24 Sep विदेश मंत्री जयशंकर की यूरोप के चार विदेश मंत्रियों से द्विपक्षीय वार्ता, भारत-ईयू एफटीए पर चर्चा
✎ भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता दोनों पक्षों के लिए आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper III — अर्थव्यवस्था
- Prelims: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA), रणनीतिक साझेदारी, वैश्विक दक्षिण, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार, CARICOM, FIPIC
- Essay: बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति और बहुपक्षवाद, मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से आर्थिक कूटनीति का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत और यूरोपीय संघ के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता दोनों पक्षों के लिए आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो वैश्विक भू-राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियों के बीच सहयोग को बढ़ावा देगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र में वैश्विक मुद्दों और आर्थिक सहयोग पर चर्चा करने के लिए चार यूरोपीय विदेश मंत्रियों के साथ द्विपक्षीय वार्ता की। इन वार्ताओं में यूक्रेन संघर्ष, भू-राजनीतिक चुनौतियाँ, प्रौद्योगिकी सहयोग, व्यापार और निवेश के अवसर, जलवायु परिवर्तन तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल थे। यह बैठकें भारत और यूरोपीय संघ (European Union) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement – FTA) को अंतिम रूप देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण थीं, जिससे दोनों पक्षों के बीच आर्थिक संबंधों को और गति मिलेगी।
पृष्ठभूमि
- भारत और यूरोपीय संघ के बीच संबंध 1960 के दशक से स्थापित हैं, जब भारत यूरोपीय आर्थिक समुदाय के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने वाले पहले देशों में से एक था।
- वर्ष 2007 में, भारत-यूरोपीय संघ व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते (Broad-based Trade and Investment Agreement – BTIA) पर बातचीत शुरू हुई, लेकिन विभिन्न कारणों से यह रुक गई थी।
- मई 2021 में, भारत और यूरोपीय संघ के नेताओं ने एक वर्चुअल शिखर सम्मेलन में व्यापार और निवेश वार्ता फिर से शुरू करने का निर्णय लिया।
- भारत कई यूरोपीय देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत कर रहा है, जैसा कि नीदरलैंड के साथ संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत करने से स्पष्ट है।
- भारत ‘वैश्विक दक्षिण’ (Global South) के देशों के साथ भी सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है, जैसा कि CARICOM और FIPIC जैसे समूहों के साथ बैठकों से पता चलता है, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) सुधार के लिए L.69 समूह में भी सक्रिय है।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) क्या है?
- भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) एक व्यापक व्यापार समझौता है जिसका उद्देश्य भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना है।
- यह समझौता टैरिफ (tariff) और गैर-टैरिफ बाधाओं (non-tariff barriers) को कम करके या समाप्त करके वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त प्रवाह को सुगम बनाएगा।
- इसका उद्देश्य निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights), प्रतिस्पर्धा, सरकारी खरीद और विवाद निपटान जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना भी है।
- यह समझौता भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के विशाल एकल बाजार तक बेहतर पहुंच प्रदान करेगा, जिससे भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए नए अवसर खुलेंगे।
- यूरोपीय संघ भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, और यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को और मजबूत करेगा।
- इस समझौते से दोनों पक्षों के उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और प्रतिस्पर्धी कीमतें मिलने की उम्मीद है, साथ ही आर्थिक संवृद्धि (economic growth) और रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिलेगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बहुपक्षीय कूटनीति | वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका और विभिन्न देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने का प्रयास। |
| यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) | भारत और यूरोपीय संघ के बीच आर्थिक संबंधों को गहरा करने और व्यापार तथा निवेश के नए अवसर खोलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। |
| रणनीतिक साझेदारी का उन्नयन | नीदरलैंड के साथ संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाना, जो द्विपक्षीय सहयोग की गहराई को दर्शाता है। |
| वैश्विक दक्षिण (Global South) के साथ जुड़ाव | विकासशील देशों के हितों को बढ़ावा देने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) सुधार जैसे मुद्दों पर आम सहमति बनाने का प्रयास। |
| क्षेत्रीय समूहों के साथ बैठकें | CARICOM और FIPIC जैसे क्षेत्रीय समूहों के साथ संवाद, जो भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘सागर’ नीतियों के अनुरूप है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) व्यापार और निवेश के नए रास्ते खोलेगा, जिससे भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिलेगा और यूरोपीय बाजारों तक पहुंच आसान होगी।
- ऊर्जा, विनिर्माण, डिजिटल और कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में सहयोग से भारत की आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति मिलेगी और रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
- यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आकर्षित होगा, जो पूंजी निर्माण और तकनीकी हस्तांतरण के लिए महत्वपूर्ण है।
सामरिक महत्व
- यूक्रेन संघर्ष जैसे वैश्विक मुद्दों पर यूरोपीय देशों के साथ विचारों का आदान-प्रदान भारत की विदेश नीति में संतुलन और बहु-संरेखण (Multi-alignment) के महत्व को दर्शाता है।
- नीदरलैंड के साथ रणनीतिक साझेदारी का उन्नयन भारत के लिए यूरोपीय संघ में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।
- भू-राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियों पर चर्चा भारत को वैश्विक शासन (Global Governance) में एक सक्रिय भूमिका निभाने और अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने में मदद करती है।
बहुपक्षीय कूटनीति
- संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दौरान विभिन्न देशों के विदेश मंत्रियों के साथ बैठकें भारत को वैश्विक मंचों पर अपने हितों को बढ़ावा देने और आम सहमति बनाने का अवसर प्रदान करती हैं।
- ग्लोबल साउथ के देशों के साथ जुड़ाव और सुरक्षा परिषद सुधार पर L.69 समूह के साथ कार्य करना भारत की बहुपक्षीय प्रणाली को अधिक समावेशी और प्रतिनिधि बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) जैसे मुद्दों पर सहयोग वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने में भारत की भूमिका को मजबूत करता है।
चुनौतियाँ
1. मुक्त व्यापार समझौते का क्रियान्वयन
- भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने और उसके प्रभावी क्रियान्वयन में विभिन्न देशों के हितों और नियामक बाधाओं को दूर करना एक चुनौती हो सकती है।
- समझौते के तहत संवेदनशील क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और व्यापार असंतुलन को रोकना महत्वपूर्ण होगा।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: व्यापार नीतियां, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार
2. भू-राजनीतिक अस्थिरता
- यूक्रेन संघर्ष जैसे वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दे यूरोपीय देशों के साथ भारत के संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर दबाव पड़ सकता है।
- बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को साधते हुए विभिन्न गुटों के साथ संतुलन बनाए रखना होगा।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: भू-राजनीति, वैश्विक सुरक्षा
3. तकनीकी सहयोग और हस्तांतरण
- तकनीकी चुनौतियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे उभरते क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ सहयोग में बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights) का संरक्षण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की शर्तें एक जटिल मुद्दा हो सकती हैं।
- भारत को उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुंच सुनिश्चित करते हुए अपनी घरेलू नवाचार क्षमताओं को भी बढ़ावा देना होगा।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी: नवाचार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुक्त व्यापार समझौते की औपचारिक स्वीकृति | समझौते को अंतिम रूप देने और सभी सदस्य देशों की सहमति प्राप्त करने में लगने वाला समय। |
| यूक्रेन संघर्ष का प्रभाव | ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर संघर्ष के दीर्घकालिक प्रभाव। |
| भू-राजनीतिक और तकनीकी चुनौतियाँ | साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता और महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों तक पहुंच से संबंधित मुद्दे। |
| बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार | संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार के लिए आम सहमति बनाने में बाधाएँ। |
आगे की राह
- भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्रता से अंतिम रूप देने और उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सक्रिय कूटनीति जारी रखना।
- ऊर्जा, विनिर्माण, डिजिटल और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय सहयोग को और गहरा करना।
- वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों, विशेषकर यूक्रेन संघर्ष के संदर्भ में, यूरोपीय भागीदारों के साथ संवाद और समन्वय बनाए रखना।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास (R&D) और नवाचार के लिए यूरोपीय देशों के साथ साझेदारी को बढ़ावा देना।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार जैसे मुद्दों पर ग्लोबल साउथ के देशों के साथ मिलकर काम करना और बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भूमिका को मजबूत करना।
- जलवायु परिवर्तन और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने के लिए यूरोपीय संघ के साथ सहयोग बढ़ाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता · रणनीतिक साझेदारी · बहुपक्षीय कूटनीति · वैश्विक दक्षिण · आर्थिक सहयोग · भू-राजनीतिक चुनौतियाँ · ऊर्जा सुरक्षा · विनिर्माण क्षेत्र · डिजिटल सहयोग · रक्षा संबंध · जलवायु परिवर्तन · कृत्रिम बुद्धिमत्ता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 51’: ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना।’}
- {‘अनुच्छेद 253’: ‘अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करने की शक्ति।’}
अवधारणा प्रवाह
विदेश मंत्री की यूरोपीय समकक्षों से मुलाकात → वैश्विक मुद्दों और आर्थिक सहयोग पर चर्चा → भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर प्रगति → रणनीतिक साझेदारी और द्विपक्षीय संबंधों का उन्नयन → वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका और प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को जनवरी में अंतिम रूप दिया गया था और इसे दिसंबर में औपचारिक रूप दिया जाना है।
2. नीदरलैंड, स्लोवेनिया और फिनलैंड यूरोपीय संघ के सदस्य हैं।
3. भारत ने हाल ही में नीदरलैंड के साथ अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक उन्नत किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। कथन 2 सही है। कथन 3 सही है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन ‘वैश्विक दक्षिण’ (Global South) के संदर्भ में सबसे सटीक रूप से वर्णित करता है?
- यह केवल अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का एक समूह है।
- यह उन देशों को संदर्भित करता है जो आर्थिक रूप से विकसित हैं और उत्तरी गोलार्ध में स्थित हैं।
- यह मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील और कम विकसित देशों का एक समूह है, जो अक्सर साझा ऐतिहासिक अनुभवों और विकास चुनौतियों से जुड़े होते हैं।
- यह उन देशों का एक समूह है जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं।
उत्तर: यह मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील और कम विकसित देशों का एक समूह है, जो अक्सर साझा ऐतिहासिक अनुभवों और विकास चुनौतियों से जुड़े होते हैं। — वैश्विक दक्षिण एक व्यापक शब्द है जो मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील और कम विकसित देशों को संदर्भित करता है, जो अक्सर उपनिवेशवाद के साझा ऐतिहासिक अनुभवों और समान विकास चुनौतियों से जुड़े होते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के संदर्भ में, भारत के लिए इसके संभावित आर्थिक और रणनीतिक निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। यह समझौता भारत की ‘वैश्विक दक्षिण’ के साथ कूटनीति को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के महत्व और वर्तमान स्थिति से करें। इसके बाद, भारत के लिए इसके आर्थिक निहितार्थों (जैसे व्यापार वृद्धि, निवेश, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था) और रणनीतिक निहितार्थों (जैसे भू-राजनीतिक संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग) का विस्तार से विश्लेषण करें। दूसरे भाग में, यह बताएं कि यह समझौता भारत की ‘वैश्विक दक्षिण’ के साथ कूटनीति को कैसे प्रभावित कर सकता है, जिसमें विकासशील देशों के साथ भारत के संबंधों पर संभावित प्रभाव और बहुपक्षीय मंचों पर भारत की स्थिति शामिल है। निष्कर्ष में, भारत की विदेश नीति के व्यापक लक्ष्यों के साथ इस समझौते के संरेखण पर प्रकाश डालें।
स्रोत: orissapost.com
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