08 Sep UPSC Civil Services (Main) Examination 2026 — Hindi Literature Paper I: Questions with Model Answers | Plutus IAS
The questions below are from Hindi Literature Paper I of UPSC Civil Services (Main) Examination 2026 (held 2026-08-30) — the actual paper, which is public. Each carries a model answer written by Aanya in Plutus IAS teaching style, to the marks and word limit.
Official source: official (upsc.gov.in).
Q1. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए (प्रत्येक लगभग 150 शब्दों में) : 10×5=50 (a) आरम्भिक हिन्दी का वैशिष्ट्य (b) अवधी का व्याकरणिक रूप (c) दक्खिनी हिन्दी का क्षेत्र एवं भाषा-स्वरूप (d) हिन्दी और उसकी बोलियों का अंतर्सम्बन्ध (e) देवनागरी लिपि में सुधार समिति द्वारा किए गए संशोधन (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में ‘टिप्पणी’ शब्द निर्देश करता है कि विषय-वस्तु का संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत किया जाए। प्रत्येक भाग लगभग 150 शब्दों में लिखना है, अतः विषय की संक्षिप्त पृष्ठभूमि, प्रमुख विशेषताएँ एवं उदाहरणों के साथ तर्क संगत प्रस्तुति अपेक्षित है। सामान्यतः परीक्षार्थी या तो विषय को बहुत विस्तार से लिख देते हैं अथवा केवल परिभाषा तक सीमित रह जाते हैं। दोनों ही स्थितियाँ अंक हानि का कारण बनती हैं। स्मरण रखें—प्रत्येक भाग में तीन स्पष्ट आयामों (पृष्ठभूमि, विशेषताएँ, उदाहरण/प्रमाण) को शामिल करें।
Model answer
(a) आरम्भिक हिन्दी का वैशिष्ट्य
आरम्भिक हिन्दी (संवत् 1050-1350 ई.) का वैशिष्ट्य उसकी अपभ्रंश से स्वतंत्र पहचान एवं लोकभाषा के रूप में विकास में निहित है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में अपभ्रंश के शब्दों तथा व्याकरणिक रूपों का स्थानीयकरण, देशज शब्दों का समावेश तथा राजस्थानी, ब्रज, अवधी आदि बोलियों का उद्भव शामिल है। उदाहरणार्थ, विद्यापति के पदों में मैथिली अपभ्रंश के साथ-साथ लोकभाषा का मिश्रण दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार, चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ में अपभ्रंश के साथ-साथ अपभ्रंशोन्मुख शब्दों का प्रयोग हुआ है। इस काल में साहित्यिक भाषा का निर्माण आरम्भ हुआ, जिसने बाद की हिन्दी की नींव रखी।
(b) अवधी का व्याकरणिक रूप
अवधी हिन्दी की एक प्रमुख बोली है जिसका व्याकरणिक रूप अत्यंत समृद्ध है। इसकी प्रमुख विशेषताओं में पुल्लिंग एवं स्त्रीलिंग का स्पष्ट भेद, बहुवचन बनाने में ‘-न’ प्रत्यय का प्रयोग (जैसे ‘लड़का-लड़के’, ‘लड़की-लड़कियाँ’), तथा क्रिया रूपों में ‘-हिं’, ‘-हैं’, ‘-हो’ जैसे प्रत्ययों का प्रयोग शामिल है। उदाहरणार्थ, ‘मैं जाता हूँ’ के स्थान पर ‘मैं जात हूँ’ का प्रयोग मिलता है। अवधी में ‘हो’ तथा ‘हैं’ का प्रयोग सामान्य भूतकाल में होता है, जैसे ‘गया हो’ अथवा ‘गयी हो’। इसके अतिरिक्त, अवधी में ‘-औ’ प्रत्यय का प्रयोग संबोधन में होता है, जैसे ‘बेटा-औ’।
(c) दक्खिनी हिन्दी का क्षेत्र एवं भाषा-स्वरूप
दक्खिनी हिन्दी दक्षिण भारत में बोली जाने वाली हिन्दी की एक प्रमुख बोली है, जिसका क्षेत्र मुख्यतः महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु के कुछ भाग शामिल हैं। इसकी प्रमुख विशेषताओं में फारसी तथा अरबी शब्दों का अधिक प्रयोग, हिन्दी के साथ मराठी तथा कन्नड़ के शब्दों का मिश्रण तथा व्याकरणिक रूपों में स्थानीय प्रभाव शामिल हैं। उदाहरणार्थ, ‘मैं’ के स्थान पर ‘हौं’ तथा ‘हैं’ का प्रयोग मिलता है। दक्खिनी हिन्दी में ‘-ण’ प्रत्यय का प्रयोग बहुवचन बनाने में होता है, जैसे ‘लड़का-लड़काण’। इसके अतिरिक्त, इसमें ‘-इ’ प्रत्यय का प्रयोग स्त्रीलिंग बनाने में होता है, जैसे ‘लड़का-लड़की’।
(d) हिन्दी और उसकी बोलियों का अंतर्सम्बन्ध
हिन्दी और उसकी बोलियों का अंतर्सम्बन्ध अत्यंत गहरा है। हिन्दी की बोलियाँ हिन्दी के विकास का आधार हैं तथा इनमें से अनेक बोलियाँ हिन्दी की मानक भाषा में विलीन हो गई हैं। उदाहरणार्थ, ब्रज, अवधी तथा भोजपुरी बोलियाँ हिन्दी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसी प्रकार, राजस्थानी बोली में प्रयुक्त शब्द तथा व्याकरणिक रूप हिन्दी में समाहित हो गए हैं। हिन्दी और उसकी बोलियों का अंतर्सम्बन्ध केवल भाषा-विज्ञान तक सीमित नहीं है, अपितु साहित्यिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(e) देवनागरी लिपि में सुधार समिति द्वारा किए गए संशोधन
देवनागरी लिपि में सुधार के लिए 1960 में भारत सरकार द्वारा एक समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने लिपि के मानकीकरण तथा सरलीकरण पर ध्यान केंद्रित किया। प्रमुख संशोधनों में ‘क्ष’, ‘त्र’, ‘ज्ञ’ जैसे संयुक्ताक्षरों के लिए अलग-अलग वर्णों का प्रयोग, ‘र’ के ऊपर हलंत चिह्न का प्रयोग तथा ‘ळ’ जैसे वर्णों को शामिल करना शामिल था। इसके अतिरिक्त, समिति ने लिपि के लेखन में एकरूपता लाने के लिए कुछ नियमों का भी निर्धारण किया। इन संशोधनों का उद्देश्य लिपि को अधिक सुगम तथा वैज्ञानिक बनाना था।
Q2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : (a) संविधान में वर्णित राजभाषा-संबंधी प्रावधानों की विवेचना कीजिए। 20 (b) रहीम की काव्यभाषा का सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए। 15 (c) वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी भाषा के विकास का सर्वेक्षण कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
प्रश्न ‘वर्णन’ (describe) तथा ‘स्पष्ट कीजिए’ (elucidate) शब्दों द्वारा निर्देशित है। परीक्षक राजभाषा नीति के संवैधानिक प्रावधानों की गहन समझ, रहीम की काव्यभाषा के सौन्दर्यशास्त्रीय पक्ष तथा वैज्ञानिक-तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी के विकास का सर्वेक्षण करने की क्षमता का आकलन करता है। आदर्श उत्तर तीन भागों में होगा: (1) संविधान के अनुच्छेदों एवं नीति निर्देशक तत्त्वों का विश्लेषण, (2) रहीम के काव्य में भाषा के सौन्दर्य के तीन आयाम—शब्द चयन, बिम्बविधान, शैलीगत विशेषता—और (3) हिन्दी के वैज्ञानिक-तकनीकी विकास के चार स्तंभ—प्रौद्योगिकी मंत्रालय, तकनीकी शब्दावली आयोग, राष्ट्रीय अनुवाद मिशन तथा शिक्षा नीति। सामान्य भूल: केवल अनुच्छेद संख्या लिख देना अथवा रहीम के पद्यों का भावार्थ प्रस्तुत कर देना; तकनीकी विकास के स्रोतों (सरकारी योजनाओं/समितियों) का उल्लेख न करना।
Model answer
राजभाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान भारतीय राज्य की भाषायी.Identity एवं प्रशासनिक एकता के मूलाधार हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में घोषित किया गया कि संघ की राजभाषा हिन्दी तथा लिपि देवनागरी होगी। साथ ही, अनुच्छेद 344 में राजभाषा आयोग एवं संसदीय समिति का गठन किया गया ताकि हिन्दी के विकास एवं प्रचार-प्रसार हेतु नीति निर्माण हो सके। अनुच्छेद 351 हिन्दी को समृद्ध करने के लिये संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने का मार्ग प्रशस्त करता है।
राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्वों में अनुच्छेद 350(क) प्रत्येक राज्य में बालकों को मातृभाषा में शिक्षा प्रदान करने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 350(ख) भाषायी अल्पसंख्यकों को उनकी भाषा में शिक्षा देने का दायित्व राज्य पर डालता है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 348 उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों में अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति देते हुए भी हिन्दी के प्रयोग की संभावना खुली रखता है।
रहीम की काव्यभाषा का सौन्दर्य उनकी भाषा में ‘सधुक्कड़ी’ शैली का प्रयोग, अलंकारों की सहजता तथा भावानुकूल शब्द-चयन दिखाई देता है। रहीम ने ‘बानी’ को ‘बानी अमिय रसायन’ कहा है, जो उनकी भाषा को अमृततुल्य बनाता है। उनकी शब्द-योजना में अरबी-फारसी शब्दों का मिश्रण तथा लोकभाषा के शब्दों का प्रयोग उनकी काव्य-भाषा को सर्वग्राही बनाता है। उदाहरणार्थ, ‘रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून’ में ‘पानी’ शब्द द्विअर्थी है—जल एवं प्रतिष्ठा।
वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी का विकास सरकारी प्रयासों एवं संस्थागत ढाँचे से निर्देशित है। तकनीकी शब्दावली आयोग (1961) द्वारा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली तैयार की गई, जिसके फलस्वरूप ‘कम्प्यूटर’, ‘इंटरनेट’, ‘मोबाइल’ जैसे शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे। राष्ट्रीय अनुवाद मिशन (2009) द्वारा वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य का हिन्दी में अनुवाद किया जा रहा है। प्रौद्योगिकी विकास एवं उपयोग मंत्रालय द्वारा ‘ई-गवर्नेस’ एवं ‘डिजिटल इंडिया’ के अन्तर्गत हिन्दी में तकनीकी संसाधनों का निर्माण किया जा रहा है। शिक्षा नीति 2020 में बहुभाषावाद एवं मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है।
निष्कर्षतः, राजभाषा नीति संविधान के माध्यम से राष्ट्र की भाषायी एकता एवं प्रशासनिक सुगमता सुनिश्चित करती है। रहीम की काव्यभाषा उनकी सांस्कृतिक दृष्टि एवं लोकमंगल की भावना को प्रतिबिम्बित करती है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी का विकास सरकारी संस्थाओं एवं नीति-निर्देशों के माध्यम से हो रहा है, जो राष्ट्रीय एकता एवं आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण है।
Q3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : (a) मध्यकाल में साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा के विकास पर प्रकाश डालिए। 20 (b) पहाड़ी हिन्दी की प्रमुख बोलियों की विशेषताएँ बताइए। 15 (c) नाथ-साहित्य में खड़ी बोली का आरंभिक स्वरूप स्पष्ट कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
प्रश्न में ‘विकास’, ‘विशेषताएँ’ और ‘आरंभिक स्वरूप’ जैसे निर्देशात्मक शब्द हैं। परखिये कि परीक्षक कारण-परिणाम संबंध, भाषिक विशेषताओं का विश्लेषण और ऐतिहासिक कालक्रम की समझ को आँक रहा है। तीन भागों में उत्तर दें: (1) ब्रजभाषा/पहाड़ी/खड़ी बोली का उद्भव एवं कारण, (2) उसकी भाषिक एवं साहित्यिक विशेषताएँ, (3) प्रमाणिक उदाहरण एवं प्रभाव। सामान्य भूल: केवल नाम गिनाने तक सीमित रह जाना और कालक्रम अथवा कारणों का विश्लेषण न करना।
Model answer
मध्यकालीन साहित्यिक भाषा के रूप में ब्रजभाषा का विकास
मध्यकाल (10वीं-18वीं शताब्दी) में ब्रजभाषा ने साहित्यिक भाषा के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की। इसका विकास भक्ति आन्दोलन और सगुण भक्ति केन्द्रित कृष्ण-भक्ति काव्य से जुड़ा है। 12वीं शताब्दी में जयदेव की ‘गीत गोविन्द’ ने ब्रजभाषा के साहित्यिक मानकों की नींव रखी। तत्पश्चात् सूरदास (1478-1583), मीराबाई और बिहारी जैसे कवियों ने ब्रजभाषा को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित किया।
ब्रजभाषा के विकास के प्रमुख कारण थे: (i) कृष्ण-भक्ति का लोकप्रिय होना, जिसके कारण ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृन्दावन) सांस्कृतिक केंद्र बना; (ii) संगीतात्मकता—ब्रजभाषा में पदावली, अलंकार और ध्वन्यात्मक सौन्दर्य का समावेश; (iii) सामाजिक स्वीकृति—राजदरबारों और गुरु-शिष्य परम्परा में इसका प्रयोग।
इस काल में ब्रजभाषा के साहित्यिक रूप में अपभ्रंश से पुरानी हिन्दी में संक्रमण देखा गया। ब्रजभाषा ने दोहा-चौपाई जैसे छन्दों के साथ-साथ पद और खण्डकाव्य की रचना को प्रोत्साहित किया। इसने आगे चलकर खड़ी बोली के विकास को भी प्रभावित किया। इस प्रकार, ब्रजभाषा मध्यकालीन साहित्यिक भाषा के रूप में एक मॉडल बन गई।
Q4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : (a) खड़ी बोली हिन्दी के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए उसके मानकीकरण पर प्रकाश डालिए। 20 (b) हिन्दी-सूफी कवियों की लोकोन्मुखता को सोदाहरण निरूपित कीजिए। 15 (c) “हिन्दी नई चाल में ढली।” इस कथन की तर्कपूर्ण व्याख्या कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न का मुख्य शब्द ‘प्रस्तुत करते हुए’ एवं ‘प्रकाश डालिए’ है, जिससे स्पष्ट है कि परीक्षार्थी से अपेक्षा है कि वह खड़ी बोली के विकास की रूपरेखा प्रस्तुत करे तथा उसके मानकीकरण पर प्रकाश डालते हुए तर्कपूर्ण व्याख्या करे। सर्वोत्तम उत्तर की संरचना तीन भागों में होनी चाहिए: (1) खड़ी बोली के विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं प्रमुख चरण, (2) मानकीकरण के प्रयास एवं उसके प्रमुख कारक, (3) उदाहरण सहित प्रमाण। सामान्यतः परीक्षार्थी ‘मानकीकरण’ को केवल ‘व्याकरणिक मानकीकरण’ तक सीमित कर देते हैं, जबकि वास्तव में इसमें साहित्यिक, राजनैतिक एवं प्रशासनिक आयाम भी शामिल हैं।
Model answer
खड़ी बोली हिन्दी के विकास की रूपरेखा एवं मानकीकरण
खड़ी बोली हिन्दी का विकास मध्यकालीन भारत की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों से जुड़ा है। इसका आरम्भ दिल्ली सल्तनत एवं मुगल काल में हुआ जब शासन की भाषा के रूप में फारसी के साथ-साथ जनभाषा के रूप में ‘खड़ी बोली’ का प्रयोग होने लगा।
विकास के प्रमुख चरण
- आदिकाल (वीरगाथाओं एवं चारण साहित्य): विद्वानों के अनुसार खड़ी बोली के बीज ‘ढोला मारू’ जैसे लोकगाथाओं में मिलते हैं, जहाँ अपभ्रंश से खड़ी बोली की ओर संक्रमण दिखाई देता है।
- भक्ति काल (15वीं-17वीं शताब्दी):
- कबीर, तुलसीदास एवं सूरदास जैसे संत कवियों ने खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
- तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ एवं सूरदास के ‘सूरसागर’ ने खड़ी बोली को जन-जन तक पहुँचाया।
- उन्नीसवीं शताब्दी एवं आधुनिक काल:
- 1800 ई. में ‘प्रेमसागर’ (लल्लू लाल) एवं ‘नासिकेतोपाख्यान’ (सदल मिश्र) ने खड़ी बोली को गद्य का माध्यम बनाया।
- 1837 में राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ ने ‘निज भाषा उन्नति’ नामक लेखमाला लिखकर खड़ी बोली को प्रशासनिक भाषा बनाने का प्रयास किया।
- 1857 में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ (काशी) एवं 1893 में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ (इलाहाबाद) की स्थापना ने मानकीकरण की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मानकीकरण के प्रमुख प्रयास
- व्याकरणिक मानकीकरण: 19वीं शताब्दी में ‘ब्रज भाषा’ एवं ‘अवधी’ के स्थान पर खड़ी बोली को मानक भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए व्याकरण एवं शब्दकोशों का निर्माण हुआ।
- राजनैतिक एवं प्रशासनिक प्रयास:
- 1835 में ‘चार्ल्स ट्रेवेलियन’ द्वारा अंग्रेजी के साथ हिन्दी को भी सरकारी भाषा बनाने का प्रस्ताव।
- 1918 में ‘महात्मा गांधी’ ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का आह्वान किया।
- 1950 में संविधान के अनुच्छेद 343(1) द्वारा हिन्दी को संघ की राजभाषा स्वीकार किया गया।
- साहित्यिक मानकीकरण: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी एवं रामचन्द्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने खड़ी बोली को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।
निष्कर्ष
खड़ी बोली हिन्दी का विकास केवल भाषिक परिवर्तन नहीं, अपितु सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आन्दोलनों का परिणाम है। इसके मानकीकरण में साहित्यकारों, समाज सुधारकों एवं राजनेताओं की समान भूमिका रही है। आज हिन्दी न केवल भारत की संपर्क भाषा है, अपितु वैश्विक स्तर पर भी अपनी पहचान बना रही है।
Q5. निम्नलिखित पर टिप्पणियाँ लिखिए (प्रत्येक लगभग 150 शब्दों में) : 10×5=50 (a) तुलसी का समन्वयवाद (b) शुक्लोत्तर साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख विशेषताएँ (c) जयशंकर प्रसाद के काव्य में मानवीय भूमि (d) हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष (e) आधुनिक हिन्दी रंगमंच की चुनौतियाँ (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में ‘टिप्पणी’ शब्द निर्देश करता है कि उत्तर संक्षिप्त, सारगर्भित एवं विश्लेषणात्मक हो। प्रत्येक भाग का उत्तर लगभग 150 शब्दों में देना है, जिसमें विषय की मूल अवधारणा, उसके प्रमुख पक्ष एवं उदाहरणों का समावेश अपेक्षित है। सामान्यतः परीक्षार्थी विषय की गहराई में जाने के स्थान पर केवल परिभाषा पर ही रुक जाते हैं, जबकि यहाँ विश्लेषणात्मक दृष्टि एवं सटीक उदाहरण अपेक्षित हैं।
Model answer
(a) तुलसी का समन्वयवाद
तुलसीदास जी के साहित्य में समन्वयवाद एक प्रमुख दर्शन है, जिसमें भक्ति, ज्ञान, कर्म तथा राजमार्ग का समन्वय दिखाई देता है। रामचरितमानस में उन्होंने राम को ईश्वर, मानव तथा आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत किया है। तुलसी ने सगुण और निर्गुण भक्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए कहा कि राम भक्ति के माध्यम से ही मोक्ष संभव है।
उदाहरणस्वरूप, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’ पद में तुलसी ने ज्ञान, भक्ति एवं कर्म के समन्वय को रेखांकित किया है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने लोकमंगल की भावना को भी प्रमुखता दी, जिससे समाज में एकता और सद्भावना का संदेश मिलता है। तुलसी का समन्वयवाद केवल धार्मिक नहीं, अपितु सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
(b) शुक्लोत्तर साहित्येतिहास-लेखन की प्रमुख विशेषताएँ
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पश्चात् साहित्येतिहास-लेखन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं सामाजिक संदर्भ को प्रमुखता मिली। शुक्लोत्तर विद्वानों ने साहित्य को केवल कालक्रमिक विकास के रूप में नहीं, अपितु सामाजिक-राजनीतिक परिवेश से जोड़कर देखा।
उदाहरणस्वरूप, डॉ. नगेन्द्र ने अपने ग्रंथों में साहित्य को सामाजिक-आर्थिक परिवेश से जोड़कर विश्लेषित किया। इसी प्रकार, डॉ. रामविलास शर्मा ने साहित्येतिहास को राष्ट्रीय चेतना के विकास से जोड़ा। शुक्लोत्तर साहित्येतिहास में तुलनात्मक अध्ययन एवं विविध विधाओं का समावेश भी हुआ।
(c) जयशंकर प्रसाद के काव्य में मानवीय भूमि
जयशंकर प्रसाद के काव्य में मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। उनके काव्य में प्रेम, विरह, प्रकृति एवं मानव मन की गहराइयों का चित्रण हुआ है। प्रसाद ने मानवीय भूमि को आध्यात्मिक एवं लौकिक दोनों दृष्टियों से प्रस्तुत किया है।
उदाहरणस्वरूप, ‘कामायनी’ में मनु एवं श्रद्धा के माध्यम से मानव मन की जटिलताओं को दर्शाया गया है। इसी प्रकार, ‘लहर’ काव्य-संग्रह में प्रेम एवं प्रकृति के माध्यम से मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति हुई है। प्रसाद के काव्य में मानवीय भूमि का चित्रण सौंदर्यबोध एवं दार्शनिकता के साथ हुआ है।
(d) हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि का सांस्कृतिक पक्ष
हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना-दृष्टि में सांस्कृतिक अध्ययन प्रमुख रहा है। उन्होंने साहित्य को केवल साहित्यिक दृष्टि से नहीं, अपितु सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़कर देखा। द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति के विकास में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया।
उदाहरणस्वरूप, ‘सूर साहित्य’ में उन्होंने सूरदास के काव्य को भारतीय संस्कृति के विकास से जोड़ा। इसी प्रकार, ‘अलंकार प्रकाश’ में उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र के सांस्कृतिक पक्ष को उजागर किया। द्विवेदी जी की आलोचना-दृष्टि सांस्कृतिक राष्ट्रीयता एवं साहित्यिक परंपरा के बीच सामंजस्य स्थापित करती है।
(e) आधुनिक हिन्दी रंगमंच की चुनौतियाँ
आधुनिक हिन्दी रंगमंच को अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पहली चुनौती है प्रेक्षक वर्ग की कमी एवं व्यावसायिकता का अभाव। रंगमंच को जीवंत बनाए रखने के लिए नए दर्शकों की आवश्यकता है।
दूसरी चुनौती है आर्थिक संसाधनों की कमी, जिसके कारण रंगमंच के कलाकारों एवं निर्देशकों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तीसरी चुनौती है तकनीकी विकास एवं नए माध्यमों के साथ प्रतिस्पर्धा। इसके अतिरिक्त, सामाजिक विषयों पर आधारित नाटकों की कमी भी एक बड़ी चुनौती है।
आधुनिक हिन्दी रंगमंच को इन चुनौतियों का सामना करते हुए नए प्रयोगों एवं तकनीकी नवाचार के माध्यम से पुनर्जीवित किया जा सकता है।
Q6. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) “भारतेन्दु के नाटक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के औजार थे।” इस कथन की तर्कसम्मत व्याख्या कीजिए। 20 – (b) रीतिमुक्त काव्यधारा में अभिव्यक्त वैयक्तिकता की विवेचना कीजिए। 15 – (c) “अज्ञेय के काव्य में व्यक्ति और समाज का द्वंद्व है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में ‘व्याख्या’ शब्द पर ध्यान दें— इसका अर्थ है तर्कसम्मत, प्रमाणित उत्तर देना। परीक्षक भारतेन्दु के नाटकों के सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव, रीतिमुक्त काव्य में व्यक्तिवाद तथा अज्ञेय के द्वंद्वात्मक चिंतन को परखना चाहते हैं। सर्वोत्तम उत्तर तीन भागों में होगा: (1) प्रत्यक्ष प्रमाण (नाटक/कविता उदाहरण), (2) सैद्धांतिक आधार (साहित्यिक आंदोलन/काव्य सिद्धांत), (3) प्रभाव/निष्कर्ष। सामान्य भूल: केवल उदाहरण देने तक सीमित रह जाना या केवल सिद्धांत पर टिके रहना— दोनों असंतुलित होंगे।
Model answer
भारतेन्दु के नाटक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के औजार थे।
परिचय : भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–1885) हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनके नाटकों में औपनिवेशिक शासन, सामाजिक कुरीतियाँ और राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्ति मिली। ये नाटक न केवल मनोरंजन के साधन थे, अपितु जनजागरण के प्रभावी माध्यम भी सिद्ध हुए।
तर्कसम्मत व्याख्या :
- सामाजिक सुधार : भारतेन्दु ने अपने नाटकों जैसे अंधेर नगरी (1881) एवं भारत दुर्दशा (1875) के माध्यम से अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भ्रष्टाचार पर प्रहार किया। अंधेर नगरी में काल्पनिक राज्य की व्यंग्यात्मक प्रस्तुति के जरिए उन्होंने अंग्रेजी शासन और भारतीय समाज की मिलीभगत को उजागर किया।
- राजनीतिक चेतना : भारत दुर्दशा में उन्होंने विदेशी शासन के प्रति असंतोष व्यक्त किया तथा राष्ट्रीय एकता का आह्वान किया। भारतेन्दु ने अपने नाटकों के माध्यम से ‘स्वदेशी’ और ‘स्वाभिमान’ की भावना को बल दिया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी।
- जनसंचार माध्यम : भारतेन्दु ने नाटकों के साथ-साथ ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ एवं ‘कविवचन सुधा’ जैसे पत्रों का संपादन किया, जिससे उनके विचारों का व्यापक प्रसार हुआ।
निष्कर्ष : भारतेन्दु के नाटक साहित्यिक रचनाएँ मात्र नहीं, अपितु सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के सशक्त औजार थे। उन्होंने हिंदी साहित्य को राष्ट्रीय चेतना से जोड़कर एक नई दिशा प्रदान की, जिसने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
Q7. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) हिन्दी की मनोविश्लेषणवादी आलोचना का विकास निरूपित कीजिए। 20 – (b) भीष्म साहनी के उपन्यासों में साम्प्रदायिकता के यथार्थ का चित्रण कीजिए। 15 – (c) “भक्तिकाल साहित्यिक उत्कृष्टता का काल है।” स्पष्ट कीजिए। 15 (15 marks)
How to approach this question
इस प्रश्न में ‘निरूपित कीजिए’ शब्द है, जिसका अर्थ है किसी विषय की ऐतिहासिक विकास-यात्रा को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत करना। परीक्षक यहाँ मनोविश्लेषणवादी आलोचना के उद्भव, प्रवृत्तियों और योगदानों का विश्लेषणात्मक वर्णन चाहते हैं। एक उत्कृष्ट उत्तर में तीन भाग होंगे: (1) मनोविश्लेषणवाद का आरंभिक प्रभाव (फ्रायड, युंग), (2) भारतीय साहित्य में इसका अनुकूलन (अज्ञेय, रामविलास शर्मा), (3) समकालीन प्रयोग (दलित, स्त्रीवादी आलोचना)। सबसे बड़ी गलती है केवल सिद्धांतों को दुहराना—प्रत्येक बिंदु पर हिन्दी साहित्य के उदाहरणों से सिद्ध करना अनिवार्य है।
Model answer
हिन्दी की मनोविश्लेषणवादी आलोचना का विकास बीसवीं सदी के मध्य में हुआ, जब पश्चिमी मनोविज्ञान के सिद्धांतों—विशेषतः फ्रायड के ‘अचेतन मन’, ‘मुक्ति-सिद्धांत’ और युंग के ‘सामूहिक अचेतन’—ने साहित्यिक विश्लेषण को एक नया आयाम दिया। हिन्दी में इसका आरंभ ‘नयी कविता’ के दौर (1943-55) में हुआ, जब कवियों ने व्यक्तित्व-विभाजन, कुंठा और विद्रोह को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। अज्ञेय ने ‘तारसप्तक’ के माध्यम से मनोविश्लेषण को काव्य-रचना का आधार बनाया, जबकि रामविलास शर्मा ने ‘नयी कविता और अस्तित्ववाद’ (1967) में फ्रायड के ‘इदं, अहं, पराहम’ सिद्धांतों को हिन्दी कविता पर लागू किया।
साठोत्तरी दौर में मनोविश्लेषणवाद का विस्तार हुआ। ‘संस्कृत’ पत्रिका के माध्यम से ‘अचेतन मन’ और ‘दमन’ जैसे सिद्धांतों पर बहस हुई। ‘नयी कहानी’ आंदोलन में भी मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों—जैसे ‘अकेलापन’, ‘अस्मिता का संकट’—को केंद्र में रखा गया। ‘दलित साहित्य’ में मनोविश्लेषणवाद ने ‘ट्रामा’ और ‘उन्मूलन’ जैसे मनोवैज्ञानिक प्रभावों को उजागर किया, जबकि ‘स्त्रीवादी आलोचना’ ने ‘पितृसत्ता’ के मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विश्लेषण किया।
आज मनोविश्लेषणवादी आलोचना हिन्दी साहित्य में ‘साइबर मनोविज्ञान’ और ‘डिजिटल मनोविज्ञान’ जैसे नवीन आयामों तक पहुँच चुकी है, जहाँ ‘वर्चुअल रियलिटी’ और ‘सोशल मीडिया’ के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर अध्ययन किया जा रहा है। इस प्रकार, मनोविश्लेषणवाद ने हिन्दी साहित्य को ‘अंतर्मुखता’ और ‘सामाजिक यथार्थ’ के द्वंद्व का एक सशक्त माध्यम प्रदान किया है।
Q8. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए : – (a) “पुनर्जागरण भारत में नई मानवता के जन्म का आंदोलन है।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। 20 – (b) “निराला का काव्य छंद के बंधन से मुक्ति का प्रयास है।” सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। 15 – (c) हिन्दी ललित निबंध में डॉ० विद्यानिवास मिश्र का योगदान रेखांकित कीजिए। 15 SB27—594 (15 marks)
How to approach this question
निर्देश शब्द ‘व्याख्या’ है—इसका अर्थ है कि दिए गए कथन को प्रमाणित तर्कों, उदाहरणों एवं संदर्भों के माध्यम से स्पष्ट करना। परीक्षक यहाँ पुनर्जागरण के सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम, निराला के काव्य में छंद मुक्ति के प्रयास तथा मिश्र जी के ललित निबंध में योगदान का मूल्यांकन करना चाहता है। सर्वाधिक सामान्य भूल है—केवल परिभाषा लिख देना अथवा तथ्यों को बिना विश्लेषण के प्रस्तुत कर देना। उत्तर में तीन भाग होंगे: (1) कथन का आशय स्पष्ट करना, (2) प्रमाणों के साथ व्याख्या करना, (3) निष्कर्ष में समग्र प्रभाव बताना।
Model answer
प्रस्तावना : पुनर्जागरण को केवल पश्चिमी प्रभावों का अनुकरण मानना एकांगी दृष्टिकोण है। वास्तव में भारतीय पुनर्जागरण ने नवीन मानवतावादी चेतना का सृजन किया, जिसने राष्ट्रीय पहचान एवं सामाजिक सुधार को नई दिशा दी।
व्याख्या :
- नवीन मानवता का जन्म : भारतीय पुनर्जागरण ने व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय एकता पर बल दिया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा उन्मूलन (1829) के माध्यम से स्त्री गरिमा स्थापित की; दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ द्वारा वैदिक आदर्शों का पुनरुद्धार किया।
- सामाजिक सुधार आंदोलन : ब्रह्म समाज, आर्य समाज एवं थियोसोफिकल सोसाइटी जैसे संगठनों ने जाति भेद, अस्पृश्यता एवं धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध जनजागृति उत्पन्न की।
- राष्ट्रीय चेतना : बंकिम चंद्र चटर्जी के ‘वंदे मातरम’ तथा रवींद्रनाथ ठाकुर के ‘गीतांजलि’ ने राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक आधार प्रदान किया।
निष्कर्ष : पुनर्जागरण ने भारतीय समाज में नवीन मानवतावादी मूल्यों का बीजारोपण किया, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन एवं आधुनिक भारत के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई।
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प्रस्तावना : निराला का काव्य केवल साहित्यिक प्रयोग नहीं, अपितु छंद मुक्ति के माध्यम से नवीन भावबोध का सृजन है। उन्होंने पारम्परिक छंदों के बंधन को तोड़कर मुक्त छंद एवं नवीन गीतिकाव्य की रचना की।
सोदाहरण व्याख्या :
- ‘जूही की कली’ : निराला ने इस कविता में मुक्त छंद का प्रयोग करते हुए प्रेम एवं प्रकृति के सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त किया। पारम्परिक छंदों का अनुसरण न कर, उन्होंने भावानुकूल लय का निर्माण किया।
- ‘सरोज स्मृति’ : इस काव्य में निराला ने आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया तथा मुक्त छंद के माध्यम से व्यक्तिगत अनुभूतियों को व्यापक मानवीय संदर्भ में प्रस्तुत किया।
- ‘विधवा’ : सामाजिक विषमताओं पर आधारित इस कविता में निराला ने मुक्त छंद का प्रयोग कर समाज सुधार की चेतना जगाई।
निष्कर्ष : निराला के काव्य ने छंद मुक्ति के माध्यम से नवीन काव्य चेतना का सृजन किया, जिसने आधुनिक हिन्दी कविता को नई दिशा प्रदान की।
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प्रस्तावना : डॉ० विद्यानिवास मिश्र हिन्दी ललित निबंध के प्रमुख स्तंभ हैं। उनके निबंधों में संस्कृति, साहित्य एवं जीवन के सूक्ष्म पक्षों का सुंदर समन्वय मिलता है।
योगदान :
- सांस्कृतिक निबंध : ‘बिना दीवारों का घर’ एवं ‘अर्धनारीश्वर’ जैसे निबंधों में मिश्र जी ने भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को सहज एवं रोचक शैली में प्रस्तुत किया।
- जीवन दर्शन : ‘जीवन और कला’ तथा ‘साहित्य और समाज’ में उन्होंने साहित्य एवं जीवन के अंतर्संबंधों पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया।
- भाषा शैली : उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ-साथ लोकभाषा का प्रयोग मिलता है, जिससे निबंधों में प्रवाह एवं गहराई आती है।
निष्कर्ष : डॉ० मिश्र के ललित निबंधों ने हिन्दी साहित्य को सांस्कृतिक एवं दार्शनिक गहराई प्रदान की है, जिससे पाठकों में साहित्य के प्रति नई दृष्टि विकसित हुई है।
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