29 Sep छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाएं: आईआईटी सहित उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य संकट

✎ उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसके लिए केवल भौतिक निवारक उपायों के बजाय एक समग्र और प्रणालीगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें पर्याप्त परामर्श सेवाएं, समावेशी वातावरण और…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय (Social Justice), शिक्षा (Education), मानव संसाधन (Human Resources) | GS Paper I — भारतीय समाज (Indian Society)
- Prelims: राष्ट्रीय कार्य बल (National Task Force – NTF), उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health in Higher Education), छात्र आत्महत्या (Student Suicides), राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy – NEP), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission – UGC)
- Essay: भारत में उच्च शिक्षा का बदलता परिदृश्य और मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ, युवा भारत का मानसिक स्वास्थ्य: एक राष्ट्रव्यापी चिंता
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर चिंता का विषय है, जिसके लिए केवल भौतिक निवारक उपायों के बजाय एक समग्र और प्रणालीगत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें पर्याप्त परामर्श सेवाएं, समावेशी वातावरण और जागरूकता कार्यक्रम शामिल हों।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त एक पैनल द्वारा किए गए राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को उजागर किया है। सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में अत्यधिक तनाव या परेशानी महसूस की, जबकि नौ प्रतिशत ने आत्महत्या के विचारों का अनुभव किया। यह रिपोर्ट राष्ट्रीय कार्य बल (NTF) की अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा होगी, जिसे 31 अक्टूबर तक प्रस्तुत किया जाना है। IIT बॉम्बे और BIT मेसरा जैसे प्रमुख संस्थानों में लगातार छात्र आत्महत्याओं ने इस मुद्दे को और भी गंभीर बना दिया है, जिससे निवारक उपायों पर बहस छिड़ गई है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT), मेसरा जैसे प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में लगातार छात्र आत्महत्याओं ने उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य संकट को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
- IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की 18 सितंबर को हुई मौत के बाद संस्थान में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जिससे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता महसूस हुई।
- कुछ संस्थानों ने छत के पंखों को बदलने या संशोधित करने जैसे भौतिक निवारक उपाय किए हैं, जो कोटा में छात्र आत्महत्याओं के बाद अपनाए गए उपायों की याद दिलाते हैं।
- हालांकि, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शिक्षाविदों का मानना है कि केवल भौतिक सुरक्षा उपाय छात्रों की परेशानी के अंतर्निहित कारणों को दूर नहीं कर सकते।
- आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 और 2024-25 के बीच 23 IITs में 45 छात्र आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं, जिनमें से 28 SC, ST और OBC समुदायों के छात्र थे।
- नैदानिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, IIT और IIM जैसे संस्थानों का वातावरण भावनात्मक अभिव्यक्ति की अनुमति नहीं देता है, और उच्च IQ वाले छात्र भी अक्सर सामाजिक और संबंधगत समस्याओं से जूझते हैं।
उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ
- उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों पर अकादमिक प्रदर्शन का अत्यधिक दबाव होता है, जिससे तनाव और चिंता बढ़ती है।
- छात्रों को अक्सर अपने साथियों के साथ प्रतिस्पर्धा और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, खासकर जब वे अपने घरों से दूर रहते हैं।
- संस्थानों में परामर्शदाताओं और छात्रों का अनुपात अक्सर अपर्याप्त होता है, जिससे समय पर और प्रभावी मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध नहीं हो पाती।
- सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, विशेष रूप से SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों को भेदभाव और समावेश की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे वे बाहरी महसूस करते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जागरूकता की कमी और कलंक (stigma) छात्रों को मदद मांगने से रोकता है।
- संस्थानों में भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए सुरक्षित स्थानों और तंत्रों की कमी छात्रों को अपनी भावनाओं को दबाने के लिए मजबूर करती है।
- प्रवेश परीक्षाओं की अत्यधिक प्रतिस्पर्धी प्रकृति और उसके बाद संस्थान के भीतर भी निरंतर दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy – NEP) 2020 मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने पर जोर देती है, लेकिन इसका प्रभावी कार्यान्वयन अभी भी एक चुनौती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य संकट | यह दर्शाता है कि भारत के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में भी छात्र गंभीर मानसिक तनाव का सामना कर रहे हैं, जिससे उनकी शिक्षा और भविष्य प्रभावित हो रहा है। |
| NTF सर्वेक्षण के निष्कर्ष | यह समस्या की गंभीरता को उजागर करता है, जिसमें 15% छात्र अभिभूत महसूस करते हैं और 9% में आत्महत्या के विचार आते हैं। यह नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण डेटा बिंदु है। |
| सामाजिक-भावनात्मक अभिव्यक्ति की कमी | संस्थानों का वातावरण छात्रों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की अनुमति नहीं देता, जिससे वे अकेलापन और अलगाव महसूस करते हैं। |
| शारीरिक सुरक्षा उपायों पर जोर | छत के पंखों को बदलने जैसे उपाय केवल सतही हैं और समस्या के मूल कारण, यानी मानसिक स्वास्थ्य सहायता की कमी को संबोधित नहीं करते। |
| परामर्शदाता-छात्र अनुपात की अपर्याप्तता | मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी छात्रों को आवश्यक सहायता प्राप्त करने से रोकती है, जिससे उनकी समस्याएँ और बढ़ जाती हैं। |
| SC, ST और OBC छात्रों में आत्महत्या | यह सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और जातिगत भेदभाव के कारण होने वाले अतिरिक्त दबाव को दर्शाता है, जो इन समुदायों के छात्रों पर पड़ता है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह सर्वेक्षण उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के बिगड़ते संकट को उजागर करता है, जो युवा आबादी के समग्र कल्याण के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
- यह दर्शाता है कि शैक्षणिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के दबाव के साथ-साथ सामाजिक अलगाव और भावनात्मक समर्थन की कमी छात्रों के जीवन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।
- SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों में आत्महत्या के बढ़ते मामले सामाजिक समावेश और समानता के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल देते हैं।
शैक्षणिक महत्व
- यह उच्च शिक्षा संस्थानों के पाठ्यक्रम और वातावरण में सुधार की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, ताकि छात्रों के समग्र विकास और मानसिक कल्याण को प्राथमिकता दी जा सके।
- यह संस्थानों में पर्याप्त परामर्श सेवाओं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों की स्थापना की अनिवार्यता को दर्शाता है, ताकि छात्रों को समय पर सहायता मिल सके।
- यह शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण की आवश्यकता को भी इंगित करता है, ताकि वे संकटग्रस्त छात्रों की पहचान कर सकें और उनकी मदद कर सकें।
शासन और नीतिगत महत्व
- यह सरकार और नियामक निकायों के लिए उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य नीतियों को मजबूत करने और उनके प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने का आह्वान करता है।
- यह राष्ट्रीय कार्य बल (National Task Force – NTF) की सिफारिशों के महत्व को रेखांकित करता है, जो इस समस्या के समाधान के लिए व्यापक नीतियां और दिशानिर्देश प्रदान कर सकता है।
- यह केवल भौतिक सुरक्षा उपायों के बजाय मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों में निवेश की आवश्यकता पर जोर देता है, ताकि समस्या के मूल कारणों को संबोधित किया जा सके।
चुनौतियाँ
1. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच का अभाव
- उच्च शिक्षण संस्थानों में परामर्शदाताओं और छात्रों का अनुपात बहुत कम है, जिससे सभी छात्रों को आवश्यक सहायता नहीं मिल पाती।
- मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में जागरूकता की कमी और कलंक (stigma) के कारण छात्र अक्सर मदद मांगने से कतराते हैं।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधन
2. शैक्षणिक दबाव और प्रतिस्पर्धा
- IIT जैसे संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और फिर अंदर भी उच्च प्रदर्शन बनाए रखने का दबाव छात्रों पर भारी मानसिक बोझ डालता है।
- असफलता का डर और साथियों से आगे निकलने की होड़ छात्रों में तनाव और चिंता बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन विकास: शिक्षा प्रणाली
3. संस्थागत वातावरण और सामाजिक अलगाव
- कई संस्थानों का वातावरण भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए अनुकूल नहीं होता, जिससे छात्र अकेलापन और अलगाव महसूस करते हैं।
- नए वातावरण में समायोजन की समस्या और सामाजिक समर्थन नेटवर्क की कमी भी छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक मुद्दे: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ
4. सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और भेदभाव
- SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों को अक्सर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और जातिगत भेदभाव के कारण अतिरिक्त दबाव और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- आरक्षण के माध्यम से प्रवेश पाने वाले छात्रों को कभी-कभी ‘कम योग्य’ के रूप में देखा जाता है, जिससे उनमें हीन भावना और तनाव पैदा होता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ
5. समस्या के प्रति सतही दृष्टिकोण
- छत के पंखों को बदलने जैसे शारीरिक सुरक्षा उपाय समस्या के मूल कारण को संबोधित नहीं करते, बल्कि केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया प्रदान करते हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों में पर्याप्त निवेश की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: शासन: नीतियों और हस्तक्षेपों का डिजाइन और कार्यान्वयन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| छात्रों में मानसिक तनाव | उच्च शिक्षा संस्थानों में 15% छात्रों का अभिभूत महसूस करना और 9% में आत्महत्या के विचार आना। |
| संस्थागत वातावरण | IIT जैसे संस्थानों में भावनात्मक अभिव्यक्ति की कमी, जिससे छात्र अकेलापन महसूस करते हैं। |
| परामर्श सेवाओं की कमी | छात्र-परामर्शदाता अनुपात अपर्याप्त है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य सहायता तक पहुँच सीमित है। |
| सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का प्रभाव | SC, ST और OBC छात्रों में आत्महत्या के उच्च मामले, जो अतिरिक्त दबाव और भेदभाव को दर्शाते हैं। |
| अधूरे सुरक्षा उपाय | छत के पंखों को बदलने जैसे उपाय समस्या के मूल कारणों को संबोधित नहीं करते, बल्कि केवल सतही समाधान हैं। |
| मानसिक स्वास्थ्य के प्रति कलंक | छात्रों द्वारा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को छिपाना और मदद मांगने से बचना। |
आगे की राह
- उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्र-परामर्शदाता अनुपात में सुधार किया जाए और योग्य मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या बढ़ाई जाए।
- संस्थानों में एक सहायक और समावेशी वातावरण बनाया जाए जो भावनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करे और छात्रों को सुरक्षित महसूस कराए।
- मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाएँ और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़े कलंक को दूर करने के प्रयास किए जाएँ।
- शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य संवेदनशीलता प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए, ताकि वे संकटग्रस्त छात्रों की पहचान कर सकें।
- छात्रों के लिए अकादमिक दबाव को कम करने और लचीलेपन को बढ़ावा देने के लिए पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणालियों में सुधार किया जाए।
- SC, ST और OBC छात्रों के लिए विशेष सहायता समूह और परामर्श कार्यक्रम स्थापित किए जाएँ, ताकि वे सामाजिक-आर्थिक और जातिगत भेदभाव से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर सकें।
- राष्ट्रीय कार्य बल (NTF) की सिफारिशों को गंभीरता से लागू किया जाए और मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों में पर्याप्त बजटीय आवंटन सुनिश्चित किया जाए।
- छात्रों के लिए सहकर्मी सहायता (peer support) नेटवर्क विकसित किए जाएँ, जहाँ वे एक-दूसरे का समर्थन कर सकें और अपनी समस्याओं को साझा कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
उच्च शिक्षा में मानसिक स्वास्थ्य · छात्र आत्महत्या · राष्ट्रीय कार्य बल (NTF) · मानसिक स्वास्थ्य देखभाल · संस्थागत सहायता प्रणाली · शैक्षणिक दबाव · सामाजिक-भावनात्मक कल्याण · समावेशी वातावरण · परामर्श सेवाएँ · राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 21’: ‘जीवन के अधिकार में गरिमापूर्ण जीवन शामिल है।’}
- {‘अनुच्छेद 38’: ‘राज्य सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करेगा।’}
- {‘अनुच्छेद 39(f)’: ‘बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर सुनिश्चित करना।’}
- {‘अनुच्छेद 41’: ‘बेरोजगारी, बीमारी आदि के मामलों में सहायता का अधिकार।’}
- {‘अनुच्छेद 46’: ‘कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा।’}
अवधारणा प्रवाह
उच्च शिक्षा में अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और दबाव → संस्थागत वातावरण में भावनात्मक अभिव्यक्ति की कमी → छात्रों में मानसिक तनाव, अलगाव और आत्महत्या के विचार → अपर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य सहायता और परामर्श सेवाओं का अभाव → छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसे चरम कदम उठाना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित हालिया सर्वेक्षण के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. राष्ट्रीय कार्य बल (NTF) द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 9 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में आत्महत्या के विचारों का अनुभव किया।
2. सर्वेक्षण के अनुसार, उच्च शिक्षा संस्थानों में लगभग 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में अत्यधिक तनाव या संकट की अवधि का अनुभव किया।
3. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) जैसे संस्थानों में भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए अनुकूल वातावरण का अभाव है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। सर्वेक्षण में 9 प्रतिशत छात्रों द्वारा आत्महत्या के विचारों का अनुभव करने की बात सामने आई। कथन 2 सही है। सर्वेक्षण के अनुसार, 15 प्रतिशत छात्रों ने अत्यधिक तनाव या संकट की अवधि का अनुभव किया। कथन 3 सही है। विशेषज्ञों ने IIT और IIM जैसे संस्थानों में भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए अनुकूल वातावरण के अभाव पर प्रकाश डाला है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारक उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट में योगदान कर सकता है/सकते हैं?
1. अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक वातावरण
2. अपर्याप्त छात्र-परामर्शदाता अनुपात
3. सामाजिक और संबंधपरक चुनौतियों का सामना करने में असमर्थता
4. संस्थागत स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणालियों का अभाव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी कारक छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट में योगदान करते हैं, जैसा कि समाचार रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय से स्पष्ट है। अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, अपर्याप्त परामर्श, सामाजिक चुनौतियाँ और संस्थागत सहायता की कमी प्रमुख कारण हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट के अंतर्निहित कारणों की विवेचना कीजिए। इस समस्या के समाधान हेतु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में सुझाए गए उपायों और अन्य संभावित संस्थागत सुधारों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य संकट की वर्तमान स्थिति और गंभीरता का संक्षिप्त उल्लेख करें (जैसे हालिया सर्वेक्षण के आंकड़े)।
2. अंतर्निहित कारण: उन प्रमुख कारकों की विवेचना करें जो छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म देते हैं। इसमें शामिल हो सकते हैं:
* अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शैक्षणिक दबाव और प्रदर्शन की अपेक्षाएँ।
* सामाजिक अलगाव और ‘बाहरी’ महसूस करना।
* भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए संस्थागत वातावरण का अभाव।
* अपर्याप्त छात्र-परामर्शदाता अनुपात और सहायता सेवाओं की कमी।
* पारिवारिक अपेक्षाएँ और भविष्य की अनिश्चितताएँ।
* सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंधित चुनौतियाँ (जैसे SC, ST, OBC छात्रों के मामले)।
3. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के उपाय: NEP 2020 में मानसिक स्वास्थ्य और छात्र कल्याण से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख करें, जैसे:
* छात्रों के समग्र विकास पर जोर।
* परामर्श सेवाओं को मजबूत करना।
* भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करना।
* एक सुरक्षित और समावेशी सीखने का माहौल बनाना।
4. अन्य संभावित संस्थागत सुधार: NEP के प्रावधानों के अतिरिक्त, अन्य व्यावहारिक और प्रभावी संस्थागत सुधारों पर चर्चा करें, जैसे:
* मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या में वृद्धि और पहुँच में सुधार।
* संकाय और कर्मचारियों के लिए संवेदनशीलता प्रशिक्षण।
* सहकर्मी सहायता (peer support) कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।
* पाठ्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को एकीकृत करना।
* शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करना।
* छात्रों के लिए सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना।
* तनाव कम करने वाले शैक्षणिक मूल्यांकन पद्धतियों को अपनाना।
5. निष्कर्ष: छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को संबोधित करने के लिए एक समग्र और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें, जिसमें संस्थागत, सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास शामिल हों।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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