04 Sep हिमाचल में 710 नई हिमनदीय झीलें: जीएलओएफ खतरा बढ़ा, केंद्र अलर्ट
✎ जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदीय झीलों की संख्या और GLOF का खतरा बढ़ रहा है, जिसके लिए प्रभावी निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की आवश्यकता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, जलवायु परिवर्तन) | GS Paper III — आपदा प्रबंधन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- Prelims: हिमनदीय झीलें, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF), जलवायु परिवर्तन, हिमालयी पारिस्थितिकी, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली
- Essay: जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और भारत की संवेदनशीलता, आपदा प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका और चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदीय झीलों की संख्या और GLOF का खतरा बढ़ रहा है, जिसके लिए प्रभावी निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की आवश्यकता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, हिमाचल प्रदेश में पिछले दस वर्षों में 710 नई हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes) बनने की जानकारी सामने आई है, जिनमें से नौ को ‘बेहद खतरनाक’ श्रेणी में रखा गया है। आईआईटी मंडी के एक अध्ययन में यह भी बताया गया है कि 2015 की तुलना में 2025 तक ऐसी झीलों की संख्या में लगभग 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस स्थिति को देखते हुए, केंद्र सरकार ने हिमालयी राज्यों को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और हिमस्खलन (Avalanche) के खतरे से निपटने के लिए निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।
पृष्ठभूमि
- हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का पीछे हटना (Glacial Retreat) और बढ़ते तापमान का सीधा असर हिमनदीय झीलों के निर्माण और विस्तार पर पड़ रहा है।
- आईआईटी मंडी के अध्ययन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में 3,500 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कुल 2,076 हिमनदीय झीलों का मानचित्रण किया गया है।
- इन झीलों का कुल क्षेत्रफल एक दशक में 28.45 प्रतिशत बढ़ गया है, जो चिंता का विषय है।
- काशंग, गेपनग गाथ, कालीकुंड और समुद्रतापू जैसी झीलों को सबसे अधिक संवेदनशील झीलों में शामिल किया गया है।
- वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारण हिमनदों में बदलाव के लिए जिम्मेदार हैं, जिसमें पर्यटकों की बढ़ती आमद और धूल का जमाव भी शामिल है, जिससे बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है।
- केंद्र सरकार ने राज्यों को आपदा के बाद की प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर, पूर्व-आपदा तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया है।
हिमनदीय झीलें और GLOF
- हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes) वे झीलें होती हैं जो ग्लेशियरों के पिघलने से बनती हैं। ये अक्सर ग्लेशियरों के अग्रभाग या किनारों पर स्थित होती हैं, जहाँ पिघला हुआ पानी जमा होता है।
- ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके द्वारा छोड़ी गई अवसाद (moraine) या प्राकृतिक बाधाओं के पीछे पानी जमा हो जाता है, जिससे इन झीलों का निर्माण होता है।
- ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) एक प्रकार की अचानक आने वाली बाढ़ है जो तब होती है जब हिमनदीय झील का किनारा (जो अक्सर मोरेन से बना होता है) टूट जाता है, जिससे बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बहने लगता है।
- GLOF के कई कारण हो सकते हैं, जैसे झील में हिमखंडों का गिरना, भूस्खलन, भूकंप, या अत्यधिक वर्षा के कारण झील के जलस्तर में तेजी से वृद्धि।
- ये बाढ़ें अत्यधिक विनाशकारी हो सकती हैं, जिससे निचले इलाकों में जान-माल का भारी नुकसान होता है, बुनियादी ढाँचा नष्ट हो जाता है और कृषि भूमि प्रभावित होती है।
- हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ऐसी झीलों की संख्या और आकार बढ़ रहा है, जिससे GLOF का खतरा भी बढ़ रहा है।
- इन झीलों की निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की स्थापना और जोखिम वाले क्षेत्रों में सुरक्षा उपायों को लागू करना आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए महत्वपूर्ण है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| नई हिमनदीय झीलें | हिमाचल प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में 710 नई हिमनदीय झीलें बनी हैं, जो जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष प्रभावों को दर्शाती हैं। |
| झीलों की संख्या में वृद्धि | वर्ष 2015 की तुलना में 2025 तक हिमनदीय झीलों की संख्या में लगभग 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। |
| कुल क्षेत्रफल में वृद्धि | इन झीलों का कुल क्षेत्रफल एक दशक में 28.45 प्रतिशत बढ़ गया है, जिससे जल जमाव का खतरा बढ़ रहा है। |
| खतरनाक झीलें | अध्ययन में नौ झीलों को ‘बहुत अधिक खतरे वाली’ श्रेणी में रखा गया है, जबकि 435 झीलें ‘उच्च संवेदनशीलता’ वाली पाई गई हैं। |
| G.L.O.F. का खतरा | ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (G.L.O.F.) यानी हिमनदीय झील फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, जिससे निचले इलाकों में जान-माल का नुकसान हो सकता है। |
| मानवजनित कारण | बढ़ती पर्यटन गतिविधि से धूल का जमाव बढ़ता है, जिससे ग्लेशियरों पर सूर्य की गर्मी का अवशोषण अधिक होता है और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज होती है। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- यह अध्ययन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को उजागर करता है, जिसमें ग्लेशियरों का पिघलना और नई झीलों का निर्माण शामिल है।
- हिमनदीय झीलों की संख्या और आकार में वृद्धि से जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, खासकर उन प्रजातियों पर जो ठंडे और स्थिर वातावरण पर निर्भर करती हैं।
- G.L.O.F. की बढ़ती संभावना से नदियों के जल विज्ञान (Hydrology) में परिवर्तन आ सकता है, जिससे नदी पारिस्थितिकी तंत्र और तटीय क्षेत्रों पर असर पड़ेगा।
आपदा प्रबंधन और सुरक्षा महत्व
- केंद्र सरकार द्वारा हिमालयी राज्यों को निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने के निर्देश, आपदा प्रबंधन की तैयारियों को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
- G.L.O.F. और हिमस्खलन (Avalanche) जैसे खतरों से निपटने के लिए पूर्व-आपदा तैयारियों और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
- उच्च जोखिम वाली झीलों की पहचान और उनकी निरंतर निगरानी, आपदा जोखिम न्यूनीकरण (Disaster Risk Reduction) रणनीतियों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सामाजिक और आर्थिक महत्व
- G.L.O.F. से निचले इलाकों में स्थित बस्तियों, कृषि भूमि और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) जैसे सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं को गंभीर क्षति हो सकती है।
- पर्यटन, जो हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जलवायु परिवर्तन और संबंधित आपदाओं से प्रभावित हो सकता है, जिससे स्थानीय आजीविका पर असर पड़ेगा।
- जल संसाधनों की उपलब्धता और गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ सकता है, जो कृषि और पेयजल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- बढ़ते तापमान के कारण हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, जिससे नई हिमनदीय झीलें बन रही हैं और मौजूदा झीलों का आकार बढ़ रहा है।
- ग्लेशियरों के पीछे हटने से अस्थिर मोराइन बांधों (Moraine Dams) का निर्माण होता है, जो G.L.O.F. के जोखिम को बढ़ाते हैं।
यूपीएससी लिंक: भूगोल: जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभाव; पर्यावरण: जलवायु परिवर्तन
2. आपदा जोखिम और प्रबंधन
- G.L.O.F. और हिमस्खलन जैसे अचानक आने वाली आपदाओं की भविष्यवाणी और उनसे निपटने के लिए प्रभावी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अभाव।
- दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में झीलों की निरंतर निगरानी और सुरक्षा उपायों को लागू करने में तकनीकी और वित्तीय चुनौतियाँ।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन: आपदाओं के प्रकार और प्रबंधन
3. मानवजनित दबाव
- पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटन गतिविधि से धूल का जमाव बढ़ता है, जो ग्लेशियरों के पिघलने की दर को तेज करता है।
- अवैज्ञानिक विकास और बुनियादी ढांचे का निर्माण, जो पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता को बढ़ाता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण: मानव गतिविधियों का पर्यावरण पर प्रभाव
4. अंतर-राज्यीय समन्वय
- हिमालयी राज्यों के बीच G.L.O.F. और अन्य आपदाओं से निपटने के लिए प्रभावी समन्वय और सूचना साझाकरण तंत्र की कमी।
- आपदा प्रबंधन योजनाओं में एकरूपता और संसाधनों के साझाकरण में चुनौतियाँ।
यूपीएससी लिंक: शासन: संघीय ढाँचा; आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| हिमनदीय झीलों की संख्या में वृद्धि | पिछले 10 वर्षों में 710 नई झीलें बनी हैं, जो G.L.O.F. के खतरे को बढ़ाती हैं। |
| G.L.O.F. का बढ़ता खतरा | नौ झीलें ‘बहुत अधिक खतरे वाली’ और 435 ‘उच्च संवेदनशीलता’ वाली हैं, जिससे अचानक बाढ़ का जोखिम है। |
| बुनियादी ढांचे को नुकसान | G.L.O.F. से निचले इलाकों में स्थित बस्तियों, कृषि और पनबिजली परियोजनाओं को गंभीर क्षति हो सकती है। |
| पर्यटन का प्रभाव | बढ़ती पर्यटन गतिविधि से धूल का जमाव ग्लेशियरों के पिघलने की दर को तेज कर रहा है। |
| प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की कमी | G.L.O.F. और हिमस्खलन के लिए प्रभावी निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की आवश्यकता है। |
| पर्यावरणीय असंतुलन | ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा हो रहा है। |
आगे की राह
- उच्च जोखिम वाली हिमनदीय झीलों की पहचान और उनकी निरंतर निगरानी के लिए उपग्रह आधारित तकनीकों और ड्रोन का उपयोग करना।
- G.L.O.F. और हिमस्खलन के लिए एक मजबूत और एकीकृत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) विकसित करना और उसे लागू करना।
- स्थानीय समुदायों को आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रतिक्रिया के लिए प्रशिक्षित करना तथा उन्हें आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित करने हेतु राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयास तेज करना।
- पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन को विनियमित करना और पर्यावरण-संवेदनशील पर्यटन (Eco-sensitive Tourism) को बढ़ावा देना ताकि मानवजनित दबाव कम हो।
- हिमालयी राज्यों के बीच आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियों के लिए बेहतर समन्वय और सूचना साझाकरण तंत्र स्थापित करना।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना ताकि ग्लेशियरों के व्यवहार और हिमनदीय झीलों के विकास को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जलवायु परिवर्तन · हिमनदीय झीलें · ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) · हिमालयी पारिस्थितिकी · आपदा प्रबंधन · प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली · सतत विकास · पर्यावरणीय संवेदनशीलता · मानवजनित प्रभाव · अनुकूलन रणनीतियाँ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 253’, ‘note’: ‘अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को लागू करना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्यों के बीच विधायी संबंध’}
अवधारणा प्रवाह
जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि → हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना → नई हिमनदीय झीलों का निर्माण और आकार में वृद्धि → G.L.O.F. (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड) का बढ़ता खतरा → निचले इलाकों में बाढ़ और विनाश का जोखिम → आपदा प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. हिमनदीय झीलें (Glacial Lakes) मुख्य रूप से ग्लेशियरों के पिघलने से बनती हैं।
2. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) एक प्रकार की अचानक आने वाली बाढ़ है जो हिमनदीय झीलों के फटने से होती है।
3. हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती पर्यटन गतिविधियाँ हिमनदों के पिघलने की दर को प्रभावित नहीं करती हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। हिमनदीय झीलें ग्लेशियरों के पिघलने से बनती हैं और GLOF इन्हीं झीलों के फटने से उत्पन्न अचानक बाढ़ है। कथन 3 गलत है क्योंकि बढ़ती पर्यटन गतिविधियाँ और उनसे उत्पन्न धूल का जमाव ग्लेशियरों पर सूर्य की गर्मी के अवशोषण को बढ़ाकर पिघलने की दर को प्रभावित करता है।
Q2. ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. GLOF केवल मानवीय गतिविधियों के कारण होता है।
2. GLOF के खतरे को कम करने के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) महत्वपूर्ण है।
3. भारत में हिमालयी राज्य GLOF के प्रति संवेदनशील नहीं हैं।
- केवल 1
- केवल 2
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 2 — कथन 2 सही है। GLOF के खतरे को कम करने में प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कथन 1 गलत है क्योंकि GLOF प्राकृतिक कारणों जैसे भूकंप या भूस्खलन से भी हो सकता है। कथन 3 गलत है क्योंकि हिमालयी राज्य GLOF के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, जैसा कि हाल के अध्ययनों से पता चला है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदीय झीलों की संख्या में वृद्धि और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के बढ़ते खतरे पर चर्चा कीजिए। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत द्वारा किए जा रहे प्रयासों और आवश्यक रणनीतियों का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हिमालयी हिमनदों के पिघलने और हिमनदीय झीलों के निर्माण की संक्षिप्त व्याख्या। हिमाचल प्रदेश में नई झीलों के निर्माण और GLOF के खतरे का उल्लेख।
2. **GLOF के कारण और प्रभाव:**
* **कारण:** बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों का पीछे हटना, भूस्खलन, भूकंप, मानवजनित गतिविधियाँ (पर्यटन से धूल का जमाव)।
* **प्रभाव:** अचानक बाढ़, जान-माल का नुकसान, कृषि भूमि का विनाश, बुनियादी ढाँचे को क्षति, पारिस्थितिक असंतुलन।
3. **भारत द्वारा किए जा रहे प्रयास:**
* **नीतिगत पहलें:** राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के दिशानिर्देश, राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC)।
* **तकनीकी उपाय:** IIT मंडी जैसे संस्थानों द्वारा अध्ययन और मानचित्रण, सुदूर संवेदन और GIS तकनीक का उपयोग।
* **प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** केंद्र सरकार द्वारा हिमालयी राज्यों को निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली मजबूत करने के निर्देश।
* **क्षमता निर्माण:** आपदा प्रतिक्रिया बलों (NDRF, SDRF) का प्रशिक्षण।
4. **आवश्यक रणनीतियाँ:**
* **वैज्ञानिक निगरानी:** संवेदनशील झीलों की नियमित और गहन निगरानी।
* **बुनियादी ढाँचा विकास:** GLOF प्रभावित क्षेत्रों में लचीले बुनियादी ढाँचे का निर्माण।
* **सामुदायिक भागीदारी:** स्थानीय समुदायों को जागरूक करना और उन्हें प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों में शामिल करना।
* **अंतर-राज्यीय सहयोग:** हिमालयी राज्यों के बीच सूचना साझाकरण और समन्वय।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** सीमा पार GLOF खतरों के लिए पड़ोसी देशों के साथ सहयोग।
* **जलवायु परिवर्तन शमन:** ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के वैश्विक और राष्ट्रीय प्रयास।
5. **निष्कर्ष:** हिमालयी पारिस्थितिकी की संवेदनशीलता और सतत विकास के महत्व पर बल देते हुए, एक समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर।
स्रोत: amarujala.com
Himachal Pradesh PCS (HPPSC (HAS)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हिमाचल प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में कितनी नई हिमनदीय झीलों का निर्माण हुआ है, जिनमें से नौ को अत्यंत खतरनाक श्रेणी में रखा गया है?
- 710
- 650
- 750
- 800
उत्तर: 710 — हिमाचल प्रदेश में पिछले 10 वर्षों में 710 नई हिमनदीय झीलों का निर्माण हुआ है, जिनमें से नौ को अत्यंत खतरनाक श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
Mains: हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न हिमनदीय झीलों के निर्माण एवं उनके खतरों का विश्लेषण करते हुए, राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का मूल्यांकन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
Related guides on our sites
- Best geography optional coaching
- Best geography optional coaching
- Best geography optional teacher
- Best geography optional teacher
- ओडिशा सरकार ने स्कूल दुर्घटनाओं में मृत/विकलांग छात्रों के परिवारों को ₹2 लाख देने का ऐलान किया - September 4, 2026
- Odisha Announces ₹2 Lakh Ex-Gratia for Students in Accidents: Key Details for UPSC - September 4, 2026
- डब्ल्यूएमओ का अल नीनो पूर्वानुमान: 2027 तक भारत पर प्रभाव - September 4, 2026

No Comments