोग आवंटन से अधिक है और यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय का अनुपालन नहीं करती है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि CWC ने कर्नाटक की DPR को वापस कर दिया है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि CWC ने पाया कि प्रस्तावित उपभोग्य जल आवंटन से अधिक था और यह CWDT के निर्णय के अनुरूप नहीं था। इस प्रकार, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। मेकेदाटू परियोजना के संदर्भ में, ऐसे विवादों को सुलझाने में आने वाली चुनौतियों और सहकारी संघवाद के महत्व पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: अंतर-राज्यीय जल विवादों का संक्षिप्त उल्लेख और CWC की भूमिका का संदर्भ।
2. CWC की भूमिका: अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के समाधान में CWC की तकनीकी और सलाहकार भूमिका का विस्तार से वर्णन करें (जैसे DPR की समीक्षा, जल उपलब्धता का आकलन, तकनीकी मार्गदर्शन)।
3. मेकेदाटू परियोजना का संदर्भ: मेकेदाटू परियोजना के मामले को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें, जिसमें CWC द्वारा DPR को वापस करने के कारणों (अधिक जल उपभोग, CWDT निर्णय का उल्लंघन) का उल्लेख हो।
4. चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय जल विवादों को सुलझाने में आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डालें (जैसे राज्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, तकनीकी जटिलताएँ, ऐतिहासिक दावे, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अनुपालन)।
5. सहकारी संघवाद का महत्व: इन विवादों के स्थायी समाधान के लिए सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के सिद्धांतों (जैसे राज्यों के बीच संवाद, विश्वास निर्माण, साझा हित) की आवश्यकता पर बल दें।
6. निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो विवादों के समाधान के लिए एक समग्र दृष्टिकोण और संवैधानिक तंत्रों के प्रभावी उपयोग पर जोर दे।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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