सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने मीडिया कानूनों पर पत्रकारों की ‘चुप्पी’ पर उठाया सवाल

Former Supreme Court judge flags ‘silence’ of journalists over media laws — labelled illustration

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ने मीडिया कानूनों पर पत्रकारों की ‘चुप्पी’ पर उठाया सवाल

✎ लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, जिसे मीडिया कानूनों के माध्यम से विनियमित किया जाता है, लेकिन यह विनियमन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों के दायरे में होना चाहिए।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली और संशोधन  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का संगठन और कार्यप्रणाली  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना
  • Prelims: अनुच्छेद 19 (1) (a), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा, संविधान संशोधन, मीडिया कानून, नीति निर्माण
  • Essay: लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका और चुनौतियाँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: सीमाएँ और महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, जिसे मीडिया कानूनों के माध्यम से विनियमित किया जाता है, लेकिन यह विनियमन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों के दायरे में होना चाहिए।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने मीडिया कानूनों को लेकर पत्रकारों की ‘चुप्पी’ पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने पत्रकारों से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से संघर्ष करने और समाज से व्यापक समर्थन प्राप्त करने का आह्वान किया। यह टिप्पणी मीडिया पर राज्य के दबाव से पत्रकारों की सुरक्षा की आवश्यकता पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन में की गई, जहाँ मीडिया में संविदात्मक रोजगार (contractual employment) के बढ़ते प्रचलन और पत्रकार संघों के कमजोर होने पर भी चिंता व्यक्त की गई।

पृष्ठभूमि

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (a) सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (freedom of speech and expression) का अधिकार प्रदान करता है। इसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी निहित है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में स्थापित किया है।
  • हालांकि, अनुच्छेद 19 (2) राज्य को इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध (reasonable restrictions) लगाने की शक्ति भी देता है, जैसे कि भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि आदि के हित में।
  • समय-समय पर, सरकारें मीडिया को विनियमित करने के लिए कानून लाने का प्रयास करती रही हैं, जिससे अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता पर संभावित प्रभावों को लेकर बहस छिड़ जाती है।
  • मीडिया संगठनों में संविदात्मक रोजगार का बढ़ता प्रचलन और पत्रकार संघों का कमजोर होना पत्रकारों की सौदेबाजी की शक्ति को कम कर रहा है, जिससे उन्हें राज्य या प्रबंधन के दबाव का सामना करने में अधिक कठिनाई हो रही है।
  • न्यायिक समीक्षा (judicial review) भारतीय न्यायपालिका की एक महत्वपूर्ण शक्ति है, जिसके तहत वह विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों और कार्यपालिका द्वारा जारी किए गए आदेशों की संवैधानिकता की जांच करती है।

मीडिया कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: यह एक मौलिक अधिकार है जो व्यक्तियों को अपने विचारों और विश्वासों को किसी भी माध्यम से व्यक्त करने की अनुमति देता है। यह किसी भी लोकतांत्रिक समाज का आधार स्तंभ है।
  • प्रेस की स्वतंत्रता: इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, जो नागरिकों को सूचित करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह अनुच्छेद 19 (1) (a) के तहत निहित है।
  • मीडिया कानून: ये कानून मीडिया के कामकाज को विनियमित करने के लिए बनाए जाते हैं। इनमें प्रेस और पंजीकरण अधिनियम, कॉपीराइट अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, मानहानि कानून आदि शामिल हो सकते हैं।
  • उचित प्रतिबंध: अनुच्छेद 19 (2) के तहत लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करना है। इन प्रतिबंधों को ‘उचित’ होना चाहिए और मनमाना नहीं होना चाहिए।
  • राज्य का हस्तक्षेप: मीडिया कानूनों के माध्यम से राज्य का हस्तक्षेप तब चिंता का विषय बन जाता है जब यह प्रेस की स्वतंत्रता को अनावश्यक रूप से प्रतिबंधित करता है या पत्रकारों को भयभीत करता है।
  • पत्रकारों की सुरक्षा: पत्रकारों को अक्सर अपने काम के दौरान धमकियों, हिंसा और कानूनी उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना एक स्वतंत्र प्रेस के लिए आवश्यक है।
  • सामूहिकीकरण का महत्व: पत्रकार संघों और प्रेस क्लबों जैसे संगठनों के माध्यम से पत्रकारों का सामूहिकीकरण उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा करने और बाहरी दबावों का सामूहिक रूप से विरोध करने में मदद करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार स्तंभ, नागरिकों को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार देता है।
प्रेस की स्वतंत्रता स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता सुनिश्चित करती है, जो सरकार की जवाबदेही के लिए महत्वपूर्ण है।
सामूहिक कार्रवाई का आह्वान पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुटता और व्यापक सामाजिक समर्थन की आवश्यकता पर बल देता है।
कानूनी सुरक्षा का महत्व पत्रकारों को राज्य के दबाव और अन्य खतरों से बचाने के लिए मजबूत कानूनों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां पत्रकारों की बढ़ती संवेदनशीलता और रोजगार असुरक्षा में योगदान करती हैं।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • स्वतंत्र मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो सूचना के प्रवाह और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
  • पत्रकारों की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का अंकुश नागरिकों के जानने के अधिकार (Right to Know) को प्रभावित करता है, जो अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत निहित है।

सामाजिक महत्व

  • एक स्वतंत्र प्रेस समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज़ों को मंच प्रदान करता है और सार्वजनिक विमर्श को समृद्ध करता है।
  • पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना समाज में पारदर्शिता और न्याय को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है।

आर्थिक महत्व

  • नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण पत्रकारिता में संविदात्मक रोजगार (contractual employment) की वृद्धि हुई है, जिससे पत्रकारों की रोजगार सुरक्षा और अधिकारों में कमी आई है।
  • मजदूर संघों (trade unions) का कमजोर होना पत्रकारों के सामूहिक सौदेबाजी (collective bargaining) की शक्ति को कम करता है, जिससे उनके शोषण की संभावना बढ़ जाती है।

चुनौतियाँ

1. मीडिया कानूनों पर पत्रकारों की चुप्पी

  • पूर्व न्यायाधीश ने मीडिया कानूनों को लेकर पत्रकारों की ‘चुप्पी’ पर चिंता व्यक्त की है।
  • यह चुप्पी पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक प्रतिरोध को कमजोर करती है।

2. राज्य द्वारा जबरदस्ती

  • पत्रकारों को राज्य द्वारा दबाव और जबरदस्ती का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग प्रभावित होती है।
  • कानूनों को कमजोर करने के प्रयास पत्रकारों की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय हैं।

3. पत्रकारिता में बढ़ती संविदात्मकता

  • पत्रकारिता में संविदात्मक रोजगार की बढ़ती प्रवृत्ति पत्रकारों की रोजगार सुरक्षा को कमजोर करती है।
  • इससे पत्रकारों के संघों की शक्ति कमजोर होती है और उनके अधिकारों का हनन होता है।

4. पत्रकारिता समुदाय में विभाजन

  • पत्रकारिता समुदाय के भीतर विभाजन सामूहिक कार्रवाई और अधिकारों की रक्षा के प्रयासों को बाधित करता है।
  • यह एकजुट होकर लड़ने की क्षमता को कमजोर करता है।

5. समाचार रिपोर्टिंग के गिरते मानक

  • समाचार रिपोर्टिंग के मानकों में गिरावट सार्वजनिक विश्वास को कम करती है और मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।
  • यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
मीडिया कानूनों पर चुप्पी पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक प्रतिरोध की कमी।
राज्य द्वारा जबरदस्ती स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर दबाव और पत्रकारों की सुरक्षा को खतरा।
संविदात्मक रोजगार रोजगार असुरक्षा और पत्रकारों के संघों का कमजोर होना।
समुदाय में विभाजन एकजुट होकर लड़ने की क्षमता का अभाव।
रिपोर्टिंग के मानक सार्वजनिक विश्वास में कमी और मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल।

आगे की राह

  • पत्रकारों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होकर सामूहिक लड़ाई लड़नी चाहिए।
  • पत्रकारों के संघों को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि वे अपने सदस्यों के अधिकारों की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकें।
  • समाज के व्यापक समर्थन को जुटाया जाना चाहिए ताकि मीडिया की स्वतंत्रता को एक जन आंदोलन बनाया जा सके।
  • सरकार को ऐसे कानून बनाने चाहिए जो पत्रकारों को राज्य के दबाव और अन्य खतरों से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करें।
  • पत्रकारिता में नैतिक मानकों और रिपोर्टिंग की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए आंतरिक तंत्र को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • पत्रकारों के लिए रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु नीतिगत सुधार किए जाने चाहिए, विशेषकर संविदात्मक रोजगार के संबंध में।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

पत्रकारों के अधिकार · अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता · मीडिया कानून · अनुच्छेद 19 · प्रेस की स्वतंत्रता · सामूहिक कार्रवाई · नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां · पत्रकारिता में संविदात्मक रोजगार · लोकतंत्र का चौथा स्तंभ · न्यायिक समीक्षा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 19(1)(ए): भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार।

अवधारणा प्रवाह

सरकार द्वारा मीडिया कानून लाने के प्रयास  →  पत्रकारों की ‘चुप्पी’ और सामूहिक प्रतिरोध की कमी  →  पत्रकारों के अधिकारों और सुरक्षा पर खतरा  →  लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस की भूमिका का कमजोर होना  →  सार्वजनिक विमर्श और नागरिकों के जानने के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) सभी नागरिकों को भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।
2. प्रेस की स्वतंत्रता को भारतीय संविधान में एक अलग मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है।
3. भारत में मीडिया कानूनों को विनियमित करने के लिए कोई केंद्रीय कानून नहीं है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 19(1)(a) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता निहित है। कथन 2 गलत है क्योंकि प्रेस की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत निहित माना गया है, न कि एक अलग मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत में मीडिया को विनियमित करने वाले कई कानून हैं, जैसे प्रेस और पंजीकरण पुस्तक अधिनियम, 1867, केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995, आदि।

Q2. अभिकथन (A): भारत में पत्रकारों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए।
कारण (R): नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां और पत्रकारिता समुदाय के भीतर विभाजन पत्रकारों की कमजोरियों को बढ़ाते हैं।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि पत्रकारों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि नव-उदारवादी नीतियों और आंतरिक विभाजनों को पत्रकारों की बढ़ती कमजोरियों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या भी करता है, क्योंकि ये कमजोरियां ही सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता को जन्म देती हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारतीय लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण करें। पत्रकारों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में संवैधानिक प्रावधानों और सामूहिक कार्रवाई की भूमिका पर भी चर्चा करें। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. **प्रेस की स्वतंत्रता का महत्व:** लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में इसकी भूमिका, सूचना के प्रसार, सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने और सार्वजनिक बहस को बढ़ावा देने में इसकी महत्ता।
2. **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता का निहित होना। अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर लगाए जा सकने वाले उचित प्रतिबंध।
3. **चुनौतियाँ:** मीडिया कानूनों को विनियमित करने के सरकारी प्रयास, नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां, पत्रकारिता में संविदात्मक रोजगार, पत्रकार संघों का कमजोर होना और पत्रकार समुदाय में विभाजन।
4. **सामूहिक कार्रवाई की भूमिका:** पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा में एकजुटता, संघों की मजबूती और व्यापक सामाजिक समर्थन की आवश्यकता।
5. **न्यायिक समीक्षा और अन्य उपाय:** अदालतों द्वारा प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा में निभाई गई भूमिका (जैसे रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य, इंडियन एक्सप्रेस बनाम भारत संघ)। मीडिया परिषदों और अन्य नियामक निकायों की भूमिका पर भी चर्चा की जा सकती है।

स्रोत: The Hindu


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