यूपीएससी 2025: ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने क्या कहा? पूरी जानकारी

OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई:केंद्र बोला- सिर्फ माता-पिता की सैलरी-आय से तय नहीं हो दर्जा; पद-संपत्ति — diagram

यूपीएससी 2025: ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, केंद्र ने क्या कहा? पूरी जानकारी

OBC क्रीमी लेयर निर्धारणसुप्रीम कोर्ट निर्देश11 मार्च 2026मूल मानदंडमाता-पिता आय, पद, संपत्ति1993 कार्यालय ज्ञापनOBC क्रीमी लेयर मानदंड2004 स्पष्टीकरणसरकारी कर्मचारियों हेतु वेतन शामिल नहींवर्तमान विवादक्या 2004 पत्र मूल मानदंड बदलता है
OBC क्रीमी लेयर निर्धारण

✎ क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन संपन्न और उन्नत सदस्यों को संदर्भित करता है जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है ताकि वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुँच सके, और इसका निर्धारण आय, पद और संपत्ति जैसे विभिन्न मानदंडों के…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

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  • Prelims: क्रीमी लेयर, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुच्छेद 15(4), अनुच्छेद 16(4), मंडल आयोग, इंदिरा साहनी वाद, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC), रोहित नाथन वाद
  • Essay: सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की चुनौतियाँ, आरक्षण नीति: आवश्यकता, प्रभाव और भविष्य की दिशा

त्वरित पुनरावृत्ति: क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन संपन्न और उन्नत सदस्यों को संदर्भित करता है जिन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाता है ताकि वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुँच सके, और इसका निर्धारण आय, पद और संपत्ति जैसे विभिन्न मानदंडों के आधार पर किया जाता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) से सिविल सेवा परीक्षा (CSE) के 958 चयनित उम्मीदवारों के लिए सेवा आवंटन (Service Allocation) प्रक्रिया को पुराने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) क्रीमी लेयर मानदंडों के आधार पर पूरा करने की अनुमति मांगी है। यह अनुरोध सर्वोच्च न्यायालय के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में 11 मार्च 2026 के फैसले के बाद आया है, जिसमें न्यायालय ने OBC क्रीमी लेयर की पहचान के संबंध में महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। केंद्र सरकार का तर्क है कि माता-पिता के केवल वेतन या आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्धारण नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके पद और संपत्ति की स्थिति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पृष्ठभूमि

  • भारत में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से की गई है। संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को ऐसे वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति देते हैं।
  • मंडल आयोग (Mandal Commission) की सिफारिशों के आधार पर, 1990 में केंद्र सरकार की सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया था।
  • इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने OBC आरक्षण को वैध ठहराया, लेकिन ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा को भी प्रस्तुत किया। न्यायालय ने कहा कि OBC के भीतर आर्थिक रूप से संपन्न और सामाजिक रूप से उन्नत व्यक्तियों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाना चाहिए, ताकि वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुँच सके।
  • सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद, केंद्र सरकार ने 8 सितंबर 1993 को एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) जारी कर OBC क्रीमी लेयर की पहचान के लिए मानदंड निर्धारित किए। इसमें माता-पिता की आय, पद और अन्य कारकों को शामिल किया गया था।
  • 14 अक्टूबर 2004 को एक स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया, जिसमें सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रीमी लेयर के निर्धारण में वेतन को आय के रूप में शामिल न करने का प्रावधान किया गया था।
  • ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2026 को फैसला सुनाया कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र 8 सितंबर 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता, जिससे क्रीमी लेयर के निर्धारण के तरीकों पर फिर से बहस छिड़ गई है।

क्रीमी लेयर क्या है?

  • क्रीमी लेयर (Creamy Layer) शब्द का अर्थ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उन सदस्यों से है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से इतने उन्नत हो चुके हैं कि उन्हें आरक्षण के लाभ की आवश्यकता नहीं है।
  • इस अवधारणा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरक्षण का लाभ OBC वर्ग के भीतर सबसे वंचित और पिछड़े लोगों तक पहुँचे, न कि उन लोगों तक जो पहले से ही समाज में एक निश्चित स्तर की समृद्धि और स्थिति प्राप्त कर चुके हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ’ (1992) वाद में क्रीमी लेयर की अवधारणा को अनिवार्य किया था, जिसमें कहा गया था कि आरक्षण नीति को ‘पिछड़ेपन के सबसे पिछड़े’ वर्गों को लाभ पहुँचाना चाहिए।
  • केंद्र सरकार ने 8 सितंबर 1993 को एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए मानदंड निर्धारित किए थे, जिसमें विभिन्न श्रेणियों जैसे संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति, उच्च आय वर्ग, पेशेवर, संपत्ति धारक आदि को शामिल किया गया था।
  • वर्तमान में, क्रीमी लेयर की पहचान के लिए वार्षिक आय की सीमा 8 लाख रुपये निर्धारित है। इस सीमा से अधिक आय वाले OBC परिवारों के बच्चों को क्रीमी लेयर में माना जाता है और वे आरक्षण के पात्र नहीं होते।
  • सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के मामले में, पद की स्थिति (जैसे समूह ‘ए’ या ‘बी’ अधिकारी) और माता-पिता की आय दोनों को क्रीमी लेयर के निर्धारण में ध्यान में रखा जाता है, हालांकि वेतन को आय गणना में शामिल करने या न करने पर विवाद रहा है।
  • क्रीमी लेयर का सिद्धांत केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) पर लागू होता है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में यह सिद्धांत लागू नहीं होता है, जैसा कि केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामे में स्पष्ट किया है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
क्रीमी लेयर का निर्धारण यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पिछड़े वर्गों के सबसे जरूरतमंद व्यक्तियों तक पहुँचे, जिससे सामाजिक न्याय का उद्देश्य पूरा हो।
आय और संपत्ति का मानदंड क्रीमी लेयर की पहचान में केवल माता-पिता के वेतन या आय के बजाय उनके पद और संपत्ति को भी शामिल करने से निर्धारण अधिक व्यापक और सटीक होता है।
समान अवसर क्रीमी लेयर के स्पष्ट और सुसंगत मानदंड यह सुनिश्चित करते हैं कि सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिलें और किसी के साथ मनमाना भेदभाव न हो।
न्यायिक समीक्षा उच्चतम न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर के मानदंडों की समीक्षा और व्याख्या, संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नीतियों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
प्रशासनिक दक्षता स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में भर्ती प्रक्रियाओं में देरी हो सकती है, जिससे प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है।

महत्व

सामाजिक न्याय

  • क्रीमी लेयर का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुँचे जो वास्तव में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं, न कि उन तक जो पहले से ही समाज में एक निश्चित स्तर की संपन्नता प्राप्त कर चुके हैं।
  • यह आरक्षण के पीछे के मूल उद्देश्य को बनाए रखता है, जो कि पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना और असमानताओं को कम करना है।

प्रशासनिक और भर्ती प्रक्रियाएँ

  • क्रीमी लेयर के मानदंडों में स्पष्टता संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) जैसी भर्ती एजेंसियों को उम्मीदवारों की पात्रता का निर्धारण करने में मदद करती है, जिससे भर्ती प्रक्रिया सुचारु रूप से चलती है।
  • मानदंडों में बार-बार बदलाव या अस्पष्टता से भर्ती प्रक्रियाओं में देरी हो सकती है, जैसा कि CSE-2025 के सर्विस अलोकेशन के मामले में देखा जा रहा है, जिससे चयनित अधिकारियों के प्रशिक्षण और कैडर आवंटन पर असर पड़ता है।

संवैधानिक और कानूनी आयाम

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा क्रीमी लेयर के मानदंडों की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता) के सिद्धांतों के अनुरूप होती है।
  • यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ न्यायालय यह सुनिश्चित करता है कि सरकारी नीतियाँ संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में हों।

चुनौतियाँ

1. क्रीमी लेयर की परिभाषा में अस्पष्टता

  • क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए ‘आय’ और ‘पद’ जैसे कारकों को कैसे तौला जाए, इस पर स्पष्टता का अभाव।
  • माता-पिता के वेतन बनाम अन्य स्रोतों से आय को शामिल करने पर विवाद।

2. भर्ती प्रक्रियाओं में देरी

  • क्रीमी लेयर के मानदंडों में बदलाव या न्यायिक हस्तक्षेप से भर्ती प्रक्रियाओं में अनिश्चितता और देरी।
  • चयनित उम्मीदवारों के सर्विस अलोकेशन, प्रशिक्षण और कैडर आवंटन पर नकारात्मक प्रभाव।

3. उम्मीदवारों के साथ संभावित भेदभाव

  • यदि नए नियम पिछली तारीख से लागू होते हैं, तो उन उम्मीदवारों के साथ भेदभाव हो सकता है जिन्होंने पुराने नियमों के आधार पर परीक्षा दी थी।
  • कुछ OBC उम्मीदवारों को आयु में छूट और अतिरिक्त प्रयासों का लाभ न मिल पाना।

4. न्यायिक हस्तक्षेप और नीति निर्माण

  • न्यायालय के निर्णयों का नीति निर्माण और सरकारी कार्यालय ज्ञापनों (Office Memorandums) पर प्रभाव।
  • सरकार और न्यायपालिका के बीच नीतिगत मामलों में समन्वय की आवश्यकता।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
क्रीमी लेयर की परिभाषा केवल माता-पिता की आय के बजाय पद और संपत्ति को भी शामिल करने से जटिलता बढ़ सकती है।
पिछली तारीख से लागू होना यदि नए मानदंड पिछली तारीख से लागू होते हैं, तो उन उम्मीदवारों के साथ अन्याय हो सकता है जिन्होंने पुराने नियमों के तहत आवेदन किया था।
भर्ती प्रक्रिया में व्यवधान क्रीमी लेयर की दोबारा जांच से CSE-2025 जैसी परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
सेवा आवंटन में देरी देरी से चयनित अधिकारियों के प्रशिक्षण, कैडर आवंटन, वरिष्ठता और वेतन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
SC/ST आरक्षण पर प्रभाव केंद्र सरकार का यह रुख कि SC/ST आरक्षण में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता, भविष्य में इस पर बहस को जन्म दे सकता है।

आगे की राह

  • क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए एक स्पष्ट, व्यापक और सुसंगत नीति तैयार की जाए, जिसमें आय, पद और संपत्ति जैसे सभी प्रासंगिक कारकों को शामिल किया जाए।
  • सरकार को उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का सम्मान करते हुए, नीतिगत अस्पष्टताओं को दूर करने के लिए आवश्यक संशोधन और स्पष्टीकरण जारी करने चाहिए।
  • भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और स्थिरता सुनिश्चित की जाए, ताकि उम्मीदवारों को नियमों में अचानक बदलाव के कारण नुकसान न हो।
  • यदि नियमों में बदलाव आवश्यक हो, तो उन्हें भविष्य की तारीख से लागू किया जाए, ताकि उन उम्मीदवारों के हितों की रक्षा हो सके जिन्होंने मौजूदा नियमों के तहत आवेदन किया था।
  • न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए, ताकि सामाजिक न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करते हुए प्रशासनिक दक्षता बनी रहे।
  • क्रीमी लेयर के मानदंडों की समय-समय पर समीक्षा की जाए ताकि वे सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप रहें और आरक्षण का लाभ सही लाभार्थियों तक पहुँचे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

क्रीमी लेयर · अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण · संवैधानिक प्रावधान · समानता का अधिकार · सामाजिक न्याय · आरक्षण नीति · इंदिरा साहनी वाद · रोहित नाथन वाद · प्रशासनिक दक्षता · न्यायिक समीक्षा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘विधि के समक्ष समता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘भेदभाव का प्रतिषेध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 16’, ‘note’: ‘लोक नियोजन में अवसर की समता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 340’, ‘note’: ‘पिछड़े वर्गों की दशाओं के अन्वेषण’}

अवधारणा प्रवाह

उच्चतम न्यायालय का क्रीमी लेयर पर फैसला  →  केंद्र सरकार द्वारा CSE-2025 के लिए पुराने मानदंड लागू करने की मांग  →  क्रीमी लेयर निर्धारण में आय, पद और संपत्ति पर बहस  →  भर्ती प्रक्रिया में संभावित देरी और उम्मीदवारों पर प्रभाव  →  सामाजिक न्याय और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन की आवश्यकता  →  उच्चतम न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई और अंतिम निर्णय

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. क्रीमी लेयर (Creamy Layer) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. क्रीमी लेयर का सिद्धांत केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण पर लागू होता है, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) पर नहीं।
2. केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 के उम्मीदवारों के लिए पुरानी क्रीमी लेयर मानदंड के आधार पर सेवा आवंटन प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति मांगी है।
3. ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि माता-पिता की पद की स्थिति के साथ आय और संपत्ति को भी क्रीमी लेयर की पहचान के लिए देखना आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि SC और ST आरक्षण में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं होता, यह केवल OBC और SEBC पर लागू है। कथन 2 सही है। केंद्र सरकार ने CSE-2025 के 958 चयनित उम्मीदवारों की सेवा आवंटन प्रक्रिया पुराने OBC क्रीमी लेयर मानदंड के आधार पर करने की अनुमति मांगी है। कथन 3 गलत है। ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र को 8 सितंबर 1993 के कार्यालय ज्ञापन को बदलने वाला नहीं माना था, और केंद्र सरकार ने ही यह दलील दी है कि केवल माता-पिता की सैलरी या आय के आधार पर किसी उम्मीदवार को OBC क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए माता-पिता के पद की स्थिति के साथ आय और संपत्ति को भी देखना जरूरी है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्रीमी लेयर के सिद्धांत से संबंधित है?

  1. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
  2. इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ
  3. मेनका गांधी बनाम भारत संघ
  4. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ

उत्तर: इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ — इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण को बरकरार रखा था, लेकिन ‘क्रीमी लेयर’ के सिद्धांत को भी पेश किया था, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में पिछड़े वर्गों तक पहुँच सके।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के सिद्धांत की अवधारणा और इसके संवैधानिक आधारों का परीक्षण कीजिए। हालिया न्यायिक निर्णयों और केंद्र सरकार के रुख के आलोक में, इस सिद्धांत के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: क्रीमी लेयर की अवधारणा को परिभाषित करें और बताएं कि यह OBC आरक्षण से कैसे संबंधित है।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4) का उल्लेख करें, जो सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देते हैं। समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से इसका संबंध स्थापित करें।
3. इंदिरा साहनी वाद (1992): इस ऐतिहासिक निर्णय का उल्लेख करें, जिसने OBC आरक्षण को वैध ठहराया और क्रीमी लेयर के सिद्धांत को पेश किया। बताएं कि इसका उद्देश्य आरक्षण के लाभों को सबसे वंचितों तक पहुंचाना था।
4. क्रीमी लेयर की पहचान के मानदंड: वर्तमान में आय, पद, संपत्ति आदि के आधार पर क्रीमी लेयर की पहचान के लिए निर्धारित मानदंडों का उल्लेख करें।
5. ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ वाद: इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले और केंद्र सरकार की दलीलों का संदर्भ दें, जिसमें माता-पिता की आय के साथ पद और संपत्ति को भी देखने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
6. कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियाँ: सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2025 के संदर्भ में केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई चुनौतियों पर चर्चा करें, जैसे कि पुराने और नए नियमों के बीच विरोधाभास, उम्मीदवारों के साथ संभावित भेदभाव, परीक्षा प्रक्रिया में देरी और प्रशासनिक दक्षता पर प्रभाव।
7. निष्कर्ष: सामाजिक न्याय और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन साधने की आवश्यकता पर बल दें, ताकि आरक्षण का उद्देश्य पूरा हो सके और साथ ही चयन प्रक्रिया में स्थिरता बनी रहे।

स्रोत: bhaskar.com


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