मेकेडाटू बाँध पर केंद्र सरकार का रुख, लोकसभा में भी दोहराया पुराना बयान

Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok Sabha too — labelled illustration

मेकेडाटू बाँध पर केंद्र सरकार का रुख, लोकसभा में भी दोहराया पुराना बयान

3D cutaway: Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok Sa
3D cutaway: Centre sticks to its stand on the Mekedatu dam project, reiterates its reply in the Lok Sa

Mekedatu dam  ·  Cauvery river  ·  Lok Sabha  ·  Supreme Court  ·  CWDT Award

✎ मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जो अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के कावेरी जल विवाद निर्णय के तहत केंद्र-राज्य संबंधों और संघवाद की…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, अंतर-राज्यीय संबंध, केंद्र-राज्य संबंध  |  GS Paper III — जल संसाधन, पर्यावरण
  • Prelims: मेकेदाटू बांध परियोजना, कावेरी नदी जल विवाद, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, अनुच्छेद 262, रिपेरियन राज्य, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (2018), जल शक्ति मंत्रालय
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ: अंतर-राज्यीय विवादों का प्रबंधन, जल सुरक्षा और अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद: समाधान के मार्ग

त्वरित पुनरावृत्ति: मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जो अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 और सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के कावेरी जल विवाद निर्णय के तहत केंद्र-राज्य संबंधों और संघवाद की चुनौतियों को उजागर करती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने हाल ही में लोकसभा में मेकेदाटू बांध परियोजना (Mekedatu Dam Project) पर अपने रुख को दोहराया है, जो उसने पहले राज्यसभा में भी व्यक्त किया था। केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि सर्वोच्च न्यायालय के फरवरी 2018 के कावेरी जल विवाद (Cauvery Water Dispute) पर दिए गए निर्णय में यह उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक राज्य को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए अन्य रिपेरियन राज्यों (riparian states) जैसे तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी से सहमति प्राप्त करने की आवश्यकता है। तमिलनाडु सरकार और किसानों के संगठनों ने इस परियोजना के संभावित प्रभावों पर चिंता व्यक्त की है, जिसके बाद यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदाटू बांध परियोजना कर्नाटक द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु शहर की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना और बिजली उत्पन्न करना है।
  • कावेरी नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • इस विवाद का लंबा इतिहास है, जिसमें औपनिवेशिक काल के समझौते, विभिन्न न्यायाधिकरणों के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप शामिल हैं।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal – CWDT) का गठन 1990 में किया गया था, जिसने 2007 में अपना अंतिम अधिनिर्णय (final award) दिया था।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2018 में CWDT के अधिनिर्णय को संशोधित करते हुए एक निर्णय दिया था, जिसमें राज्यों के बीच जल बंटवारे को अंतिम रूप दिया गया था।
  • तमिलनाडु का तर्क है कि मेकेदाटू परियोजना CWDT के अधिनिर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा स्थापित विनियमित प्रवाह व्यवस्था (regulated flow regime) को प्रभावित करेगी और निचले तटवर्ती राज्यों (lower riparian states) को निर्धारित जल आपूर्ति को बाधित करेगी।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित है। यह संसद को कानून द्वारा किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के पानी के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से संबंधित किसी भी विवाद या शिकायत के न्यायनिर्णयन का प्रावधान करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 262 (2) संसद को यह भी अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे विवाद में सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय के क्षेत्राधिकार को बाहर कर सकती है।
  • इस संवैधानिक प्रावधान के तहत, संसद ने अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956) अधिनियमित किया है।
  • यह अधिनियम केंद्र सरकार को किसी भी राज्य सरकार द्वारा अनुरोध प्राप्त होने पर एक अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरण (Inter-State River Water Disputes Tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है, यदि बातचीत से समाधान नहीं हो पाता है।
  • न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम और विवाद में शामिल पक्षों पर बाध्यकारी होता है। अधिनियम के तहत, न्यायाधिकरण के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने न्यायिक समीक्षा (judicial review) के अधिकार का प्रयोग करते हुए न्यायाधिकरण के निर्णयों की समीक्षा की है।
  • जल शक्ति मंत्रालय (Ministry of Jal Shakti) केंद्र सरकार में अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों के प्रबंधन और समाधान के लिए नोडल मंत्रालय है।
  • रिपेरियन राज्य वे राज्य होते हैं जिनके क्षेत्र से कोई नदी बहती है या जिसकी सीमा से होकर गुजरती है। इन राज्यों को नदी के जल के उपयोग का अधिकार होता है, लेकिन उन्हें अन्य रिपेरियन राज्यों के अधिकारों का भी सम्मान करना होता है।
  • संघवाद (Federalism) के सिद्धांत के तहत, केंद्र सरकार की भूमिका अंतर-राज्यीय विवादों को सुलझाने और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने की होती है, विशेषकर साझा प्राकृतिक संसाधनों जैसे नदी जल के संबंध में।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित बांध, जिसका उद्देश्य बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करना है।
कावेरी जल विवाद कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के बीच कावेरी नदी के जल बँटवारे को लेकर चल रहा एक दीर्घकालिक अंतर-राज्यीय विवाद।
उच्चतम न्यायालय का 2018 का निर्णय कावेरी जल विवाद पर उच्चतम न्यायालय का अंतिम निर्णय, जिसमें कहा गया है कि कर्नाटक को किसी भी संरचना के निर्माण के लिए अन्य राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है।
अंतर-राज्यीय जल विवाद भारतीय संघवाद की एक जटिल चुनौती, जिसमें राज्यों के बीच नदी जल के बँटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।
निचले तटवर्ती राज्य वे राज्य जो नदी के बहाव के निचले हिस्से में स्थित हैं और ऊपरी तटवर्ती राज्यों द्वारा किए गए किसी भी निर्माण से प्रभावित हो सकते हैं।
संघीय सरकार की भूमिका अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में केंद्र सरकार की मध्यस्थता और संवैधानिक प्रावधानों को लागू करने की भूमिका।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • यह परियोजना बेंगलुरु जैसे बड़े शहरी केंद्रों की बढ़ती पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायक हो सकती है, जिससे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलेगा।
  • कृषि और अन्य उद्योगों के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित करना, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को बढ़ावा मिल सकता है।

सामाजिक महत्व

  • बेंगलुरु की आबादी के लिए पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक आवश्यकता है।
  • हालांकि, निचले तटवर्ती राज्यों में पेयजल और कृषि के लिए जल की कमी से सामाजिक अशांति और संघर्ष बढ़ सकता है।

पर्यावरणीय महत्व

  • बांध निर्माण से नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और जैव विविधता (Biodiversity) पर प्रभाव पड़ सकता है, जिससे पर्यावरण संतुलन प्रभावित होगा।
  • नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव से डेल्टा क्षेत्रों की पारिस्थितिकी और कृषि पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

राजव्यवस्था और शासन

  • यह मामला अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में संघीय ढांचे की जटिलताओं को उजागर करता है।
  • उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का पालन और केंद्र सरकार की मध्यस्थता की भूमिका भारतीय राजव्यवस्था में महत्वपूर्ण है।

संघीय संबंध

  • यह विवाद केंद्र-राज्य संबंधों और विभिन्न राज्यों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा के गतिशीलता को दर्शाता है।
  • राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग की कमी से संघीय संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • कावेरी जल विवाद एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है जो कई दशकों से चला आ रहा है।
  • राज्यों के बीच जल बँटवारे को लेकर सहमति का अभाव और ऐतिहासिक दावे विवाद को और गहरा करते हैं।

2. उच्चतम न्यायालय के निर्णय की व्याख्या

  • केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय की व्याख्या को लेकर मतभेद हैं।
  • कर्नाटक का तर्क है कि उसे अन्य राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं है, जबकि तमिलनाडु का मानना है कि परियोजना के लिए सहमति अनिवार्य है।

3. निचले तटवर्ती राज्यों पर प्रभाव

  • तमिलनाडु का तर्क है कि मेकेदाटू परियोजना कावेरी डेल्टा क्षेत्र में जल उपलब्धता, विशेषकर पेयजल और कृषि के लिए, को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
  • यह परियोजना निचले तटवर्ती राज्यों के जल अधिकारों और उनकी आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

4. राजनीतिकरण

  • अंतर-राज्यीय जल विवाद अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं, जिससे समाधान खोजना और भी मुश्किल हो जाता है।
  • राज्यों में राजनीतिक दल इन मुद्दों का उपयोग अपनी चुनावी संभावनाओं को मजबूत करने के लिए करते हैं।

5. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

  • बांध निर्माण से विस्थापन, वनस्पति और जीव-जंतुओं पर प्रभाव, तथा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव जैसी पर्यावरणीय चिंताएँ जुड़ी हुई हैं।
  • परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय समुदायों के पुनर्वास और मुआवजे का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जल बँटवारा कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) और उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बावजूद राज्यों के बीच सहमति का अभाव।
निचले तटवर्ती राज्यों के अधिकार तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे निचले तटवर्ती राज्यों को पर्याप्त जल प्रवाह सुनिश्चित करने की आवश्यकता।
उच्चतम न्यायालय के निर्णय की व्याख्या केंद्र और राज्यों के बीच निर्णय के विशिष्ट खंडों की व्याख्या को लेकर मतभेद।
पर्यावरणीय प्रभाव बांध निर्माण से नदी के पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और डेल्टा क्षेत्रों पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
राजनीतिक गतिरोध राज्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और चुनावी हितों के कारण समाधान में देरी।
पेयजल सुरक्षा बेंगलुरु की बढ़ती पेयजल आवश्यकताओं और निचले तटवर्ती राज्यों में जल की कमी के बीच संतुलन।

आगे की राह

  • केंद्र सरकार को सभी हितधारक राज्यों के साथ एक व्यापक संवाद प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ताकि आपसी सहमति बन सके।
  • उच्चतम न्यायालय के निर्णय के प्रावधानों की स्पष्ट और सर्वमान्य व्याख्या के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है।
  • जल संसाधन प्रबंधन के लिए एक एकीकृत नदी बेसिन दृष्टिकोण (Integrated River Basin Approach) अपनाया जाना चाहिए, जिसमें सभी राज्यों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाए।
  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) और सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए।
  • राज्यों को जल संरक्षण (Water Conservation) और जल उपयोग दक्षता (Water Use Efficiency) को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, विशेषकर कृषि क्षेत्र में।
  • विवादों के त्वरित और प्रभावी समाधान के लिए एक स्थायी अंतर-राज्यीय जल विवाद समाधान तंत्र (Inter-State Water Dispute Resolution Mechanism) स्थापित किया जाना चाहिए।
  • नदी जल बँटवारे के वैज्ञानिक और तकनीकी पहलुओं पर आधारित निर्णय लेने के लिए डेटा और अनुसंधान को मजबूत करना।
  • राज्यों के बीच विश्वास बहाली के उपायों को बढ़ावा देना और सहयोग के लिए एक मंच प्रदान करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मेकेदाटू बांध परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · संघवाद · सहकारी संघवाद · न्यायिक समीक्षा · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · निचले तटवर्ती राज्य · ऊपरी तटवर्ती राज्य · अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम · जल शक्ति मंत्रालय · पर्यावरण प्रभाव आकलन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘नोट’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन।’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 131’, ‘नोट’: ‘राज्यों के बीच विवादों में उच्चतम न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार।’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘नोट’: ‘अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council) का गठन, विवादों की जाँच और सलाह।’}
  • {‘Article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची II, प्रविष्टि 17)’, ‘नोट’: ‘राज्यों को जल पर कानून बनाने की शक्ति।’}
  • {‘Article’: ‘सातवीं अनुसूची (सूची I, प्रविष्टि 56)’, ‘नोट’: ‘अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास पर संघ की शक्ति।’}

अवधारणा प्रवाह

कर्नाटक द्वारा मेकेदाटू बांध परियोजना का प्रस्ताव  →  बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने का उद्देश्य  →  तमिलनाडु द्वारा परियोजना पर आपत्ति  →  कावेरी डेल्टा क्षेत्र पर संभावित नकारात्मक प्रभाव की चिंता  →  केंद्र सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के 2018 के निर्णय का हवाला  →  निचले तटवर्ती राज्यों की सहमति की आवश्यकता नहीं होने का तर्क  →  तमिलनाडु द्वारा निर्णय की भिन्न व्याख्या और प्रधानमंत्री को पत्र  →  अंतर-राज्यीय जल विवाद का राजनीतिकरण और संघीय तनाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेकेदाटू बांध परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा प्रस्तावित है।
2. कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (Cauvery Water Disputes Tribunal) के अंतिम अधिनिर्णय में कर्नाटक को अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति के बिना कोई भी संरचना बनाने की अनुमति नहीं है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के अपने निर्णय में कहा कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर कोई भी संरचना बनाने के लिए अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। मेकेदाटू बांध परियोजना कर्नाटक द्वारा बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कावेरी नदी पर प्रस्तावित है। कथन 2 गलत है। न्यायाधिकरण के अधिनिर्णय में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो कर्नाटक को अन्य राज्यों की सहमति के बिना संरचना बनाने से रोके। कथन 3 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के अपने निर्णय में कहा था कि न्यायाधिकरण के अंतिम अधिनिर्णय में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कर्नाटक को कावेरी नदी पर किसी भी प्रकार की संरचना के निर्माण के लिए तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी जैसे अन्य तटवर्ती राज्यों की सहमति प्राप्त करनी होगी।

Q2. कथन (A): अंतर-राज्यीय जल विवाद भारत में सहकारी संघवाद के समक्ष एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जिससे राज्यों की स्वायत्तता सीमित होती है।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — कथन (A) सही है क्योंकि अंतर-राज्यीय जल विवाद राज्यों के बीच तनाव पैदा करते हैं और सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करते हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 262 संसद को ऐसे विवादों के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जैसे कि अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State River Water Disputes Act, 1956)। हालांकि, R, A की सही व्याख्या नहीं है। अनुच्छेद 262 का उद्देश्य विवादों का समाधान प्रदान करना है, न कि राज्यों की स्वायत्तता को सीमित करना। विवादों का समाधान न हो पाना सहकारी संघवाद के लिए चुनौती है, न कि अनुच्छेद 262 का अस्तित्व।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद भारत में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के समक्ष एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। मेकेदाटू बांध परियोजना के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और ऐसे विवादों के समाधान के लिए संवैधानिक तथा विधिक तंत्रों पर प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में अंतर-राज्यीय जल विवादों को सहकारी संघवाद के लिए चुनौती के रूप में स्थापित करना होगा। मेकेदाटू बांध परियोजना को एक समकालीन उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करें, जिसमें कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद के मुख्य बिंदुओं (पेयजल बनाम सिंचाई, निचले तटवर्ती राज्यों के अधिकार) का उल्लेख हो। संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 262) और विधिक तंत्रों (अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956, जल विवाद न्यायाधिकरणों की भूमिका) की विस्तृत चर्चा करें। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों (विशेषकर 2018 का कावेरी निर्णय) का उल्लेख करें। समाधान के लिए सुझावों में बातचीत, डेटा साझाकरण, एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन और स्थायी न्यायाधिकरणों की आवश्यकता शामिल हो सकती है। अंत में, सहकारी संघवाद को मजबूत करने के लिए इन तंत्रों के प्रभावी कार्यान्वयन के महत्व पर बल दें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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