02 Sep लक्कुंडी के छिपे स्मारकों की खोज करेगा LiDAR सर्वेक्षण, जानिए पूरी प्रक्रिया
✎ LiDAR एक अत्याधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीक है जो लेजर प्रकाश का उपयोग करके घनी वनस्पति के नीचे छिपी पुरातात्विक संरचनाओं और भू-भाग की विशेषताओं का पता लगाने में मदद करती है, जिससे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रबंधन में क्रांति…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति, भारतीय इतिहास | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ, स्वदेशीकरण | GS Paper IV — नीतिशास्त्र (नैतिक शासन में प्रौद्योगिकी का उपयोग)
- Prelims: LiDAR, रिमोट सेंसिंग, GIS मैपिंग, ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR), कल्याणी-चालुक्य वास्तुकला, वेसर शैली, लक्कुंडी, पुरातत्व सर्वेक्षण, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान (NIAS)
- Essay: भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और संवर्धन: चुनौतियाँ और समाधान, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग: विकास और विरासत के बीच संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: LiDAR एक अत्याधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीक है जो लेजर प्रकाश का उपयोग करके घनी वनस्पति के नीचे छिपी पुरातात्विक संरचनाओं और भू-भाग की विशेषताओं का पता लगाने में मदद करती है, जिससे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रबंधन में क्रांति आती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
पुरातत्व, संग्रहालय और विरासत विभाग (DAMH) ने कर्नाटक के गदग जिले में स्थित लक्कुंडी के छिपे हुए स्मारकों का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान (NIAS), बेंगलुरु के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल में LiDAR (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) सर्वेक्षण, GIS मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) जैसी अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जाएगा, ताकि वनस्पति के नीचे छिपी संरचनाओं और कलाकृतियों की पहचान की जा सके।
पृष्ठभूमि
- लक्कुंडी 10वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच एक महत्वपूर्ण शहरी केंद्र था और यह कल्याणी-चालुक्य काल की वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।
- स्थानीय परंपरा के अनुसार, लक्कुंडी में 101 कुएँ और 101 मंदिर मौजूद हैं, जिनमें से अधिकांश समय के साथ वनस्पति से ढक गए हैं और अदृश्य हो गए हैं।
- पुरातत्व विभाग का मानना है कि लक्कुंडी के ज्ञात स्मारक इसकी व्यापक पुरातात्विक कहानी का केवल एक हिस्सा हो सकते हैं।
- इस पहल का उद्देश्य पुरातात्विक स्थलों के स्थायी विकास, संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक नया रोडमैप तैयार करना है।
- यह सहयोग पारंपरिक सर्वेक्षणों पर निर्भरता कम करके उत्खनन के लिए संभावित स्थानों को अधिक सटीक रूप से इंगित करने में मदद करेगा।
LiDAR तकनीक क्या है और यह पुरातत्व में कैसे उपयोगी है?
- LiDAR (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) एक रिमोट सेंसिंग तकनीक है जो पृथ्वी की सतह का सर्वेक्षण करने के लिए लेजर प्रकाश का उपयोग करती है।
- यह तकनीक लेजर दालों को उत्सर्जित करती है और सेंसर द्वारा परावर्तित दालों को वापस प्राप्त करती है, जिससे दूरी और ऊंचाई की सटीक जानकारी मिलती है।
- पुरातत्व में, LiDAR घनी वनस्पति के नीचे छिपी हुई संरचनाओं, जैसे कि प्राचीन सड़कों, इमारतों या कृषि क्षेत्रों का पता लगाने में विशेष रूप से उपयोगी है।
- यह एक विस्तृत और सटीक डिजिटल एलिवेशन मॉडल (DEM) या डिजिटल सरफेस मॉडल (DSM) बनाता है, जो भू-भाग की विशेषताओं को उजागर करता है जिन्हें नग्न आँखों से देखना मुश्किल होता है।
- LiDAR के साथ GIS मैपिंग, रिमोट सेंसिंग और GPR जैसी अन्य तकनीकों का संयोजन पुरातात्विक स्थलों की व्यापक और गैर-विनाशकारी जांच को सक्षम बनाता है।
- यह उत्खनन के लिए लक्षित क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करता है, जिससे समय और संसाधनों की बचत होती है और पुरातात्विक अनुसंधान की दक्षता बढ़ती है।
- यह तकनीक पुरातात्विक स्थलों के दस्तावेजीकरण, मानचित्रण और निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो उनके संरक्षण और प्रबंधन में सहायक है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| LiDAR सर्वेक्षण (LiDAR Survey) | वनस्पति या मलबे के नीचे छिपी हुई संरचनाओं का पता लगाने के लिए लेजर तकनीक का उपयोग। |
| GIS मैपिंग (GIS Mapping) | भौगोलिक डेटा का विश्लेषण और प्रदर्शन, पुरातात्विक स्थलों की सटीक पहचान में सहायक। |
| रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing) | दूर से जानकारी एकत्र करना, व्यापक क्षेत्रों का सर्वेक्षण करने और संभावित स्थलों की पहचान करने के लिए उपयोगी। |
| ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार (GPR) | भूमिगत संरचनाओं और कलाकृतियों का पता लगाने के लिए रडार पल्स का उपयोग। |
| ड्रोन दस्तावेज़ीकरण (Drone Documentation) | उच्च-रिज़ॉल्यूशन हवाई इमेजरी प्रदान करना, दुर्गम क्षेत्रों का सर्वेक्षण करने में सहायक। |
| फोटोग्रामेट्री (Photogrammetry) | तस्वीरों से सटीक 3D मॉडल बनाना, पुरातात्विक स्थलों के दस्तावेज़ीकरण और विश्लेषण के लिए। |
महत्व
सांस्कृतिक महत्व (Cultural Significance)
- लक्कुंडी के छिपे हुए स्मारकों की खोज से भारत की स्थापत्य कला और इतिहास की गहरी समझ मिलेगी, विशेषकर कल्याणी-चालुक्य काल के संबंध में।
- यह परियोजना स्थानीय परंपराओं की पुष्टि कर सकती है जो 101 कुओं और 101 मंदिरों की उपस्थिति का दावा करती हैं, जिससे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत समृद्ध होगी।
वैज्ञानिक और तकनीकी महत्व (Scientific and Technological Significance)
- LiDAR, GIS, रिमोट सेंसिंग और GPR जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग पुरातात्विक सर्वेक्षणों में डिजिटल उपकरणों के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
- यह पहल पुरातात्विक स्थलों के स्थायी विकास, संरक्षण और प्रबंधन के लिए एक नया रोडमैप प्रदान कर सकती है, जिससे पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक दक्षता आएगी।
प्रशासनिक और संस्थागत महत्व (Administrative and Institutional Significance)
- पुरातत्व, संग्रहालय और विरासत विभाग (DAMH) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज (NIAS) के बीच सहयोग विभिन्न संस्थानों के बीच ज्ञान और विशेषज्ञता साझा करने का एक मॉडल प्रस्तुत करता है।
- यह परियोजना भविष्य में अन्य पुरातात्विक स्थलों पर भी इसी तरह की तकनीकों को लागू करने के लिए एक मिसाल कायम कर सकती है, जिससे पूरे देश में विरासत संरक्षण के प्रयासों में सुधार होगा।
चुनौतियाँ
1. तकनीकी विशेषज्ञता और क्षमता निर्माण (Technical Expertise and Capacity Building)
- इन उन्नत तकनीकों के प्रभावी उपयोग के लिए पुरातत्वविदों और संबंधित कर्मियों के लिए विशेष प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता होगी।
- डेटा के विश्लेषण और व्याख्या के लिए उच्च-स्तरीय तकनीकी कौशल की आवश्यकता होती है, जो एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – विकास एवं अनुप्रयोग
2. वित्तीय संसाधन (Financial Resources)
- LiDAR सर्वेक्षण, GPR और अन्य डिजिटल तकनीकों का उपयोग महंगा हो सकता है, जिसके लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तपोषण की आवश्यकता होगी।
- परियोजना के दीर्घकालिक रखरखाव और आगे की खुदाई के लिए भी वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी।
यूपीएससी लिंक: सरकारी बजट और वित्तीय प्रबंधन
3. डेटा प्रबंधन और सुरक्षा (Data Management and Security)
- बड़ी मात्रा में एकत्र किए गए डेटा के कुशल प्रबंधन, भंडारण और सुरक्षा के लिए मजबूत प्रणालियों की आवश्यकता होगी।
- संवेदनशील पुरातात्विक डेटा की सुरक्षा और अनधिकृत पहुंच को रोकने के लिए प्रोटोकॉल स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा।
यूपीएससी लिंक: सूचना प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा
4. स्थानीय समुदाय की भागीदारी (Local Community Participation)
- स्थानीय परंपराओं और ज्ञान को परियोजना में शामिल करना महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके लिए समुदाय के साथ प्रभावी जुड़ाव और विश्वास निर्माण की आवश्यकता होगी।
- खुदाई और संरक्षण प्रयासों के दौरान स्थानीय निवासियों के हितों और आजीविका को संतुलित करना एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक सशक्तिकरण और विकास प्रक्रियाएँ
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| तकनीकी एकीकरण (Technical Integration) | विभिन्न डिजिटल तकनीकों से प्राप्त डेटा को प्रभावी ढंग से एकीकृत और विश्लेषण करना। |
| डेटा की सटीकता और व्याख्या (Data Accuracy and Interpretation) | तकनीकी डेटा की सटीकता सुनिश्चित करना और पुरातात्विक संदर्भ में इसकी सही व्याख्या करना। |
| संरक्षण और प्रबंधन (Conservation and Management) | नए खोजे गए स्थलों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक योजनाएँ विकसित करना। |
| पर्यावरणीय प्रभाव (Environmental Impact) | सर्वेक्षण और खुदाई गतिविधियों का स्थानीय पर्यावरण पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम करना। |
| कानूनी और नियामक ढाँचा (Legal and Regulatory Framework) | पुरातात्विक खोजों और विरासत स्थलों के प्रबंधन से संबंधित मौजूदा कानूनों और विनियमों का अनुपालन सुनिश्चित करना। |
आगे की राह
- उन्नत तकनीकों के प्रभावी उपयोग के लिए पुरातात्विक कर्मियों और शोधकर्ताओं के लिए व्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
- LiDAR, GIS और GPR जैसे उपकरणों के लिए पर्याप्त वित्तीय आवंटन सुनिश्चित किया जाए और निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए।
- एक केंद्रीकृत डेटाबेस प्रणाली विकसित की जाए जो एकत्र किए गए सभी पुरातात्विक डेटा को सुरक्षित रूप से संग्रहीत और प्रबंधित कर सके।
- स्थानीय समुदायों को परियोजना में सक्रिय रूप से शामिल किया जाए, उनके पारंपरिक ज्ञान और विरासत के प्रति सम्मान को बढ़ावा दिया जाए।
- खोजे गए स्थलों के संरक्षण और स्थायी प्रबंधन के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति तैयार की जाए, जिसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी ध्यान में रखा जाए।
- अन्य पुरातात्विक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों पर भी इसी तरह की डिजिटल तकनीकों को लागू करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति विकसित की जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पुरातत्व सर्वेक्षण · विरासत संरक्षण · LiDAR तकनीक · भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) · रिमोट सेंसिंग · भू-भेदी रडार (GPR) · कल्याणी चालुक्य · वेसर शैली · सांस्कृतिक विरासत प्रबंधन · डिजिटल प्रलेखन · लक्कुंडी · पुरातत्व स्थल
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 49 (Article 49)’, ‘note’: ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
लक्कुंडी में छिपे स्मारकों की स्थानीय मान्यता → पारंपरिक सर्वेक्षणों की सीमाएँ और अक्षमता → LiDAR और अन्य डिजिटल तकनीकों का उपयोग करने का निर्णय → DAMH और NIAS के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) → अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करके सर्वेक्षण और डेटा संग्रह → संभावित स्थलों की पहचान और सटीक खुदाई → लक्कुंडी की विरासत का दस्तावेज़ीकरण और संरक्षण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. LiDAR (Light Detection and Ranging) एक सुदूर संवेदन तकनीक है जो प्रकाश का उपयोग करके दूरियों को मापती है।
2. भू-भेदी रडार (GPR) का उपयोग भूमिगत संरचनाओं का पता लगाने के लिए किया जाता है।
3. लक्कुंडी के स्मारक मुख्य रूप से राष्ट्रकूट काल से संबंधित हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। LiDAR और GPR दोनों ही पुरातत्व सर्वेक्षण में उपयोग की जाने वाली उन्नत तकनीकें हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि लक्कुंडी के स्मारक मुख्य रूप से कल्याणी चालुक्य काल से संबंधित हैं।
Q2. लक्कुंडी, जो हाल ही में खबरों में था, भारत के किस राज्य में स्थित है और यह किस स्थापत्य शैली के लिए जाना जाता है?
- कर्नाटक, वेसर शैली
- महाराष्ट्र, नागर शैली
- तमिलनाडु, द्रविड़ शैली
- तेलंगाना, विजयनगर शैली
उत्तर: कर्नाटक, वेसर शैली — लक्कुंडी कर्नाटक के गडग जिले में स्थित है और इसके स्मारक कल्याणी चालुक्य काल की वेसर शैली (नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण) को प्रदर्शित करते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पुरातत्व स्थलों के संरक्षण और प्रबंधन में आधुनिक डिजिटल तकनीकों, जैसे LiDAR और GIS, के महत्व का परीक्षण कीजिए। कल्याणी चालुक्य काल के संदर्भ में लक्कुंडी के पुरातात्विक महत्व पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: पुरातत्व स्थलों के संरक्षण में पारंपरिक तरीकों की सीमाओं का संक्षिप्त उल्लेख और आधुनिक तकनीकों की आवश्यकता।
2. आधुनिक डिजिटल तकनीकों का महत्व:
– LiDAR (Light Detection and Ranging): अदृश्य/छिपी हुई संरचनाओं का पता लगाने में भूमिका, वनस्पति के नीचे मैपिंग।
– GIS (Geographic Information System): स्थानिक डेटा के विश्लेषण, प्रबंधन और विज़ुअलाइज़ेशन में उपयोग।
– रिमोट सेंसिंग: बड़े क्षेत्रों का सर्वेक्षण और संभावित स्थलों की पहचान।
– भू-भेदी रडार (GPR): भूमिगत संरचनाओं की विस्तृत मैपिंग।
– ड्रोन प्रलेखन और फोटोग्रामेट्री: 3D मॉडल बनाने और विस्तृत रिकॉर्ड रखने में।
– इन तकनीकों के लाभ: सटीकता, समय की बचत, कम विनाशकारी प्रकृति, बेहतर निर्णय लेने में सहायता।
3. लक्कुंडी का पुरातात्विक महत्व:
– ऐतिहासिक संदर्भ: 10वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच एक प्रमुख शहरी केंद्र।
– कल्याणी चालुक्य काल: इस काल के स्मारकों का प्रतिनिधित्व।
– स्थापत्य शैली: नागर, द्रविड़ और भूमिजा शैलियों का मिश्रण ‘वेसर शैली’ का प्रदर्शन।
– स्थानीय परंपराएं: 101 कुओं और 101 मंदिरों की धारणा, जो छिपे हुए हो सकते हैं।
– वर्तमान परियोजना का महत्व: छिपी हुई संरचनाओं का पता लगाने और लक्कुंडी की पूरी पुरातात्विक कहानी को उजागर करने में।
4. निष्कर्ष: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सतत विकास, संरक्षण और प्रबंधन में इन तकनीकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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