08 Aug तमिलनाडु सरकार ने ‘संघ-राज्य संबंध’ रिपोर्ट का अंग्रेजी संस्करण सार्वजनिक किया, जानिए क्यों है महत्वपूर्ण
✎ तमिलनाडु सरकार ने न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली केंद्र-राज्य संबंध समिति की रिपोर्ट के अंग्रेजी संस्करण को सार्वजनिक किया है, जो भारत में संघवाद और पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper II — शासन व्यवस्था, पारदर्शिता एवं जवाबदेही
- Prelims: केंद्र-राज्य संबंध, उच्च-स्तरीय समिति, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति, सरकारी आदेश (GO), संघवाद, संविधान की सातवीं अनुसूची
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, पारदर्शिता और जवाबदेही सुशासन के आधार स्तंभ
त्वरित पुनरावृत्ति: तमिलनाडु सरकार ने न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की अध्यक्षता वाली केंद्र-राज्य संबंध समिति की रिपोर्ट के अंग्रेजी संस्करण को सार्वजनिक किया है, जो भारत में संघवाद और पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है।
पूर्व में पूछा गया: Asked in UPSC Prelims 2019
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार ने केंद्र-राज्य संबंधों पर गठित उच्च-स्तरीय समिति (High-Level Committee on Union-State Relations) की रिपोर्ट के भाग-I के अंग्रेजी संस्करण को सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। यह निर्णय पारदर्शिता सुनिश्चित करने और रिपोर्ट को आम जनता तक पहुँचाने के उद्देश्य से लिया गया है, जैसा कि तमिल संस्करण के साथ किया गया था। सरकार ने रिपोर्ट के अंग्रेजी संस्करण के अनन्य कॉपीराइट (exclusive copyright) को भी रद्द करने का निर्देश दिया है।
पृष्ठभूमि
- तमिलनाडु की पिछली DMK सरकार ने 15 अप्रैल, 2025 को केंद्र-राज्य संबंधों पर एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन किया था।
- इस समिति की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ (Justice Kurian Joseph) ने की थी।
- सेवानिवृत्त IAS अधिकारी के. अशोक वर्धन शेट्टी और तमिलनाडु राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एम. नागनाथन को समिति के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया था।
- समिति ने अपनी रिपोर्ट का भाग-I तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को 16 फरवरी, 2026 को प्रस्तुत किया था।
- मुख्यमंत्री स्टालिन ने 18 फरवरी, 2026 को इस रिपोर्ट को विधानसभा में प्रस्तुत किया था।
- यह कदम केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार और राज्यों की स्वायत्तता से संबंधित मुद्दों पर चर्चा को बढ़ावा देने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।
भारत में केंद्र-राज्य संबंध
- भारतीय संविधान (Indian Constitution) संघीय ढाँचा प्रदान करता है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है।
- संविधान के भाग XI और XII में केंद्र-राज्य संबंधों के विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं का विस्तृत वर्णन है।
- सातवीं अनुसूची (Seventh Schedule) में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से विधायी शक्तियों का वितरण किया गया है।
- विधायी संबंध: अनुच्छेद 245 से 255 तक केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों को परिभाषित करते हैं, जिसमें संसद और राज्य विधानमंडलों की कानून बनाने की शक्तियाँ शामिल हैं।
- प्रशासनिक संबंध: अनुच्छेद 256 से 263 तक प्रशासनिक संबंधों से संबंधित हैं, जिसमें राज्यों पर संघ का नियंत्रण और राज्यों के बीच समन्वय शामिल है।
- वित्तीय संबंध: अनुच्छेद 268 से 293 तक केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण और वित्तीय स्वायत्तता से संबंधित हैं।
- समय-समय पर विभिन्न आयोगों और समितियों, जैसे सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) और पुंछी आयोग (Punchhi Commission) ने केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा की है और सुधारों का सुझाव दिया है।
- संघवाद (Federalism) भारत के संविधान की एक मूल विशेषता है, जो देश की विविधता को समायोजित करते हुए एकता बनाए रखने का प्रयास करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| संघ-राज्य संबंध समिति का गठन | केंद्र-राज्य संबंधों की जटिलताओं का अध्ययन कर सुधार हेतु सिफारिशें देना। |
| रिपोर्ट का सार्वजनिक डोमेन में जारी होना | शासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और जनता तक महत्वपूर्ण जानकारी की पहुँच बढ़ाना। |
| अंग्रेजी संस्करण पर कॉपीराइट रद्द करना | ज्ञान और सूचना के मुक्त प्रवाह को बढ़ावा देना, जिससे अधिक लोग रिपोर्ट का उपयोग कर सकें। |
| तमिलनाडु सरकार की पहल | राज्यों द्वारा संघवाद (Federalism) और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय भूमिका। |
महत्व
शासन और पारदर्शिता
- रिपोर्ट को सार्वजनिक डोमेन में जारी करने से सरकारी कामकाज में पारदर्शिता (Transparency) बढ़ती है, जिससे जनता को नीति निर्माण और शासन प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलती है।
- कॉपीराइट रद्द करने का निर्णय सूचना के अधिकार (Right to Information) और ज्ञान के मुक्त प्रसार के सिद्धांतों के अनुरूप है, जो सुशासन (Good Governance) के लिए आवश्यक हैं।
संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
- यह पहल केंद्र-राज्य संबंधों (Union-State Relations) के महत्वपूर्ण मुद्दे पर राज्यों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है, जो भारतीय संघवाद की एक मूलभूत विशेषता है।
- समिति की सिफारिशें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण, वित्तीय संबंधों और प्रशासनिक समन्वय को बेहतर बनाने में सहायक हो सकती हैं, जिससे सहकारी संघवाद को बल मिलेगा।
लोकतांत्रिक सहभागिता
- रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और आम जनता को केंद्र-राज्य संबंधों पर विचार-विमर्श में भाग लेने का अवसर मिलता है।
- यह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को मजबूत करता है और विभिन्न हितधारकों को नीतिगत बहसों में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है।
चुनौतियाँ
1. केंद्र-राज्य संबंधों में असंतुलन
- केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों के वितरण में असंतुलन अक्सर तनाव का कारण बनता है।
- राज्यों को अक्सर वित्तीय स्वायत्तता की कमी महसूस होती है, जिससे उनकी विकास पहलों पर असर पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान-केंद्र-राज्य संबंध
2. सहकारी संघवाद का अभाव
- कई बार केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय की कमी देखी जाती है, जिससे राष्ट्रीय नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा आती है।
- राजनीतिक मतभेद अक्सर सहकारी संघवाद की भावना को कमजोर करते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद-विशेषताएँ
3. राज्यों की स्वायत्तता का मुद्दा
- राज्य अक्सर अधिक स्वायत्तता (Autonomy) की मांग करते हैं, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ केंद्र का हस्तक्षेप अधिक होता है।
- राज्यपाल की भूमिका और अनुच्छेद 356 (Article 356) का उपयोग राज्यों की स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगाता रहा है।
यूपीएससी लिंक: केंद्र-राज्य संबंध-विवादित मुद्दे
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| शक्तियों का वितरण | केंद्र और राज्यों के बीच विधायी और प्रशासनिक शक्तियों के विभाजन में अस्पष्टता या असंतुलन। |
| वित्तीय संबंध | राज्यों की वित्तीय निर्भरता और राजस्व स्रोतों पर केंद्र का अधिक नियंत्रण। |
| संस्थागत तंत्र | अंतर-राज्यीय परिषदों (Inter-State Councils) जैसे मंचों का कम प्रभावी उपयोग। |
| राजनीतिक हस्तक्षेप | केंद्र सरकार द्वारा राज्यों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप, विशेषकर राज्यपाल के माध्यम से। |
आगे की राह
- केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा के लिए समय-समय पर गठित समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लागू किया जाए।
- अंतर-राज्यीय परिषद और नीति आयोग (NITI Aayog) जैसे मंचों का प्रभावी ढंग से उपयोग करके केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और समन्वय बढ़ाया जाए।
- राज्यों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता प्रदान की जाए, जिससे वे अपनी विकासात्मक प्राथमिकताओं के अनुसार संसाधन जुटा सकें।
- विधायी शक्तियों के स्पष्ट विभाजन और समवर्ती सूची (Concurrent List) के विषयों पर केंद्र और राज्यों के बीच अधिक परामर्श सुनिश्चित किया जाए।
- राज्यपाल की भूमिका को संविधान के प्रावधानों के अनुरूप और अधिक निष्पक्ष बनाया जाए, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो।
- राज्यों को अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अधिक लचीलापन प्रदान किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
केंद्र-राज्य संबंध · संघवाद · सहकारी संघवाद · राज्यों की स्वायत्तता · सरकारी आयोग · पुंछी आयोग · तमिलनाडु उच्च-स्तरीय समिति · अनुच्छेद 245 · अनुच्छेद 246 · सातवीं अनुसूची · राजकोषीय संघवाद · प्रशासनिक संबंध
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 245-255’, ‘note’: ‘विधायी संबंधों का प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 256-263’, ‘note’: ‘प्रशासनिक संबंधों का प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 268-293’, ‘note’: ‘वित्तीय संबंधों का प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय परिषद का गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 356’, ‘note’: ‘राज्य में राष्ट्रपति शासन’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘केंद्र-राज्य शक्तियों का विभाजन’}
अवधारणा प्रवाह
तमिलनाडु सरकार ने समिति गठित की → समिति ने केंद्र-राज्य संबंधों पर रिपोर्ट प्रस्तुत की → सरकार ने रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में जारी की → अंग्रेजी संस्करण पर कॉपीराइट रद्द किया गया → पारदर्शिता और संघवाद को बढ़ावा मिला
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. भारत का संविधान संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण करता है। 2. सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं। 3. अवशिष्ट शक्तियाँ (Residuary powers) राज्यों के पास होती हैं। उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। भारत का संविधान अनुच्छेद 245 और 246 के तहत विधायी शक्तियों का वितरण करता है और सातवीं अनुसूची में सूचियाँ शामिल हैं। कथन 3 गलत है क्योंकि अवशिष्ट शक्तियाँ भारतीय संविधान के तहत संसद (केंद्र) के पास होती हैं, न कि राज्यों के पास (अनुच्छेद 248)।
Q2. अभिकथन (A): केंद्र-राज्य संबंधों पर विभिन्न समितियों और आयोगों का गठन भारत में संघवाद की प्रकृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। कारण (R): ये समितियाँ और आयोग अक्सर केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संतुलन और वित्तीय संबंधों में सुधार के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करते हैं।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि विभिन्न आयोगों (जैसे सरकारी आयोग, पुंछी आयोग) ने केंद्र-राज्य संबंधों के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया है। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि इन आयोगों का मुख्य उद्देश्य केंद्र-राज्य संबंधों में सुधार के लिए सिफारिशें देना ही होता है, जिसमें शक्तियों का संतुलन और वित्तीय संबंध शामिल हैं।
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा आयोग केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित नहीं है?
- सरकारी आयोग
- पुंछी आयोग
- राजमन्नार समिति
- कोठारी आयोग
उत्तर: कोठारी आयोग — सरकारी आयोग (1983), पुंछी आयोग (2007) और राजमन्नार समिति (1969) सभी केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित हैं। कोठारी आयोग (1964-66) शिक्षा सुधारों से संबंधित था।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में केंद्र-राज्य संबंधों की प्रकृति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, विभिन्न आयोगों और समितियों की प्रमुख सिफारिशों का उल्लेख करते हुए राज्यों की स्वायत्तता की बढ़ती मांग के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: भारत में केंद्र-राज्य संबंधों की अर्ध-संघीय प्रकृति का संक्षिप्त परिचय।
मुख्य भाग:
1. केंद्र-राज्य संबंधों की प्रकृति: विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों का उल्लेख। केंद्र की ओर झुकाव (जैसे आपातकालीन प्रावधान, अखिल भारतीय सेवाएँ, अवशिष्ट शक्तियाँ) और राज्यों की सीमित स्वायत्तता।
2. विभिन्न आयोगों और समितियों की सिफारिशें: सरकारी आयोग (अनुच्छेद 356 का संयमित उपयोग, राज्यपाल की भूमिका, वित्तीय हस्तांतरण), पुंछी आयोग (सहकारी संघवाद पर जोर, राज्यपाल की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार, स्थानीय निकायों को सशक्त बनाना), राजमन्नार समिति (राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता, अवशिष्ट शक्तियों का राज्यों को हस्तांतरण की मांग)।
3. राज्यों की स्वायत्तता की बढ़ती मांग के निहितार्थ: राजनीतिक (क्षेत्रीय दलों का उदय), आर्थिक (राजकोषीय संघवाद में असंतुलन, जीएसटी परिषद), सामाजिक-सांस्कृतिक (भाषा, पहचान का मुद्दा)। संघवाद के सिद्धांतों पर प्रभाव, विकास और शासन पर प्रभाव।
निष्कर्ष: सहकारी संघवाद को मजबूत करने की आवश्यकता, केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और सहयोग के महत्व पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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