संसद में गतिरोध: किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से मुलाकात, एफसीआरए बिल पर अमित शाह बोलेंगे

Parliament deadlock: Rijiju meets Rahul to break logjam; Shah may speak on FCRA bill — concept mind map

संसद में गतिरोध: किरेन रिजिजू की राहुल गांधी से मुलाकात, एफसीआरए बिल पर अमित शाह बोलेंगे

✎ संसदीय गतिरोध तब होता है जब संसद की कार्यवाही विभिन्न कारणों से बाधित होती है, जिससे विधायी कार्य और बहस रुक जाती है, और इसका समाधान सरकार व विपक्ष के बीच बातचीत से होता है।

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Parliamentary deadlock cycle

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
  • Prelims: संसदीय कार्यवाही, प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधेयक पारित करना, संसदीय विशेषाधिकार, संसदीय गतिरोध, FCRA संशोधन विधेयक, परिसीमन विधेयक
  • Essay: लोकतंत्र में संसद की भूमिका और चुनौतियाँ, संसदीय कार्यवाही में व्यवधान: लोकतंत्र के लिए निहितार्थ

त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय गतिरोध तब होता है जब संसद की कार्यवाही विभिन्न कारणों से बाधित होती है, जिससे विधायी कार्य और बहस रुक जाती है, और इसका समाधान सरकार व विपक्ष के बीच बातचीत से होता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

संसद के मानसून सत्र में लगातार गतिरोध बना हुआ है, जिसके कारण लोकसभा में प्रश्नकाल बाधित हुआ है और कई विधेयक बिना चर्चा के पारित किए गए हैं। इस गतिरोध को समाप्त करने के प्रयास में, संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस बैठक में संसद में जारी गतिरोध और प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर चर्चा हुई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026) पर बोलने की संभावना भी व्यक्त की गई है।

पृष्ठभूमि

  • संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ था, और तब से लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल (Question Hour) पूरा नहीं हो पाया है।
  • विपक्ष विभिन्न मुद्दों पर सरकार से प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बयान की मांग कर रहा है, जिनमें जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई भी शामिल है।
  • गतिरोध के बीच, कई विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किए गए हैं, जिससे संसदीय कार्यवाही की गुणवत्ता पर सवाल उठ रहे हैं।
  • लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदस्यों से सदन की गरिमा बनाए रखने और प्रश्नकाल को सुचारू रूप से चलने देने का आग्रह किया है।
  • संसदीय गतिरोध भारतीय लोकतंत्र के लिए एक आवर्ती चुनौती बन गया है, जो विधायी कार्यों और सार्वजनिक जवाबदेही को प्रभावित करता है।
  • विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन किया है, जिनमें कथित पुलिस कार्रवाई और अन्य राष्ट्रीय मुद्दे शामिल हैं।

संसदीय गतिरोध क्या है?

  • संसदीय गतिरोध (Parliamentary Deadlock) उस स्थिति को संदर्भित करता है जब संसद की कार्यवाही विभिन्न कारणों से बाधित होती है, जिससे विधायी कार्य और बहस रुक जाती है।
  • इसके मुख्य कारणों में सरकार और विपक्ष के बीच किसी मुद्दे पर असहमति, विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी और सदन के नियमों का उल्लंघन शामिल हैं।
  • प्रश्नकाल (Question Hour) और शून्यकाल (Zero Hour) जैसे महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण अक्सर गतिरोध के दौरान बाधित होते हैं, जिससे सरकार की जवाबदेही प्रभावित होती है।
  • गतिरोध के कारण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो सकते हैं, जिससे कानून बनाने की प्रक्रिया की गुणवत्ता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
  • यह सार्वजनिक धन के अपव्यय का कारण भी बनता है, क्योंकि संसद सत्रों पर भारी खर्च होता है लेकिन उत्पादक कार्य नहीं हो पाता।
  • संसदीय गतिरोध का समाधान अक्सर सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत और सहमति से होता है, जिसमें संसदीय कार्य मंत्री और विपक्ष के नेता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • लोकतंत्र में स्वस्थ बहस और चर्चा आवश्यक है, और गतिरोध इसे बाधित करता है, जिससे जनता के मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जा पाता।
  • संसदीय नियमों और परंपराओं का पालन गतिरोध को रोकने और सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संसदीय गतिरोध संसद के मानसून सत्र में लगातार व्यवधान, जिससे विधायी कार्य और सार्वजनिक बहस प्रभावित हो रही है।
विपक्ष की मांगें विभिन्न मुद्दों पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के बयान की मांग, जिसमें छात्रों पर कथित पुलिस कार्रवाई भी शामिल है।
प्रश्नकाल का बाधित होना सत्र शुरू होने के बाद से एक भी प्रश्नकाल पूरा नहीं हो पाया, जिससे सरकार की जवाबदेही पर असर पड़ा है।
बिना चर्चा के विधेयक पारित बार-बार व्यवधान के बीच पांच विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किए गए, जो विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता को कम करता है।
सीमांकन विधेयक (Delimitation Bill) विपक्ष की स्थिति जानने के लिए सरकार द्वारा चर्चा का प्रयास, जिसका दूरगामी राजनीतिक और चुनावी निहितार्थ हो सकता है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026) गृह मंत्री द्वारा इस विधेयक पर बोलने की संभावना, जो गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के विदेशी वित्तपोषण को विनियमित करता है।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • संसदीय कार्यवाही का सुचारु संचालन भारत के लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, क्योंकि यह कानून बनाने, नीतियों पर बहस करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का प्राथमिक मंच है।
  • प्रश्नकाल और चर्चाओं का बाधित होना नागरिकों के प्रतिनिधियों के माध्यम से सरकार से प्रश्न पूछने के अधिकार को कमजोर करता है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही में कमी आती है।

विधायी और नीतिगत निहितार्थ

  • बिना पर्याप्त चर्चा के विधेयकों का पारित होना खराब कानून निर्माण का कारण बन सकता है, जिससे भविष्य में कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियां और कानूनी खामियां पैदा हो सकती हैं।
  • महत्वपूर्ण विधेयकों जैसे सीमांकन विधेयक और विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक पर बहस की कमी से सार्वजनिक सहमति और हितधारकों के परामर्श की कमी हो सकती है।

शासन और जवाबदेही

  • संसद में गतिरोध सरकार को महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी नीतियों और निर्णयों का बचाव करने से रोकता है, जिससे जनता के बीच विश्वास की कमी हो सकती है।
  • प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से बयान की विपक्ष की मांग संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही के सिद्धांत को रेखांकित करती है।

चुनौतियाँ

1. संसदीय प्रभावशीलता का क्षरण

  • बार-बार व्यवधान और स्थगन संसद को अपने प्राथमिक कार्यों – कानून बनाने, बजट पारित करने और सरकार पर निगरानी रखने – को प्रभावी ढंग से करने से रोकते हैं।
  • प्रश्नकाल और शून्यकाल जैसे महत्वपूर्ण संसदीय उपकरणों का बाधित होना सांसदों को सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाने और सरकार से जवाब मांगने से रोकता है।

2. लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास

  • सदन की गरिमा को कम करने वाले नारेबाजी और तख्तियां दिखाने से सार्वजनिक बहस का स्तर गिरता है और राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है।
  • सहमति और संवाद के बजाय टकराव पर जोर देने से लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता का विश्वास कम होता है।

3. विधायी गुणवत्ता पर प्रभाव

  • बिना पर्याप्त चर्चा और जांच के विधेयकों को पारित करने से खराब गुणवत्ता वाले कानून बन सकते हैं, जिनमें खामियां हो सकती हैं और जो अपने इच्छित उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल हो सकते हैं।
  • विधेयकों पर संसदीय समितियों द्वारा जांच की कमी भी कानून निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

4. सरकार की जवाबदेही में कमी

  • जब विपक्ष को महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगने का अवसर नहीं मिलता है, तो यह कार्यपालिका की जवाबदेही को कमजोर करता है।
  • संसद में मंत्रियों के बयान और बहस सरकार को अपनी नीतियों के लिए जिम्मेदार ठहराने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संसदीय गतिरोध विधायी कार्य और सार्वजनिक बहस में बाधा, महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की कमी।
प्रश्नकाल का बाधित होना सरकार की जवाबदेही में कमी, सांसदों को प्रश्न पूछने से रोकना।
बिना चर्चा के विधेयक पारित खराब गुणवत्ता वाले कानून बनने की संभावना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया का कमजोर होना।
विपक्ष की नारेबाजी सदन की गरिमा का ह्रास, रचनात्मक बहस के लिए माहौल का अभाव।
सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की कमी सहमति बनाने और गतिरोध को तोड़ने में विफलता, राजनीतिक ध्रुवीकरण का बढ़ना।
महत्वपूर्ण विधेयकों पर बहस का अभाव जनता की राय और हितधारकों के परामर्श की अनदेखी, दूरगामी प्रभावों वाले कानूनों पर अपर्याप्त जांच।

आगे की राह

  • सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक संवाद और सहयोग के लिए एक तंत्र स्थापित करना, जिसमें नियमित बैठकें और सर्वदलीय बैठकें शामिल हों।
  • संसदीय कार्यवाही के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करने के लिए सभी दलों द्वारा संसदीय नियमों और परंपराओं का सम्मान करना।
  • विपक्ष को महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी चिंताओं को उठाने और सरकार से जवाब मांगने के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करना।
  • विधेयकों पर गहन चर्चा और जांच के लिए संसदीय समितियों की भूमिका को मजबूत करना, जिससे कानून निर्माण की गुणवत्ता में सुधार हो।
  • अध्यक्ष/सभापति द्वारा सभी सदस्यों को सदन में अपनी बात रखने के लिए समान अवसर प्रदान करना और व्यवधानों को रोकने के लिए प्रभावी ढंग से नियमों को लागू करना।
  • सांसदों के लिए आचार संहिता विकसित करना और उसका पालन करना, ताकि सदन की गरिमा बनी रहे और सार्वजनिक बहस का स्तर ऊंचा रहे।
  • जनता के बीच संसदीय प्रक्रियाओं के महत्व और सांसदों की भूमिका के बारे में जागरूकता बढ़ाना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय गतिरोध · संसद की कार्यवाही · प्रश्नकाल · विधेयक पारित करना · विपक्षी दल · संसदीय लोकतंत्र · विशेषाधिकार · संसदीय प्रक्रियाएँ · विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) · परिसीमन विधेयक · महिला आरक्षण संशोधन विधेयक · संसदीय कार्य मंत्री

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद के सदस्यों की शक्तियां, विशेषाधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद की प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 122’, ‘note’: ‘संसद की कार्यवाही की अदालतों द्वारा जांच नहीं’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 75(3)’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद का लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व’}

अवधारणा प्रवाह

संसदीय गतिरोध और व्यवधान  →  प्रश्नकाल और विधायी चर्चाओं का बाधित होना  →  बिना बहस के विधेयकों का पारित होना  →  सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता में कमी  →  लोकतांत्रिक संस्थानों में जनता के विश्वास का क्षरण  →  खराब गुणवत्ता वाले कानून और नीतिगत चुनौतियाँ

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकारों से संबंधित है।
2. प्रश्नकाल के दौरान, संसद सदस्य सरकार के मंत्रियों से प्रश्न पूछ सकते हैं, और मंत्री मौखिक या लिखित रूप में उत्तर देने के लिए बाध्य होते हैं।
3. अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 105 संसद के सदनों और उनके सदस्यों तथा समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों आदि से संबंधित है। कथन 2 सही है। प्रश्नकाल संसदीय कार्यवाही का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जहां सदस्य सरकार से जवाबदेही मांगते हैं। कथन 3 सही है। अविश्वास प्रस्ताव सरकार के प्रति लोकसभा के विश्वास को मापने के लिए होता है, और सरकार केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

Q2. विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. FCRA का उद्देश्य विदेशी योगदानों को विनियमित करना है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल गतिविधियों के लिए उपयोग न हों।
2. यह अधिनियम केवल व्यक्तियों पर लागू होता है, संगठनों पर नहीं।
3. FCRA के तहत पंजीकरण के बिना कोई भी विदेशी योगदान प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है। FCRA का मुख्य उद्देश्य विदेशी योगदानों के उपयोग को विनियमित करना है ताकि वे भारत की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित न करें। कथन 2 गलत है। यह अधिनियम व्यक्तियों, संघों और कंपनियों सहित सभी संस्थाओं पर लागू होता है। कथन 3 सही है। FCRA के तहत पंजीकरण या पूर्व अनुमति के बिना विदेशी योगदान प्राप्त करना अवैध है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ संसदीय कार्यवाही में बार-बार होने वाले गतिरोध भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण करें और ऐसे गतिरोधों को दूर करने के लिए संभावित उपायों पर चर्चा करें। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल: परिचय में संसदीय गतिरोध की वर्तमान स्थिति और उसके प्रभावों का संक्षिप्त उल्लेख करें। मुख्य भाग में, गतिरोध के कारणों (जैसे सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास की कमी, महत्वपूर्ण मुद्दों पर आम सहमति का अभाव, नियमों का उल्लंघन) पर प्रकाश डालें। गतिरोध के नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण करें, जैसे कि विधायी कार्य में बाधा, प्रश्नकाल का बाधित होना, सार्वजनिक धन की बर्बादी, और संसद की गरिमा में कमी। अंत में, गतिरोध को दूर करने के लिए संभावित उपायों पर चर्चा करें, जिसमें शामिल हैं: पीठासीन अधिकारियों की भूमिका, सर्वदलीय बैठकें, नियमों का प्रभावी प्रवर्तन, रचनात्मक बहस को बढ़ावा देना, और सरकार व विपक्ष के बीच संवाद को मजबूत करना। निष्कर्ष में संसदीय लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए सहयोग और संवाद के महत्व पर जोर दें।

स्रोत: Times of India


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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