23 Sep राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने सीएम विजय से मुलाकात की, जानिए प्रमुख मुद्दे
✎ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य कार्य अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना | GS Paper II — केंद्र एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ; स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ | GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से उत्पन्न विषय
- Prelims: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), अनुच्छेद 338A, संवैधानिक निकाय, अनुसूचित जनजातियाँ, अध्यक्ष और सदस्य, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय
- Essay: भारत में सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में संवैधानिक निकायों की भूमिका, अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों का संरक्षण और सशक्तिकरण: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य कार्य अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
इस बैठक में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की गई, जिसमें उनके कल्याण और अधिकारों के संरक्षण से जुड़े विषय शामिल थे। यह मुलाकात आयोग के संवैधानिक दायित्वों का हिस्सा है, जिसके तहत वह राज्यों में अनुसूचित जनजातियों की स्थिति की समीक्षा करता है और उनके हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाता है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत मूल रूप से एक विशेष अधिकारी का प्रावधान किया गया था, जिसे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आयुक्त के रूप में जाना जाता था।
- 65वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1990 द्वारा एक बहु-सदस्यीय राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना की गई, जिसने उक्त विशेष अधिकारी का स्थान लिया।
- वर्ष 2003 में 89वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग को दो अलग-अलग निकायों में विभाजित किया गया: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338A)।
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना वर्ष 2004 में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है।
- यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की निगरानी, जांच और मूल्यांकन करता है तथा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास में भाग लेता है और सलाह देता है।
- आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत करता है, जो इसे संसद के समक्ष रखवाते हैं।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) क्या है?
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत की गई है।
- इसका मुख्य कार्य भारत में अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) के अधिकारों और हितों की रक्षा करना तथा उनके कल्याण को बढ़ावा देना है।
- आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं। इन सभी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा की जाती है।
- अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा शर्तें और कार्यकाल राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- आयोग के प्रमुख कार्यों में अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच और निगरानी करना शामिल है।
- यह अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित करने से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जांच करता है।
- आयोग अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेता है और सलाह देता है तथा केंद्र और राज्य सरकारों के तहत उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करता है।
- यह अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए किए जाने वाले उपायों के संबंध में राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संवैधानिक निकाय | यह आयोग भारत के संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है, जो इसे अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए विशेष अधिकार और स्वायत्तता प्रदान करता है। |
| अध्यक्ष और सदस्य | आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। यह संरचना विभिन्न दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है। |
| कार्य | आयोग अनुसूचित जनजातियों को प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच और निगरानी करता है, उनके अधिकारों और सुरक्षा उपायों से वंचित करने संबंधी विशिष्ट शिकायतों की जांच करता है, और उनके सामाजिक-आर्थिक विकास में भागीदारी और सलाह देता है। |
| रिपोर्ट प्रस्तुत करना | यह आयोग प्रतिवर्ष राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, जिसमें अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की स्थिति का विवरण होता है। ये रिपोर्टें संसद में रखी जाती हैं। |
| राज्य सरकारों से परामर्श | आयोग अनुसूचित जनजातियों से संबंधित महत्वपूर्ण नीतियों और कार्यक्रमों पर राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों से परामर्श करता है, जैसा कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्यपाल से मुलाकात में देखा गया। |
महत्व
शासन और जवाबदेही
- राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (National Commission for Scheduled Tribes – NCST) का राज्य के मुख्यमंत्री और राज्यपाल से मिलना अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन के प्रति सरकार की जवाबदेही को दर्शाता है।
- यह बैठक अनुसूचित जनजातियों से संबंधित मुद्दों पर केंद्र और राज्य के बीच समन्वय स्थापित करने में मदद करती है, जिससे नीतियों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है।
सामाजिक न्याय और समावेशन
- यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में कार्य करता है, जिससे उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके।
- आयोग की सिफारिशें और हस्तक्षेप अनुसूचित जनजातियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भूमि अधिकारों जैसे क्षेत्रों में न्याय सुनिश्चित करने में सहायक होते हैं।
नीति निर्माण में भूमिका
- आयोग की रिपोर्टें और सिफारिशें अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए नई नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- राज्य के प्रमुखों के साथ सीधे संवाद से जमीनी हकीकत को समझने और उसके अनुरूप नीतियां बनाने में मदद मिलती है।
चुनौतियाँ
1. कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
- अनुसूचित जनजातियों के लिए बनाई गई नीतियों और कानूनों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है, विशेषकर दूरदराज के क्षेत्रों में।
- संसाधनों की कमी, प्रशासनिक अक्षमता और जागरूकता का अभाव कार्यान्वयन को बाधित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, कल्याणकारी योजनाएँ
2. भूमि और वन अधिकारों का संरक्षण
- अनुसूचित जनजातियों के भूमि और वन अधिकारों का अतिक्रमण एक गंभीर मुद्दा है, जिससे उनका विस्थापन और आजीविका का नुकसान होता है।
- वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) जैसे कानूनों के बावजूद, इन अधिकारों को पूरी तरह से लागू करने में बाधाएँ आती हैं।
यूपीएससी लिंक: आदिवासी मुद्दे, भूमि सुधार
3. शिक्षा और स्वास्थ्य तक पहुँच
- अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और उनकी गुणवत्ता में सुधार अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
- सांस्कृतिक बाधाएँ, भाषाई अंतर और बुनियादी ढाँचे की कमी इन सेवाओं की पहुँच को सीमित करती है।
यूपीएससी लिंक: मानव विकास, सामाजिक क्षेत्र
4. भेदभाव और हिंसा
- अनुसूचित जनजातियों को अभी भी सामाजिक भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है।
- कानूनी सुरक्षा उपायों के बावजूद, इन घटनाओं को रोकने और दोषियों को दंडित करने में चुनौतियाँ हैं।
यूपीएससी लिंक: कमजोर वर्ग, मानवाधिकार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| योजनाओं का अपर्याप्त लाभ | कई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लक्षित अनुसूचित जनजाति समुदायों तक पूरी तरह से नहीं पहुँच पाता है, जिससे उनके जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता। |
| आजीविका के अवसर | अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थायी आजीविका के अवसरों की कमी उन्हें गरीबी और शोषण के प्रति संवेदनशील बनाती है। |
| प्रतिनिधित्व का अभाव | शासन और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अनुसूचित जनजातियों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना अभी भी एक चुनौती है। |
| सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण | आधुनिकीकरण और बाहरी प्रभावों के कारण अनुसूचित जनजातियों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और भाषाओं के संरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- जनजातीय उप-योजना (Tribal Sub-Plan – TSP)
- प्रधानमंत्री वन धन योजना (Pradhan Mantri Van Dhan Yojana)
- एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (Eklavya Model Residential Schools)
आगे की राह
- अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों और कल्याणकारी योजनाओं का प्रभावी और समयबद्ध कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- वन अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों को सख्ती से लागू किया जाए ताकि अनुसूचित जनजातियों के भूमि और वन अधिकारों का संरक्षण हो सके।
- अनुसूचित जनजातियों के सांस्कृतिक विरासत और भाषाओं के संरक्षण के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से लिया जाए और उन पर त्वरित कार्रवाई की जाए।
- अनुसूचित जनजातियों के बीच जागरूकता बढ़ाने और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सशक्त बनाने के लिए कार्यक्रम चलाए जाएँ।
- शासन और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में अनुसूचित जनजातियों की भागीदारी बढ़ाई जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 338A: राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन
- अनुच्छेद 46: अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा
- पांचवीं अनुसूची: अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण
- छठी अनुसूची: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन
अवधारणा प्रवाह
NCST अध्यक्ष और सदस्य मुख्यमंत्री से मिले → अनुसूचित जनजातियों के मुद्दों पर चर्चा हुई → संवैधानिक सुरक्षा उपायों के कार्यान्वयन की समीक्षा → राज्य सरकार को सिफारिशें प्रस्तुत की गईं → अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अधिकारों का संरक्षण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय है जिसका गठन अनुच्छेद 338A के तहत किया गया है।
2. यह आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच और निगरानी करता है।
3. आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन संविधान के अनुच्छेद 338A के तहत एक संवैधानिक निकाय के रूप में किया गया है।
कथन 2 सही है। आयोग का मुख्य कार्य अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच और निगरानी करना है।
कथन 3 सही है। आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा वारंट द्वारा और उसके हाथ और मुहर के तहत की जाती है।
Q2. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कार्य आयोग के दायरे में नहीं आता है?
- अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जाँच करना।
- अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना।
- अनुसूचित जनजातियों के लिए लागू सुरक्षा उपायों के कामकाज पर वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
- अनुसूचित जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करने के लिए कानून बनाना।
उत्तर: अनुसूचित जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करने के लिए कानून बनाना। — राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एक सलाहकार और निगरानी निकाय है। कानून बनाने की शक्ति विधायिका के पास है, आयोग के पास नहीं। अन्य सभी विकल्प आयोग के कार्यों में शामिल हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) एक संवैधानिक निकाय के रूप में अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और कल्याण को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कथन के आलोक में, आयोग की शक्तियों और कार्यों का विश्लेषण कीजिए तथा जनजातीय कल्याण के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों के साथ इसके समन्वय के महत्व पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का संवैधानिक दर्जा (अनुच्छेद 338A) और इसके गठन का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **आयोग की शक्तियाँ और कार्य:**
* अनुसूचित जनजातियों के लिए संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जाँच और निगरानी।
* इन सुरक्षा उपायों के कामकाज पर राष्ट्रपति को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
* अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों के उल्लंघन से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की जाँच।
* अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में भाग लेना और सलाह देना।
* जनजातीय समुदायों के कल्याण, संरक्षण, विकास और उन्नति के लिए किए जाने वाले उपायों पर सिफारिशें करना।
* सिविल न्यायालय की शक्तियाँ (साक्ष्य एकत्र करना, गवाहों को बुलाना आदि)।
3. **केंद्र और राज्य सरकारों के साथ समन्वय का महत्व:**
* नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आवश्यक।
* जनजातीय क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं और चुनौतियों को समझने में मदद।
* सुरक्षा उपायों के उल्लंघन के मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना।
* राज्यों द्वारा जनजातीय कल्याण योजनाओं के उचित उपयोग और निगरानी में सहायता।
* संघवाद के सिद्धांत को मजबूत करना, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर जनजातीय उत्थान के लिए कार्य करते हैं।
* हालिया बैठकें (जैसे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और राज्यपाल के साथ) इस समन्वय के महत्व को दर्शाती हैं।
4. **चुनौतियाँ और सुझाव (संक्षेप में):** आयोग के सामने आने वाली चुनौतियाँ (जैसे सीमित शक्तियाँ, सिफारिशों का गैर-बाध्यकारी होना) और उन्हें दूर करने के लिए सुझाव।
5. **निष्कर्ष:** जनजातीय समुदायों के समावेशी विकास और उनके अधिकारों की सुरक्षा में NCST की निरंतर प्रासंगिकता और भूमिका पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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