31 Aug भारत ने इंडस वाटर्स संधि विवाद में CoA के ‘पुरस्कार’ को किया खारिज, कहा- ‘अवैध न्यायालय’
✎ सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हस्ताक्षरित एक जल-बंटवारा समझौता है, जिसके तहत पूर्वी नदियों का नियंत्रण भारत को और पश्चिमी नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया है, लेकिन भारत को…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध | GS Paper II — भारत एवं उसके पड़ोसी-संबंध
- Prelims: सिंधु जल संधि, विश्व बैंक, स्थायी मध्यस्थता न्यायालय, पश्चिमी नदियाँ, पूर्वी नदियाँ, जल विवाद
- Essay: अंतर्राष्ट्रीय संधियों और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन, भारत की विदेश नीति में जल कूटनीति का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हस्ताक्षरित एक जल-बंटवारा समझौता है, जिसके तहत पूर्वी नदियों का नियंत्रण भारत को और पश्चिमी नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया है, लेकिन भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ गैर-उपभोक्ता उपयोग की अनुमति है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) से संबंधित एक मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration – CoA) द्वारा जारी नवीनतम ‘निर्णय’ को अस्वीकार कर दिया है। भारत ने इस न्यायालय को ‘अवैध रूप से गठित’ बताया है और कहा है कि यह विश्व बैंक द्वारा संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए स्थापित किया गया था। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह इस निकाय के किसी भी निर्णय को मान्यता नहीं देता है और उसके संप्रभु निर्णयों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारत ने यह भी दोहराया है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह से बंद नहीं कर देता, तब तक सिंधु जल संधि को ‘स्थगित’ रखा जाएगा।
पृष्ठभूमि
- सिंधु जल संधि पर भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर, 1960 को हस्ताक्षर किए गए थे।
- यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई थी और इसका उद्देश्य सिंधु नदी प्रणाली के जल के उपयोग का प्रबंधन करना था।
- संधि के तहत, तीन पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास और सतलुज) का पूर्ण नियंत्रण भारत को दिया गया था।
- तीन पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चिनाब) का अधिकांश जल उपयोग पाकिस्तान को आवंटित किया गया था, लेकिन भारत को इन नदियों पर कुछ गैर-उपभोक्ता उपयोग (जैसे पनबिजली उत्पादन) की अनुमति थी।
- संधि में जल विवादों के समाधान के लिए एक त्रि-स्तरीय तंत्र शामिल है: पहले द्विपक्षीय बातचीत, फिर एक तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति, और अंत में एक मध्यस्थता न्यायालय का गठन।
- भारत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि विश्व बैंक द्वारा गठित मध्यस्थता न्यायालय संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करता है और इसलिए यह अवैध है।
- न्यायालय ने हाल ही में रत्ले जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydro-Electric Plant – RHEP) से संबंधित अंतरिम उपायों और संधि की स्थिति पर एक आदेश जारी किया था।
सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) क्या है?
- सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली के जल-बंटवारे के लिए एक ऐतिहासिक समझौता है, जिस पर 1960 में हस्ताक्षर किए गए थे।
- यह संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी और इसे दुनिया की सबसे सफल जल-साझाकरण संधियों में से एक माना जाता है।
- संधि के तहत, सिंधु नदी प्रणाली को दो भागों में विभाजित किया गया है: पूर्वी नदियाँ (रावी, ब्यास और सतलुज) और पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, झेलम और चिनाब)।
- भारत को पूर्वी नदियों के जल का अप्रतिबंधित उपयोग करने का अधिकार है, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों के जल का अप्रतिबंधित उपयोग करने का अधिकार है।
- हालांकि, भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ गैर-उपभोक्ता उपयोग (जैसे पनबिजली उत्पादन, सिंचाई और नेविगेशन) की अनुमति है, बशर्ते यह संधि के विशिष्ट प्रावधानों का पालन करे।
- संधि में एक स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission – PIC) की स्थापना का प्रावधान है, जिसमें दोनों देशों के आयुक्त शामिल होते हैं, जो संधि के कार्यान्वयन और विवादों के समाधान की निगरानी करते हैं।
- विवाद समाधान तंत्र में द्विपक्षीय परामर्श, एक तटस्थ विशेषज्ञ की मध्यस्थता और अंततः एक मध्यस्थता न्यायालय का गठन शामिल है।
- यह संधि दोनों देशों के बीच कई युद्धों और तनावों के बावजूद बड़े पैमाने पर कायम रही है, जो इसके महत्व को दर्शाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty – IWT) | भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी प्रणाली के जल-बंटवारे को नियंत्रित करने वाली एक ऐतिहासिक संधि। |
| मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration – CoA) | विश्व बैंक द्वारा गठित एक निकाय, जिसे भारत ‘अवैध रूप से गठित’ मानता है और जिसकी वैधता को चुनौती देता है। |
| अंतरिम उपाय और संधि की स्थिति पर ‘पुरस्कार’ | CoA द्वारा जारी निर्णय, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया है, विशेष रूप से राटल जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydro-Electric Plant – RHEP) से संबंधित। |
| संधि को निलंबित रखना | भारत ने सीमा पार आतंकवाद के समर्थन को रोकने तक IWT को निलंबित रखने का निर्णय लिया है। |
| पश्चिमी नदियाँ | सिंधु, झेलम और चिनाब नदियाँ, जिनके जल का उपयोग पाकिस्तान को आवंटित है, लेकिन भारत को कुछ शर्तों के तहत जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण का अधिकार है। |
महत्व
सामरिक महत्व
- सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच जल-बंटवारे का एक महत्वपूर्ण तंत्र है, जो दोनों देशों के बीच संबंधों को प्रभावित करता है।
- भारत द्वारा CoA के ‘पुरस्कार’ को अस्वीकार करना अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता निकायों की वैधता और अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाता है।
अंतर्राष्ट्रीय कानून और कूटनीति
- यह घटना अंतर्राष्ट्रीय संधियों के क्रियान्वयन और विवाद समाधान तंत्रों की जटिलताओं को दर्शाती है।
- भारत का यह रुख कि CoA अवैध रूप से गठित है, अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत संधियों की व्याख्या और प्रवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
जल सुरक्षा और ऊर्जा परियोजनाएँ
- राटल जलविद्युत परियोजना जैसी परियोजनाओं पर CoA के निर्णय भारत की जलविद्युत क्षमता और ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव डाल सकते हैं।
- पश्चिमी नदियों पर भारत की परियोजनाओं का डिज़ाइन और संचालन संधि के तहत भारत के अधिकारों और दायित्वों के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. अंतर्राष्ट्रीय विवाद समाधान
- अंतर्राष्ट्रीय संधियों से उत्पन्न होने वाले विवादों को सुलझाने के लिए एक स्वीकार्य और वैध तंत्र स्थापित करना एक चुनौती है।
- विभिन्न पक्षों द्वारा मध्यस्थता निकायों की वैधता पर असहमति विवादों को और जटिल बना सकती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध, अंतर्राष्ट्रीय संगठन
2. सीमा पार आतंकवाद का प्रभाव
- सीमा पार आतंकवाद जैसे गैर-राज्य कारकों का द्विपक्षीय संधियों और समझौतों पर पड़ने वाला प्रभाव एक बड़ी चुनौती है।
- भारत का संधि को निलंबित रखने का निर्णय आतंकवाद के खिलाफ अपनी दृढ़ता को दर्शाता है, लेकिन इससे संधि के भविष्य पर अनिश्चितता पैदा होती है।
यूपीएससी लिंक: सुरक्षा, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
3. जल संसाधनों का प्रबंधन
- साझा नदी प्रणालियों के जल संसाधनों का न्यायसंगत और टिकाऊ प्रबंधन एक जटिल मुद्दा है, खासकर जब राजनीतिक तनाव अधिक हो।
- जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण और संचालन, विशेष रूप से पश्चिमी नदियों पर, संवेदनशील विषय है।
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4. कूटनीतिक संबंध
- इस मुद्दे पर भारत का कड़ा रुख पाकिस्तान के साथ उसके पहले से ही तनावपूर्ण संबंधों को और प्रभावित कर सकता है।
- अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत के रुख को स्पष्ट करना और उसका बचाव करना एक कूटनीतिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| CoA की वैधता | भारत इसे ‘अवैध रूप से गठित’ मानता है, जिससे इसके निर्णयों की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिह्न लगता है। |
| अंतर्राष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन | भारत का मानना है कि CoA का गठन संधि की शर्तों का उल्लंघन है। |
| राटल जलविद्युत परियोजना | परियोजना के डिज़ाइन और संचालन पर CoA का ‘पुरस्कार’ भारत के संप्रभु निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास है। |
| सीमा पार आतंकवाद | भारत ने इस मुद्दे के कारण संधि को निलंबित रखा है, जिससे संधि के भविष्य पर अनिश्चितता है। |
| अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता का अधिकार क्षेत्र | यह घटना अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता निकायों के अधिकार क्षेत्र और उनके निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति पर बहस छेड़ती है। |
आगे की राह
- भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर CoA की अवैधता और सिंधु जल संधि के उल्लंघन के अपने तर्क को मजबूती से प्रस्तुत करना चाहिए।
- पाकिस्तान के साथ रचनात्मक संवाद के लिए रास्ते खुले रखने चाहिए, ताकि संधि से संबंधित मुद्दों को द्विपक्षीय रूप से हल किया जा सके।
- पश्चिमी नदियों पर अपनी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण और संचालन में अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधि के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
- सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी नीति को दृढ़ता से बनाए रखना चाहिए और पाकिस्तान पर इस खतरे को समाप्त करने के लिए दबाव बनाना चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय जल कानून और विवाद समाधान तंत्रों के संबंध में अपनी स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए।
- जल संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग से संबंधित दीर्घकालिक रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो भारत की ऊर्जा और जल सुरक्षा सुनिश्चित करें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सिंधु जल संधि · भारत-पाकिस्तान संबंध · जल विवाद · अंतर्राष्ट्रीय कानून · स्थायी मध्यस्थता न्यायालय · विश्व बैंक · जलविद्युत परियोजनाएँ · आतंकवाद · संधि का निलंबन · न्यायिक समीक्षा
अवधारणा प्रवाह
भारत ने CoA के ‘पुरस्कार’ को अस्वीकार किया। → भारत CoA को ‘अवैध रूप से गठित’ मानता है। → CoA का गठन सिंधु जल संधि की शर्तों का उल्लंघन है। → भारत ने सीमा पार आतंकवाद के कारण IWT को निलंबित रखा है। → CoA के निर्णयों का भारत की परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं होगा। → यह घटना अंतर्राष्ट्रीय विवाद समाधान और द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करती है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह संधि भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हस्ताक्षरित हुई थी।
2. यह संधि सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के जल-बंटवारे से संबंधित है।
3. विश्व बैंक इस संधि का एक हस्ताक्षरकर्ता और गारंटर है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। सिंधु जल संधि पर 19 सितंबर, 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षर किए गए थे।
कथन 2 सही है। यह संधि सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास, सतलुज) के जल-बंटवारे से संबंधित है।
कथन 3 गलत है। विश्व बैंक इस संधि का एक हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, बल्कि एक गारंटर और मध्यस्थ के रूप में इसकी भूमिका रही है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सी नदी सिंधु जल संधि के तहत ‘पूर्वी नदियों’ में शामिल नहीं है?
- रावी
- ब्यास
- सतलुज
- झेलम
उत्तर: झेलम — सिंधु जल संधि के तहत, पूर्वी नदियों में रावी, ब्यास और सतलुज शामिल हैं, जिनका उपयोग भारत द्वारा बिना किसी प्रतिबंध के किया जा सकता है। झेलम एक पश्चिमी नदी है, जिसका उपयोग पाकिस्तान द्वारा किया जाता है, हालांकि भारत को कुछ गैर-उपभोग्य उपयोगों की अनुमति है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) भारत और पाकिस्तान के बीच जल-बंटवारे के एक महत्वपूर्ण तंत्र का प्रतिनिधित्व करती है। हाल के घटनाक्रमों के आलोक में, संधि के प्रमुख प्रावधानों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और भारत द्वारा इसके निलंबन के कारणों तथा संभावित परिणामों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर की रूपरेखा:
1. परिचय: सिंधु जल संधि (IWT) का संक्षिप्त परिचय, इसके हस्ताक्षर की तिथि (1960) और उद्देश्य।
2. संधि के प्रमुख प्रावधान: पूर्वी और पश्चिमी नदियों का वर्गीकरण (रावी, ब्यास, सतलुज – भारत; सिंधु, झेलम, चिनाब – पाकिस्तान), भारत को पश्चिमी नदियों पर सीमित गैर-उपभोग्य उपयोग (जैसे जलविद्युत उत्पादन) की अनुमति, विवाद समाधान तंत्र (तटस्थ विशेषज्ञ, मध्यस्थता न्यायालय)।
3. हाल के घटनाक्रम: भारत द्वारा मध्यस्थता न्यायालय (CoA) के ‘अवैध’ गठन और उसके ‘अवार्ड’ को अस्वीकार करना। भारत द्वारा संधि को ‘स्थगित’ (abeyance) रखने का निर्णय।
4. भारत द्वारा निलंबन के कारण: मुख्य रूप से पाकिस्तान द्वारा सीमा पार आतंकवाद (cross-border terrorism) को समर्थन देना, भारत की संप्रभुता और सुरक्षा पर इसका प्रभाव।
5. संभावित परिणाम: भारत-पाकिस्तान संबंधों पर प्रभाव, अंतर्राष्ट्रीय जल कानून के तहत निहितार्थ, परियोजनाओं (जैसे रतले जलविद्युत संयंत्र) पर प्रभाव, विश्व बैंक की भूमिका और भविष्य की मध्यस्थता की संभावनाएँ।
6. आलोचनात्मक विश्लेषण: संधि की ऐतिहासिक सफलताएँ और वर्तमान चुनौतियाँ, भारत की स्थिति की वैधता बनाम अंतर्राष्ट्रीय संधियों के प्रति प्रतिबद्धता, क्षेत्रीय स्थिरता पर प्रभाव।
7. निष्कर्ष: आगे बढ़ने का मार्ग, जिसमें कूटनीति और अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर बल दिया जाए।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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